गुरुवार, 15 अगस्त 2019

बहुत-बहुत बधाई व शुभकामनाएँ

स्वतंत्रता दिवस व रक्षाबंधन पर्व  की बहुत-बहुत बधाई व अशेष हार्दिक शुभकामनायें

शनिवार, 10 अगस्त 2019

क्या लड़कियां सम्पत्ति होती हैं?


  मोदी और शाह की जोड़ी द्वारा जब से कश्मीर से अनुच्छेद 370 व 35 A हटाया गया है सारे देश में एक चर्चा गर्म है - "कश्मीरी लड़कियों से शादी करने की" और न केवल आम जनता बल्कि सत्तारुढ़ पार्टी के जिम्मेदार नेता भी इस हवन में अपनी आहुति दे रहे हैं. भाजपा के उत्तर प्रदेश के खतौली क्षेत्र के विधायक विक्रम सिंह सैनी कहते हैं कि  "अब हर कोई गोरी कश्मीरी लड़कियों से शादी कर सकता है, " और हरियाणा के मुख्य मंत्री मनोहर लाल खट्टर कहते हैं कि "अपने यहां कम पड़ेगी तो कश्मीर से मंगा लेंगे,".
          सवाल ये उठता है कि क्या वाकई लड़कियाँ कोई चीज़ या कोई सम्पत्ति हैं कि उनका जिसने जैसे चाहा इस्तेमाल कर लिया और ऐसा नहीं है कि यहां बात केवल भोली नादान लड़कियों की है बल्कि यहां हम बात ऐसी लड़कियों की भी कर रहे हैं जो आज के युग में सशक्तता की मिसाल बन चुकी थी.
     अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश बार कौंसिल अध्यक्ष पद के लिए निर्वाचित हुई कुमारी दरवेश यादव एडवोकेट की उनके साथी अधिवक्ता मनीष शर्मा ने कुछ मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, केवल इसलिये हत्या कर दी कि दरवेश उनकी इच्छा के विरूद्ध एक पुलिस अधिकारी से मिलती थी जबकि मनीष शादी शुदा थे और दरवेश केवल उनकी साथी अधिवक्ता थी, न तो वह उनकी बहन थी और न ही उनसे किसी भी भावनात्मक रिश्ते में बंधी थी, केवल साथ काम करने के कारण मनीष शर्मा एडवोकेट उन पर ऐसे अधिकार समझने लगे जैसे वे उनकी संपत्ति हों.
         ऐसे ही उत्तर प्रदेश के एटा जिले की जलेसर कोर्ट में सहायक अभियोजन अधिकारी के पद पर तैनात कुमारी नूतन यादव को उसके पुलिस क्वार्टर में हत्यारे द्वारा मुंह में पांच गोलियों के फायर कर मार दिया गया और पुलिस को प्राप्त काल डिटेल से पता लगता है कि नूतन के मंगेतर की काल ज्यादा थी और हत्यारे की कम, जिससे कुछ मीडिया रिपोर्ट के अनुसार यह ज़ाहिर होता है कि हत्यारे ने नूतन द्वारा खुद से अधिक मंगेतर को तरजीह दिए जाने पर हत्याकांड को अन्जाम दिया और ऐसा उसके द्वारा समाज में घर से बाहर निकली लड़की को अपनी संपत्ति सोच कर किया गया.
       ये तो मात्र दो एक किस्से व हमारे देश के जिम्मेदार नेताओं के बयान हैं, जबकि देखा जाए तो स्थिति बहुत ज्यादा बदतर है. लड़कियों को इंसान का दर्जा न किसी पुरुष द्वारा, न परिवार द्वारा, न समाज द्वारा और न ही देश के प्रबुद्ध नागरिकों, नेताओं, समाजसेवियों द्वारा दिया जाता है बल्कि उनके द्वारा उन्हें पग पग पर अपनी सामाजिक कमजोर स्थिति का आकलन कर ही कुछ करने के निर्देश दिए जाते हैं और जहां कोई लड़की हिम्मत कर ऐसी स्थिति का मुकाबला करने के लिए खड़ी होती है तो उसके लिए अनर्गल प्रलाप कर उसे नीचा दिखाने की कोशिश की जाती है या फिर उसकी दरवेश यादव या नूतन यादव की तरह हत्या कर दी जाती है.   शालिनी कौशिक एडवोकेट
(कौशल)


