रविवार, 24 सितंबर 2017

बेशर्म हैं वो लाठियां



डूब कर मरने की भी
बददुआ है बेअसर,
आंख का पानी भी जिनका
सूख गया इस कदर,
न्याय के लिए बढ़ी
बेटियों को क्या मिला?
ज्यादती की इंतिहां
हैं पुलिस की लाठियां!!!

हक नहीं गर बेटियों को
बोलने का देश में,
तानाशाही चल रही
जनतंत्र तेरे भेष में,
न रूकेगा बेटियों
जान लो ये सिलसिला,
ज्यादती की इंतिहां
है पुलिस की लाठियां!

बेशर्म है वो लाठियां
बेटियों पर जो पड़ी,
बेशर्म हैं वो हाथ जिनमें
लाठियां थी वे थमी,
अब ढ़हाना है हमें
बेशर्म ताकत का किला,
ज्यादती की इंतिहां
हैं पुलिस की लाठियां!!

शिखा कौशिक नूतन 

गुरुवार, 21 सितंबर 2017

ब्रह्मरूप-पुरुष –उठो जागो बोध प्राप्त करो--डा श्याम गुप्त

----ब्रह्मरूप-पुरुष –उठो जागो बोध प्राप्त करो ---
------माँ शक्ति रूपा के आगमन के प्रथम दिवस पर----
-----आदिशक्ति...नारी सृष्टि का आधार है, परन्तु ‘एकोहं बहुस्यामि’ के सृष्टि-विचार का आधार तो ब्रह्म...पुरुष ही है |
                         मनुस्मृति---पुरुष ही लिखता है, किसी भी नारी ने कोई महान कालजयी ग्रन्थ की रचना की है?..नहीं| इसमें पुरुष-प्रधान समाज का घिसा-पिटा गाना गाया जासकता है परन्तु उस समाज में तो नारी-पुरुष का समान अधिकार था | तभी तो लोपामुद्रा, घोषा, अपाला, यमी, भारती आदि ऋषिकाओं की उपस्थिति है |
                         जब जब भी पुरुष निर्बल, असहाय होजाता है तब-तब नारी दुर्गा रूप लेकर युद्धरत होती है ..यह अवधारणा केवल भारत में ही है, अन्य कहीं है भी तो यहीं से गयी हुईं, फ़ैली हुई संस्कृतियों में व उनकी स्मृतियों/ कथाओं में हैं|
                    परन्तु दुर्गा को बल ब्रह्मा, विष्णु, शिव व अन्य देवता, अर्थात पुरुष ही, अपनी शक्तियों के रूप में देते हैं तब दुर्गा में शक्ति का अवतरण होता है | उस प्रचंड शक्ति के काली रूपमें उद्दाम, असंयमित वेग को पुरुष (महादेव) ही रोकता है, नियमित करता है |
                        पुरुष-श्री कृष्ण के गुणों पर नारियां रीझती हैं, विष्णु को पति रूप में पाने हेतु, शिव के लिए भी तप करती हैं ..परन्तु कोइ एसा केंद्रीय नारी चरित्र नहीं है जिसके गुणों पर संसार भर के पुरुष रीझ जाएँ | हाँ शारीरिक रूप सौन्दर्य के दीवानों की गाथाएँ मिलतीं हैं अथवा महामाया माँ दुर्गा पर सौंदर्य लोलुप दुष्ट दानवों, असुरों द्वारा अनुचित प्रस्ताव रखने पर मृत्यु को वरण करने की गाथाएँ |
                    अतः निश्चय ही सृष्टि की जनक नारी है परन्तु पुरुष की नियमन व्यवस्था के अनुसार | अतः आज के परिप्रेक्ष्य में ---
-----वे पुरुष के आचरण सुधार की बातें करती रहेंगी एवं स्वयं सलमान खान व शाहरुख के पीछे भागती रहेंगीं|
-----वे हीरोइनों के वस्त्राभूषणों की नक़ल करेंगीं, स्वतंत्र रूप से रात-विरात अकेली स्वच्छंदता का भी अनुसरण करेंगीं ( जबकि हीरोइनें तो बोडीगार्ड के साथ रहती हैं)| हीरोइनों के पीछे भागने की वजाय सलमान, शाहरुख के पीछे भागेंगी | ( कुछ विद्वान नारियां हर काल की तरह अपवाद भी होती हैं ) |
------वे कहेंगीं कि समाज अपनी सोच बदले | समाज में तो स्त्री-पुरुष दोनों ही होते हैं अकेले पुरुष से कब समाज बनता है अतः दोनों को ही सोच बदलनी चाहिए |
-----वे पुरुष को साधू-संत बनने को कहेंगीं परन्तु स्वयं डायरेक्टर की इच्छा/आज्ञा पर /पैसे के लिए वस्त्र उतारती रहेंगीं |
------ वे देह –दर्शना वस्त्र पहनती रहेंगीं, उनका तर्क है की छोटी-छोटी बालिकाओं से, गाँव में पूरे वस्त्र पहने महिलाओं से भी वलात्कार होता है अतः वस्त्र कम पहनने से कुछ नहीं होता अपितु पुरुष व समाज को अपनी मानसिकता बदलनी होगी|
                    वे भूल जाती हैं कि- कम वस्त्रों, अश्लील चित्रों, सिनेमा, विज्ञापन आदि से जाग्रत उद्दाम वासना से जो भी व्यक्ति की पहुँच में होगा वही प्रभावित होगा | आप तो बाडीगार्ड, परिवार आदि की सुरक्षा में हैं, कौन हाथ डालने की हिंम्मत करेगा| चोर किसी प्रधानमन्त्री या पुलिस वाले के घर चोरी करने थोड़े ही जायेगा, जहां सुरक्षा कम है वहीं दांव लगाएगा |
------- इनसे कुछ नहीं होगा ----
                          अतः हे पुरुषो ! ब्रह्म रूप बनो, अपनी ज्ञान, विवेक व सदाचरण रूपी दैविक शक्तियां जाग्रत करो...उदाहरण बनो और अपनी जाग्रत शक्तियों को प्रदान करो नारी को ताकि वह पुनः दुर्गा का दुष्ट दलन रूप बनकर समाज में पूज्य बने |
                    और आप सच में ही---“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता” के महामंत्र के गान के योग्य बनें |


चित्र--सिंह वाहिनी माँ की वन्दना रत त्रिदेव व ऋषि-मुनि----
------महाभारत -गूगल साभार
 

शनिवार, 16 सितंबर 2017

ये है नारी शक्ति

 

नारी की सशक्तता यहाँ देखो /इनमे देखो .


