शुक्रवार, 19 अगस्त 2016

नर-नारी द्वंद्व व संतुलन, समस्यायें व कठिनाइयाँ... डा श्याम गुप्त...

                       *** नर-नारी द्वंद्व व संतुलन, समस्यायें व कठिनाइयाँ.. ***

----समस्यायें व कठिनाइयाँ सर्वत्र एवं सदैव विद्यमान हैं, चाहे युद्ध हो, प्रेम हो, आतंरिक राजनीति या सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक या व्यवसायिक द्वंद्व हों या व्यक्तिगत कठिनाइयां |

-------- वैदिक-पौराणिक युग में तात्कालीन सामजिक स्थितियों, ब्राह्मणों, ऋषि व मुनियों के तप बल एवं राजाओं के शक्ति बल एवं स्त्री-लोलुपता के मध्य स्त्रियों की दशा पर पौराणिक कथाओं (सुकन्या का च्यवन से मज़बूरी अथवा नारी सुकोमल भाव या मानवीय –सामाजिक कर्त्तव्य भाव में विवाह करना, नहुष का इन्द्रणी पर आसक्त होना, कच-देवयानी प्रकरण, ययाति-शर्मिष्ठा प्रकरण आदि ) में देवी सुकन्या( राजा शर्याति की पुत्री, महर्षि च्यवन की पत्नी ) विचार करती हैं कि नर-नारी के बीच सन्तुलन कैसे लाया जाए तो अनायास ही कह उठती हैं कि यह सृष्टि, वास्तव में पुरुष की रचना है। इसीलिए, रचयिता ने पुरुषों के साथ पक्षपात किया, उन्हें स्वत्व-हरण की प्रवृत्तियों से पूर्ण कर दिया। किन्तु पुरुषों की रचना यदि नारियाँ करने लगें, तो पुरुष की कठोरता जाती रहेगी और वह अधिक भावप्रणव एवं मृदुलता से युक्त हो जाएगा।

--------इस पर आयु, उर्वशी-पुरुरवा पुत्र, यह दावा करता है कि मैं वह पुरुष हूँ जिसका निर्माण नारियों ने किया है। { पुरुरवा स्वयं इला, जो इल व इला नाम से पुरुष व स्त्री दोनों रूप था, का बुध से पुत्र था, एल कहलाता था| अतः आयु स्वयं को नारियों द्वारा निर्मित कहता था ..}

-------आयु का कहना ठीक था, वह प्रसिद्ध वैदिक राजा हुआ, किन्तु युवक नागराजा सुश्रवा ने आयु को जीतकर उसे अपने अधीन कर लिया था।

------- देवी सुकन्या सोचती हैं कि फिर वही बात ! पुरुष की रचना पुरुष करे तो वह त्रासक होता है और पुरुष की रचना नारी करे तो लड़ाई में वह हार जाता है।-

----------आज नारी के उत्थान के युग में हमें सोचना चाहिए कि अति सर्वत्र वर्ज्ययेत ....जोश व भावों के अतिरेक में बह कर हमें आज नारियों की अति-स्वाधीनता को अनर्गल निरंकुशता की और नहीं बढ़ने देना चाहिए | चित्रपट, कला, साहित्य व सांस्कृतिक क्षेत्र की बहुत सी पाश्चात्य-मुखापेक्षी नारियों बढ़-चढ़ कर, अति-स्वाभिमानी, अतिरेकता, अतिरंजिता पूर्ण रवैये पर एवं तत्प्रभावित कुछ पुरुषों के रवैये पर भी समुचित विचार करना होगा |

---------अतिरंजिता पूर्ण स्वच्छंदता का दुष्परिणाम सामने है ...समाज में स्त्री-पुरुष स्वच्छंदता, वैचारिक शून्यता, अति-भौतिकता, द्वंद्व, अत्यधिक कमाने के लिए चूहा-दौड़, बढ़ती हुई अश्लीलता ...के परिणामी तत्व---अमर्यादाशील पुरुष, संतति, जो हम प्रतिदिन समाचारों में देखते रहते हैं...यौन अपराध, नहीं कम हुआ अपराधों का ग्राफ, आदि |

""क्यों नर एसा होगया यह भी तो तू सोच ,
क्यों है एसी होगयी उसकी गर्हित सोच |
उसकी गर्हित सोच, भटक क्यों गया दिशा से |
पुरुष सीखता राह, सखी, भगिनी, माता से |
नारी विविध लालसाओं में खुद भटकी यों |
मिलकर सोचें आज होगया एसा नर क्यों |""

------समुचित तथ्य वही है जो सनातन सामजिक व्यवस्था में वर्णित है, स्त्री-पुरुष एक रथ के दो पहियों के अनुसार संतति पालन करें व समाज को धारण करें ------ऋग्वेद के अन्तिम मन्त्र (१०-१९१-२/४) में क्या सुन्दर कथन है---
"" समानी व अकूतिःसमाना ह्रदयानि वः ।
समामस्तु वो मनो यथा वः सुसहामतिः ॥"""--- अर्थात हम ह्रदय से समानता ग्रहण करें...हमारे मन समान हों, हम आपसी सहमति से कार्य संपन्न करें |...

----पुरुष की सहयोगी शक्ति-भगिनी, मित्र, पुत्री, सखी, पत्नी, माता के रूप में सत्य ही स्नेह, संवेदनाओं एवं पवित्र भावनाओं को सींचने में युक्त नारी, पुरुष व संतति के निर्माण व विकास की एवं समाज के सृजन, अभिवर्धन व श्रेष्ठ व्यक्तित्व निर्माण की धुरी है।

-----अतः आज की विषम स्थिति से उबरने क़ा एकमात्र उपाय यही है कि नारी अन्धानुकरण त्याग कर भोगवादी संस्कृति से अपने को मुक्त करे।

-----हम स्त्री विमर्श, पुरुष विमर्श, स्त्री या पुरुष प्रधान समाज़ नहीं, मानव प्रधान समाज़, मानव-मानव विमर्श की बात करें। बराबरी की नहीं, युक्त-युक्त उपयुक्तता के आदर की बात हो तो बात बने।

रविवार, 24 जुलाई 2016

अब डिग्री क्यों नहीं पूछते

अब डिग्री  क्यों नहीं पूछते  
भाषा के विषय में निर्मला जोशी जी के बेहद खूबसूरत शब्द 
'माता की ममता यही  , निर्मल गंगा नीर 
इसका अर्चन कर गए तुलसी सूर कबीर '
आज भारत की राजनीति ने उस भाषा को जिस स्तर तक गिरा दिया है वह वाकई निंदनीय है।
उत्तर प्रदेश   बीजेपी के वाइस प्रेसीडेन्ट दयाशंकर सिंह ने 20 जुलाई को मायावती को वेश्या से भी बदतर कहा।
जवाब में बसपा कार्यकर्ताओं ने जगह जगह रैलियाँ निकाल कर हिंसात्मक प्रदर्शन किए बेहद आपत्तिजनक नारे लगाए दया शंकर की बेटी व्  बहन का अभद्रता के साथ जिक्र किया। इतना ही नहीं सड़कों पर प्रदर्शन के दौरान लड़किओं एवं महिलाओं को भी नहीं बख्शा गया। उनके साथ भी अभद्रता की गई। 

इस सबको मायावती सही मानती हैं यानी खून के बदले खून और गाली के बदले गाली उनकी नीति है।
अभद्र भाषा का प्रयोग एक पुरुष ने एक महिला के खिलाफ किया। बात महिलाओं के सम्मान की थी मौसम चुनाव का था। बात निकली तो दूर तलक गई और मुकदमा दलित को आधार बनाकर दर्ज हुआ।
वो मुद्दा ही क्या जो खत्म हो जाए ! बात और दूर तलक निकली और दया शंकर की बेटी ने पूछा
  " नसीम अंकल बताएं मुझे कहाँ पेश होना है।"
हमारा देश विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है और अनेक देशों के लिए एक मिसाल भी है  किन्तु आज भारत में  राजनीति जिस स्तर तक गिर चुकी है वह अत्यंत दुर्भाग्य पूर्ण है। 
भाषा ही वह माध्यम है जिससे हम अपने आप को एवं अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हैं। आपके शब्दों का चयन आपके व्यक्तित्व को दर्शाता है।
आज भारतीय राजनीति में जिस प्रकार की भाषा शैली का प्रयोग हो रहा है वह बहुत ही चिंताजनक एवं निराशाजनक है। जिस तरह की भाषा हमारे नेता बोल रहे हैं उससे उनकी दूषित शब्दावली ही नहीं अपितु दूषित मानसिकता का भी प्रदर्शन हो रहा है।
उससे भी अधिक खेद पूर्ण यह है कि परिवार की महिलाओं एवं बेटियों को भी नहीं बख्शा जा रहा।
हर बात पर वोट बैंक की राजनीति , चुनावों का अंकगणित  , सीटो का नफा नुकसान ! इससे ऊपर क्यों नहीं उठ पा रहे हम ?
नेताओं द्वारा दूषित भाषा का प्रयोग पहली बार नहीं हो रहा। इससे पहले भी चुनावी मौसम में अनेक आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग हो चुका है। कोई भी पार्टी इससे अछूती नहीं है। चाहे वो कांग्रेस के सलमान खुर्शीद हों जिन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को 'नपुंसक ' तक कह डाला हो या भाजपा के वी के सिंह हों जो पत्रकारों के लिए अभद्र भाषा का प्रयोग करते हों। चाहे साक्षी महाराज और योगी आदित्यनाथ हों या फिर ओवेसी हों जो एक दूसरे के लिए स्तर हीन भाषा का प्रयोग करते हों। चाहे समाज वादी पार्टी के मुलायम सिंह यादव हों अथवा आर जे डी के लालू प्रसाद यादव हों ।चाहे मध्य प्रदेश के पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह हों जिन्होंने अपने ही पार्टी की महिला सांसद को 'टंच माल ' की उपाधि देते हुए खुद को पुराना जौहरी बताया हो।
बात महिला अथवा पुरुष तक सीमित नहीं है , जाती अथवा धर्म की नहीं है आप पत्रकार हैं या नेता हैं इसकी भी नहीं है। बात है मर्यादाओं की , नैतिकता की , सभ्यता की , संस्कारों की  ,शिक्षित होने के मायने की  , समाज के प्रति अपने कर्तव्यों की।बात है भावी पीढ़ी के प्रति हमारे दायित्वों की ! हम उन्हें क्या सिखा रहे हैं ? हम उन्हें कैसा समाज दे रहे हैं  ? 
सोचिए क्या बीती होगी एक बारह वर्ष की लड़की पर जब उसने बसपा महा सचिव नस्लिमुद्दीन से वह प्रश्न पूछा होगा !
क्या बीती होगी उस माँ पर जिसकी   नाबालिग  बेटी ऐसा सवाल पूछ रही हो  ? 
एक नेता के रूप में एक महिला के लिए प्रयोग किये गये शब्दों की  कीमत एक पिता को चुकानी होगी इस बात की कल्पना तो निःसंदेह दया शंकर ने भी नहीं करी होगी  
दया शंकर को तो शायद अब कहे हुए शब्दों की कीमत पता चल गई होगी  किन्तु मायावती  ? 
कहते हैं बेटियाँ तो साँझी होती हैं   क्या एक बेटी के लिए उनके कार्यकर्ताओं द्वारा उपयोग किए गए इन शब्दों को वह सही मानती हैं  ?
क्या इसी आचरण से वे स्वयं को देवी सिद्ध करेंगी  ?
एक महिला होने के नाते कम से कम उन्हें  महिलाओं को इस मुद्दे से अलग ही रखना चाहिए था   महिलाओं का सम्मान जब एक महिला ही नहीं करेगी तो वह इस सम्मान की अपेक्षा पुरुषों से कैसे कर सकती है ?  शायद वह भी नहीं जान पाईं कि जिस बात को उन्होंने महिला सम्मान से  जोड़ कर दलित रंग में रंग कर वोट बटोरने चाहे , वह उन्हीं की अति उग्र प्रतिक्रिया के फलस्वरूप एक बेटी द्वारा पूछे गए प्रश्न से 'बेटी के सम्मान ' का मुद्दा बन जाएगा।
एक सवर्ण पुरुष   से एक दलित महिला तो शायद  जीत भी जाती लेकिन मैदान में सामना एक महिला और एक बेटी से होगा यह तो शायद मायावती ने भी नहीं सोचा होगा।
एक  महिला से भी वो शायद जीत  जातीं लेकिन भारतीय राजनीति के रंगमंच पर उनका सामना अब एक माँ से है  !
क्रिया की प्रतिक्रिया करते समय संयम रखने का पाठ संभवतः मायावती को भी मिल ही गया होगा।
आज बशीर बद्र की पंक्तियों से हमारे नेताओं को नसीहत लेनी चाहिए
'दुश्मनी जम कर करो लेकिन यह गुंजाइश रहे
जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा  होना पड़े '
हम कैसी भाषा का प्रयोग करते हैं यह स्वयं हम पर निर्भर करता है। भाषा की मर्यादा की सीमा रेखा भी हमें स्वयं ही खींचनी हे । यह नैतिकता एवं स्वाध्याय का प्रश्न है। जिस समाज में भाषा की मर्यादाओं का पालन कानून की धाराएँ अथवा राज नैतिक लाभ और हानि कराएँ यह उस समाज के लिए  अत्यंत ही चिंतन का विषय होना चाहिए।
डा नीलम महेंद्र 