बहादुर कश्मीरी बेटियां

कश्मीरी बेटियों व बहनों की गोरी त्वचा व सुंदरता को लेकर अपनी लार टपकाने वाले दुष्टों को एक बार यह भी पढ़ लेना चाहिए -

रविवार, 4 अगस्त 2019

बेटी और माँ - कविता



Mother_and_daughter : mother and baby hands at homeMother_and_daughter : Mother and baby Stock PhotoMother_and_daughter : Sketch of little girl having fun with her beautiful mother. Vector illustration Stock Photo

बेटी मेरी तेरी दुश्मन ,तेरी माँ है कभी नहीं ,
तुझको खो दूँ ऐसी इच्छा ,मेरी न है कभी नहीं .
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नौ महीने कोख में रखा ,सपने देखे रोज़ नए ,
तुझको लेकर मेरे मन में ,भेद नहीं है कभी नहीं .
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माँ बनने पर पूर्ण शख्सियत ,होती है हर नारी की ,
बेटे या बेटी को लेकर ,पैदा प्रश्न है कभी नहीं .
.......................................................................
माँ के मन की कोमलता ही ,बेटी से उसको जोड़े ,
नन्ही-नन्ही अठखेली से ,मुहं मोड़ा है कभी नहीं .
.........................................................................
सबकी नफरत झेल के बेटी ,लड़ने को तैयार हूँ,
पर सब खो देने का साहस ,मुझमे न है कभी नहीं .
....................................................................
कुल का दीप जलाने को ,बेटा ही सबकी चाहत ,
बड़े-बुज़ुर्गों  की आँखों का ,तू तारा है कभी नहीं .
.......................................................................
बेटे का ब्याह रचाने को ,बहु चाहिए सबको ही ,
बेटी होने पर ब्याहने का ,इनमे साहस है कभी नहीं .
............................................................................
अपने जीवन ,घर की खातिर ,पाप कर रही आज यही ,
माफ़ न करना अपनी माँ को ,आना गर्भ में कभी नहीं .
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रो-रोकर माँ कहे ''शालिनी ''वसुंधरा भी सदा दुखी ,
बेटी के आंसू बहने से ,माँ रोक सकी है कभी नहीं .
.............................................................................
     शालिनी कौशिक 
            [कौशल ]

शनिवार, 3 अगस्त 2019

बेचारी नारी

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निकल जाओ मेरे घर से

एक पुरुष का ये कहना
अपनी पत्नी से
आसान
बहुत आसान
किन्तु
क्या घर बनाना
उसे बसाना
सीखा कभी
पुरुष ने
पैसा कमाना
घर में लाना
क्या मात्र
पैसे से बनता है घर
नहीं जानता
घर
ईंट सीमेंट रेत का नाम नहीं
बल्कि
ये वह पौधा
जो नारी के त्याग, समर्पण ,बलिदान
से होता है पोषित
उसकी कोमल भावनाओं से
होता पल्लवित
पुरुष अकेला केवल
बना सकता है
मकान
जिसमे कड़ियाँ ,सरिये ही
रहते सिर पर सवार
घर
बनाती है नारी
उसे सजाती -सँवारती है
नारी
उसके आँचल की छाया
देती वह संरक्षण
जिसे जीवन की तप्त धूप
भी जला नहीं पाती है
और नारी
पहले पिता का
फिर पति का
घर बसाती जाती है
किन्तु न पिता का घर
और न पति का घर
उसे अपना पाता
पिता अपने कंधे से
बोझ उतारकर
पति के गले में डाल देता
और पति
अपनी गर्दन झुकते देख
उसे बाहर फेंक देता
और नारी
रह जाती
हमेशा बेघर
कही जाती
बेचारी
जिसे न मिले
जगह उस बगीचे में
जिसकी बना आती वो क्यारी- क्यारी .