मैंने बहुत पहले एक आलेख लिखा था-

Maa DurgaMaa DurgaMaa Durga

ये सर्वमान्य तथ्य है कि महिला शक्ति का स्वरुप है और वह अपनों के लिए जान की बाज़ी  लगा भी देती है और दुश्मन की जान ले भी लेती है.नारी को अबला कहा जाता है .कोई कोई तो इसे बला भी कहता है  किन्तु यदि सकारात्मक रूप से विचार करें तो नारी इस स्रष्टि की वह रचना है जो शक्ति का साक्षात् अवतार है.धेर्य ,सहनशीलता की प्रतिमा है.जिसने माँ दुर्गा के रूप में अवतार ले देवताओं को त्रास देने वाले राक्षसों का संहार किया तो माता सीता के रूप में अवतार ले भगवान राम के इस लोक में आगमन के उद्देश्य को  साकार किया और पग-पग पर बाधाओं से निबटने में छाया रूप  उनकी सहायता की.भगवान विष्णु को अमृत देवताओं को ही देने के लिए और भगवान् भोलेनाथ  को भस्मासुर से बचाने के लिए नारी के ही रूप में आना पड़ा और मोहिनी स्वरुप धारण कर उन्हें विपदा से छुड़ाना पड़ा.
हमारे संस्कृत ग्रंथों में कहा गया है -
"यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते,रमन्ते तत्र देवता."
प्राचीन काल  का इतिहास नारी की गौरवमयी  कीर्ति से भरा पड़ा है.महिलाओं ने समय समय पर अपने साहस पूर्ण कार्यों से दुश्मनों के दांत खट्टे किये हैं.प्राचीन काल में स्त्रियों का पद परिवार में अत्यंत महत्वपूर्ण था.गृहस्थी का कोई भी कार्य उनकी सम्मति के बिना नहीं किया जा सकता था.न केवल धर्म व् समाज बल्कि रण क्षेत्र में भी नारी अपने पति का सहयोग करती थी.देवासुर संग्राम  में कैकयी ने अपने अद्वित्य रण कौशल से महाराज दशरथ को चकित किया था.
गंधार के राजा रवेल की पुत्री विश्पला ने सेनापति का दायित्व स्वयं पर लेकर युद्ध किया .वह वीरता से लड़ी पर तंग कट गयी ,जब ऐसे अवस्था में घर पहुंची तो पिता को दुखी देख बोली -"यह रोने का समय नहीं,आप मेरा इलाज कराइये मेरा पैर ठीक कराइये जिससे मैं फिर से ठीक कड़ी हो सकूं तो फिर मैं वापस शत्रुओसे  सामना करूंगी ."अश्विनी कुमारों ने उसका पैर ठीक किया और लोहे का पैर जोड़ कर उसको वापस खड़ा किया -

" आयसी जंघा विश्पलाये अदध्यनतम  ".[रिग्वेद्य  १/ ११६]
इसके बाद विश्पला ने पुनः     युद्ध किया और शत्रु को पराजित किया.
महाराजा  रितध्वज    की पत्नी      मदालसा ने अपने पुत्रों को समाज में जागरण के लिए सन्यासी बनाने का निश्चय किया .महाराजा   रितध्वज के आग्रह पर अपने आठवे पुत्र अलर्क को योग्य शासक बनाया.व् उचित समय पर पति सहित वन को प्रस्थान कर गयी.जाते समय एक यंत्र अलर्क को दिया व् संकट के समय खोलने का निर्देश दिया.कुछ दिनों बाद जब अलर्क के बड़े भाई ने उसे राजपाट सौंपने का निर्देश दिया तब अलर्क ने वह यंत्र खोला जिसमे सन्देश लिखा था-"संसार के सभी ईश्वर अस्थिर हैं तू शरीर मात्र नहीं है ,इससे ऊपर उठ."और उसने बड़े भाई को राज्य सौंप देने का निश्चय किया.सुबाहु इससे अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्हें ही राज्य करते रहने का आदेश दिया.राजा  अलर्क को राज ऋषि की पदवी मिली .यह मदालसा की ही तेजस्विता थी जिसने ८ ऋषि तुल्य पुत्र समाज को दिए.
तमलुक [बंगाल] की रहने वाली मातंगिनी हाजरा ने ९ अगस्त १९४२ इसवी में भारत छोडो आन्दोलन में भाग लिया और आन्दोलन में प्रदर्शन के दौरान वे ७३ वर्ष की उम्र में अंग्रेजों की गोलियों का शिकार हुई और मौत के मुह में समाई .
असम के दारांग जिले में गौह्पुर   गाँव की १४ वर्षीया बालिका कनक लता बरुआ ने १९४२ इसवी के भारत छोडो आन्दोलन में भाग लिया .अपने गाँव में निकले जुलूस का नेतृत्व इस बालिका ने किया तथा थाने पर तिरंगा झंडा फहराने के लिए आगे बढ़ी पर वहां के गद्दार थानेदार ने उस पर गोली चला दी जिससे वहीँ उसका प्राणांत हो गया.
इस तरह की नारी वीरता भरी कहानियों से इतिहास भरा पड़ा है.और किसी भी वीरता,धैर्य        ज्ञान      की तुलना नहीं की जा सकती.किन्तु इस सबके बावजूद नारी को अबला  बेचारी  कहा जाता है.अब यदि हम कुछ और उदाहरण  देखें तो हम यही पाएंगे कि नारी यदि कहीं झुकी है तो अपनों के लिए झुकी है न कि अपने लिए .उसने यदि दुःख सहकर भी अपने चेहरे पर शिकन तक नहीं आने दी है तो वह अपने प्रियजन    के दुःख दूर करने के लिए.
कस्तूरबा गाँधी,जिन्होंने दक्षिण अफ्रीका में घूमकर महिलाओं में सत्याग्रह का शंख फूंका .चंपारण ,भारत छोडो आन्दोलन में जिनका योगदान अविस्मर्णीय रहा ,ने भी पतिव्रत धर्म के पालन के लिए कपडे धोये,बर्तन मांजे और   ऐसे ऐसे कार्य किये जिन्हें कोई सामान्य भारतीय नारी सोचना भी पसंद नहीं करेगी.
महाराजा जनक की पुत्री ,रघुवंश की कुलवधू,राम प्रिय जानकी सीता ने पतिव्रत धर्म के पालन के लिए वनवास में रहना स्वीकार किया.
हमारे अपने ही क्षेत्र की  एक कन्या मात्र इस कारण से जैन साध्वी के रूप में दीक्षित हो गयी कि उसकी बड़ी बहन के साथ उसके ससुराल वालों ने अच्छा व्यव्हार नहीं किया और एक कन्या इसलिए जैन साध्वी बन गयी कि उसकी प्रिय सहेली साध्वी बन गयी थी.
स्त्रियों का प्रेम, बलिदान ,सर्वस्व समर्पण ही उनके लिए विष बना है.गोस्वामी तुलसीदास जी नारी को कहते हैं-
"ढोल गंवार शुद्रपशु नारी,
ये सब ताड़न के अधिकारी. "
वे एक समय पत्नी  प्रेम में इतने पागल थे कि सांप को रस्सी समझ उस पर चढ़कर पत्नी  के मायके के कमरे में पहुँच गए थे.ऐसे में उनको उनकी पत्नी  का ही उपदेश था जिसने उन्हें विश्व वन्दनीय बना दिया था-
"अस्थि चर्ममय देह मम तामे ऐसी प्रीती,
ऐसी जो श्रीराम में होत न तो भाव भीती."
इस तरह नारी को अपशब्दों के प्रयोग द्वारा    जो उसकी महिमा को नकारना चाहते हैं वे झूठे गुरुर में जी रहे हैं और अपनी आँखों के समक्ष उपस्थित सच को झुठलाना चाहते हैं .आज नारी निरंतर प्रगति पथ पर आगे बढ़ रही है .भावुकता सहनशीलता जैसे गुणों को स्वयं से अलग न करते हुए वह पुरुषों के झूठे दर्प के आईने को चकनाचूर कर रही है .अंत में नईम अख्तर के शब्दों में आज की नारी पुरुषों से यही कहेगी-
"तू किसी और से न हारेगा,
तुझको तेरा गुरुर मारेगा .
तुझको    दस्तार जिसने बख्शी है,
तेरा सर भी वही उतारेगा ."