 



शुक्रवार, 24 जून 2016

यक्ष-प्रश्न ...कहानी ….डा श्याम गुप्त

                                      यक्ष-प्रश्न ...कहानी ….डा श्याम गुप्त

                                पुष्पाजी अपनी महिला मंडली के नित्य सायंकालीन समागम से लौटकर आयीं तो कहने लगीं,’ आखिर राम ने एक धोबी के कहने पर सीताजी को वनबास क्यों देदिया? क्या ये उचित था |
                           क्या हुआ? मैंने पूछा, तो कहने लगीं,’ आज पर्याप्त गरमा-गरम तर्क-वितर्क हुए| शान्ति जी कुछ अधिक ही महिलावादी हैं, इतना कि वे अन्य महिलाओं के तर्क भी नहीं सुनतीं | उनका कहना है कि पुरुष सदा ही नारी पर अत्याचार करता आया है | मेरे कुछ उत्तर देने पर बोलीं कि अच्छा तुम डाक्टर साहब से पूछ कर आना इनके उत्तर | वे तो साहित्यकार हैं और नारी-विमर्श आदि पर रचना करते रहते हैं | वे आपसे भी बात करना चाहती हैं |
                 क्यों नहीं, मैंने कहा, अवश्य, कभी भी |
                  दूसरे दिन ही तेज तर्रार शान्ति जी प्रश्नों को लेकर पधारीं, साथ में अन्य महिलायें भी थीं | बोलीं ‘क्या उत्तर हैं आपके इन परिप्रेक्ष्य में ? मैंने कहने का प्रयत्न किया कि एसा नहीं है, राम शासक थे और...वे तुरंत ही बात काटते हुए कहने लगीं ,’ राम राजा थे..प्रजा के हित में व्यक्तिगत हित का परित्याग, लोक-सम्मान आदि...ये सब मत कहिये, घिसी-पिटी बातें हैं, बेसिर-पैर की...पुरुषों की सोच की ...| कुछ महिलाओं ने कहा भी कि पहले उनकी बात तो सुनिए, परन्तु वे कहती ही गयीं, आखिर नारी ही क्यों सारे परीक्षण भोगे, पुरुष क्यों नहीं?
                              मैंने प्रति-प्रश्न किया, अच्छा बताइये, क्या एक स्त्री के कहने पर राम-वनबास... क्या स्त्री का पुरुष पर अत्याचार नहीं था| पुरुष तो कभी ये प्रश्न नहीं उठाते, क्यों | प्रश्न उठते भी हैं तो... हाय, विरुद्ध विधाता....आज्ञाकारी पुत्र ..में दब कर रह जाते हैं| विवाह सुख भोगते राम को ठेल दिया वनबास में और दशरथ को मृत्युलोक में | क्या स्त्री पर पुरुषों को प्रश्न उठाने का अधिकार नहीं है ?
                              शान्ति जी कुछ ठिठकीं परन्तु हतप्रभ नहीं हुईं, बोलीं, तो आप मानते हैं कि जैसे राम पर अत्याचार हुआ वैसे ही सीता पर भी अग्नि-परिक्षा व सीता त्याग रूपी अत्याचार –अन्याय हुआ, तो राम पुरुषोत्तम क्यों हुए ?
                       क्या आप समझती हैं कि राम को कष्ट नहीं हुआ होगा यह निर्णय लेते हुए, मैंने कहा, पत्नी-सुख वियोग एवं आत्म-ग्लानि की दो-दो पीडाएं झेलना कम दुःख होगा | वे चाहते तो दूसरा विवाह कर सकते थे, परन्तु नहीं सामाजिक परिवर्तन की उस युग-संधिबेला पर राम एक उदाहरण, एक मर्यादा स्थापित करना चाहते थे –प्रत्येक स्थित-परिस्थिति में एक पत्नीव्रत की |

                   तो उन्होंने स्वयं वनबास क्यों नहीं लेलिया, साथ में बैठी प्रीति जी ने पूछ लिया |

                     तो फिर एक पत्नीव्रत मर्यादा कैसे स्थापित होती, और वे कायर कहलाते| समस्या समाधान से पलायन करने वाला भगोड़ा, कापुरुष राजा | सीता को यह कब मान्य था अतः उन्होंने स्वयं ही निर्वासन को चुना| पति का अपमान प्राय: पत्नी को स्वयं का ही अपमान प्रतीत होता है, क्या यह सही नहीं है, मैंने कहा|
सब चुप रहीं |
                      सीता ने स्वयं ही निर्वासन को चुना...ये नया ही बहाना गढ़ लिया है आपने, वाह!... शान्ति जी ने कहा |
                    मैंने पुनः प्रयास किया, ‘वास्तव में जैसे राम का वनगमन एक राजनीति-सामाजिक कूटनीति का भाग था वैसे ही सीता-वनबास भी विभिन्न नीतिगत राजनीति के कार्यान्वन का भाग थे |

कैसे ! वे बोल पडीं |

                              देखिये मैंने कहा, कुछ विद्वानों का मत है कि सीता-वनबास हुआ ही नहीं, क्योंकि तुलसी की रामचरित मानस एवं महाभारत के रामायण प्रसंग में इस घटना का रंचमात्र भी उल्लेख नहीं है, अतः बाल्मीक रामायण में यह प्रसंग प्रक्षिप्त है, बाद में डाला गया, राम को बदनाम करने हेतु| परन्तु मेरे विचार से जन-श्रुतियां, लोक-साहित्य व स्थानीय प्रचलित कथाये आदि में कुछ अनकही बातें अवश्य होती हैं जो लोक-स्मृति में रह जाती हैं| जिन्हें पात्र की महत्ता व संगति से विपरीत मानकर सामाजिक-साहित्यकार-रचनाकार छोड़ भी सकते हैं|

                     वस्तुतः राम एक अत्यंत ही नीति-कुशल राजनैतिज्ञ थे| समस्त भारत की शक्तियों का ध्रुवीकरण करके अयोध्या व भारतवर्ष को अविजित शक्ति का केंद्र बनाना उनका ध्येय था | पूरे भारत में उन्होंने अपनी मित्रता, कूटनीति, धर्माचरण व शक्ति-पराक्रम के बल पर शक्तियां एकत्रित कीं| वनांचल के तमाम स्थानीय कबीले, वनबासी शासक, आश्रम व ऋषि, मुनि अस्त्र-शस्त्रों व शक्ति के केंद्र थे | विश्वामित्र, वशिष्ठ, अगस्त्य, भारद्वाज सभी ने राम को अस्त्र-शस्त्र प्रदान किये, परेंतु महर्षि बाल्मीकि जो बहुत बड़े शक्ति के केंद्र थे, उन्होंने सिर्फ आशीर्वाद दिया ..अस्त्र-शस्त्र नहीं | जैसा मानस में पाठ है....

मुनि कहँ राम दण्डवत कीन्हा । आसिरवादु विप्रवर दीन्हा।।’ 

             वाल्मीकि जी ने आशीर्वाद तो दिया किन्तु दिव्यास्त्रों के भण्डार का नाम तक नहीं लिया। अतः लंका विजय अर्थात समस्त भारतीय भूभाग का ध्रुवीकरण के पश्चात सिर्फ अयोध्या के निकटवर्ती वाल्मीकि आश्रम ही शक्ति का केंद्र बच गया था| राम ने सोचा, यह भण्डार अब व्यर्थ है इसका सदुपयोग होना चाहिए। उसी वन के समीप सीता को प्रेषित किया, जहाँ महर्षि वाल्मीकि का आश्रम था। राम का यह कृत्य महर्षि को अच्छा नहीं लगा। महर्षि ने साध्वी सीता को संरक्षण दिया। महर्षि ने उनके माध्यम से राम को सबक सिखाने का निश्चय कर, लव व कुश को दिव्यास्त्रों का संचालन सिखाया। समस्त शस्त्र-शास्त्र उन्हें सौंप कर अयोध्या से लड़ने योग्य बनाया| माँ के लाड़-प्यार व संरक्षण में और महर्षि के कुशल निर्देशन में पल्लवित बच्चे अश्वमेध के घोडे को पकड़ने के प्रकरण में विश्व-विजयी अयोध्या की समस्त सेना को हराने में सफल हुए|

                             इस युद्ध में लंका-विजयी शूरवीरों के दर्प व उनकी शक्तियों का भी दलन हुआ जो राम की कूटनीति का भाग था| इस प्रकार राम व सीता ने परस्पर सहयोग, सामंजस्य व कूटनीति से अपने पुत्रों को भी महलों के राजसी विलास, लंका-विजयी विश्व-विख्यात महान सम्राट राजा रामचंद्र के प्रभामंडल के दर्प से दूर वनांचल में ज्ञानी ऋषियों-मुनियों छत्र-छाया में पालन-पोषण का प्रवंध कर दिया ताकि वे सर्व-शक्तिमान बन कर उभरें|
                                 ये त्याग की पराकाष्ठाएं हैं | इसीलिये राम,राम हैं....सीता, सीता| त्याग, तप, धैर्य व कष्टों में तपकर ही तो व्यक्ति महान होता है| यदि राम-वनबास नहीं होता तो कौन जानता राम को, लक्ष्मण को, वे सिर्फ एक राजा होकर रह जाते, न इतिहास पुरुष होते, न पुरुषोत्तम न प्रभु राम|
                          कृष्ण-राधा के त्याग तप ने ही उन्हें श्रीकृष्ण व श्रीराधिका जी बनाया अन्यथा कौन पूछता सीता को कौन राधा को...वे भी श्रीकृष्ण की एक और रानी या किसी अन्य पात्र की पत्नी बन कर इतिहास में गुम हो जातीं |
                        तो आपका मत है कि सीता के साथ कोइ अन्याय नहीं हुआ, शान्ति जी जल्दी-जल्दी बोलीं, ये सारे प्रश्न निरर्थक हैं?

                        आप लोग यह बताइये, मैंने भी प्रश्न पूछ लिया, कि क्या सीता के काल-खंड में विदुषी स्त्रियाँ नहीं थीं, उन्होंने ये प्रश्न क्यों नहीं उठाये? विज्ञ, पढी-लिखी, विदुषी, बीर-प्रसू, शस्त्र-शास्त्र कुशल तीनों माताएं; कैकयी जैसी युद्धकुशल, नीतिज्ञ, देवासुर संग्राम में दशरथ की रथ-संचालिका एवं सहायिका ने ये प्रश्न क्यों नहीं उठाये? सीता की अन्य तीनों बहनों ने क्यों नहीं उठाये?

                            यदि उठाये भी होंगें तो हमें कैसे ज्ञात होगा, वे कहने लगीं, पुरुष दंभ व राजाज्ञा में दबा दिए गए होंगे |

                 उसी प्रकार जैसे सीता पर अत्याचार के तथ्य आपको ज्ञात हैं, मैंने स्पष्ट किया, अन्यथा हमें क्या पता कोई राम-सीता थे भी या नहीं, सीता वनबास हुआ भी था या नहीं | फिर तो सारे प्रश्न ही निरर्थक होजाते हैं|

           और अग्नि-परिक्षा का क्या औचित्य है आपके अनुसार | प्रीति जी ने पूछा |

          आपने रामचरित मानस तो कई बार पढी होगी| ध्यान दें ,जब राम कहते हैं...

“तुम पावक महं करहु निवासा, जब लगि करों निशाचर नासा |
जबहिं राम सब कहा बखानी, प्रभु पद हिय धरि अनल समानी|
निज प्रतिबिम्ब राखि तहं सीता, तैसेहि रूप सील सुविनीता | ...अरण्यकाण्ड

              अर्थातु सीताजी तो महर्षि अग्निदेव के आश्रय में चली गयीं जो उनके श्वसुर थे| वह तो नकली सीता थी जिसका हरण हुआ|

अब लंकाकाण्ड की चौपाई पर गौर करें ....

