रविवार, 28 मई 2017

नारी.... क्यूं पापन हुई?


कुर्सियां,मेज और मोटर साइकिल
     नजर आती हैं हर तरफ
और चलती फिरती जिंदगी
     मात्र भागती हुई
     जमानत के लिए
     निषेधाज्ञा के लिए
      तारीख के लिए
      मतलब हक के लिए!
ये आता यहां जिंदगी का सफर,
है मंदिर ये कहता न्याय का हर कोई,
मगर नारी कदमों को देख यहां
लगाता है लांछन बढ हर कोई.
   है वर्जित मोहतरमा
    मस्जिदों में सुना ,
   मगर मंदिरों ने
   न रोकी है नारी कभी।
वजह क्या है
  सिमटी है सोच यहाँ ?
भला आके इसमें
 क्यूँ पापन हुई ?
क्या जीना न उसका ज़रूरी यहाँ ?
 क्या अपने हकों को बचाना ,
क्या खुद से लूटा हुआ छीनना ,
क्या नारी के मन की न इच्छा यहाँ ?
मिले जो भी नारी को हक़ हैं यहाँ
  ये उसकी ही हिम्मत
   उसी की बदौलत !
वो रखेगी कायम भी सत्ता यहाँ
   खुद अपनी ही हिम्मत
    खुदी की बदौलत !
बुरा उसको कहने की हिम्मत करें
कहें चाहें कुलटा ,गिरी हुई यहाँ
पलटकर जहाँ को वो मथ देगी ऐसे
समुंद्रों का मंथन हो जैसे रहा !
बहुत छीना उसका
     न अब छू सकोगे ,
है उसका ही साया
    जहाँ से बड़ा।
वो सबको दिखा देगी
     अपनी वो हस्ती ,
है जिसके कदम पर
      ज़माना पड़ा।

शालिनी कौशिक
     [कौशल ]

सोमवार, 22 मई 2017

फिसलना छोड़ नारी ....

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''हैलो शालिनी '' बोल रही है क्या ,सुन किसी लड़की की आवाज़ मैंने बेधड़क कहा कि हाँ मैं ही बोल रही हूँ ,पर आप ,जैसे ही उसने अपना नाम बताया ,अच्छा लगा ,कई वर्षों बाद अपनी सहपाठी से बात कर  रही हूँ ,पर आश्चर्य हुआ कि आखिर उसे मेरा नंबर कैसे मिला ,क्योंकि आज जो फोन नंबर की स्थिति है यह अबसे २० साल पहले नहीं थी ,२० साल पहले चिट्ठी से बात होती थी ,पत्र भेजे जाते थे किन्तु आज जिससे बात करनी है फ़ौरन नंबर दबाया और उससे कर ली बात ,खैर मैंने उससे पुछा ,''तुझे मेरा नंबर कैसे मिला ,तो उसने एकदम बताया कि लिया है किसी से ,बहुत परेशानी में हूँ ,क्या हुआ ,मेरे यह पूछते ही वह पहले रोने लगी और फिर उसने बतायी अपनी आपबीती ,जो न केवल उसकी बल्कि आज की ६०%महिलाओं की आपबीती है और महिलाएं उसे सह रही हैं और सब कुछ सहकर भी अपनी मुसीबतों के जिम्मेदार को बख्श रही हैं .

मेरी सहपाठी के अनुसार शादी को २० वर्ष हो गए और उसका पति अब उसका व् बच्चों का कुछ नहीं करता और साथ ही यह भी कहता है कि यदि मेरे खिलाफ कुछ करोगी तो कोई फायदा नहीं होगा क्योंकि अगर तुमने मुझे जेल भी भिजवाने की कोशिश की तो देख लेना मैं अगले दिन ही घर आ जाऊंगा .ऐसे में एक अधिवक्ता होने के नाते जो उपाय उसके पति का दिमाग ठीक करने के लिए मैं बता सकती थी मैंने बताये पर देखो इस भारतीय नारी का अपने पति के लिए और वो भी ऐसे पति के लिए जो पति होने का कोई फ़र्ज़ निभाने को तैयार नहीं ,उसने वह उपाय मानने से इंकार कर दिया क्योंकि उसे केवल पति से भरण-पोषण चाहिए था और उसके लिए वह कोर्ट के धक्के खाने को भी तैयार नहीं थी ,नहीं जानती जिसे कि जो पति इस स्थिति में तुझे घर से निकल सकता है, अपने बच्चों को घर से बाहर धकिया सकता है ,२० साल साथ रहने पर भी तेरे चरित्र पर ऊँगली उठा सकता है ,सरकारी नौकर नहीं है ,ज़मीन जायदाद वाला नहीं है ,कोर्ट ने भरण पोषण का खर्चा उस पर डाल भी दिया तो वह क्या देगा ? उसके लिए तुझे फिर भरण-पोषण के खर्चे के निष्पादन के लिए फिर कोर्ट जाना पड़ेगा और जिसे जेल जाने से बचाने का तू प्रयास कर रही है उसे उसके कर्मो के हिसाब से फिर जेल जाने का ही कदम उठाने का प्रयास करना पड़ेगा ,क्योंकि वह अगर उसे भरण-पोषण देने के ही मूड में होता तो २० साल की शादी को ऐसे नहीं तोड़ता ,अपनी जिम्मेदारी से ऐसे पल्ला नहीं झाड़ता ,और रही कोर्ट की बात तो ३-४ साल तो हे भारतीय नारी इस पर अमल भूल जा क्योंकि भारत के न्यायालय की कार्यवाही बहुत सुस्त है ,ऐसे में वह कुछ जवाब न देते हुए सोचने को मजबूर हो गयी .

