गुरुवार, 7 जून 2018

बस बच्चों वाली औरतें - कांधला से कैराना





   कांधला से कैराना और पानीपत ,एक ऐसी बस यात्रा जिसे भुला पाना शायद भारत के सबसे बड़े घुमक्कड़ व् यात्रा वृतांत लिखने वाले राहुल सांकृत्यायन जी के लिए भी संभव नहीं होता यदि वे इधर की कभी एक बार भी यात्रा करते .
       कोई भी बात या तो किसी अच्छे अनुभव के लिए याद की जाती है या किसी बुरे अनुभव के लिए ,लेकिन ये यात्रा एक ऐसी यात्रा है जिसे याद किया जायेगा एकमात्र इसलिए कि इसमें महिलाओं की और वह भी ऐसी महिलाओं की बहुतायत है जिसके पास देश की जनसँख्या को बढ़ाने वाले बच्चे बहुत अधिक मात्रा में उपलब्ध हैं और सारा देश भले ही नारी सशक्तिकरण के लिए तरस रहा हो किन्तु इस सफर में नारी की सशक्तता देखते ही बनती है और पुरुष सशक्त होने के लिए तड़पता दिखाई देता है .
       कांधला से कैराना जाने वालों में एक बड़ी संख्या उस वर्ग की है जिन्हें कैराना पहुंचकर डग्गामार की सवारी द्वारा पानीपत जाना होता है ,डग्गामार वे वाहन हैं जो वैन या जीप में सीट से अधिक ही क्या बहुत अधिक संख्या में यात्रियों को बैठाकर या कहूं ठूसकर पानीपत ले जाते हैं और ठीक यही स्थिति कांधला से कैराना यात्रामार्ग की है जिसमे लगभग एक सीट के हिसाब से चार या पांच लोग भर लिए जाते हैं और उन्हें जैसे तैसे कैराना पहुंचना होता है और कैराना पहुंचकर डग्गामार की सवारी द्वारा पानीपत जाना होता है और यही एक सबसे दुखद परिस्थिति है जिसमे कैराना आना कांधले के सामान्य जन के लिए ,अधिवक्ताओं के लिए ,वादकारियों के लिए जी का जंजाल बन जाता है . बस में बच्चे लिए हुए लगभग १०-१२ महिलाएं उसमे रोज चढ़ेंगी और वे चाहे कांधला से कैराना तक पड़ने वाले किसी भी अड्डे चाहे गढ़ी कौर, चाहे असदपुर जिद्दाना ,चाहे आल्दी या चाहे ऊँचा गांव हो ,बस में पहले से सीट ग्रहण किये आदमी से खड़े होने की इच्छा लिए ही बस में चढ़ती हैं और बस में चढ़ते ही यही कहती नज़र आने लगती हैं कि ''हमारे आदमी तो बस में कोई भी औरत चढ़े उसके लिए फ़ौरन सीट छोड़ देते हैं .''
       ऐसा नहीं है कि आदमी इतना सीधा-सादा है कि औरत के लिए एकदम सीट छोड़ दे लेकिन क्या करें आदमियों को उनकी ही जात-बिरादरी के अन्य लोग जिन्हे इन अबलाओं के कारण सीट नहीं मिली वे दया-धर्म के नाम पर अपनी सीट छोड़ने को मजबूर कर देते हैं और तब ये बेचारी अबला उस सीट पर आसानी से विराजमान हो जाती हैं उस आदमी के अपने से उम्र में बहुत बड़ा होने पर या बीमार कमजोर होने पर भी उसके द्वारा सीट छोड़ने पर कोई दुःख भी जताना इन सशक्त होने की चाह रखने वाली या कहूं देश में समानता के अधिकार की चाह रखने वाली यहाँ असमानता की सोच को अपने पर हावी नहीं होने देती .ऐसे में कभी कभी तो ऐसी स्थिति भी देखी जाती है कि बेचारा आदमी ये सोचकर कि अब ये औरतें उतर गयी हैं जैसे ही सीट पर बैठता है तभी पता नहीं कहाँ से एक अन्य और अबला वहां प्रकट हो जाती है और उस बेचारे की बैठने की इच्छा सारे रास्ते मन ही मन में धरी रह जाती है .
         अब ऐसे में बेचारे आदमियों का क्या किया जाये जिन्हे इस देश में समानता के अधिकार की बात कह-कहकर बार-बार हाशिये पर धकेल दिया जाता है .अब या तो प्रशासन यहाँ ज्यादा बसें चलवायें ,पर उससे भी पूरा फायदा इस क्षेत्र को होने वाला नहीं है क्योंकि तब भी जितना आवागमन इस रुट पर है उसे देखते हुए ये बसें कम रह जाएँगी ऐसे में अच्छा ये है कि बच्चों वाली औरतों के लिए अलग बसों का इंतज़ाम किया जाये जिससे किसी को किसी के लिए सीट छोड़ने की आवश्यकता ही नहीं पड़े ,या फिर आदमियों के लिए अलग बसों का इंतज़ाम किया जाये .
      अब कहने को तो सब कुछ आदमियों के हाथ में है किन्तु ये रुट ऐसा है जहाँ लगाम औरतों के हाथ में नज़र आती है और आदमी बेचारा नज़र आता है .बसों के ऐसे हाल देखते हुए बेचारे आदमियों का अनुभव हमें तो बस ऐसा ही नज़र आता है -
''बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले ,
 बहुत निकले मेरे अरमान ,लेकिन फिर भी कम निकले .''