आज मैं उसी कड़ी में अपने विचारों को आगे रख रही हूँ और बता रही हूँ नारी के ऐसे वर्ग के बारे में जो सशक्त है सबल है और केवल इसलिए क्योंकि वह भावुकता जैसी कमजोरी से कोसों दूर है .बहुत दिन पहले मेरे पापा ने मुझे बताया कि वे एक कमीशन में गए थे वहां पर जाट समुदाय की एक बुजुर्ग महिला ने उन्हें बताया कि -''बाबूजी !हम जाट औरतें अपना कार्य स्वयं देखती हैं और अपने पुरुषों पर आश्रित नहीं हैं .अन्य समुदायों में जैसे  औरतें आदमियों का हर काम में मुंह देखती हैं और उनके लिए ही भगवान के आगे झुकी रहती हैं हम्मे ऐसा नहीं है और इसलिए हममे न करवा चौथ होती है और न ही रक्षा बंधन .हम खुद पर ही ज्यादा विश्वास करती हैं और अपने आदमियों को अपने मालिक का दर्जा नहीं देती ''और ये हम सभी देखते भी हैं जाट औरतें जाट आदमियों के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर चलती हैं और खेती हो या नौकरी हर काम में अपना दबदबा रखती हैं .
ऐसे ही जैन समुदाय है जिसमे हमारे क्षेत्र में अधिकांश सर्राफ हैं और इनकी औरतें इनमे आदमियों से पूरी बराबरी करती हैं और अतिश्योक्ति न होगी अगर यह कहा जाये कि आदमियों को अपनी मुट्ठी में रखती हैं .ये धन का ,जेवर का लेनदेन आदि सभी कार्यों में बराबर का सहयोग व् हिस्सा रखती हैं और इनके परिवार में कोई भी फैसला हो इनकी जानकारी व् साझेदारी के बगैर नहीं लिया जा सकता .
बहुत अभिमान करते हैं हम अपने उच्च वर्ग या माध्यम वर्ग से सम्बंधित होने पर किन्तु यदि सच्चाई से बात की जाये तो सबसे अधिक सबल नारी निम्न वर्ग की ही कही जाएगी और इसका प्रत्यक्ष उदाहरण आप सभी स्वयं देख सकते हैं .सुबह सवेरे हम जैसे ही अपने घर के बाहर देखते हैं तो पाते हैं कि बहुत सी नारियों का झुण्ड चला जा रहा है जो कमीज-पेटीकोट पहने होती हैं और उनके हाथों में हंसिया -खुरपी आदि औजार होते हैं दिन भर वे इन औजारों से खेतों में मेहनत करती हैं और शाम को फिर ऐसे ही बतियाते हुए लौटती हैं जैसे सुबह काम पर जाते हुए बतिया रही थी .यही नहीं कहने को अनपढ़ कही जाने वाले ये महिलाएं किसी से सशक्ति करण की मांग नहीं करती और देश के लिए अपने घर परिवार के लिए एक मुखिया की हैसियत में ही काम करती हैं और अपना दबदबा सभी के दिमाग पर बनाये रखती हैं ये वे हैं जो भरे पूरे आदमियों के परिवारों में होते हुए भी अपने जानवरों को स्वयं हांककर घर कुशलता से ले आती हैं और इस तरह पुरुष की ताकत को दरकिनारकर एक तरफ रख देती हैं 

.
 

.कारण केवल एक है ये अपने वर्चस्व की राह में और कार्य के बीच में भावुकता को आड़े नहीं आने देती और पूर्ण व्यावसायिक होकर अपने कर्मक्षेत्र पर आगे बढती हैं और ये कभी किसी के आगे नारी की कमजोरी का रोना नहीं रोती क्योंकि ये वे हैं जो भारतीय नारी को इस विश्व में कर्मशील प्राणी का सम्मान दिलाती हैं .ये केवल यही कहती हैं -
''कोमल है कमजोर नहीं तू ,
शक्ति का नाम ही नारी है .''


शालिनी कौशिक
[कौशल ]

सोमवार, 11 सितंबर 2017

औरत और बूढी हाय रे!!!!!!!!!!!!


हाय रे!  योगी सरकार ऐसी गलती कैसे कर गयी, सुबह का अखबार देख केवल मेरा ही नहीं बल्कि सारी महिलाओं का माथा ठनक गया. समाचार कुछ यूँ था-
"बसों में मुफत सफर करेंगी 60 साल से ऊपर की महिलायें"
    समाचार  ही ऐसा था कि किसी के भी मुंह से योगी सरकार के लिए आशीर्वाद को हाथ नहीं उठे,  वजह कोई जानना कठिन थोड़े ही है, वो तो सब जानते ही हैं.
      इस दुनिया में आदमी हो या औरत, अपनी उमर कोई भी बताना नहीं चाहता और योगी सरकार के इस निर्णय के मुताबिक मुफत सफर के लिए जो परिचय पत्र बनेगा उसमें उमर का साक्षय लिया जायेगा, बस हो गया साबित कि मुफत सफर वाली औरत, यानी साठ साल से ऊपर, यानी बूढी, भला कौन औरत अपने को बूढी सुनना चाहेगी.
     लो भई योगी सरकार गई काम से.

शालिनी कौशिक 
  (कौशल) 

रविवार, 10 सितंबर 2017

गुलाम नारी


बढ़ रही हैं

गगन छू रही हैं

लोहा ले रही हैं

पुरुष वर्चस्व से

कल्पना

कपोल कल्पना

कोरी कल्पना

मात्र

सत्य

स्थापित

स्तम्भ के समान प्रतिष्ठित

मात्र बस ये

विवशता कुछ न कहने की

दुर्बलता अधीन बने रहने की

हिम्मत सभी दुःख सहने की

कटिबद्धता मात्र आंसू बहने की .

न बोल सकती बात मन की है यहाँ बढ़कर

न खोल सकती है आँख अपनी खुद की इच्छा पर

अकेले न वह रह सकती अकेले आ ना जा सकती

खड़ी है आज भी देखो पैर होकर बैसाखी पर .

सब सभ्यता की बेड़ियाँ पैरों में नारी के

सब भावनाओं के पत्थर ह्रदय पर नारी के

मर्यादा की दीवारें सदा नारी को ही घेरें

बलि पर चढ़ते हैं केवल यहाँ सपने हर नारी के .

कुशलता से करे सब काम

कमाये हर जगह वह नाम

भले ही खास भले ही आम

लगे पर सिर पर ये इल्ज़ाम .