“सीता प्रथम अनल महं राखी, प्रकट कीन्ह चहं अंतरसाखी”

‘तेहि कारन करूणानिधि, कछुक कहेउ दुर्वाद,
सुनत जातुधानी सबै लागीं करन बिसाद |’

                       आखिर बिना असली सीता को प्रकट किये वे नकली सीता को वहां से कैसे साथ लेजाते |

              तो फिर सीताजी लौटी क्यों नहीं राम के साथ? किसी महिला ने एक और प्रश्न उठाया |

                  जिससे कूटनीति का पटाक्षेप भी सत्य लगे, कुछ तो स्वाभिमान प्रकट होना ही चाहिए नारी का, ताकि प्रत्येक एरा-गेरा पुरुष इस उदाहरण रूप में स्त्री पर अत्याचार न करने लगे|

                          यह तीसरी अग्नि-परिक्षा थी, वास्तव में शक्ति के पूर्ण ध्रुवीकरण के पश्चात, शक्ति-रूप की आवश्यकता समाप्त होगई | आदि-शक्ति को ब्रह्म से पूर्व पहुँचना होता है गोलोक की व्यवस्था हेतु, मैंने हंसते हुए कहा | वे भी मुस्कुराने लगीं |

                        पूरा समाधान नहीं होपाया, आपके उत्तर, तर्क व व्याख्याएं सटीक होते हुए भी पूर्ण नहीं हैं | शान्ति जी उठकर चलते हुए बोलीं |

              पूर्ण यहाँ कौन है शान्ति जी? इस प्रकार के ये प्रश्न युग-प्रश्न हैं..यक्ष-प्रश्न...प्रत्येक युग में अपने-अपने प्रकार से प्रश्नांकित व उत्तरित किये जाते रहेंगे | मैंने समापन करते हुए दोनों हाथ जोड़कर कहा, हम तो बस आप सबको, सभी महिलाओं को ‘जोरि जुग पाणी’ प्रणाम ही कर सकते हैं इस आशा में कि शायद रामजी की एवं पुरुष-वर्ग की इस तथाकथित भूल का रंचमात्र भी निराकरण होजाए|

गुरुवार, 23 जून 2016

yunhi dil se: एक सवाल सलमान से …….क्या आत्मा भी जख्मी हुई थी ?:
एक सवाल सलमान से …….क्या आत्मा भी जख्मी हुई थी ?

सलमान खान द्वारा दिए गए एक बयान पर आजकल देश भर में काफी बवाल मचा हुआ है ऐसा नहीं है कि पहली बार किसी शख्सियत की ओर से महिलाओं के विषय में कुछ आपत्तिजनक कहा गया हो इससे पूर्व चाहे बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालूप्रसाद यादव हों जो बिहार की सड़कों की तुलना हेमा मालिनी के गालों से करते हों चाहे मघ्य प्रदेश के तत्कालीन गृहमंत्री बाबू लाल गौर जो भरी सभा में कहते हों कि वे महिलाओं को धोती  बाँधना तो नहीं किन्तु धोती खोलना सिखा सकते हैं चाहे सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस काटजू हों जो कहते हैं कि रेप महत्वपूर्ण मुद्दा नहीं है यह तो होता रहता है और होता रहेगा चाहे उत्तर प्रदेश के नेता बाबू आजमी हों ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं कि अगर सभी के बारे में लिखा जाए तो शायद तो शायद कुछ और लिखना शेष नहीं रह जाएगा।

जब जब ऐसे बयान आते हैं कुछ दिन हो हल्ला मचता है बयानबाजी होती है सम्बन्धित पक्ष की ओर से माफीनामा आता है और कुछ दिन के मनोरंजन   (माफ कीजिएगा किन्तु इस शब्द का प्रयोग यहाँ आज एक कटु सत्य है) के बाद खबरों के भूखे लोगों द्वारा ऐसी ही किसी नई खबर की तलाश शुरू हो जाती है।
इस पूरे प्रकरण में सोचने वाली बात यह है कि सलमान द्वारा उक्त वक्तव्य एक वेबसाइट को दिए साक्षात्कार में कहा गया मीडिया द्वारा जो औडियो क्लिप सुनाई जा रही है उसमें सलमान के वक्तव्य के बाद वहाँ मौजूद पत्रकारों की हँसने की आवाजें सुनाई दे रही हैं उस समय मौजूद किसी भी पत्रकार द्वारा इस वक्तव्य की आलोचना नहीं की गई शायद उन्हें इसमें कुछ गलत नहीं लगा तो फिर उन्हीं के द्वारा बाद में इसे उछाला क्यों गया ? अगर वे वाकई में महिलाओं की भावनाओं के प्रति जागरूक थे और उन्हें बुरा लगा तो वे उसी समय सलमान को उनकी गलती का एहसास कराकर बात को खत्म कर देते न कि उसे खबर बनाकर पूरे देश की महिलाओं की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करते ।मीडिया के इस कृत्य ने ऐसी अनेक पीड़ितों के नासूरों को पुनः जीवित कर दिया है । सलमान ने जो कहा वो तो बिना सोचे समझे कहा और इसकी कीमत भी चुका रहे हैं किन्तु मीडिया ने जो किया क्या वो भी बिना सोचे समझे या फिर  सोच समझ कर ? 


लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं कि सलमान ने जो कहा सही कहा!
उनका कहना है कि वे जब प्रैक्टिस करके रिंग  से बाहर निकलते थे तो उन्हें एक रेप पीड़िता की तरह महसूस होता था । यह कथन वाकई दुर्भाग्यपूर्ण है काश उन्होंने बोलने से पहले सोचा होता। सलमान अपनी आने वाली फिल्म सुल्तान के लिए अपने द्वारा की गई मेहनत पर बात कर रहे थे जो पसीना उन्होंने बहाया था उसका बखान करते हुए कुछ ज्यादा ही बोल गए वे यह भूल गए कि वे अपने द्वारा भोगे गए  शारीरिक कष्ट की तुलना जिस कष्ट से कर रहे हैं वो केवल शारीरिक नहीं है बलात्कार एक महिला के शरीर का नहीं उसकी आत्मा उसके मन उसके व्यक्तित्व उसके स्वयं को एक इंसान समझने की खोखली सोच इन सभी का होता है। वे यह भूल गए कि इस मेहनत और उससे मिलने वाले कष्ट को उन्होंने स्वयं चुना था उन पर थोपा नहीं गया था जबकि बलात्कार महिला पर थोपा गया होता है कोई भी महिला किसी भी परिस्थिति में इसे चुनती नहीं है।  वे यह भूल गए कि उनके द्वारा की गई इस मेहनत ने उस किरदार को जीवित कर दिया जिसे वह परदे पर निभा रहे हैं लेकिन बलात्कार उस महिला को जीते जी मार डालता है और वह महिला अपना शेष जीवन एक जिंदा लाश की तरह बिताती है जिस पर यह बीतता है। हमारा देश अभी उस नर्स अरुणा शानबाग को भूला नहीं है जो बलात्कार के कारण 42 साल तक कौमा में चली गईं थीं और 66 साल की उम्र में कौमा में ही इस दुनिया से बिदा हो गईं। वे यह भूल गए कि उनके द्वारा एक "रेप पीड़िता" के बराबर झेले गये कष्ट  से उन्हें नाम शोहरत पैसा तालियाँ तारीफ सब मिलेगी उनकी फैन फौलोइंग बढ़ेगी लेकिन एक रेप पीड़िता को मिलती है बदनामी उसे समाज में मुँह छिपाकर घूमना पड़ता है और न्याय पाने की आस में उसकी सारी जमा पूंजी खत्म हो जाती है फिर भी न्याय नहीं मिल पाता (निर्भया को ही देख लें) । वे यह भूल गए कि उनकी शारीरिक मेहनत से उपजी उनकी पीड़ा एक दिन के आराम से या किसी पेनकिलर (दर्द नाशक दवा) से कम हो जाएगी लेकिन रेप पीड़िता का जख्म और दर्द दोनों  जीवन भर के नासूर बन जाते हैं शरीर के घाव भर भी जाँए मन और आत्मा तो छलनी हो ही जाते हैं ।   कहते हैं कि समय के साथ सारे घाव भर जाते हैं लेकिन शायद यह ही एक घाव होता है जिसका इलाज तो समय के पास भी नहीं होता ।वे यह भूल गए कि कई बलात्कार पीड़िता तो आत्महत्या तक कर लेती हैं क्या उन्हें रिंग से बाहर आने के बाद 
अपनी पीड़ा के कारण कभी आत्महत्या करने का विचार आया था? वे भूल गए कि बलात्कार तो महिला का होता है लेकिन उसके दंश से उपजी पीड़ा को उसका पूरा परिवार भोगता है क्या सलमान के रिंग से बाहर आने के बाद उनके दर्द से उनका परिवार भी कराहता था ? 
यह सवाल इस लिए उठ रहे हैं सलमान साहब क्योंकि आप आज के यूथ आइकान हैं आपकी जबरदस्त फैन फौलोइंग है आप से आज का युवा प्रोत्साहित होता है  आप सफलता के चरम पर हैं।सफलता के साथ उसका नशा भी आता है और उससे जिम्मेदारी भी उपजती है यह तो सफलता प्राप्त करने वाले पर निर्भर करता है कि वह इसके नशे में चूर होता है या फिर उससे मिलने वाली जिम्मेदारी के अहसास से अपने व्यक्तिगत में और निखार लाता है।
देश के प्रति अपने फर्ज को निभाने के लिए आवश्यक नहीं कि सीमा पर जा कर खून ही बहाया जाए।हम सब जहाँ भी हैं जिस क्षेत्र में भी हैं उसी जगह से देश हित में आचरण करना भी देश सेवा होती है।जिस देश ने  सलमान को सर आँखों पर बैठाया उस देश के युवाओं पर उनके आचरण का क्या असर होगा अगर वो इतना ही ध्यान में रखकर देश के युवाओं के सामने एक उचित एवं अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करें तो यह भी एक तरह की देश सेवा ही होगी।
डाँ नीलम महेंद्र 


मंगलवार, 21 जून 2016

yunhi dil se: कब तक जलेंगी हमारी बेटीयाँ

yunhi dil se: कब तक जलेंगी हमारी बेटीयाँ: कब तक जलेंगी हमारी बेटीयाँ दुनिया के मानचित्र पर एक देश भारत जिसका एक गौरवशाली इतिहास रहा है और विकास के रथ पर सवार एक स्वर्णिम भविष्य ...

शुक्रवार, 3 जून 2016

हिंदी ब्लॉगिंग और महिला सरोकार : ['भारतीय -नारी ' सामूहिक ब्लॉग के सन्दर्भ में ]

I HAVE PRESENTED THIS RESEARCH PAPER 0N 30TH MARCH 2016 AT MALVIYA BHAVAN DELHI  IN A SEMINAR -DR.SHIKHA KAUSHIK

भारतीय समाज विभिन्न धर्मों , समूहों और जातियों से मिलकर बना है ,जिसमें char वर्णों के अतिरिक्त एक एक और जाती भी है .वह जाति है -स्त्री की . आज इक्कीसवीं  सदी  में प्रविष्ट  होकर भी स्त्री को अनेक  प्रकार से उत्पीड़न  का  शिकार होना पड़ रहा है .आज भी उसकी सामाजिक स्थिति दोयम दर्जे की है .
                                                         प्राचीन काल से लेकर आज के 'ग्लोबल विलेज ' काल तक  पितृसत्तात्मक  व्यवस्था ही स्त्री का सामाजिक कद निर्धारित करती आई है . इसी पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने स्त्री को दो श्रेणियों में विभाजित किया है --


प्रथम - देवी स्वरूपा स्त्री ,जो पुरुष द्वारा निर्धारित नैतिक मापदंडों पर खरी उतरती है , पुरुष की आज्ञा का शीश झुकाकर पालन करती है , पतिव्रता , सती -साध्वी स्त्री ।

द्वित्य -इस श्रेणी में उन स्त्रियों को रखा गया जो पुरुष द्वारा निर्धारित आचरण की सीमाओं को लांघती हैं और इसी कारण उन्हें कुलटा , पुनश्छली , कर्कशा , वेश्या , बदचलन ,व्याभिचारिणी आदि अभद्र संज्ञाओं से विभूषित किया जाता है ।