शालिनी कौशिक
[कौशल ]

बुधवार, 31 जुलाई 2019

ऐसे भी कहर - वैसे भी कहर - तीन तलाक

 सायरा बानो केस पर फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच ने 2017 में तीन तलाक को गैर-कानूनी करार दिया था। अलग-अलग धर्मों वाले 5 जजों की बेंच ने 3-2 से फैसला सुनाते हुए सरकार से तीन तलाक पर छह महीने के अंदर कानून लाने को कहा था। दो जजों ने इसे असंवैधानिक कहा था, एक जज ने पाप बताया था। इसके बाद दो जजों ने इस पर संसद को कानून बनाने को कहा था।
        इसी क्रम में सरकार ने इसके लिए कानून तैयार किया और लोकसभा में इसे पास कराया. राज्यसभा में संख्या बल कम होने के चलते इसे पास कराने में दिक्कत थी किन्तु विपक्ष के एकजुट न होने व सदन से बहिर्गमन के चलते तीन तलाक विधेयक मंगलवार को राज्यसभा में भी पास हो गया राज्यसभा में तीन तलाक विधेयक पर करीब चार घंटे चली बहस के बाद यह पारित हुआ।  राष्ट्रपति की सहमति के बाद तीन तलाक का विधयेक कानून बन जाएगा।
*क्या हैं तीन तलाक विधेयक के प्रावधान
*तलाक-ए-बिद्दत यानी एक बार में तीन तलाक देना गैर कानूनी
*तीन तलाक संज्ञेय अपराध मानने का प्रावधान, यानी पुलिस बिना वारंट गिरफ्तार कर सकती है, लेकिन तब जब महिला खुद शिकायत करेगी
*खून या शादी के रिश्ते वाले सदस्यों के पास भी केस दर्ज करने का अधिकार
*पड़ोसी या कोई अनजान शख्स इस मामले में केस दर्ज नहीं कर सकता है
*मौखिक, लिखित, इलेक्ट्रॉनिक (एसएमएस, ईमेल, वॉट्सऐप) पर तलाक को अमान्य करार दिया गया
*आरोपी पति को तीन साल तक की सजा का प्रावधान
मजिस्ट्रेट आरोपी को जमानत दे सकता है
*आरोपी को जमानत तभी दी मिलेगी, जब पीड़ित महिला का पक्ष सुना जाएगा
*पीड़ित महिला के अनुरोध पर मजिस्ट्रेट समझौते की अनुमति दे सकता है
*पीड़ित महिला पति से गुजारा भत्ते का दावा कर सकती है
महिला को कितनी रकम दी जाए यह जज तय करेंगे
*पीड़ित महिला के नाबालिग बच्चे किसके पास रहेंगे इसका फैसला भी मजिस्ट्रेट ही करेगा
           मुस्लिम महिलाओं की स्थिति को देखते हुए यह कहा जा रहा है कि अब उनकी स्थिति मजबूत होगी किन्तु अगर हम विधेयक की गहराई में जाते हैं तो साफ तौर पर पाते हैं कि ये मजबूती मुस्लिम विवाह को बुरी तरह से हिला देगी क्योंकि विपक्ष का विरोध जिस मुद्दे को लेकर था वह अब भी जस का तस है.
. विपक्षी दल कांग्रेस ने कहा कि एक बार में तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) को आपराधिक कृत्य बनाने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि इस प्रथा को उच्चतम न्यायालय ‘शून्य एवं अमान्य’ करार दे चुका है।
     दूसरी तरफ जम्मू-कश्मीर की पूर्व सीएम महबूबा मुफ्ती ने कहा कि तीन तलाक को लेकर कानून बनाने की क्या जरूरत थी, जब सुप्रीम कोर्ट ने खुद ही इसे अवैध करार दिया है।