कमज़ोर है हर बोझ को तू सह नहीं सकती

दिमाग में पुरुषों से कम समझ तू कुछ नहीं सकती

तेरे सिर इज्ज़त की दौलत वारी है खुद इस सृष्टि ने

तुझे आज़ाद रहने की इज़ाज़त मिल नहीं सकती .

सहे हर ज़ुल्म पुरुषों का क्या कोई बोझ है बढ़कर

करे है राज़ दुनिया पर क्यूं शक करते हो बुद्धि पर

नकेल कसके जो रखे वासना पर नर अपनी

ज़रुरत क्या पड़ी बंधन की उसकी आज़ादी पर ?

मगर ये हो नहीं सकता

पुरुष बंध रो नहीं सकता

गुलामी का कड़ा फंदा

नहीं नारी से हट सकता

नहीं दिल पत्थर का करके

यहाँ नारी है रह सकती

बहाने को महज आंसू

पुरुष को तज नहीं सकती

कुचल देती है सपनो को

वो अपने पैरों के नीचे

गुलामी नारी की नियति

कभी न मिल सकती मुक्ति .



शालिनी कौशिक

[कौशल ]

सोमवार, 4 सितंबर 2017

दोहरापन (कहानी )

रूचि अभी अभी कॉलेज से आयी ही थी | कि सामने मेज पर पड़ी मिठाइयाँ व शरबत के खाली गिलासो को देखकर माँ से पूछ बैठी की माँ कोई मेहमान आया था क्या ?
"हाँ आया था न तेरे ससुराल वाले आये थे "
माँ जवाब  दे पाती उससे पहले ही छोटे भाई ने कुछ चिढ़ाने के अंदाज़ में कहा |
रूचि को सुनकर विश्वास ही  नहीं हुआ उसे लगा उसके छोटे भाई ने मजाक किया है क्योकि वो तो अक्सर ऐसे मजाक कर के उसे चिढ़ाया करता था |
तो उसने भी पलटकर उसे चिढ़ाने के लिए कह दिया |
"अरे मेरे ससुराल वाले आये थे तो उन्हें रोक लेता मै भी मिल लेती उनसे "
और फिर रूचि हसँते हुए अपने कमरे की तरफ चल दी |
अभी कमरे में पहुँचकर बैड पर बैठी ही थी कि उसकी नजर कमरे में रखे शगुन के समान पर पड़ी | वो समान को देखने के लिए उठी ही थी की माँ कमरे में मिठाई का डिब्बा लेकर आ गई |
माँ - रूचि ले बेटा मुँह तो मीठा कर ले
पर रूचि तो अब भी समान की तरफ ही देख रही थी |
माँ - अरे वो तेरे शगुन का समान है वो लोग आज ही बात पक्की करने के साथ साथ शगुन का समान भी देकर गए |
बेटा बड़ा ही अच्छा रिश्ता है लड़का भी अच्छा है और पैसे वाला है अपना खुद का बड़ा घर है और इकलौता लड़का है अपने माँ बाप का | अरे वैसे भी आजकल कहा मिलता है ऐसा रिश्ता |
 माँ बोले जा रही थी | और  रूचि बस बेसुध सी बैठी अपने ही अन्तर्मन में खोई हुई अपने ही सवालो में उलझ सी गई थी |

कि वो ऐसे अचानक शादी कैसे कर सकती है ? अभी तो पढाई भी पूरी  नहीं हुई उसकी ?अभी अभी तो सपने देखना शुरू किया था | अभी अभी तो ज़िन्दगी का मतलब समझ आया था |  अभी तो बचपन से बाहर आयी है | शादी कैसे ?
और अभी कुछ समय पहले ही तो जब कॉलेज में प्रशांत ने उसे प्रपोज लिया था और उसने तुरंत घर आकर माँ को बताया था |
और फिर माँ ने  कितना समझाया था उसे की बेटा अभी तू छोटी है सिर्फ पढ़ाई पर ध्यान दे | और उसने प्रशांत को पसंद करने की बात माँ को बतानी चाही तो माँ ने फिर समझाया की तू इस काबिल नहीं है अभी की अपनी ज़िंदगी के इतने अहम फैसले ले सके |
पर आज वही माँ उसकी शादी करा रही है | तो क्या आज उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता कि  उनकी बेटी अभी छोटी है और अपनी ज़िंदगी के अहम फैसले लेने लायक नहीं है  या उसकी पढाई अभी ज्यादा जरुरी है |


या शायद हमारे समाज में लड़किया कभी इतनी बड़ी और समझदार हो ही नहीं पाती कि अपनी ज़िंदगी के अहम् फैसले ले पाए | वो या तो छोटी नासमझ नादान होती है या फिर  के लायक |



शुक्रवार, 1 सितंबर 2017

कामवालियां



Woman in depression - stock photo
लड़ती हैं
खूब झगड़ती हैं
चाहे जितना भी
दो उनको
संतुष्ट कभी नहीं
दिखती हैं
खुद खाओ
या तुम न खाओ
अपने लिए
भले रसोईघर
बंद रहे
पर वे आ जाएँगी
लेने
दिन का खाना
और रात का भी
मेहमानों के बर्तन
झूठे धोने से
हम सब बचते हैं
मैला घर के ही लोगों का
देख के नाक सिकोड़ते हैं
वे करती हैं
ये सारे काम
सफाई भेंट में हमको दें
और हम उन्हीं को 'गन्दी 'कह
अभिमान करें हैं अपने पे
माता का दर्जा है इनका
लक्ष्मी से इनके काम-काज
ये ''कामवालियां'' ही हमको
रानी की तरह करवाएं राज़ .
.....................
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

सोमवार, 21 अगस्त 2017

कहानी माधवी की – नारी की महत्ता या यौन शोषण - एक पौराणिक कथा----डा श्याम गुप्त...


कहानी माधवी की – नारी की महत्ता या यौन शोषण - एक पौराणिक कथा----


               

 