                                       'त्रिया चरित्रं देवो न जानाति कुतो मनुष्य '' जैसी कुटिल उक्तियों से स्त्री-जाति की गरिमा की धज्जियाँ उड़ाते हुए पुरुष -वर्ग ने अपने पशु -बल का प्रयोग कर स्त्री की ज्ञानेन्द्रियों पर बलात ताला ठोक दिया और स्त्री को देह की कोठरी तक सीमित कर , उस देह पर भी अपना एकाधिकार घोषित कर दिया ।  ''मानवी प्रगति के इतिहास में वह दिन सबसे दुर्भाग्य का है जब नर -नारी के बीच एक को वरिष्ठ और दूसरे को कनिष्ठ मानने के भेदभाव की परंपरा आरम्भ हुई ।  भारतीय -संस्कृति के इतिहास में कलंक का ऐसा पृष्ठ जुड़ा जिसे पढ़ने पर सिर लज्जा से झुक जाता है। तब से नारी की स्थिति दिन -प्रतिदिन गिरती ही गई। भोग्या , अबला , कामिनी ,माया जैसी कितनी ही असम्मान सूचक उपाधियां उसे दी गई। कितनों ने तो नर को वरिष्ठ व्  नारी को कनिष्ठ सिद्ध करने के लिए धर्मतंत्र के मनोवैज्ञानिक हथियारों का प्रयोग किया। .... निःसंदेह तथाकथित विद्वानोँ की यह खुली साज़िश थी जो नारी -शक्ति को गिराने के लिए धर्मतंत्र का दुरूपयोग करने तक पर उतारू हो गए। शास्त्र के नाम पर कुछ ऐसे पृष्ठ तक बनाये गए तथा श्लोक जोड़ दिए गए जो नारी की छवि धूमिल करते हैं। समाज में बहुतायत उन व्यक्तियों की होती है , जिनका स्वयं का अपना कोई मौलिक चिंतन नहीं होता। भीड़ जिस प्रवाह में बहती है , उसी में वे डूबते -उतराते बहते देखे जाते हैं।  शास्त्र के नाम पर अथवा परम्परा के नाम पर जो भी चिंतन थोपा गया ; आँख मूँदकर पीढ़ी -दर -पीढ़ी यह वर्ग अपनाता चला गया।  एक बार नारी को पुरुष की तुलना में हेय मानने की प्रथा आरम्भ हुई , वह क्रमशः पोषण पाकर सुदृढ़ होती रही। ''1
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1-'' नारी को रमणी न मानें जननी का सम्मान दे ''-ब्रह्मवर्चस , पृष्ठ -3-4 : [युग निर्माण योजना गायत्री तपोभूमि , मथुरा ] संस्करण -2006

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                                             वैदिक युगीन शास्त्रार्थ में पारंगत गार्गी ,मैत्रेयी  उत्तरवैदिक काल , मौर्य काल , गुप्त काल , राजपूत काल ,मुग़ल काल तक आते आते पुरुष हेतु मात्र भोग की वस्तु बन कर रह गयी।  पुरुष के आसुरी शोषण की शिकार नारी की स्थिति आज भी बहुत संतोष प्रद नहीं है जबकि स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात संविधान ने महिला को पुरुष के समान अधिकार प्रदान किये व् नारी हित में अनेक महत्वपूर्ण कानूनों का निर्माण किया गया। स्थिति यह है कि स्त्री -विरूद्ध अपराधों में निरंतर वृद्धि हो रही है। ''राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो , भारत '' के अनुसार-  '' incidents of crime against women increased 6.4% during 2012, and a crime against a woman is committed every three minutes. In 2012, there were 244,270 reported incidents of crime against women, while in 2011, there were 228,650 reported incidents. Of the women living in India, 7.5% live in West Bengal where 12.7% of the total reported crime against women occurs. Andhra Pradesh is home to 7.3% of India's female population and accounts for 11.5% of the total reported crimes against women.65% of Indian men believe women should tolerate violence in order to keep the family together, and women sometimes deserve to be beaten.[3] In January 2011, the International Men and Gender Equality Survey (IMAGES) Questionnaire reported that 24% of Indian men had committed sexual violence at some point during their lives.''1
             


ऐसे  में यह कैसे संभव है कि साहित्यकारों का ध्यान इस ओर न आकृष्ट हो। ''साहित्यकार तो बहुत

ही संवेदनशील होता है। ...... वह तो जो समाज में घटित होते हुए देखता है , उसे अपनी रचनाओं के माध्यम

से अभिव्यक्ति प्रदान करता है। ''2 आज यही साहित्यकार अपनी रचनाओं के माध्यम से अपना संदेश

पाठकों तक प्रेषित करने के लिए इस इंटरनेट युग की देन '' ब्लॉगिंग '' का प्रयोग कर रहा है।  आज न केवल

प्रतिष्ठित साहित्यकार वरन आम -जन मानस भी अपने विचार ,भावनाओं को ब्लॉगिंग के माध्यम से

अभिव्यक्त कर रहे हैं। ब्लॉगिंग में अन्य किसी विषय व् मुद्दे की तुलना में जिस एक विषय को सर्वाधिक

महत्ता प्रदान की गयी है वो है ''महिला सरोकार '' ,इसका प्रमाण है प्रत्येक ब्लॉग की सर्वाधिक चर्चित ब्लॉग-

पोस्ट में महिला -आधारित ब्लॉग -पोस्ट की उपस्थिति और अन्य ब्लॉगर्स की टिप्पणियां। हिंदी साहित्य -

संसार को समृद्ध करती व् नारी आधारित मुद्दों को बहस के केंद्र में लाकर खड़े कर देने वाला यह माध्यम -

'ब्लॉगिंग '' नवीन अवश्य है किन्तु इसने हिंदी पट्टी के साहित्यकारों विशेष कर स्त्री रचनाकारों [जिनमें आम

भारतीय नारी भी सम्मिलित है ] को अपने अनुभव व् विचाराभिव्यक्ति का महत्वपूर्ण मंच प्रदान किया है।


* हिंदी ब्लॉगिंग -ब्लॉग का अर्थ , आरम्भ व् प्रकार


  * ब्लॉग का अर्थ -आज सम्पूर्ण विश्व कम्प्यूटरमय होने की दिशा में प्रयासरत है।  बैंकिंग क्षेत्र ,तकनीकी संस्थान और महत्वपूर्ण प्रतिष्ठान कम्प्यूटर के यंत्र -मस्तिष्क से लाभान्वित हो रहे हैं , वहीं जन -जन की जीवन रेखा बनकर इंटरनेट ने दुनिया भर के कम्प्यूटर्स को आपस में जोड़कर सम्पूर्ण विश्व को 'ग्लोबल फैमिली '' में परिवर्तित कर दिया है। इसी क्रम में ''वर्ड प्रेस ''[https://wordpress.com ] व्   ''ब्लॉगर ''[https://www.blogger.com] आदि चर्चित ब्लॉग पब्लिशिंग सेवाओं

से सम्बन्धित वेबसाइट द्वारा इंटरनेट उपभोक्ताओं को फ्री  ब्लॉग निर्माण की सुविधा प्रदान की गई है। इस सुविधा से

लाभान्वित होते हुए आज हिंदी सहित अनेक भाषाओँ में हज़ारों ब्लॉग स्थापित किये जा चुके हैं।  सरल शब्दों में

'ब्लॉग किसी व्यक्ति द्वारा लिखित निजी डायरी का ही ऑनलाइन रूप है ; जिसमें ब्लॉग -स्वामी अपनी रचनाएँ

स्वयं लिखकर स्वयं प्रकाशित कर सकता है तथा पाठकों [जो अनुसरणकर्ता के रूप में ब्लॉग से जुड़े होते हैं ] द्वारा

त्वरित टिप्पणी भी प्राप्त कर सकता है ।



...................................................................................................................................................                   1-इ -लिंक - Violence against women in India-https://en.wikipedia.org/wiki/Violence_against_women_in_India
2-हिंदी भाषा :डॉ नारायण स्वरुप शर्मा 'सुमित्र ',पृष्ठ -115
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*हिंदी ब्लॉगिंग का आरम्भ व् विकास -''हिंदी में ब्लॉगिंग के आरम्भ का श्रेय ''आलोक कुमार '' को दिया जाता है। ''1  आलोक कुमार हिंदी के प्रथम ब्लॉगर और उनके  ' नौ दो ग्यारह [9 -2 -11 ]' ब्लॉग को हिंदी का प्रथम ब्लॉग माना जाता है। नब्बे के दशक के उत्तरार्ध में आरम्भ हुए ब्लॉगिंग के इस सफर का नामकरण हिंदी में  आलोक कुमार ने ही ''चिठ्ठा '' शब्द देकर किया ; जो बहुत तेज़ी के साथ हिंदी के अन्य ब्लॉगर्स द्वारा अपनाया गया। शीघ्र ही हिंदी में ब्लॉगिंग के लिए ''चिठ्ठा ' शब्द एक मानक शब्द बन गया और हिंदी ब्लॉगर्स को ''चिठ्ठाकार '' कहा जाने लगा।
                     प्रारम्भ में देवनागरी लिपि की टाइपिंग से सम्बंधित कठिनाइयों के कारण हिंदी ब्लॉगिंग की गति बहुत धीमी रही और सीमित व्यक्तियों  द्वारा  ही  हिंदी में ब्लॉगिंग की जाती रही , किन्तु सन 2000 ई से सन 2007 ई  के मध्य हिंदी टाइपिंग उपकरणों की उपलब्धता के फलस्वरूप हिंदी ब्लॉगर्स की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज़ की जाने लगी।
                                      जैसा कि पूर्व में ही बताया गया है सन 2007 ई में हिंदी ब्लॉगर्स की संख्या तेज़ी से बढ़ी। इसके पीछे कारण था कि यूनिकोड फ़ॉन्ट्स ने हिंदी सहित अनेक भारतीय भाषाओँ को ऑनलाइन टाइपिंग में अधिक उन्नत उपकरणों के माध्यम से सहायता  पहुँचाना आरम्भ कर दिया था। यनिकोड़ से तात्पर्य है -The material on this website was created using a unicode compliant Devanagari font. Unicode is a 16-bit encoding standard that allows all characters of every major language in the world to be represented. Unicode is platform independent, meaning if you typed something in Windows, it would appear the same way on a Macintosh machine. Most modern systems have built-in unicode support and often require nothing more than a unicode compliant font for any particular language.''2

                     इसके अतिरिक्त मुख्यधारा की मीडिया द्वारा हिंदी ब्लॉग्स पर प्रकाशित सामग्री को हाथों हाथ लिए जाने ने जन सामान्य का ध्यान ब्लॉगिंग की ओर आकर्षित किया।

*हिंदी -ब्लॉग के प्रकार :स्वरुप व् गठन - विषय के आधार पर  हिंदी ब्लॉग्स को अनेकों श्रेणियों में बाँटा जा सकता है ; जैसे -तकनीकी ब्लॉग ,आध्यात्मिक ब्लॉग ,सामाजिक -राजनैतिक ब्लॉग , रचनात्मक ब्लॉग ,कानूनी ब्लॉग आदि।
            शरुआती दौर में हिंदी जहाँ व्यक्तिगत ब्लॉग्स  का निर्माण अधिक करने की ओर  हिंदी ब्लॉगर्स का रूझान था ; वहीं समय के साथ साथ हिंदी ब्लॉगर्स ने सामूहिक ब्लॉग्स का निर्माण करने में रूचि लेना प्रारम्भ कर दिया। इस प्रकार स्वरुप व् गठन के आधार पर हिंदी ब्लॉग जगत में दो प्रकार के ब्लॉग्स सृजित किये जाने की परम्परा का आरम्भ हुआ -

1 - व्यक्तिगत ब्लॉग -   इस प्रकार के  ब्लॉग पर केवल ब्लॉग -स्वामी अपनी रचनाओं को प्रकाशित कर सकता है। एक ही व्यक्ति ब्लॉग -स्वामी होता है और वही एकमात्र योगदानकर्ता होता है। इस प्रकार के ब्लॉग के सृजन का उद्देश्य ब्लॉग -स्वामी की निजी भावनाओं , विचारों , विशिष्ठ रचनाओं अथवा अन्य रुचिकर विषयों का प्रकाशन मात्र होता है , यथा -''कौशल'' ब्लॉग [  http://shalinikaushik2.blogspot.com ]  मेरी कहानियां [ http://shikhapkaushik.blogspot.com ] आदि।          