      और ऐसा इसलिए क्योंकि साल 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने शायरा बानो केस में फैसला देते हुए तुरंत तीन तलाक को असंवैधानिक घोषित कर दिया और जब कोई कार्य असंवैधानिक है तो वह किसी भी कानून द्वारा मान्य नहीं है ऐसे में उसके किए जाने पर क्या मान्यता मिलना या क्या अपराध हो जाना किन्तु केंद्र सरकार ने इस असंवैधानिकता को अपराध के दायरे में रखा और मुस्लिम परिवार को तोड़ने का और मुस्लिम महिलाओं के दर दर भटकने का पूरा इंतजाम कर दिया.
       अब राष्ट्रपति की मंजूरी मिलते ही यह कानून बन जाएगा कि जैसे ही कोई मुस्लिम पति अपनी पत्नी को तलाक तलाक तलाक कहता है और मुस्लिम पत्नी इसकी शिकायत कर देती है तो यह एक संज्ञेय अपराध होगा और पुलिस मुस्लिम पति को बिना वारंट गिरफ्तार कर सकेगी और वह तीन साल की सज़ा के अधीन होगा मतलब ये कि उस मुस्लिम पत्नी को उसका पति तीन तलाक दे तो वह बेसहारा और वह इसकी शिकायत करे तो भी बेसहारा क्योंकि पति अगर जेल गया तो कौनसा पुलिस थाना या कौनसी कोर्ट उसके व उसके बच्चों के लिए रोटी कपड़ा मकान का इंतज़ाम कर रही है और उस पर जुमले ये कि
    "राज्यसभा से तीन तलाक बिल पास होने पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि नारी गरिमा की रक्षा के लिए तीन तलाक बिल का पास होना जरूरी था।"
     पीएम ने कहा कि तीन तलाक बिल का पास होना महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक बहुत बड़ा कदम है. तुष्टिकरण के नाम पर देश की करोड़ों माताओं-बहनों को उनके अधिकार से वंचित रखने का पाप किया गया. मुझे इस बात का गर्व है कि मुस्लिम महिलाओं को उनका हक देने का गौरव हमारी सरकार को प्राप्त हुआ है.पीएम ने कहा कि एक पुरातन और मध्यकालीन प्रथा आखिरकार इतिहास के कूड़ेदान तक ही सीमित हो गई है.
    अब इन्हें कौन बताए कि महिला गरिमा व अस्मिता की रक्षा के लिए पहले ज़रूरी ये है कि उसका व उसके बच्चों का पेट भरा हो और वह अपने दम पर पारिवारिक रूप से सशक्त हो क्योंकि कोई भी लड़ाई तभी मजबूती से लडी जा सकती है जब वह मजबूत आधार से लडी जाए, फिर विवाह के बाद पत्नी का जीवन आधार पति ही होता है और तीन तलाक मुस्लिम पत्नी के जीवन में जो शून्यता उत्पन्न करता है वह शून्यता तो सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक को अमान्य व असंवैधानिक घोषित करके ही भर दी थी केंद्र सरकार द्वारा तो तीन तलाक से मुस्लिम पति द्वारा खोदी गई खाई को और चौड़ी करने का ही काम किया गया है पाटने का नहीं और यह भारतीय संस्कृति के भी खिलाफ है क्योंकि भारतीय संस्कृति परिवार को बसाने मे विश्वास रखती है उजाड़ने मे नही और अब की यह केंद्र सरकार मुस्लिम पुरातन व मध्यकालीन प्रथा को कूड़ेदान मे सीमित करने के नाम पर मुस्लिम परिवार को ही कूड़ेदान में सीमित करने लग गई है. इसलिए अब मुस्लिम परिवार का स्थायित्व खुदा के ही भरोसे है.
शालिनी कौशिक एडवोकेट
(कौशल)