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                  बुराइयां मानव का एक स्वाभाविक भाव है वे समाज में सदैव से ही रही हैं, हाँ उन्हें छुपाने व जोर जबर्दस्ती से मिटाने के प्रयत्न की अपेक्षा पारदर्शी तौर पर उजागर किया जाता रहा जाय तो आचरण सुधार की सतत प्रक्रिया अधिकाधिक प्रभावी रहती है |
\
                         भारतीय शास्त्र एवं तत्व चिंतन व व्यवहारिक दृष्टिकोण सदा ही पारदर्शी रहा है | उन्होंने अपने समाज में उपस्थित बुराइयों, कुप्रथाओं आदि को छुपाने की अपेक्षा सदैव उजागर व स्पष्ट किया है एवं वैदिक, पौराणिक व शास्त्रीय कथाओं आदि में संपूर्ण वर्णित किया, ताकि मानव उन पर तथ्यातथ्य विचार करके उन्हें अपनाए, सुधार लाये या त्यागे |
\
                       माधवी की कथा में उसे तीन राजाओं और अंत में गुरु विश्वामित्र को सपुत्र प्राप्ति हेतु सौपा गया । यद्यपि उस काल में यह एक बुराई नहीं अपितु समाज में स्त्री की सर्व-स्वीकृत सार्वभौम स्वतंत्रता व महत्ता थी | स्त्री के शरीर की अपेक्षा आत्मा व मन की स्वच्छता व सौन्दर्य शुचिता की महत्ता थी | --------यद्यपि आज के लेखकों भीष्म साहनी के नाटक एवं अन्य कहानियों में इसे महाभारत की मूलकथा से कुछ अवांतर करके प्रस्तुत किया गया है जिसमें आज के युग के चिंतन-भाव, नारी-विमर्श एवं पौराणिक तथ्यों को विकृत व तोड़ मरोड़कर प्रस्तुत करने का भाव उपस्थित है |
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                      नहुष कुल में उत्पन्न चन्द्रवंश के राजा ययाति की पुत्री माधवी की इस कथा का वर्णन महाभारत के उद्योगपर्व में है। माधवी राजपुत्री थी पर उसके पिता ययाति ने उसे इसलिए गालव ऋषि को सौप दिया ताकि वो उसे अन्य राजाओं को सौप कर अपने गुरु विश्वामित्र को गुरु दक्षिणा में देने के लिए 800 श्वेतवर्णी श्यामकर्ण अश्व प्राप्त कर सके।
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गुरु विश्वामित्र के शिष्य ऋषि गालव अत्यंत गरीब थे यह जानकर विश्वामित्र ने उन्हें गुरु दक्षिणा शुल्क से मुक्त करदिया था, परन्तु गालव को यह अच्छा नहीं लग रहा था अतः वे उन्हें देने के लिए गुरु दक्षिणा माँगने लेने की जिद पर लिए पर अड़ गए | नाराज़ होकर विश्वामित्र ने ८०० श्याम-कर्ण घोड़े मांग लिए, जो अत्यंत दुर्लभ प्रजाति थी |
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घोड़ों की व्यवस्था हेतु गालव की सहायता हेतु उनके मित्र गरुड़ आगे आये उन्होंने प्रतिष्ठानपुर के स्वामी महाराज ययाति की शरण में चलने की प्रेरणा दी। महाराज ययाति का उन दिनों धरती के राजाओं में सर्वाधिक सम्मान था। राजा ययाति प्रसन्न हुए परन्तु संयोगवश उस समय उनकी स्थिति वैसी नहीं थी जैसी कि गरुड़ समझते थे। अनेक राजसूय और अश्वमेध यज्ञों में उन्होंने अपना सम्पूर्ण कोष रिक्त कर दिया था।
---------कुछ क्षण गम्भीर सोच विचार के उपरांत उन्होंने अपनी त्रेलोक्य सुन्दरी कन्या माधवी को समर्पित करते हुए गालव से कहा कि ऋषिकुमार मेरी यह कन्या दिव्य गुणों से अलंकृत है। माधवी को यह वरदान था कि वह चक्रवर्ती सम्राट को जन्म देगी और जन्म के पश्चात एक अनुष्ठान द्वारा चिर कुमारी हो सकेगी| दैवी वरदान के अनुसार इसके द्वारा हमारे देश में चार महान राजवंशों की प्रतिष्ठा होगी। इसे संग लेकर आप पृथ्वी के अन्य राजाओं के पास जाइए। ऐसी सर्वगुण संपन्न एवं सुन्दरी के शुल्क के रूप में राजा लोग अपना राज्य तक दे सकते हैं, फिर आठ सौ श्यामकर्ण अश्वों की तो बात ही क्या है| परन्तु प्रार्थना है की अपना कार्य पूर्ण करने के उपरांत आप मेरी कन्या मुझे लौटा देंगे |
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माधवी को संग लेकर गरुड़ और गालव सर्वप्रथम संसार भर से चुने हुए अश्वों को रखने के कारण विख्यात एवं दानशीलता, शूरता, परदुःख-कातरता तथा समृद्धि के कारण धरती भर में प्रसिद्ध अयोध्या के राजा हर्यश्व के पास पहुँचे | उन्होंने जब अपना मन्तव्य प्रकट किया, किन्तु विडम्बना यह थी कि उनके पास वैसे श्यामकर्ण अश्वों की संख्या केवल दो सौ थी। हर्यश्व ने अपनी असमर्थता प्रकट करते हुए गालव और गरुड़ को यह सुझाव दिया कि आपको मेरे ही समान अन्य राजाओं से भी माधवी के शुल्क के रूप में वैसे श्यामकर्ण अश्वों की प्राप्ति का उपाय करना होगा। मैं अपने दो सौ अश्वों को देकर माधवी से केवल एक पुत्रोत्पत्ति की प्रार्थना करूँगा।
------दूसरा कोई चारा न होने के कारण गालव और गरुड़ ने अयोध्यापति हर्यश्व की बात मान ली और माधवी को अयोध्या में निर्दिष्ट अवधि के लिए छोड़ दिया| यथा समय राजा हर्यश्व के संयोग से माधवी ने वसुमना नामक पुत्र को उत्पन्न किया, जो बाद में चलकर अयोध्या के राजवंश में परम प्रसिद्ध हुआ।
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तदनंतर गालव और गरुड़ काशिराज दिवोदास के दरबार में पहुँचे, जिनकी कीर्ति-कौमुदी का प्रसार उन दिनों समग्र भूमण्डल में हो रहा था। गालव और गरुड़ के प्रस्ताव करने पर वह भी अपने दो सौ श्यामकर्ण अश्वों को देकर माधवी जैसी सुन्दरी तथा दैवी प्रभायुक्त स्त्री से एक पुत्र प्राप्त करने का लोभ संवरण न कर सके।
------- नियत समय बीत जाने पर माधवी के संयोग से काशिराज दिवोदास ने प्रतर्दन नामक पुत्र की प्राप्ति की, जो बाद में काशीराज्य का पुनरुद्धारक ही नहीं, प्रत्युत वंशपरम्परागत शत्रुओं का विध्वंसक भी हुआ।
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इस द्वितीय पुत्रोत्पत्ति के बाद गालव और माधवी, पक्षिराज गरुड़ के संग भोजराज उशीनर के यहाँ पहुँचे, भोजराज की अतिशय समृद्धि और अदम्य दानशीलता की उन दिनों पृथ्वी पर बड़ी चर्चा थी। किन्तु संयोगतः उनके पास भी दो सौ श्यामकर्ण अश्व थे। गालव और गरुड़ की प्रार्थना पर राजा उशीनर ने भी त्रैलोक्य-सुन्दरी माधवी के संयोग से एक पुत्र प्राप्त कर अपने उन दुर्लभ अश्वों को उन्हें सौंप दिया।
-------- भोजराज का यही तेजस्वी पुत्र बाद में शिवि के नाम से विख्यात हुआ, जिसकी दान-शीलता की अमर कहानी आज भी पुराणों की शोभा है। इस पुत्र की उत्पत्ति के बाद भी माधवी का रूप-यौवन पूर्ववत् बना रहा।
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गालव को अपनी गुरु-दक्षिणा के लिए अब दो सौ अश्व ही शेष थे, गालव द्वारा विश्वामित्र से प्राप्त की गयी अवधि समाप्ति पर थी और गरुड़ को यह ज्ञात हो चुका था कि धरती पर इन छह सौ श्यामकर्ण अश्वों के सिवा कहीं अन्यत्र एक भी नहीं बचा है |
------अन्ततः छह सौ अश्वों और त्रैलोक्य-सुन्दरी माधवी तथा गरुड़ को संग लेकर वह विश्वामित्र के समीप पहुँचे और शेष दो सौ अश्वों की प्राप्ति में असमर्थता प्रकट करते हुए विनय भरे स्वर में कहा-‘‘गुरुवर! आपकी आज्ञा से इस भूमण्डल पर प्राप्त छह सौ श्यामकर्ण अश्वों को मैं ले आया हूँ, जिन्हें आप कृपा कर स्वीकार करें। अब इस धरती पर ऐसा एक भी अश्व नहीं बचा है। अतः मेरी प्रार्थना है कि शेष दो सौ अश्वों के शुल्क के रूप में आप दिव्यांगना माधवी को अंगीकार करें।’’गालव की प्रार्थना का अनुमोदन गरुड़ ने भी किया। -------विश्वामित्र ने अपने प्रिय शिष्य की प्रार्थना स्वीकार कर ली और माधवी के संयोग से अन्य राजाओं की भाँति उन्होंने भी एक तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति की, जो कालान्तर में अष्टक के नाम से प्रसिद्ध हुआ। उनकी राजधानी का सारा कार्य-भार ग्रहण किया और माधवी के शुल्क के रूप में प्राप्त उन छह सौ दुर्लभ श्यामकर्ण अश्वों का भी वही स्वामी हुआ।
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इन चारों पुत्रों की उत्पत्ति के बाद माधवी ने गालव को उऋण करा दिया। फिर वह अपने पिता राजा ययाति को वापस कर दी गयी | उसके अनन्त रूप और यौवन में चार पुत्रों की उत्पत्ति के बाद भी कोई कमी नहीं हुई थी।
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अपने इन चारों यशस्वी पुत्रों की उत्पत्ति के बाद जब वह पिता के घर वापस आयी, तो पिता ने उसका स्वयंवर करने का विचार प्रकट किया। किन्तु माधवी ने किसी अन्य पति को वरण करने की अनिच्छा प्रकट कर तपोवन का मार्ग ग्रहण किया।


