मंगलवार, 24 जुलाई 2012

माफ करना साथिन !


तुम्हें तो पंख मिले हैं फितरतन
जाओ न उड़ो तुम भी
कहो कि मेरा है आकाश

क्यों
आखिर क्यों चाहिए तुम्हें
उतनी ही हवा
जितनी उसके बांहों के घेरे में है
क्यों है जमीन उतनी ही तुम्हारी
जहां तक वह पीपल घनेरा है

सुनी नहीं बहस तुमने टीवी पर
बिन ब्याही भी पूरी है औरत
क्या बैर है तुम्हारा उन सहेलियों से
जिनके पर्स में रखी माचिस
कहीं भी और कभी भी
चिंगारी फेंकने के लिए रहती है तैयार

बताओ आखिर
क्या मतलब है इसका
कि एक आईना भी नहीं है तुम्हारे पास
उसे छोड़कर
जिसमें तुम संवर सको
मलिका बन सको दुनिया जहान की

तुमने तो देखी भी नहीं होगी
टांगें अपनी ऊपर से नीचे तक
पता भी है तुम्हें
कि जिन अलग-अलग नंबरों से
घेरती-बांधती हो खुद को
उसका जरूरत से ज्यादा बटनदार होना
आजादी की असीम संभावनाओं का गला घोंटना है

जानती नहीं तुम
कि छलनी से चांद निहारने की आदत तुम्हारी
आक्सीजन में मिलावट है उसके लिए
खांसने लगता है वह
हांफती है जिंदगी उसकी
तुम्हारे बस उसके कहलाने से

तुम भले बनना चाहो उसकी मैना
वह तुम्हारे दरख्त का तोता नहीं बन सकता
वन बचाओ मुहिम का एक्टिविस्ट वह
जंगली है पूरी तरह से

तुम्हें अहसास नहीं शायद
कि बेटी हो तुम उस सौतेली सोच की
जो पूरी जिंदगी सोखा आती है
अपने बाप का हुलिया जानने में
माफ करना साथिन
बिल क्लिंटन की पीढ़ी का मर्द
इससे ज्यादा ईमानदार नहीं हो सकता
कि रात ढले तक तुम्हें
अपनी दबोच से आजाद रखे

5 टिप्‍पणियां:

शालिनी कौशिक ने कहा…

एक गंभीर विचारणीय प्रस्तुति..हमें आप पर गर्व है कैप्टेन लक्ष्मी सहगल

Shravan Somvanshi ने कहा…

NIce Lines....
Good...
http://yayavar420.blogspot.in/

शिखा कौशिक ने कहा…

shabdon ki katar se purush par prahar kiya hai jordar .aabhar .

डा. श्याम गुप्त ने कहा…

-----एक बे सिर-पैर की बकवास ..

सबके अपने अपने आकाश होते हैं....सीमा में रहना ही सीमाहीनता होती है....

शिखा कौशिक ने कहा…

aage se prem ji shyam ji se poochkar sir pair sahit bakvas likha kijiyega .shyam ji ye tippani kuchh jyada hi katu shabdon se yukt hai .