2 -सामूहिक ब्लॉग -  इस प्रकार के ब्लॉग का निर्माण सार्वजानिक व् सामूहिक महत्व के विषयों पर ब्लॉगर्स को अपनी राय अपनी रचनाओं के माध्यम से एक ही ब्लॉग रुपी मंच पर प्रस्तुत करने के उद्देश्य से किया जाता है। इसमें ब्लॉग स्वामी स्वयं भी ब्लॉग व्यवस्थापक की भूमिका निभाता है अथवा अन्य किसी ब्लॉगर को व्यवस्थापक के रूप में नियुक्त कर सकता है। ऐसे ब्लॉग पर ब्लॉग -स्वामी अन्य ब्लॉगर्स को योगदान हेतु ब्लॉग -लिंक भेजकर ब्लॉग में शामिल होने हेतु आमंत्रित करता है। ये लिंक अन्य ब्लॉगर्स को अपने मेल में प्राप्त होता है। इस ब्लॉग -लिंक पर क्लिक कर अन्य ब्लॉगर योगदानकर्ता के रूप में सामूहिक ब्लॉग से जुड़ जाता है और यह ब्लॉग उसके डैशबोर्ड पर दिखाई देने लगता है। योगदानकर्ता के रूप में जुड़े ब्लॉगर सामूहिक ब्लॉग पर समय समय पर ;जिस विशिष्ट विषय के आधार पर ब्लॉग का निर्माण किया गया ,स्वयं ब्लॉग पोस्ट प्रकाशित कर सकता है।
                             आज हिंदी ब्लॉग -जगत में सामूहिक ब्लोग्स की भरमार है। इनमें कुछ साहित्यिक उद्देश्य से सृजित किये गए हैं जैसे ''रचनाकार '[ www.rachanakar.org ], तो कुछ अन्य ब्लोग्स को ब्लॉग जगत

से परिचित करने के उद्देश्य से सृजित किये गए हैं जैसे -चर्चामंच [http://charchamanch.blogspot.com] . इसी प्रकार

नारी को केंद्र में रखकर भी अनेकों सामूहिक ब्लॉग्स का निर्माण जारी है ;जिनमें भारतीय नारी

[http://bhartiynari.blogspot.com]ब्लॉग ने

महत्वपूर्ण स्थान बनाया


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1-हिंदी ब्लॉगिंग का इतिहास [लेखक : रविन्द्र प्रभात , प्रकाशक :हिंदी साहित्य निकेतन ,बिजनौर , भारत ,वर्ष -2011 ,पृष्ठ -180 , ISBN 978 -93 -80916 -14 -9 ]


2-Author: भारत-दर्शन संकलन-link-http://www.bharatdarshan.co.nz/magazine/articles/122/hindi-font-downloads.html

* हिंदी ब्लॉगिंग और महिला सरोकार -
              यह एक संतोषप्रद तथ्य है कि हिंदी ब्लॉगर्स में महिला ब्लॉगर्स की संख्या दिन -प्रतिदिन बढ़ रही है। प्रसिद्ध हिंदी ब्लॉगर्स में कई महिला ब्लॉगर्स के नाम भी सम्मान के साथ लिए जाते हैं। ''अप्रैल 2013 , में लगभग 50 ,000 हिंदी ब्लॉगर्स थे जिनका एक चौथाई हिस्सा महिला ब्लॉगर्स के लेखनाधीन था। ''1
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1 -''BLOGGING IN HINDI FOR 10 YEARS , CITY FOLK WIN LAURELS -THE TIMES OF INDIA '' timesofindia.indiatimes.com.com'' Retrieved 2014-06-11
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यह भी एक स्वाभाविक सी बात है कि जब महिलायें लिखेंगी तो निश्चित रूप से उनका लेखन  -''एक महिला होने के नाते '' महिलाओं की समस्याओं पर ही अधिक केंद्रित होगा किन्तु प्रशंसनीय तथ्य यह है कि अनेक पुरुष ब्लॉगर्स ने भी महिलाओं से सम्बंधित मुद्दों को गंभीरता के साथ उठाया यद्यपि कुछ पुरुष ब्लॉगर्स ने अपनी ब्लॉग पोस्ट में स्त्री के प्रति उसी परम्परागत रूढ़िवादी सोच को प्रस्तुत किया।
                                     महिलाओं से सम्बंधित मुद्दों को उठाने  में जिस सामूहिक ब्लॉग ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है , वह है ''भारतीय नारी '' सामूहिक ब्लॉग। मुख्य धारा की मीडिया के साथ कदम मिलाते हुए 'भारतीय नारी '' ब्लॉग ने महिलाओं के मुद्दों के प्रति ब्लॉग -जगत के साथ साथ आम जन तक युगों युगों से शोषित नारी की आवाज़ पहुँचाने का स्तुत्य प्रयास किया।

*'भारतीय नारी' ब्लॉग की स्थापना व् उद्देश्य -  भारतीय नारी ब्लॉग की स्थापना 23 जुलाई 2011 को हिंदी ब्लॉगर व् इस ब्लॉग की व्यवस्थापक शिखा कौशिक द्वारा की गई थी। व्यवस्थापक के निमंत्रण पर अन्य प्रबुद्ध ब्लॉगर इस सामूहिक ब्लॉग से योगदानकर्ता के रूप में जुड़ते गए। आज पचास से अधिक ब्लॉगर इस ब्लॉग पर अपना अमूल्य योगदान दे रहें हैं। जिनमे प्रमुख योगदानकर्ताओं के नाम इस प्रकार हैं -
Prem Prakash
Kunal Verma
सारिका मुकेश
Pratibha Verma
Dr. sandhya tiwari
DR. ANWER JAMAL
हरीश सिंह
रेखा श्रीवास्तव
Neelkamal Vaishnaw
kanu.....
The World Is Mine
Shalini Kaushik
godharavs1947
Atul Shrivastava
सरिता भाटिया
bhuneshwari malot
Shastri JC Philip
हरकीरत ' हीर'
shyam Gupta
Anjali Maahil
रेखा
वाणी गीत
Anju pokharana
Prerna Argal
रजनी मल्होत्रा नैय्यर
shravan shukla
रज़िया "राज़"
deepak kumar garg
रचना दीक्षित
deepti sharma
sadhana vaid
नीरज पाल
रविकर
mridula pradhan
Sawai Singh Rajpurohit
savan kumar
Rushabh Shukla
अंकित कुमार हिन्दू
Mahesh Barmate
Sonali Bhatia
Sunita Shanoo
आशा बिष्ट
अशोक कुमार शुक्ला
wgcdrsps
ई. प्रदीप कुमार साहनी
इस ब्लॉग की विशिष्टता इस बात में भी है कि महिला मुद्दों पर केंद्रित ब्लॉग होते हुए भी इसपर पुरुष ब्लॉगर्स को योगदानकर्ता के रूप में जोड़ा गया जैसा इससे पूर्व नारी आधारित ब्लॉग्स में नहीं किया गया था।
                                             महिला मुद्दों को उठाने में सक्रिय भूमिका निभाते हुए इस ब्लॉग पर लगभग 1400 ब्लॉगपोस्ट प्रकाशित की जा चुकी है , जिन पर 5753 टिप्पणियां भी प्राप्त की जा चुकी हैं।
उद्देश्य -ब्लॉग निर्माण के समय ही योगदानकर्ताओं के सूचनार्थ यह ब्लॉग पर प्रकाशित कर दिया गया था कि उनकी ब्लॉगपोस्ट इन विषयों पर आधारित होनी चाहिए -

*भारतीय नारी ब्लॉग पर इन विषयों से सम्बंधित पोस्ट करें -

-नारी जीवन से सम्बंधित समस्याएं - *दहेज़ प्रथा

 *महिलाओं के खिलाफ अपराध [घर में अथवा बाहर ]

*नारी शोषण के विभिन्न रूप *कामकाजी महिलाओं की समस्याएं

. *नारी सशक्तिकरण *नारी सशक्तिकरण के नाम पर महिलाओं में बढती मूल्य -हीनता
*दहेज़

-*दहेज़ कानून के पक्ष -विपक्ष में तर्क . *महिलाओं से सम्बंधित कानून व् इनमे सुधार की

आवश्यकता .

 *समाज में आये परिवर्तनों का नारी जीवन पर प्रभाव -सकारात्मक व् नकारात्मक . *माता ,

भगिनी [बहन ],पुत्री ,सहधर्मिणी व् मित्र रूप में नारी के प्रेरणाप्रद सहयोग के संस्मरण

. *नारी की सामाजिक ,राजनैतिक ,आर्थिक प्रगति हेतु सार्थक आलेख .

*भारतीय - नारी ब्लॉग पर प्रस्तुत पोस्ट का स्वरुप - *इस ब्लॉग पर साहित्य की

किसी भी विधा में आप अपनी बात रख सकते हैं वो कविता ,कहानी ,आलेख ,व्यंग्य संस्मरण ,

लघु कथा  आदि कुछ भी हो सकता है .

आप स्त्री हैं या पुरुष -सभी का स्वागत है ' 1  
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1 -भारतीय नारी ब्लॉग मुख्य पृष्ठ [http://bhartiynari.blogspot.com]
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योगदानकर्ताओं ने उपर्युक्त वर्णित विषयों पर अपनी ओजपूर्ण रचनाओं व् गंभीर आलेखों को प्रस्तुत कर परिवर्तित भारतीय सामाजिक -राजनैतिक -सांस्कृतिक परिस्थितियों में महिलाओं से सम्बंधित मुद्दों को केंद्र में लाने का सफल प्रयास किया है और यही इस ब्लॉग की स्थापना का मुख्य उद्देश्य है।
 -*भारतीय नारी ब्लॉग और महिला सरोकार -  हमारे धर्मग्रंथों में भले ही यह कहा गया हो कि ''यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते तत्र रमन्ते देवताः '' किन्तु व्यवहार में ''स्त्री स्वातन्त्र्यं न अहर्ती '' का पालन किया जाता है। उसकी पूजा की तो बात छोड़िये उसको मानवी तक का दर्ज़ा नहीं प्रदान किया जाता इस पुरुष -प्रधान समाज में। ऐसे में प्रसिद्ध लेखक के एस तूफ़ान का यह कथन भारतीय नारी की यथार्थ सामाजिक स्थिति के सम्बन्ध में सटीक प्रतीत होती है -'' भारतीय सामाजिकता के इतिहास में वेद , पुराण , स्मृतियाँ , काव्य , ग्रन्थ एवं साहित्य आदि युगों युगों से नारी की स्थिति पर अपनी अपनी टीका -टिप्पणी तो करते आये हैं किन्तु यह एक कठोर सत्य है कि नारी -जाति को समाज में वह स्थान कदापि प्राप्त नहीं हुआ जिसकी वह वास्तविक अधिकारिणी है। ''1
                                 भारतीय नारी ब्लॉग पर पुरुष की छाया मात्र बनकर रह गयी समस्त अधिकारों से शून्य ,घरेलू काम की मशीन व् संतानोत्पादन का साधन बनी नारी के जीवन से लेकर आकाश की ऊचाईयां चूमती आधुनिक नारी के हौसलों की उड़ान तक को ब्लॉगर्स ने अपनी ब्लॉग पोस्ट का विषय बनाया। हम निम्न बिन्दुओं के अंतर्गत इनका अध्ययन कर सकते हैं -
*पितृसत्तात्मक समाज और नारी जीवन - भारतीय नारी ब्लॉग ने पितृसत्ता के जरिये स्त्रियों की विभिन्न शोषणकारी , दमनकारी परिस्थितियों को चित्रित कर प्रश्न उठाया कि स्त्री को स्त्री होने के कारण क्यों शोषित , उत्पीड़ित व् अपमानित किया जाता है ?  5 दिसंबर 2012 को ''प्यार शादी धोखा और भरोसा '' शीर्षक से हरीश सिंह द्वारा प्रस्तुत पोस्ट[ डिंपल मिश्र से हुयी बातचीत और जनचर्चाओ तथा मीडिया में आई खबरों पर प्रकाशित] में डिम्पल मिश्र नामक युवती के संघर्ष को रेखांकित किया गया जो भारतीय पुरुष के उसी परम्परागत छल का शिकार हुई थी जिस छल का शिकार सदियों पहले शकुंतला को होना पड़ा था अर्थात गन्धर्व विवाह के पश्चात समाज के समक्ष विवाह से इंकार करते हुए स्त्री को सार्वजानिक रूप से लांछित करने की पुरुष की कुत्सित प्रवर्ति। डिम्पल के शोषण व् संघर्ष को चित्रित करते हुए हरीश सिंह लिखते हैं -''अपने पिता और अपना पेट पालने के लिए वह रिलायंस में काम करने लगी, उसका काम था बकाया बिलों की वसूली करना, एक दिन वह भूल से अपने निजी मोबाइल द्वारा एक बकायेदार ठाणे निवासी विपिन मिश्र को फ़ोन कर दिया, विपिन मूलतः भदोही जनपद के गोपीगंज थाना क्षेत्र के मूलापुर गाँव का रहने वाला है,
उसका no मिलने के बाद विपिन बार बार फ़ोन करने लगा, वह उसकी कंपनी के गेट पर खड़ा होकर इंतजार करता, पीछा करके उसके घर तक आता, विपिन ने डिंपल के पिता को भी भरोशे में लिया, डिंपल के पिता शादी के लिए परेशान थे, विपिन ने कहा की वह भी अकेला है, उसके पिता से उसकी नहीं बनती, दोनों शादी करके खुश रहेंगे, विपिन द्वारा बार बार दबाव दिए जाने से डिंपल के पिता ने एक दुर्गा मंदिर में दर्जनों लोंगो के सामने हिन्दू रीती रिवाज़ के साथ डिंपल और विपिन की शादी कर दी, दोनों पति पत्नी विपिन के घर पर रहने लगे,
जब इसकी भनक विपिन के पिता नागेन्द्र नाथ मिश्र को मिली तो वे मुंबई पहुंचे और डिंपल को घर से मारपीट कर भगा दिए, उस दौरान विपिन ने साथ दिया और दोनों आकर डिंपल के पिता के घर आकर रहने लगे, कुछ दिन तक दोनों प्रेम से साथ रहने लगे, विपिन अपने घर भी आने जाने लगा, इसी दौरा डिंपल के पेट में विपिन का बच्चा पलने लगा, विपिन का मोह भी डिंपल से भंग होना शुरू हो गया,
डिंपल के पिता अपनी बेटी के लिए विपिन के  पिता से भी गिडगिडाने लगे तब विपिन के पिता ने दस लाख रूपये दहेज़ की मांग रखी और कहा की बिना दहेज़ लिए स्वीकार नहीं करेंगे,
८ अप्रैल २०११ को सदमे के चलते डिंपल के पिता का निधन हो गया, २ मई को जब अस्पताल में डिंपल ने मासूम अंचल को जन्म दे रही तो उसे अस्पताल में भरती कराकर विपिन दादा के बीमारी का बहाना बनाया और ५ मई को इलाहबाद जनपद के हंडिया तहसील निवासी राकेश कुमार पाण्डेय की बेटी क्षमा पाण्डेय से भरी दहेज़ लेकर विवाह कर लिया, इसकी जानकारी काफी दिन बाद डिंपल को हुयी, वह विपिन से रोने गिडगिडाने लगी, पर उसका असर विपिन पर नहीं पड़ा, वे लोग डिंपल की दूसरी शादी करना चाहते थे, पर वह तैयार नहीं थी,
पति की बेवफाई का शिकार बनी डिंपल ने सोशल मीडिया का सहारा लिया, फेसबुक के जरिये वह भदोही के लोंगो को दोस्त बनाना शुरू किया, अपना दुखड़ा वह सबको सुनाने लगी,
उधर ११ सितम्बर को उलहास्नगर के थाने में मुकादम दर्ज कराया पर एक गरीब की सुनवाई पुलिस नहीं की, उल्टा उसे ही परेशान किया जाता रहा, पुलिस स्टेसन  में बुलाकर उसे अपमानित किया जाता और विपिन को कुर्सी पर बैठकर पुलिस चाय पिलाती, उसकी गरीबी का मजाक बनाया जाता, अपनी मासूम बेटी को लेकर वह दर दर की ठोकरे खाती रही,
सब जगह से निराश होकर उसने भदोही में रहने वाले अपने फेसबुक के दोस्तों से कहा की यदि मैं आपकी बेटी या बहन होती तो भी आप ऐसा ही करते, मेरी कोई नहीं सुनेगा तो मैं अपनी बेटी के साथ आत्महत्या कर लूंगी,
भदोही के लोंगो का इमान उसने जगाया और लोग उसकी मदद में खड़े हुए, उसे भरोषा दिलाया,
फेसबुक के जरिये अपनी जंग की शुरुआत करने वाली एक अबला रणचंडी बन गयी, जन हथेली पर लेकर अपने बेटी के साथ वह आ पहुंची भदोही,
३० नवम्बर को वह बारात लेकर मूलापुर गाँव पहुँचने का एलान कर दिया, मोहल्ले के लोंगो से क़र्ज़ लेकर वह हवाई जहाज़ के आई थी और सीधे पति के घर पहुंची. मुंबई से चलकर अकेली आने वाली औरत को हजारो लोंगो का साथ मिला, बैंड बाजे के साथ वह धमक पड़ी पति की चौखट पर, उसकी हिम्मत थी की वह रणचंडी बन चुकी थी क्योंकि वह अपने बेटी को नाजायज़ नहीं कहलाना चाहती थी, एक फूल अंगारा बन चूका था,''2 पर प्रश्न ये उठता है कि पितृसत्तात्मक समाज में कब तक महिला को ऐसी नारकीय स्थितियों से गुज़रना पड़ेगा ?