बुधवार, 9 अगस्त 2017

रिश्ता सारमेय सुत का.--कहानी ---..डा श्याम गुप्त

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रिश्ता सारमेय सुत का.-----..डा श्याम गुप्त की कहानी ----
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कालू कुत्ते ने झबरीली कुतिया का गेट खटखटाया और बोला,-
'भौं .s.s.भौं ऊँ भुक -अरे कोई है। '
झबरीली ने गेट की सलाखों के नीचे से झांका और गुर्राई, 'भूं ऊँ ऊँ भौं, कौन है ?'
भूं s भुक , मैं कालू ।
ओ s sभूं अक , क्या है, क्यों आये हो?
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                 रिश्ता लाया हूँ , कालू बोला,मेरी बेटी शरवती की आपके झबरू बेटे के साथ जोड़ी अच्छी रहेगी। क्या ख्याल है। झबरू भी शरबती के आगे पीछे घूमता रहता है।
-----------झबरीली इन्जीनियेर शर्मा साहब की कोठी में रहने वाली बड़े बड़े बालों वाली सफ़ेद अच्छी नस्ल की कुतिया थी। इठला कर गुर्राई,'भूं .s.s.भौं s sऔं भूट, तो इससे क्या , कालू कहीं का । चल हट, मेरा बेटा कोठी में पला-बढ़ा , साहबों की सोहबत में है, तू फटेहाल झौंपडी में रहने वाला कुत्ता! तेरी क्या मजाल । बड़ा आया। तेरे पास क्या है देने को? क्या दहेज़ देगा? कल ही नीलू कुतिया अपनी मिंकी बेटी का रिश्ता लाई थी। शगुन पर ही चांदी का पट्टा देने की बात कर रही थी।
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           भौं s s अंग.. भट, दो हड्डियां है मेरे पास, दावत के लिए, झोंपड़ी के पीछे दबा कर रखी हैं । पर ये दहेज़ क्या होता है? कालू असमंजस में पड़कर बोला।
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           भूं .s.s..s भू...अक:॥, अरे तभी तो। तुम गली के छोटे लोग हो, बड़े घरों की बातें कहाँ जानते हो। चल हट, बड़ा आया।
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          बातें सुनकर इधर-उधर के कुछ कुत्ते भी एकत्र होगये थे ।
--------अरे, ये आदमियों के चोंचले हैं । पड़ोस के सिल्की कुत्ते ने भों भों करके बताया। आदमी लोग बेटों की शादी में खूब माल काटते हैं। सोना, चांदी,कार, नकद रुपया-पैसा के साथ ही बेटे की शादी करते हैं। जो भी अधिक से अधिक दे सके..... ।-
---------हाँ हाँ , 'उस दिन जब में कोठी न. सोलह के साहब के यहाँ दावत में फैंकी हुई मिठाई, पूड़ी, सब्जी के मज़े लेरहा था तो मैंने भी सुना कि साहब को खूब माल व इम्पोर्टेड कार मिली है। कोई पच्चीस लाख की शादी थी । ' ब्राउनी कुत्ता बोला।
---------' पर जो देते हैं वे इतना सारा माल लाते कहाँ से होंगे। ' कालू ने पूछा।
            'कुछ नं. दो का चक्कर है। मैंने कुछ लोगों को यह भी कहते सुना था।' ब्राउनी बोला।
;-------यार ! ये आदमी भी अजीब , वेवकूफ जानवर है, मिठाई, पूड़ी आदि खाना, आखिर ये लोग फैंकते ही क्यों हैं? क्या मिलता इन्हें इसमें । '
'चलो हमारे लिए तो मज़े ही रहते हैं। '
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             ' हाँ सो तो है। पर हमारे साथ कुछ दुबले-पतले किस्म के इंसान भी तो टूट पड़ रहे थे उस खाने पर। क्या उन लोगों के पास इतना खाना नहीं होता।' ब्राउनी बोला।
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            'पता नहीं, ये इंसान भी विचित्र प्राणी है। कोई खूब खाना फैंकता है, कोई फैंके हुए को उठाता है। इसमें भी उसका कुछ मतलब ही होगा। क्योंकि मैंने सुना है कि आदमी बड़ा चतुर जानवर होता है, कोई काम बिना मतलब के नहीं करता।' सिल्की ने बताया।
--------' हो सकता है कोठी वाले आदमी लोग भी किसी के पालतू होते होंगे, जैसे झबरीली कुतिया और ये दुबले-पतले इंसान हमारी तरह गली झौंपडी वाले जानवर।' पप्पी पिल्ले ने अपना दिमाग लड़ाया ।
---------'हो..हो..हो॥, सब हंसते हुए भोंके, ये आदमी की लाइफ भी हम कुत्तों जैसी ही है। ' पर इनके गले में पट्टा तो नहीं दिखाई देता। ' ब्राउनी हंसते हुए बोला। 'शायद इनको पालने वाला जानवर इनसे भी अधिक चतुर होता होगा। '
         'भुक..भुक...भुक .s.s.और हम कुत्ते दहेज़ भी तो नहीं माँगते,बेटियों को नहीं जलाते। इसमें तो आदमियों से अच्छे ही हैं। अब सोलह न. वाले साहब को शादी में इतना मिला फिर भी साल भर बाद ही बहू को जलाने की कोशिश में जेल में हैं। ' ब्राउनी ने बताया।
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            ' वो तो भला हो भूरा का,' लंगडाकर धीरे धीरे आता हुआ चितकबरा कुत्ता बोला,'जो रात में भौंक भौंक कर सारा मोहल्ला जगा दिया, और बहू-बिटिया बच गयी।