मंगलवार, 30 जुलाई 2019

नारी की दुनिया व सोच

Indian Village Women Royalty Free Stock Photo

      हमारी संविधान व्यवस्था ,कानून व्यवस्था हम सबके लिए गर्व का विषय हैं और समय समय पर इनमे संशोधन कर इन्हें बदलती हुई परिस्थितयों के अनुरूप भी बनाया जाता रहा है किन्तु हमारा समाज और उसमे महिलाओं की स्थिति आरम्भ से ही शोचनीय रही है .महिलाओं को वह महत्ता समाज में कभी नहीं मिली जिसकी वे हक़दार हैं .बचपन से लेकर वृद्धावस्था तक उसके लिए ऐसे पल कम ही आते हैं जब वह अपने देश के कानून व् संविधान पर गर्व कर सके इसमें देश के कानून की कोई कमी नहीं है बल्कि कमी यहाँ जागरूकता की है इस देश की आधी आबादी लगभग एक तिहाई प्रतिशत में नहीं जानती कि कानून ने उसकी स्थिति कितनी सुदृढ़ कर रखी है .
         आज गर्व होता है जब हम लड़कियों को भी स्कूल जाते देखते हैं हालाँकि मैं जिस क्षेत्र की निवासी हूँ वहाँ लड़कियों के लिए डिग्री कॉलिज तक की व्यवस्था है और वह भी सरकारी इसलिए लड़के यहाँ स्नातक हों या न हों लड़कियां आराम से एम्.ए.तक पढ़ जाती हैं और संविधान में दिए गए समान शिक्षा के अधिकार के कारण आज लड़कियां तरक्की के नए पायदान चढ़ रही हैं .
              शिक्षा का स्थान तो नारी के जीवन में महत्वपूर्ण है ही किन्तु सर्वाधिक ज़रूरी जो कहा जाता है और जिसके बिना नारी को धरती पर बोझ कहा जाता है वह उसकी जीवन की सबसे बड़ी तकलीफ भी बन जाता है कभी दहेज़ के रूप में तो कभी मारपीट ,कभी तलाक और पता नहीं क्या क्या ,घरेलू हिंसा से संरक्षण विधेयक द्वारा कानून ने सभी महिलाओं की सुरक्षा का इंतज़ाम किया है और ऐसे ही महिलाओं को पुरुषों की अपेक्षा तलाक के ज्यादा अधिकार देकर उन्हें, जबर्दस्ती के सम्बन्ध को जिसे जनम जनम का नाता कहकर उससे ढोने की पिटने की अपेक्षा की जाती है ,मुक्ति का रास्ता भी दिया है महिलाओं को अबला जैसी संज्ञा से मुक्ति दिलाने की हमारे कानून ने बहुत कोशिश की है किन्तु कुछ सामाजिक स्थिति व् कुछ अज्ञानता के चलते वे सहती रहती हैं और इस सम्बन्ध को अपनी बर्दाश्त की हद से भी बाहर तक निभाने की कोशिश करती हैं किन्तु जहाँ शिक्षा का उजाला होगा और कानून का साथ वहाँ ऐसी स्थिति बहुत लम्बे समय तक चलने वाली नहीं है और ऐसे में जब हद पार हो जाती है तो कहीं न कहीं तो विरोध की आवाज़ उठनी स्वाभाविक है और यही हुआ अभी हाल ही में हमारे क्षेत्र की एक युवती ने पारिवारिक प्रताड़ना का शिकार होने पर अपने पति से हिन्दू विधि की धारा १३ -बी में दिए गए पारस्परिक सहमति से तलाक के अधिकार का प्रयोग किया और अपनी ज़िंदगी को रोज रोज की घुटन से दूर किया .
        साथ ही आज बहुत सी महिलाएं दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १२५ के तहत भरण पोषण के वाद दायर कर भी अपने पतियों से अपने व् अपने बच्चों के लिए कानून की छाँव में एक सुन्दर व् सार्थक आशियाना का सपना अपनी संतान की आँखों में पाल रही हैं .
         भारतीय कानून व् संविधान महिलाओं की समाज में बेहतर स्थिति के लिए प्रयासरत हैं और इसका उदाहरण दामिनी गैंगरेप कांड के बाद इस तरह के मामलों में उठाये गए कानूनी  कदम हैं .ऐसे ही विशाखा बनाम स्टेट ऑफ़ राजस्थान के मामले से भी सुप्रीम कोर्ट ने कामकाजी महिलाओं की स्थिति बहुत सुदृढ़ की है जिसके कारण तरुण तेजपाल जैसे सलाखों के पीछे हैं और रिटायर्ड जस्टिस अशोक गांगुली जैसी हस्ती पर कानून की तलवार लटकी।
        पर जैसी कि रोज की घटनाएं सामने आ रही हैं उन्हें देखते हुए कानून में अभी बहुत बदलावों की ज़रुरत है इसके साथ ही महिलाओं की आर्थिक सुदृढ़ता की कोशिश भी इस दिशा में एक मजबूत कदम कही जा सकती है क्योंकि आर्थिक सुदृढ़ता ही वह सम्बल है जिसके दम पर पुरुष आज तक महिलाओं पर राज करते आ रहे हैं समाज में स्वयं देख लीजिये जो महिलाएं इस क्षेत्र में पुरुषों की बराबरी कर रही हैं उनके आगे पुरुष दयनीय स्थिति में ही नज़र आते हैं .और जैसे कि पंचायतों में महिलाओं के लिए स्थान आरक्षित किये गए हैं ऐसे ही अब संसद व् विधान सभाओं में भी ३३% आरक्षण हो जाना चाहिए साथ ही सरकारी नौकरियों में भी उनके लिए स्थानों का आरक्षण बढ़ाये जाने की ज़रुरत है .



शालिनी कौशिक

[कौशल ]