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1 -रूपायन :अमर उजाला दैनिक समाचार पत्र , 20 नवम्बर 1998 : के एस तूफ़ान [नारी लेख]
2 भारतीय नारी ब्लॉग [http://bhartiynari.blogspot.com]5 दिसंबर 2012 को ''प्यार शादी धोखा और भरोसा '' शीर्षक से हरीश सिंह
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 भारतीय नारी का जीवन पितृ -सत्तात्मक   समाज में अत्यन्त दयनीय रहा है। भारतीय नारी की इसी व्यथा को अभिव्यक्त करते हुए भारतीय नारी ब्लॉग  पर ''7 अगस्त 2015 '' की अपनी पोस्ट ''आखिर कब तक '' में महिला ब्लॉगर सोनाली भाटिया प्रश्न उठाती हैं -

आखिर कब तक
लोगो के सवालो के कटघरो
में खड़ी रहेगी लडकियाँ
आखिर कब तक
इज्ज़त और मान के
लिये तरसती रहेगी लडकियाँ
आखिर कब तक
अपने छोटे छोटे हक़
के लिए लड़ती रहेगी लडकियाँ''1
      स्त्री जीवन के एक और पहलू पर प्रकाश डालती हुई महिला ब्लॉगर श्रीमती भुवनेश्वरी मालोत की भारतीय नारी ब्लॉग पर 24 दिसंबर 2011 को ''महिलाए ही नसबंदी क्यो कराये ,पुरूष क्यों नहीं'' शीर्षक से प्रस्तुत पोस्ट ने गम्भीर चिंतन के लिए सभी को विवश कर दिया। भुवनेश्वरी जी लिखती हैं -
''परिवार की खुषहाली  के लिए पति-पत्नि दोनों का समान अधिकार है तथा वे दोनो ही संयुक्त रूप से जिम्मेदार है।पुरूष नसबंदी बहुत ही सरल,सुलभ और व्यवहारिक आॅपरेषन है,ऐसे में महिलाओं को आगे नसबंदी कराने धकेल देना कहा तक न्याय संगत है।''
        कुल मिलाकर यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि पुरुष ने आज तक स्त्री को पददलित बनाकर रखा हुआ है। जब तकपितृसत्ता का अस्तित्व है , तब तक स्त्री -पुरुष की सच्ची समानता पर आधारित व्यवस्था के बारे में सोचना भी दिन में तारे जैसा कपोल -कल्पित विचार है।
*विवाह संस्था : कुरीतियों ,कुप्रथाओं ,विकृतियों के कारण नारी -व्यक्तित्व की बलिवेदी - भारतीय संस्कृति में व्यक्ति के सम्पूर्ण जीवन को चार भागों में विभक्त कर , प्रत्येक भाग के कुछ नियम निर्धारित किये गए। इस व्यवस्था को आश्रम व्यवस्था  का नाम दिया गया।  चारो आश्रमों -ब्रह्मचर्य , गृहस्थः , वानप्रस्थ एवं सन्यास में गृहस्थ आश्रम को सर्वश्रेष्ठ बताया गया है। विवाह संस्कार इस आश्रम का महत्वपूर्ण संस्कार है और भारतीय स्त्रियों के लिए सोलह संस्कारों में से मात्र 'विवाह संस्कार ' को ही महत्वपूर्ण माना गया है क्योंकि पुरुष प्रधान हमारे समाज की यह मान्यता है कि पति की सेवा करना ही समस्त संस्कारों की पूर्णता है
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1-ब्लॉग लिंक -http://bhartiynari.blogspot.in/2015/08/blog-post_7.html
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प्राचीन काल में स्वयंवर एवं गन्धर्व विवाहों के उदाहरण से यह स्पष्ट होता है कि तब कन्या अपनी रुचि के अनुसार वर चुनने के लिए सर्वथा स्वतंत्र थी किन्तु धीरे धीरे विवाह के  सम्बन्ध में स्त्री की स्वतंत्रता का हरण हो गया। मानवोचित अधिकारों से वंचित स्त्री एक ऐसी संपत्ति बनकर रह गयी जिसे उसके संरक्षक विवाह के नाम पर जिसे चाहें सौंप दें और पति के नाम वाला व्यक्ति उसके साथ जैसा चाहे व्यवहार करने के लिए सामाजिक रूप में स्वतंत्र घोषित किया गया। विवाह के साथ ही अवांछनीय परम्पराओं ने अनेक कुरीतियों , कुप्रथाओं  को जन्म दिया जिसने भारतीय नारी के जीवन को अनेक त्रासदियों व् विडंबनाओं से भर दिया। इनका विश्लेषण हम निम्न बिंदुओं के अंतर्गत कर सकते हैं -
* दहेज़ प्रथा - भारतीय समाज में विवाह के सम्बन्ध विभिन्न समस्याओं में से 'दहेज़ 'की समस्या सबसे भीषण समस्या है। अनेक प्रकार से प्रताड़ित की जाती हुई विवाहिता को दहेज़ लोभी ससुराल वाले मौत की नींद सुलाने में भी पीछे नहीं हटते। भारत में दहेज़ -हत्या के रूप व्  ये आंकड़ें चौंकाने वाले हैं -
'Dowry deaths relate to a bride’s suicide or murder committed by her husband and his family soon after the marriage because of their dissatisfaction with the dowry. Most dowry deaths occur when the young woman, unable to bear theharassment and torture, commits suicide by hanging herself or consuming poison. Dowry deaths also include bride burningwhere brides are doused in kerosene and set ablaze by the husband or his family. Sometimes, due to their abetment to commit suicide, the bride may end up setting herself on fire.[41] Bride burnings are often disguised as accidents or suicide attempts. Bride burnings are the most common forms of dowry deaths for a wide range of reasons like kerosene being inexpensive, there being insufficient evidence after the murder and low chances of survival rate. Apart from bride burning, there are some instances of poisoning, strangulation, acid attacks, etc., as a result of which brides are murdered by the groom’s family.
India, with its large population, reports the highest number of dowry related deaths in the world according to Indian National Crime Record Bureau.[43] In 2012, 8,233 dowry death cases were reported across India, while in 2013, 8,083 dowry deaths were reported. This means a dowry-related crime causes the death of a woman every 90 minutes, or 1.4 deaths per year per 100,000 women in India. For contextual reference, the United Nations reports a worldwide average female homicide rate of 3.6 per 100,000 women, and an average of 1.6 homicides per 100,000 women for Northern Europein 2012.''1    
भारतीय नारी ब्लॉग पर  समाज के लिए कलंक बनी इस प्रथा के विरोध में समय समय पर ब्लॉग पोस्ट
प्रकाशित की  जाती रही हैं। 8 जुलाई 2011 को 'विवाह अथवा ब्लैकमेलिंग ?'' शीर्षक से प्रकाशित पोस्ट में
दहेज़ की माँग के कारण दुल्हन के पिता की हुई मौत की खबर को आधार बनाते हुए स्पष्ट रूप से ये सन्देश
दिया गया कि दहेज़ के नामपर वर पक्ष द्वारा  की जाने वाली ब्लैकमेलिंग के आगे अब वधू -पक्ष को झुकना बंद करना होगा -''हिन्दुस्तान '' दैनिक समाचार -पत्र में कुछ समय पूर्व  ''दहेज़ में कार मांगने पर दुल्हन के पिता को हार्ट-अटैक ;मौत'' खबर पढ़कर आँखें नम हो गयी थी  .बेटी की बारात आने में कुछ ही दिन रह गए थे  .दुल्हन के पिता कुछ दिन पहले सगाई की रस्म अदा क़र आये थे. शादी में ५१ हज़ार की नकदी के अलावा बाइक और फर्नीचर देना तय हुआ था . लड़के वालों ने फोन पर धमकी दे दी कि यदि दहेज़ में कार देनी है तो बारात आएगी वर्ना कैंसिल समझो.'समझ में नहीं आता विवाह जैसे पवित्र संस्कार को ''ब्लैकमेलिंग' बनाने वाले ऐसे दानवों के आगे लड़की के पिता कब तक झुकते रहेंगे. अनुमान कीजिये उस पुत्री के ह्रदय की व्यथा क़ा जो जीवन भर शायद इस अपराध बोध से न निकल पायेगी कि उसके कारण उसके पिता की जान चली गयी.होना तो यह चाहिए था कि जब वर पक्ष ऐसी ''ब्लैकमेलिंग'' पर उतर आये तो लड़की क़ा पिता कहे कि ''अच्छा हुआ कि तुमने मुझे विवाह पूर्व ही यह दानवी रूप दिखा दिया.मेरी बेटी क़ा जीवन स्वाहा होने  से बच  गया '' पर ऐसा कब होगा और इसमें कितना समय लगेगा? ये कोई नहीं बता सकता.मै तो बस इतना कहूँगी----          '''बेटियों को इतना बेचारा मत बनाइये; क़ि विधाता भी सौ बार सोचे इन्हें पैदा करने से पहले..''2

