शनिवार, 14 जुलाई 2012

अपराध तो अपराध है और कुछ नहीं ...

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बलात्कार ,छेड़छाड़ ऐसे अपराध जो नारी जाति के विरुद्ध घटित होते हैं और  जिनकी पीड़ित हमेशा से नारी जाति ही  होती है .ऐसे अपराध जिनका दंड पीडिता ही भुगतती आई है और इस कारण या  तो ये अपराध पीडिता द्वारा छिपा लिया जाता  है और या इसे उजागर करने का परिणाम उसे निंदा या ये कहूं कि घोर निंदा के रूप में भुगतना पड़ता है जिसका परिणाम अंततः पीडिता को  आत्म हत्या के रूप में ही अपनाना पड़ता है.
  अभी ताज़ा घटनाक्रम में गुवाहाटी  असम में एक नाबालिग किशोरी  के साथ छेड़छाड़ की घटना चर्चा में है और हमेशा की तरह नारी चरित्र पर उंगली उठनी आरम्भ हो चुकी है 
जिसे  आप हमारी  प्रबुद्ध  ब्लोगर अंशुमाला  जी  के ब्लॉग  mengopeople पर प्रत्यक्षतः  पढ़  सकते हैं लिंक ये है -
 और शायद ऐसी ही मानसिकता ने कानून को कुछ कठोर उपाय अपनाने को विवश  किया  है .भारतीय साक्ष्य अधिनियम १८७२ की धारा १४६ में प्रतिपरीक्षा में विधि पूर्ण  प्रश्न के  विषय  में प्रावधान  किया है . धारा इस प्रकार है - 
  "जबकि किसी साक्षी से प्रतिपरीक्षा की जाती है तब उससे एतस्मिन पूर्व निर्दिषित प्रश्नों के अतिरिक्त ऐसे कोई भी प्रश्न पूछे जा सकेंगे ,जिनकी प्रवर्ति -
  १-उसकी सत्यवादिता परखने की है ,
 २-यह पता चलने की है कि वह कौन है और जीवन में उसकी स्थिति क्या है ,अथवा 
 ३- उसके शील को दोष लगाकर उसकी विश्वसनीयता को धक्का पहुँचाने की है ,चाहे ऐसे प्रश्नों का उत्तर उसे प्रत्यक्षतः अपराध में फंसाने की प्रवर्ति रखता हो ,या उसे किसी शास्ति या समपहरण के लिए उच्छन्न  करता है या प्रत्यक्षतः या परोक्षतः उच्छन्न करने की प्रवर्ति रखता हो.
किन्तु इसके साथ ही अधिनयम संख्या ४ सन २००३ द्वारा धारा १४६ {३}में एक परंतुक अंतःस्थापित किया गया है जो ये है -
"बशर्ते कि बलात्कार या बलात्कार के प्रयास के अभियोजन में अभियोक्त्री  से प्रतिपरीक्षा में उसके सामान्य अनैतिक चरित्र के विषय में प्रश्नों को करने की अनुज्ञा नहीं होगी ."
 साथ ही इसी संशोधन द्वारा धारा १५५ की उपधारा ४ को निकल दिया गया है जो ये कहती थी -
"जबकि कोई मनुष्य बलात्संग या बलात्संग के प्रयत्न के लिए अभियोजित है तब यह दर्शित किया जा सकता है कि अभियोक्त्री साधारणतः व्यभ्चारिणी है."
और कानून का यह कदम पूर्णतः सही  कहा  जायेगा क्योंकि महिला को इस तरह के साक्ष्य से व्यभचारी साबित करना इस पुरुष सत्तात्मक  समाज और स्वयं नारी होकर नारी के दोष ढूँढने  की प्रवर्ति वाली नारियों के समाज  में बहुत आसान है .क्योंकि स्वयं बहुत से सही आचरण  व वेशभूषा वाली नारियां भी इस सच्चाई से इंकार नहीं कर सकतीं कि उन्हें भी कभी न कभी ऐसी दुरूह परिस्थिति से दो-चार होना पड़ता है जिनकी कल्पना भी वे नहीं कर सकती.क्या वरिष्ठ आई .ए.एस  अधिकारी रूपम देओल बजाज के साथ  पुलिस अधिकारी के,पी.एस गिल ने जो किया वह उनके आचरण  या वेशभूषा के कारण किया .
   और फिर ये कहना कि गलत आचरण सुधर का यही उपाय है तो ये तो किसी जानवर  समाज के लिए ही सही कहा जायेगा यहाँ जो कुछ  भी इन लोगों द्वारा किया गया है  उसके लिए भारतीय कानून इन्हें अपराधी की श्रेणी में रखता है भले ही वह किशोरी ऐसे कपडे पहनकर ''आ  बैल मुझे मार" की कहावत चरितार्थ  करती हो किन्तु छेड़छाड़ करने वाले इंसान  हैं जानवर नहीं इसलिए कानून के दायरे में आते हैं और अपराधी ही कहलाने योग्य हैं गलत आचरण पर रोक के हजारों उपाय हैं जिन्हें प्राचीन  समाज में बहिष्कार आदि के द्वारा कार्यान्वित किया जाता था.
   ऐसे में जिन महिलाओं की चेन लुटती है उनके विषय में तो इनके दृष्टिकोण से यही कहना चाहिए कि "चेन चीज़ ही ऐसी है कि कोई लूट ले और फिर गरीबी भुखमरी के देश में कोई सोने चांदी की चेन पहन ही कैसे रही है "किसी के यहाँ लूट-डकैती होती है तो कहना चाहिए "माल ही इतना भर रखा  है कि ये न होता तो क्या होता" 
फिर ऐसे में सभ्यता संस्कृति की दुहाई दी ही क्यों  जाती है ,और ऐसे में विदेशी प्रयटक  जिनकी जीवन शैली यही है उन्हें तो भारत आना  छोड़  ही देना चाहिए क्योंकि यहाँ अपराधी का अपराध नहीं बल्कि पीड़ित का आचरण और वेशभूषा देखी जाती है.
                                       शालिनी  कौशिक  
                                            {कौशल } 

3 टिप्‍पणियां:

शिखा कौशिक ने कहा…

aapne sahi kaha hai .aabhar

रविकर फैजाबादी ने कहा…

बिलकुल-
लड़की की कोई भी गलती / भूल
इन दुष्टों का पाप नहीं कम कर सकती ||
सादर

डा. श्याम गुप्त ने कहा…

निश्चय ही हमें यह देखना होगा कि लड़कियों/ महिलाओं की अति-हिम्मत या त्रुटि तो नहीं है....परन्तु निश्चय ही इससे अपराधी का / पुरुषों का अपराध कम नहीं होजाता ....