ये है भारतीय नारी जो आदमी के ज़ुल्म सह-सहकर भी उसके भले की ही सोचती रहती है .अगर ऐसे में मैं एक और माननीय भारतीय नारी की बात करूँ तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए क्योंकि इसकी तो नस्ल ही ऐसी है ,जिसे अपनी दो-दो लड़कियों को ले ससुराल से माँ के घर इसलिए आना पड़ गया कि पति नालायक व् नाकारा था और स्वयं की सारी कोशिशों से उन बच्चियों का पालन-पोषण करना पड़ा वह भी अपने पति के आगे अपने घुटने टेकने से स्वयं को नहीं रोक सकी  और उसके दबाव में आकर एक और संतान को जन्म दे दिया जबकि उसकी सारी कॉलोनी उसके साथ थी ,जिस बाप ने बच्चियों के पालन -पोषण में कोई योगदान न दिया , अपनी ज़मीन जायदाद भी उठाकर बेटा होते हुए भतीजे को दे दी ,बेटी के ब्याह में भी न आया उस तक को उन बच्चों की माँ ने बख्श दिया .कैसे सुधर सकता है ये समाज ? और कैसे कहा जा सकता है इस नारी को नारीशक्ति ,जो अन्यायी को अन्याय का प्रतिकार अपने आंसुओं के रूप में दे ,अपने बच्चों को निराश्रितता के रूप में दे .

नारी शक्ति है ,वह संसार की सभी शक्तियों से लड़कर अपना एक मुकाम बना सकती है ,वह अपने बच्चों को अपने दम पर इस जगत में खड़ा कर सकती है ,वह आतताई शक्तियों को ठेंगा दिखा सकती है ,उनका मुंह तोड़ सकती है और उसने यह सब किया भी है ,ऐसे में इस एक भावनात्मक रिश्ते की डोर नारी को कब तक कमजोर बनाती रहेगी ? उसे इस रिश्ते की डोर से स्वयं को ऐसी परिस्थितियों में आज़ाद करना ही होगा और जैसे को तैसा की प्रवर्ति अपनाते हुए अपने व् अपने से जुड़े हर शख्स ,चाहे वह नारी की माता -पिता व् संतान कोई भी क्यों 'न हो ,को मजबूती का स्तम्भ बनकर दिखाना ही होगा तभी वह यह कहती हुई शोभायमान होगी -

''अभी तक सो रहे हैं जो ,उन्हें आवाज़ तो दे दूँ ,
बिलखते बादलों को मैं कड़कती गाज तो दे दूँ .
जनम भर जो गए जोते, जनम भर जो गए पीसे
उन्हें मैं तख़्त तो दे दूँ ,उन्हें मैं ताज़ तो दे दूँ ''

शालिनी कौशिक
[कौशल ]

शुक्रवार, 19 मई 2017

मैं तुम्हारे काव्य की नायिका नहीं हूँ

मैं नहीं कोमल कली सी, ना गरजती   दामिनी,
हूं नहीं तितली सी चंचल, ना ही मैं गजगामिनी,
ना मैं देवी, ना परी, ना ही हूं मैं दानवी,
मैं सरल साक्षात नारी,  मात्र हूं मैं मानवी,
मैं गगन में नित चमकती तारिका नहीं हूँ !
मैं तुम्हारे काव्य की नायिका नहीं हूँ !

है नहीं मुझ पर समय कि केश सज्जा मैं करूं,
आईने के सामने बैठकर  सजती रहूं,
तोड़ती  पत्थर  मैं, धूप में  प्रहार से,
ढ़ो रही सिर धर के ईटें, दब रही हूँ भार से,
श्रंगार रस प्रसार की सहायिका नहीं हूँ !
मैं तुम्हारे काव्य की नायिका नहीं हूँ !

हां गृहस्थी के लिए दिन रात मैं खटती रही,
जिंदगी  चूल्हे  आगे ही मेरी कटती रही,
कब गृहस्थन बैठ सकती मेंहदी लगाकर हाथ में ?
कूटने दिन में मसाले, चौका बरतन रात में,
प्रेम राग गाने वाली गायिका नहीं हूँ !
मैं तुम्हारे काव्य की नायिका नहीं हूँ !

हूँ नहीं मुग्धा कोई जो चित्त का कर लूं हरण,
ना ही कर पल्लव  नरम, न फूल से मेरे चरण,
मानिनी बनकर कभी खुद पर नहीं करती अहम,
हां सहज ही भाव से कर्तव्यों को करती वहन,
मैं विलास इच्छुक अभिसारिका नहीं हूँ !
मैं तुम्हारे काव्य की नायिका नहीं हूँ !