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1 Dowry system in India-वेब लिंक -https://en.wikipedia.org/wiki/Dowry_system_in_India
2 -भारतीय नारी ब्लॉग -ब्लॉग लिंक -http://bhartiynari.blogspot.in/2011/08/blog-post_9593.html
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    एक अन्य पोस्ट में महिला ब्लॉगर शालिनी कौशिक  ने जिसका शीर्षक था ''दहेज़ :अकेली लड़की की मौत '' [दिनांक -2 जुलाई 2013 को प्रकाशित ]में ये विचार प्रस्तुत किये -''एक तो पहले ही बेटे के परिवार वाले बेटे पर जन्म से लेकर उसके विवाह तक पर किया गया खर्च बेटी वाले से वसूलना चाहते हैं उस पर यदि बेटी इकलौती हो तब तो उनकी यही सोच हो जाती है कि वे अपना पेट तक काटकर उन्हें दे दें .''1  दहेज़  का दानव कितनी बेटियों को निगल चुका है इसका अनुमान भी दिल को दहला जाता है। कठोर दहेज़ कानूनों के निर्माण के पश्चात भी इस दहेज़ रुपी कलंक से भारतीय नारी की स्थिति नारकीय बनी हुई है। इस दहेज़ प्रथा के कारण समाज में कन्या -जन्म एक अभिशाप माना जाने लगा। दहेज़ की राशि न जुटा पाने के कारण माता -पिता अपनी कन्या का विवाह अशिक्षित ,वृद्ध , कुरूप , अपंग एवं अयोग्य लड़के के साथ करने को विवश हो जाते हैं। दहेज़ के कारण माता -पिता को रकम उधार लेनी पड़ती है या जमीन ,जेवर एवं मकान आदि को गिरवी रखना पड़ता है। प्रश्न यह भी ''भारतीय नारी '' ब्लॉग पर उठाया गया है ब्लॉगर्स द्वारा कि दहेज़ हत्या में दोषी कौन है -ससुरालवाले या मायके वाले ? ''समाज की भेंट चढ़ती बेटियां '' शीर्षक वाली ब्लॉग -पोस्ट में कविता वर्मा जी यही प्रश्न करती हैं - '''साहब !मैं तो अपनी बेटी को घर ले आता लेकिन यही सोचकर नहीं लाया कि समाज में मेरी हंसी उड़ेगी और उसका ही यह परिणाम हुआ कि आज मुझे बेटी की लाश को ले जाना पड़ रहा है .'' केवल राकेश ही नहीं बल्कि अधिकांश वे मामले दहेज़ हत्या के हैं उनमे यही स्थिति है दहेज़ के दानव पहले लड़की को प्रताड़ित करते हैं उसे अपने मायके से कुछ लाने को विवश करते हैं और ऐसे मे बहुत सी बार जब नाकामी की स्थिति आती है तब या तो लड़की की हत्या कर दी जाती है या वह स्वयं अपने को ससुराल व् मायके दोनों तरफ से बेसहारा समझ आत्महत्या कर लेती है .सवाल ये है कि ऐसी स्थिति का सबसे बड़ा दोषी किसे ठहराया जाये ? ससुराल वालों को या मायके वालों को ....जहाँ एक तरफ मायके वालों को अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा की चिंता होती है वहां ससुराल वालों को ऐसी चिंता क्यूं नहीं होती ?''
यह एक विडंबना ही  है कि दहेज़ कुप्रथा को लेकर प्रश्न तो हर मंच से उठाए जाते रहे हैं पर अब तक इस कुप्रथा को रोक पाने में न तो कानून ही कारगर भूमिका निभा पाया है और न ही जागरूक करने वाली ऐसी ब्लॉग पोस्ट।
*नारी विरूद्ध अपराध - स्त्री के विरूद्ध घर व् बाहर अनेक जघन्य अपराध किये जा रहे हैं। बलात्कार से लेकर तेज़ाब उड़ेलने तक इन अपराधों की एक लम्बी फेहरिस्त है। भारतीय नारी ब्लॉग के योगदानकर्ताओं ने अपनी सजगता का परिचय देते हुए स्त्री विरूद्ध अपराधों पर अपनी सामयिक पोस्ट प्रस्तुत की और समस्या का समाधान प्रस्तुत करने का भी प्रयास किया।
                                     ''कन्या भ्रूण -हत्या '' एक ऐसा क्रूर अपराध है जो स्त्री -बीज को इस संसार से नष्ट कर देना चाहता है। अपराध की प्रवर्ति तब और गम्भीर हो जाती है जब स्वयं एक स्त्री इस अपराध में साथ देती है। कारण कुछ भी हो। 2 जुलाई २०१२ को भारतीय नारी ब्लॉग पर माहेश्वरी मालोत द्वारा 'कन्या-भ्रूण हत्या को रोकने के उपाय'' शीर्षक के अंतर्गत इसी ओर ध्यानाकर्षण कराया गया -बिना मातृत्व के एक स्त्री को अधूरी माना जाता है,जिस पूर्णता को प्राप्त होने पर जहा उसे आत्म-संतोष का आभास होता है, लेकिन जैसे ही पता पडता है, ये कन्या-भ्रूण है तो वह इसको नष्ट करने के लिए तैयार हो जाती है। कन्या-भ्रूण हत्या के लिए सभी जिम्मेदार है, सबसे पहले इसकी जिम्मेदारी माॅ और उसके परिजनो पर है, एक माॅ परिजनो के दबाब में आकर अपने ही  पेट में पल रहे कन्या-भ्रूण की हत्या करने पर उतारू हो जाती है।इसके लिए सामाजिक जागृति लानी होगी और माॅ व बेटियों के मन में आत्म-विश्वास जागृत करना होगा ताकि साहस पूर्वक इस घिनौने कार्य का विरोध कर सके गांव-गंाव में लोगो को नाटको व मंचो के द्धारा कन्या के महता को समझाना होगा। डाक्टर को अपने पेशे के मानवीय पहलू को ध्यान में रखते हुए ऐसे कृत करने से मना करना हेागाडाक्टरो के लिए सख्त नियम लागू करके,दोषी डाक्टरो के विरूद्ध सख्त कार्यवाही करनी चाहिए।''  
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1 -ब्लॉग लिंक -http://bhartiynari.blogspot.in/2013/02/blog-post_5016.html
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महिलाओं के विरूद्ध अपराध में जो अपराध सर्वाधिक जघन्य है , वो है ''बलात्कार '' . बलात्कार को स्त्री की पवित्रता -अपवित्रता के साथ जोड़कर स्त्री -गरिमा को रौंदने का ये एक हथियार बना डाला। इंद्र द्वारा अहिल्या के साथ किये गए जारकर्म से आरम्भ हुए इस कुकृत्य की यात्रा 16 दिसंबर 2012 के क्रूर निर्भया काण्ड से होती हुई सतत जारी है और बलात्कृत होने का सारा दोष  स्त्री के सिर पर ही मढ़ दिया जाता है। भारतीय नारी ब्लॉग पर ''सुरक्षा नारी की '' शीर्षक के अंतर्गत प्रेरणा अर्गल इसी दुःखद स्थिति को अभिव्यक्त करते हुए कहती हैं -
''इंसान नहीं कोई वस्तु है वो
किसी भी सामान से बहुत सस्ती है वो
कैसे भी किसी ने भी उसका उपयोग किया
जिसने चाहा जब चाहा उसको बेइज्जत किया
बेइज्जत होकर भी अपना ही चेहरा छुपाती है वो


अपनों से भी सहानुभूति की जगह दुत्कारी जाती है वो
कोई और अपराध में अपराधी अपना मुंह छुपाता है
ये ऐसा अपराध है इसमें सहनेवाला ही अपना सिर झुकाता है
आज नई सदी में नारी कहीं भी सुरक्षित नहीं है   ''1


  आज स्त्री  के तरक्की की ओर बढ़ते क़दमों को देखकर परम्परावादी पुरुष वर्ग तिलमिला उठा है। बलात्कार व् छेड़छाड़ जैसी घटनाओं के लिए महिलाओं के चाल चलन व्  वेशभूषा को ही जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है। भारतीय नारी ब्लॉग के योगदानकर्ता डॉ श्याम गुप्त पुरुषों में बढ़ती वहशी प्रवर्ति के लिए स्त्रियों के बदलते आचरण को जिम्मेदार मानते हैं। वे अपनी ब्लॉग पोस्ट  ''अमर्यादित पुरुष '' में लिखते हैं -पहले महिलायें कहा करतीं थीं- ‘घर-बच्चों के मामले में टांग न अड़ाइए आप अपना काम देखिये|’ आजकल वे कहने लगीं हैं- ‘घर के काम में भी पति को हाथ बंटाना चाहिए, बच्चे के काम में भी| क्यों? क्योंकि अब हम भी तो आदमी के तमाम कामों में हाथ बंटा रही हैं, कमाने में भी |
 दुष्परिणाम सामने है ...समाज में स्त्री-पुरुष स्वच्छंदता, वैचारिक शून्यता, अति-भौतिकता, द्वंद्व, अत्यधिक कमाने के लिए चूहा-दौड़, बढ़ती  हुई अश्लीलता ...के परिणामी तत्व---अमर्यादाशील पुरुष, संतति, जो हम प्रतिदिन समाचारों में देखते रहते हैं...यौन अपराध, नहीं कम हुआ अपराधों का ग्राफ, आदि |  
क्यों नर एसा होगया यह भी तो तू सोच ,
क्यों है एसी  होगयी  उसकी  गर्हित सोच |
 उसकी  गर्हित सोच ,  भटक क्यों गया दिशा से |
पुरुष सीखता राह, सखी, भगिनी, माता से |
नारी विविध लालसाओं में खुद भटकी यों |
मिलकर सोचें आज होगया एसा नर क्यों |''2
  पुरुष वर्ग की इसी सोच ने स्त्रियों के जीवन को नरक बना डाला और  मर्यादा के नाम पर कितनी ही सीताओं को आत्महत्या के लिए विवश कर दिया।
                           पुरुष का स्त्री को शारीरिक व् मानसिक तौर पर उत्पीड़ित करने का कुचक्र यही नहीं थमा। जब स्त्री पर उसका हर वार बेकार गया तो उसने उसके वज़ूद को तेज़ाब से जला डालने का हथियार अपने हाथ में ले लिया।

1 -ब्लॉग लिंक -http://bhartiynari.blogspot.in/2012/08/blog-post_7234.html
2 -http://bhartiynari.blogspot.in/2014/12/blog-post_1.html

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स्त्री पर किये जाने वाले तेजाबी हमलों पर प्रश्न उठाते हुए भारतीय नारी ब्लॉग पर 26 जनवरी 2016 की अपनी ब्लॉग पोस्ट में ब्लॉगर प्रदीप कुमार साहनी तेजाब पीड़िता की व्यथा को अभिव्यक्त करते हुए लिखते हैं -कैसा तेरा प्यार था ?
कुंठित मन का वार था,
या बस तेरी जिद थी एक,
कैसा ये व्यवहार था ?
माना तेरा प्रेम निवेदन,
भाया नहीं जरा भी मुझको,
पर तू तो मुझे प्यार था करता,
समझा नहीं जरा भी मुझको ।
प्यार के बदले प्यार की जिद थी,
क्या ये कोई व्यापार था,
भड़क उठे यूँ आग की तरह,
कैसा तेरा प्यार था ?
बदन की मेरी चाह थी तुम्हे,
उसे ही तूने जला दिया,
आग जो उस तेजाब में ही था,
तूने मुझपर लगा दिया ।
देख के शीशा डर जाती,
क्या यही मेरा संसार था,
ग्लानि नहीं तुझे थोड़ा भी,
कैसा तेरा प्यार था ?
दोष मेरा नहीं कहीं जरा था,
फिर भी उपेक्षित मैं ही हूँ,
तुम तो खुल्ले घुम रहे हो,
समाज तिरस्कृत मैं ही हूँ ।

ताने भी मिलते रहते हैं,
न्याय नहीं, जो अधिकार था,
अब भी करते दोषारोपण तुम,
कैसा तेरा प्यार था ?1
8 अप्रैल 2013 को भारतीय नारी ब्लॉग की 'बेटियों घर से निकलना देखभाल कर '' में कांधला [शामली ] में चार मुस्लिम बहनों पर हुए तेज़ाबी हमले को आधार बना कर ये कविता प्रस्तुत की गयी -