-------- पड़ोस की पढी-लिखी सुमन दीदी, जो समाज-सेवा का काम करती है ; और वो जाने क्या होता है, नारी जागरण, के भाषण देती रहती है; अचानक जाग गयी और कुत्ता क्यों जाने लगातार भोंक रहा है, यह देखने दौड़ी चली आई। वरना ये लोग तो महीनों से हरकत कर रहे थे कोई आदमी बीच में पड़ने नहीं आया। '
---------' कृष्णा ..कृष्णा..एसा नीच कुकर्म, कमीना कुत्ता कहीं का। '
           ' भों.s..s.भौं .sss.. क्यों कुत्तों को गाली दे रहा है।' सिल्की गुर्राया।
--------'भूं.n.n..भूं..n.अक..सारी' , कालू सकपका कर बोला, 'मेरा मतलब था आदमी कहीं का। '
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             'अजीव है ये आदमी भी' , कालू सोचते हुए बोला, 'अपने भाई बंधुओं से ही दुश्मनी निकलता है,अपनी ही बहू-बेटियों को बिकने, जलने, मरने देता है। और कहावत बना रखी है,'क्यों कुत्तों की तरह लड़ते हो'; 'क्या इनका राजा या मुखिया नहीं होता,वो कुछ नहीं कहता?'
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                राजा..s..s..s.चितकबरा सोचते हुए बोला,' आदमी लोग स्वयं अपने राजा होते हैं,आज कल इनके यहाँ वो न जाने क्या है...मन्त्र या तंत्र व्यवस्था ; बड़ी अजीब सी चीज है। ये लोग स्वयं को वोट जैसी कुछ चीज देते हैं और खुद ही राजा बन जाते हैं। ----
---------कोई भी राजा बन जाता है। न कोई पराक्रम ,न विद्वता मंडली की या गुरु मंडली की कोई सलाह ली जाती है। न राजा का बेटा ही राजा होता है। भीड़ जिस तरफ होती है वही राजा बन जाता है। और कई बार तो साल में चार चार बार राजा बदल जाता है। कौन किसे मना करे, कौन किसे दंड दे। '
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        ' ये तो अंधेर नगरी वाली बात हुई। पर हम क्यों उनकी हरकतों को अपना रहे हैं?' सिल्की बोला।
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              ' अरे भाई! एक मछली सारे तालाब को गंदा करती है। अपनी जाति या समाज के पतन के लिए स्वयं हमारे काम ही तो जिम्मेदार होते हैं। ' अब देखलो साहबों के यहाँ रहने के कारण ही वो झबरीली को घमंड व दहेज़ जैसी बीमारी लग गयी है। मनुष्य तो कुत्तों को अपने स्वार्थ के लिए पालता है,गुलामी कराने को और उनकी गंदी आदतें कुत्तों में आ जाती हैं। अगर इसे शीघ्र ही नहीं रोका गया तो देखा-देखी अन्य कुत्तों में भी यह बीमारी फ़ैल सकती है। ' भूरा बोला,' आदमी शायद सभी जानवरों से बुरा है। '
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                 ' झबरीली तो बुरी तरह से बिगड़ गयी है। बस आदमियों के पीछे पीछे घूमती रहती है। उन्हीं की तरह बात करने की कोशिश करती है। अपने को आदमी ही समझने लगी है। बिस्कुट का नाश्ता,दूध-रोटी का लंच-डिनर, आदमी के खाने की अच्छी अच्छी चीज़ों के स्वाद में लालच ने इसे पागल कर दिया है। साहब ने कोट भी बनवा दिया है,साहब बनी घूमती है और गुलामी का पट्टा व ज़ंजीर गले में बांधे अपनी शान समझती है।
-------अच्छा खाना, पहनना, सोने के लालच में अपना कुत्तापन भी भूल गयी है। और बिगडैल आदमी की तरह बनती जारही है कुत्तों से तो बात ही नहीं करती, नकचढी कहीं की। ' ब्राउनी कुत्ता बोला।
---------' राम...राम ..एसा दुष्कृत्य और नीचता की बात कर रही है ये झबरीली। कमीनी आदमी कहीं की। ' कालू कुत्ता जोर से गुर्राया। ' इससे अच्छे तो हम कुत्ते ही हैं,आदमी तो कुत्तों से भी गया बीता है। कान पकडे जो अब झबरीली की तरफ पूंछ भी करूँ तो। कराले अपने बेटे की शादी आदमियों में ही। '\
' अरे जब कोई इसकी और मुंह उठाके देखेगा ही नहीं तो अपने आप झख मारकर कुत्तों की और दौड़ेगी।
--------आदमी तो इसके काम आयेगा नहीं,जब वह अपने आदमियों का ही नहीं होता , अपने लोगों को ही सताता है,उन्हें जलने मरने देता है तो कुत्तों का क्या होगा।
-------अगर सभी कुत्ते एकजुट होजाएं और इसका बायकाट करदें अपने आप ही सातवें आसमान पर चढ़ा दिमाग उतर जायगा। ' मरियल सा झबरीला कुत्ता बोला, ' मैंने इसे बहुत समझाया था पर इसने मुझे ही दौड़ाकर कोठी से बाहर निकलवा दिया। '
\
अच्छा भाई कुत्तो! जय सारमेय , कालू बोला,' आप सबका बहुत बहुत धन्यवाद, जो मुझे पाप में पड़ने से बचा लिया।
---------आप सब यहाँ बायकाट कराकर कुत्ता समाज सुधार संघर्ष में रत रहें , मैं अन्य कालोनियों में भी इसका बायकाट कराऊंगा। तभी एसे कुत्ते लोग ठीक होंगे। '