शिखा कौशिक नूतन 

बुधवार, 17 मई 2017

रंग लाई बेटियों की जंग - BHASKAR. COM से साभार

... पर एक सवाल कचोटता है.... छेड़छाड़ का क्या इलाज किया जाये या इसे लाइलाज बीमारी मान लिया जाये...... 


हरियाणा में छेड़छाड़ से तंग लड़कियों का अनशन, अपग्रेड करना पड़ा स्कूल

Ajay Bhatia | May 17,2017 16:15 I



रेवाडी -स्कूल शिक्षा मंत्री रामबिलास शर्मा ने सोमवार को भरोसा दिलाया था कि जल्द ही स्कूल को अपग्रेड करने का एलान किया जाएगा। 
-हड़ताल पर बैठी कुछ लड़कियों की तबीयत बिगड़ गई थी,लेकिन उन्होंने धरना जारी रखा।
-मंगलवार को एडमिनिस्ट्रेशन लडककियों को समझाने पहुंचा था,लेकिन उन्होंने ऑर्डर का लेटर हाथ में आने से पहले धरना खत्म करने से इनकार कर दिया था। 
-बुधवार को स्कूल शिक्षा मंत्री ने कहा कि स्कूल में एक प्रिंसिपल अप्वाइंट कर दिया गया है। गुरुवार से इसमें एडमिशन शुरू हो जाएंगे। 
छेड़छाड़ से तंग आकर लिया हड़ताल का फैसला
-बता दें कि 30 से ज्यादा छात्राएं 10 मई से धरने पर बैठी थीं। उनका कहना था कि गांव का स्कूल 10वीं तक है। 11th और 12th की पढ़ाई के लिए उन्हें दूसरे गांव के स्कूलों में जाना पड़ता है। वहां उनके साथ छेड़छाड़ होती है। कई पेरेंट्स परेशान होकर बेटियों की पढ़ाई छुड़वा देते हैं। 
-लड़कियों ने कहा था कि सरकार'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ'का नारा दे रही है,लेकिन ये हमारे यहां चुनौती बना है। 
(शिखा कौशिक नूतन) 

सोमवार, 15 मई 2017

तुमने मुझे आंसू दिये

हो व्यथित नारी ने नर से
दो टूक ये वचन कहे,
मैंने तुमको दिल दिया
तुमने मुझे आंसू दिये!

जिंदगी के तुम मेरे
बन के मालिक तन गये,
छीनकर हक मेरे सारे
खुद खुदा तुम बन गये,
टूट कर बिखर गयी
जुल़म  इतने क्यूं किये!
मैंने तुमको दिल दिया
तुमने मुझे आंसू दिये!

रोज़ दे देकर सुबूत
पाकीज़गी के थक गयी,
तेरे वहशीपन के कारण
देह बनकर रह गयी,
है मुझे मालूम कैसे?
खून के आँसू पिये!
 मैंने तुमको दिल दिया
तुमने मुझे आंसू दिये!

जिस किसी ने की बगावत
हो गया उसका कत्ल,
और है इल्जाम उसपर
बदचलन थी बेअक्ल,
हां जुबान काटकर
सब लफ़ज मेरे ले लिये!
मैंने तुमको दिल दिया
तुमने मुझे आंसू दिये!!

शिखा कौशिक नूतन

शनिवार, 13 मई 2017

माँ का वंदन..डा श्याम गुप्त ...



माँ का वंदन..




फिर आज माँ की याद आई सुबह सुबह |
शीतल पवन सी घर में आयी सुबह सुबह |

वो लोरियां, वो मस्तियाँ, वो खेलना खाना,  
ममता की छाँह की सुरभि छाई सुबह सुबह |

वो चाय दूध नाश्ता जबरन ही खिलाना,  
माँ अन्नपूर्णा सी छवि भाई सुबह सुबह |

परिवार के सब दर्दो-दुःख खुद पर ही उठाये,  
कदमों में ज़न्नत जैसे सिमट आयी सुबह सुबह |

अब श्याम क्या कहें माँ औ ममता की कहानी,
कायनात सारी कर रही वंदन सुबह सुबह ||



मातृ दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं

मां तेरी तस्वीर के आगे ठहर जाती हूँ मैं, 
टूट कर माला के मोती सी बिखर जाती हूँ मैं! 

है नहीं मालूम कैसे जी रही तेरे बिना, 
जिंदगी के सब गमों का पी जहर जाती हूँ मैं! 

गौर से मैं देखती हूँ जब कभी मां आईना, 
हूबहू तब तेरे जैसी ही नजर आती हूँ मैं! 

अब नहीं मिल पायेंगी मां की नरम वो थपकियां, 
सोचकर ऐसा ही कुछ कितनी सिहर जाती हूँ मैं! 

तुम बसी 'नूतन' के दिल में क्या कहूं इसके सिवा, 
हां दुआयें याद कर अब भी निखर जाती हूँ मैं! 

शिखा कौशिक नूतन