 बेटे नहीं किसी के न भाई किसी के ,
ये पले शैतान की गोद खेलकर ,
बेटियों घर से निकलना देख-भाल कर !घूमते हैं शख्स कई तेजाब लिए हाथ ,
तुमसे उलझ जायेंगे ये जान-बूझकर ,
बेटियों घर से निकलना देख-भाल कर !  
मासूम बच्चियां भी अब हमारे समाज में सुरक्षित नहीं हैं। गम्भीर होती जा रही इस समस्या को भी भारतीय नारी ब्लॉग पर उठाया गया 13 मार्च 2013 को  मासूम बच्चियों के साथ किये जा रहे यौन अत्याचारों के लिए आधुनिक नारी को दोषी ठहराने की प्रवर्ति को अपनी ब्लॉग पोस्ट का विषय[[मासूम बच्चियों के प्रति यौन अपराध के लिए आधुनिक महिलाएं कितनी जिम्मेदार? रत्ती भर भी नहीं ].
 बनाते हुए भारतीय नारी ब्लॉग की योगदानकर्ता शालिनी कौशिक ने यही निष्कर्ष प्रस्तुत किया   -आधुनिक महिलाओं पर यह जिम्मेदारी डाली जा रही है तो ये नितान्त अनुचित है क्योंकि यह कृत्य इन बच्चियों के साथ या तो घर के किसी सदस्य द्वारा ,या स्कूल के किसी कर्मचारी या शिक्षक द्वारा ,या किसी पडौसी द्वारा किया जाता है और ऐसे में ये कहना कि वह उसकी वेशभूषा देख उसके साथ ऐसा कर गया ,पूर्ण रूप से गलत है यहाँ महिलाओं की आधुनिकता का तनिक भी प्रभाव नहीं कहा जा सकता .मासूम बच्चियों के प्रति यौन दुर्व्यवहार का पूर्ण रूप से जिम्मेदार हमारा समाज और उसकी सामंतवादी सोच है ,जिसमे पुरुषों के लिए किसी संस्कार की कोई आवश्यकता नहीं समझी जाती ,उनके लिए किसी नैतिक शिक्षा को ज़रूरी नहीं माना  जाता . यह सब इसी सोच का दुष्परिणाम है .ऐसे में समाज में जो थोड़ी बहुत नैतिकता बची है वह नारी समुदाय की शक्ति के फलस्वरूप है और यदि नारी को इसी तरह से दबाने की कोशिशें जारी रही तो वह भी नहीं बचेंगी और तब क्या हल होगा उनकी सहज कल्पना की जा सकती है.''3
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1-ब्लॉग लिंक -http://bhartiynari.blogspot.in/2016/01/Acidattack.html
2 -http://bhartiynari.blogspot.in/2013/03/blog-post_13.html
3-ब्लॉग लिंक -http://bhartiynari.blogspot.in/2013/04/blog-post_4.html
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*******सामयिक महिला सम्बन्धी घटनाओं व् बदलते सामाजिक मूल्यों पर प्रखर अभिव्यक्ति भारतीय नारी ब्लॉग की सर्वाधिक प्रमुख विशेषता कही जा सकती है। किसी भी घटना पर त्वरित प्रतिक्रिया इस ब्लॉग के योगदानकर्ताओं -ब्लॉगर्स की विशेषता है और यह सन 2011 ई में स्थापित होने के बाद से घटी हर घटना के सम्बन्ध में प्रस्तुत ब्लॉग पोस्ट से जाना जा सकता है जैसे -
*जुलाई 2012  में गुवाहाटी में महिला के साथ एक पत्रकार द्वारा छेड़छाड़ की  घटी अमर्यादित घटना पर क्षोभ व्यक्त करते हुए भारतीय नारी ब्लॉग पर रविकर की ये पक्तियाँ पठन योग्य हैं -
-घृणित मानसिकता गई,  असम सड़क पर फ़ैल ।
भीड़ भेड़ सी देखती, अपने मन का मैल ।
अपने मन का मैल, बड़ा आनंद उठाती ।
करे तभी बर्दाश्त, अन्यथा शोर मचाती ।
भेड़ों है धिक्कार, भेड़िये सबको खाये  ।
हो धरती पर भार , तुम्हीं तो नरक मचाये ।।
औरतों के प्रति पुरुषों की दकियानूसी सोच से दो चार होते ही भारतीय नारी ब्लॉग के योगदानकर्ता नीरज पाल ने ''फिर इतना दिखावा क्यों '' पोस्ट में पुरुष प्रधान समाज से पूछ ही डाला -अभी बीते दिनों की ही बात है, ज्यादा समय नहीं गुज़रा है, गुडगाँव की एक बड़ी ही डेलिकेट पार्टी का सदस्य बनकर मैं एक मुशायरे में शामिल हुआ और जनाब जो देखने को मिला , वह मेरी आँखें चुधियाने के लिए काफी था, सच कहूँ तो बड़े ही उम्रदराज़, खुशमिजाज़ और अछे लोगों की महफ़िल थी और साथ में था बड़ा ही मौजूं बयान, और वो यह कि “ औरत सिर्फ देखने और भोगने के लिए होंती है, अन्यथा कुछ भी नहीं” मै शर्मसार था और मेरे दमाग में एक ही प्रश्न बार बार घूम रहा था की “फिर इतना दिखावा क्यूँ?”2
19 जुलाई 2014 की अपनी ब्लॉग पोस्ट में योगदानकर्ता शालिनी कौशिक ने लखनऊ में घटी बलात्कार की एक घटना को आधार बनाते हुए यही सन्देश प्रसारित करने का प्रयास किया कि आमजन की नज़र अब हर घटना पर है। प्रशासन को सजग होकर कार्य करना होगा। वे लिखती हैं - अभी दो दिन पहले ही ये समाचार समाचार पत्रों की सुर्खियां बना हुआ था और बता रहा था उत्तर प्रदेश के बिगड़ते हुए हालात की बदहवास दास्ताँ .एक तरफ महिलाओं के साथ उत्तर प्रदेश में दरिंदगी का कहर ज़ारी है और दूसरी तरफ कोई इसे मोबाईल और कोई नारी के रहन सहन से जोड़ रहा है .भला यहाँ बताया जाये कि एक महिला जो कि दो बच्चों की माँ है उसके साथ ऐसी क्रूरता की स्थिति क्यूँ नज़र आती है जबकि वह न तो कोई उछ्र्न्खिलता का जीवन अपनाती है और न ही कोई आधनिकता की ऐसी वस्तु वेशभूषा जिसके कारण आजके कथित बुद्धिजीवी लोग उसे इस अपराध की शिकार होना ज़रूरी करार देते हैं ?यही नहीं अगर ऐसे में उत्तर प्रदेश की सरकार यह कहती है कि यहाँ स्थिति ठीक है तो फिर क्या ये ही ठीक स्थिति कही जाएगी कि नारी हर पल हर घडी डरकर सहमकर अपनी ज़िंदगी की राहें तय करे .3
इनके अतिरिक्त अनवर जमाल द्वारा प्रस्तुत ब्लॉग पोस्ट -''यौन उत्पीड़न किसे कहते हैं?''[22 नवम्बर 2013 ]में तरुण तेजपाल द्वारा किये गए सहकर्मिणी के यौन शोषण के मुद्दे का विश्लेषण किया गया। डॉ श्याम गुप्त द्वारा प्रस्तुत ब्लॉग पोस्ट   ''भारतीय राजनीति के आकाश में नारियों का योगदान ....'' में वैदिक काल से लेकर वर्तमान राजनीति में महिलाओं के योगदान का विवेचन अत्यन्त गहराई के साथ किया गया - स्वतन्त्रता पश्चात काल में प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की राजनैतिक शक्ति का पूरे विश्व में डंका बजा | आज न जाने कितनी महिलायें मुख्यमंत्री, मंत्री, सांसद, विधायक, राजनयिक, ग्राम-प्रधान आदि बनाकर देश की राजनीति में अपना वर्चस्व कायम किये हुए हैं, इसे सम्पूर्ण विश्व देख व जान  रहा है |

अप्रैल 2014 में दलित महिलाओं के सम्बन्ध में दिए गए विवादस्पद बयान के बाद जब बाबा रामदेव की निंदा हुई तो उसमे भारतीय नारी ब्लॉग के योगदानकर्ता तरुण कुमार सावन  ने सटीक शब्दों में अपनी राय रखते हुए कहा कि -प्रश्न सिर्फ यौग गुरू बाबा रामदेव के बयान का नहीं हैं,न ही भौगी आशाराम बापू का हैं।यह पूरे संत समाज पर लागू होता हैं। आख़िर वो समाज को किस रास्ते पर ले जाना चहाते हैं। यह बयान किसी नेता ने दिया होता तो और बात थी क्योंकि नेता तो जुबान के यूं भी कच्चे होते हैं।लेकिन यह संत के वचन हैं जिसकी गुंज दूर तक सुनाई देती हैं।संत समाज के माथे पे लगा यह वह कलंक हैं,जो गंगा नहाने पर भी नहीं धुलेगा।
 उमा भारती जी द्वारा घरेलू महिला के सम्बन्ध में की गयी अनुचित टिप्पणी [ ' 'वाड्रा को जेल भेजने की बात पर घरेलू महिला की तरह रो रही हैं प्रियंका ] को भी भारतीय नारी ब्लॉग पर हाथों हाथ लिया गया और 24 अप्रैल 2014 की पोस्ट में ये सन्देश दिया गया कि -''ऐसा ब्यान एक महिला का दूसरी महिला के खिलाफ सबसे अभद्र श्रेणी का बयान कहलाया जायेगा .''
महिला दिवस से लेकर वैलेंटाइन दिवस तक , लिव -इन -रिलेशनशिप से लेकर -बाल विवाह तक- महिला सरोकार से जुड़ा कोई ऐसा मुद्दा नहीं जो भारतीय नारी ब्लॉग की पोस्ट में न प्रकाशित हुआ हो। नारी गरिमा को पुनर्स्थापित करने में संलग्न इसके योगदानकर्ता नियमित रूप से ब्लॉग पोस्ट प्रकाशित कर महिला मुद्दों को बहस के केंद्र में बनाए रखते हैं जो कहीं न कहीं स्त्री सशक्तिकरण को बढ़ावा देता है।

1 -14 जुलाई 2012 -ब्लॉग शीर्षक ''भीड़ भेड़ सी देखती, अपने मन का मैल ।''ब्लॉग लिंक -http://bhartiynari.blogspot.in/2012/07/blog-post_7839.html

2 -5 दिसंबर २०१४ -ब्लॉग लिंक -http://bhartiynari.blogspot.in/2014/12/blog-post_47.html
3 -लखनऊ की निर्भया की कहानी, पिता की जुबानी;ये है उत्तर प्रदेश की हवा सुहानी, ब्लॉग लिंक -http://bhartiynari.blogspot.in/2014/07/blog-post_2484.html
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निष्कर्ष -वास्तव में  हिंदी ब्लॉगिंग ने महिलाओं के साथ युगों युगों से किये जा रहे अन्यायों के विरूद्ध  अभिव्यक्ति प्रदान करने का एक व्यापक मंच प्रदान किया है। ''भारतीय नारी '' सामूहिक ब्लॉग पर दिन -प्रतिदिन प्रकाशित ब्लॉग पोस्ट यही प्रमाण प्रस्तुत कर रही हैं। स्त्री स्वायत्ता के सटीक माध्यम के रूप में महिला ब्लॉगर अपने अनुभवों को संसार के समक्ष प्रस्तुत कर रही हैं , इससे बढ़कर हर्ष की बात क्या हो सकती है। भारतीय नारी ब्लॉग पर स्त्री के समानाधिकार जैसे गम्भीर मुद्दों को प्रखर ढंग से उठाकर इससे जुड़े ब्लॉगर्स ने स्त्री मुक्ति आंदोलन को गति प्रदान की है और नारी को धार्मिक -सामाजिक -आर्थिक -राजनैतिक रूप से पुरुष के समान दर्ज़ा प्रदान किये जाने की जोरदार वकालत की है। स्त्री जीवन के यथार्थ को चित्रित करने , उसके उत्पीड़न -शोषण को रोकने , सामाजिक परम्पराओं में गुँथी जाति ,धर्म , लिंग आधारित विषमता को दूर करने में '' भारतीय नारी '' ब्लॉग के योगदानकर्ताओं ने ''महिला सरोकारों '' के माध्यम से साहित्य एवं रचनाधर्मिता से स्वयं को जोड़ा है। निश्चय ही ''भारतीय नारी '' ब्लॉगपर प्रकाशित की जाने वाली हर पोस्ट महिला सरोकार से सम्बंधित विमर्श को एक नवीन दिशा प्रदान करेगी।