मंगलवार, 8 अगस्त 2017

क्यों हम बेटियों को बचाएँ

क्यों हम बेटियों को बचाएँ


मुझे मत पढ़ाओ , मुझे मत बचाओ,, मेरी इज्जत अगर नहीं कर सकते ,तो मुझे इस दुनिया में ही मत लाओ
मत पूजो मुझे देवी बनाकर तुम ,मत कन्या रूप में मुझे 'माँ' का वरदान कहो
अपने अंदर के राक्षस का पहले तुम खुद ही संहार करो। 
एक बेटी का दर्द
चंडीगढ़ की सड़कों पर जो 5 ता० की रात हुआ वो देश में पहली  बार तो नहीं हुआ।
और ऐसा भी नहीं है कि हम इस घटना से सीख लें और यह इस प्रकार की आखिरी घटना ही हो।
बात यह नहीं है कि यह सवाल कहीं नहीं उठ रहे कि रात बारह बजे दो लड़के एक लड़की का पीछा क्यों करते हैं,बल्कि सवाल तो यह उठ रहे हैं कि रात बारह बजे एक लड़की घर के बाहर क्या कर रही थी।
बात यह भी नहीं है कि वे लड़के नशे में धुत्त होकर एक लड़की को परेशान कर रहे थे,
बात यह है कि ऐसी घटनाएं इस देश की सड़कों पर आए दिन और आए रात होती रहती हैं।
बात यह नहीं है कि इनमें से अधिकतर घटनाओं का अंत पुलिस स्टेशन पर पीड़ित परिवार द्वारा न्याय के लिए अपनी आवाज़  उठाने के साथ नहीं होता।
बात यह है कि ऐसे अधिकतर मामलों का अन्त पीड़ित परिवार द्वारा घर की चार दीवारी में अपनी जख्मी आत्मा की चीखों को दबाने के साथ होता है।
बात यह नहीं है कि दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र में न्याय के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है,
बात यह है कि इस देश में अधिकार भी भीख स्वरूप दिये जाते है।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा पहलू यह है कि वर्णिका कुंडु जिन्होंने रिपोर्ट लिखवाई है,एक आईएएस अफ्सर की बेटी हैं, यानी उनके पिता इस सिस्टम का हिस्सा हैं।
जब वे और उनके पिता उन लड़कों के खिलाफ रिपोर्ट लिखवाने के लिए पुलिस स्टेशन गए थे तब तक उन्हें नहीं पता था कि वे एक राजनैतिक परिवार का सामना करने जा रहे हैं लेकिन जैसे ही यह भेद खुला कि लड़के किस परिवार से ताल्लुक रखते हैं तो पिता को यह आभास हो गया था कि न्याय की यह लड़ाई कुछ लम्बी और मुश्किल होने वाली है।
उनका अंदेशा सही साबित भी हुआ।
न सिर्फ लड़कों को थाने से ही जमानत मिल गई बल्कि एफआईआर में लड़कों के खिलाफ लगी धाराएँ भी बदल कर केस को कमजोर करने की कोशिशें की गईं।
जब उनके साथ यह व्यवहार हो सकता है तो फिर एक आम आदमी इस सिस्टम से क्या अपेक्षा करे?
जब एक आईएएस अफ्सर को अपने पिता का फर्ज निभाने में इतनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है तो एक साधारण पिता क्या उम्मीद करे?
वर्णिका के पिता ने तो आईएएस लाबी से समर्थन जुटा कर इस केस को सिस्टम वर्सिस पालिटिक्स करके इसके रुख़ को बदलने की कोशिश की है लेकिन एक आम पिता क्या करता?
जब एक लोकतांत्रिक प्रणाली में सत्ताधारी पार्टी के अध्यक्ष का बेटा ऐसा काम करता है तो वह पार्टी अपने नेता के बचाव में आगे आ जाती है क्योंकि वह सत्ता तंत्र में विश्वास करती है लोकतंत्र में नहीं,वह तो सत्ता हासिल करने का एक जरिया मात्र है।
उसके नेता यह कहते हैं कि पुत्र की करनी की सजा पिता को नहीं दी जा सकती तो बिना योग्यता के पिता की राजनैतिक विरासत उसे क्यों दे दी जाती है।
आप अपनी ही पार्टी के प्रधानमंत्री के लाल किले से दिए गए भाषण को भी नकार देते हैं जो कहते हैं कि हम अपनी बेटियों से तो तरह तरह के सवाल पूछते हैं,उन पर पाबंदियां भी लगाते हैं लेकिन कभी बेटे से कोई सवाल कर लेते, कुछ संस्कारों के बीज उनमें डाल देते, कुछ लगाम बेटों पर लगा देते  तो बेटियों पर बंदिशें नहीं लगानी पड़तीं।
यह कैसा लोकतंत्र है जिसमें सरकार अपने नागरिकों की सुरक्षा से ऊपर अपने नेताओं और स्वार्थों को रखती है?
यह कैसी व्यवस्था है जहाँ अपने अधिकारों की बात करना एक "हिम्मत का काम" कहा जाता है।
हम एक ऐसा देश क्यों नहीं बना सकते जहाँ हमारी बेटियाँ भी बेटों की तरह आजादी से जी पाँए ?
हम अपने भूतपूर्व सांसदों विधायकों नेताओं को आजीवन सुविधाएं दे सकते हैं लेकिन अपने नागरिकों को सुरक्षा नहीं दे सकते।
हम नेताओं को अपने ही देश में अपने ही क्षेत्र में जेड प्लस सेक्यूरिटी दे सकते हैं लेकिन अपनी बेटियों को सुरक्षा तो छोड़िये न्याय भी नहीं  ?
देश निर्भया कांड को भूला नहीं हैं और न ही इस सच्चाई से अंजान है कि हर रोज़ कहीं न कहीं कोई न कोई बेटी किसी न किसी अन्याय का शिकार हो रही है। उस दस साल की मासूम और उसके माता पिता का दर्द कौन समझ सकता है जो किसी और की हैवानियत का बोझ इस अबोध उम्र में उठाने के लिए मजबूर है। जिसकी खिलौनों से खेलने की उम्र थी वो खुद किसी अपने के ही हाथ का खिलौना बन गई। जिसकी हँसने खिलखिलाने की उम्र थी वो आज दर्द से कराह रही है।जो खुद एक बच्ची है लेकिन माँ बनने के लिए मजबूर है।
क्यों हम बेटियों को बचाएँ ? इन हैवानों के लिए?
हम अपने बेटों को क्यों नहीं सभ्यता और संस्कारों का पाठ पढ़ाएँ ?
बेहतर यह होगा कि बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ के बजाय
बेटी बचानी है तो पहले बेटों को सभ्यता और संस्कारों का पाठ पढ़ाओ ।उन्हें बेटियों की इज्जत करना तो सिखाओ।
डॉ नीलम महेंद्र



सोमवार, 31 जुलाई 2017

नारी की लेके कदम-कदम अग्नि-परीक्षा

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अवसर दिया श्रीराम ने पुरुषों को हर कदम ,
अग्नि-परीक्षा नारी की तुम लेते रहोगे ,
करती रहेगी सीता सदा मर्यादा का पालन
पर ठेकेदार मर्यादा के यहाँ तुम ही रहोगे .
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इक रात भी नारी अगर घर से रही बाहर
घर से निकाल तुम उसे बाहर ही करोगे ,
पर लौटके तुम आ रहे दस साल में भी गर
पवित्रता की मूर्ति बन सजते रहोगे .
...................................................
इज़्ज़त के नाम पे यहां नारी की खिंचाई
इज़्ज़त के वास्ते उसे तुम क़त्ल करोगे ,
हमको खबर है बहक कलियुगी सूर्पणखा से
सबकी नज़र में इज़्ज़तदार बने रहोगे .
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कुदरत ने दिया नारी को माँ बनने का जो वर
उसको कलंक तुम ही बनाते रहोगे ,
नारी की लेके कदम-कदम अग्नि-परीक्षा
तुम राम बनके दिल यूँ ही दुखाते रहोगे .
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 शालिनी कौशिक
     [कौशल ]