शालिनी कौशिक
    [कौशल ]

बुधवार, 25 अप्रैल 2018

बेटियां और आसाराम

आसाराम दोषी करार, बिटिया के पिता ने कोर्ट का किया धन्यवाद

शनिवार, 14 अप्रैल 2018

सियासती रोटियां

सियासती रोटियां

एक नन्हीं बच्ची के जिस्म को चूल्हा बनाकर, उसकी योनि में आग लगाकर कुछ भेड़ियों ने रोटी सेंकी. वे रोटियां न हिन्दू थी और न मुस्लिम... वे सियासत की भूख मिटाने के काम आई.

डॉ शिखा कौशिक नूतन

बापू तो रहे याद भूल गए बा को


बा के  बारे में खुद बापू ने स्वीकार भी किया है कि उनमें दृढ़ता और निर्भीकता उनसे भी ज्यादा थी। बा की पहचान सिर्फ यही नहीं थी कि वे बापू की जीवन संगिनी रहीं। वह एक दृढ़ आत्मशक्ति वाली महिला थीं और गांधीजी की प्रेरणा भी


- प्रेम प्रकाश
दो अक्टूबर 2019 को महात्मा गांधी की 150वीं जयंती को लेकर सरकार और समाज दोनों उत्साहित हैं। खासतौर पर पीएम मोदी ने बापू की150वीं जयंती को राष्ट्रीय स्वच्छता मिशन के लक्ष्य के साथ जोड़कर इसे 2014 से ही चर्चा में ला दिया है। पर यह देश और सरकार दोनों भूल यह गई कि अगले वर्ष बापू के साथ बापू की भी 150वीं जयंती है। यही नहीं, कस्तूरबा (11 अप्रैल 1869 - 22 फरवरी 1942) चूंकि गांधी से 6 माह बड़ी थीं, इसलिए बा की जयंती दो अक्टूबर से पहले 11 अप्रैल को ही मनाई जाएगी।

कस्तूरबा और गांधी आधुनिक विश्व में दांपत्य की सबसे सफल मिसाल हैं। बा के  बारे में खुद बापू ने स्वीकार भी किया है कि उनमें दृढ़ता और निर्भीकता उनसे भी ज्यादा थी। तारीखी अनुभव के तौर पर भी देखें तो बा की पहचान सिर्फ यही नहीं थी कि वे बापू की जीवन संगिनी रहीं। आजादी की लड़ाई में उन्होंने न सिर्फ हर कदम पर अपने पति का साथ दिया, बल्कि यह कि कई बार स्वतंत्र रूप से और गांधीजी के मना करने के बावजूद उन्होंने जेल जाने और संघर्ष में शिरकत करने का फैसला किया। यहां तक गांंधी के अहिंसक संघर्ष की राह में वे गांदी से पहले जेल भी गईं। वह एक दृढ़ आत्मशक्ति वाली महिला थीं और गांधीजी की प्रेरणा भी। उन्होंने नई तालीम को लेकर गांधी के प्रयोग को सबसे पहले अमल में लाई।

इसी तरह चरखा और स्वच्छता को लेकर गांधी के प्रयोग को मॉडल की शक्ल देने वाली कोई और नहीं, बल्कि कस्तूरबा ही थीं। इसको लेकर कई प्रसंगों की चर्चा खुद गांधी ने भी की है। कहना हो तो कह सकते हैं कि शिक्षा, अनुशासन और स्वास्थ्य से जुड़े गांधी के कई बुनियादी सबक के साथ स्वाधीनता संघर्ष तक कस्तूरबा का जीवन रचनात्मक दृढ़ता की बड़ी मिसाल है।

धन्यवाद के पात्र हैं गांधी की लीक पर चले रहे वे कुछ सर्वोदयी, जिन्होंने बा और बापू की प्रेरणा को साझी विरासत के तौर पर जिंदा रखा। इस मौके पर ‘बा-बापू 150’ के नाम से जहां गांधी के इन अनुयायियों ने देशव्यापी यात्रा काफी पहले शुरू कर दी है, वहीं इस अभियान के तहत कुछ और कार्यक्रम भी हो रहे हैं। पर जहां तक रही सरकार और समाज की मुख्यधारा की बात तो शायद उनकी स्मृति से बा की विदायी हो चुकी है। 

गुरुवार, 12 अप्रैल 2018

ये इंसानियत का बलात्कार है

आज शब्द ही नहीं हैं जिनसे इस कुकृत्य की निंदा की जाये.... इंसानियत चीखती रही... और गूंगी हो गई...

रविवार, 1 अप्रैल 2018

औरत की तकदीर

औरत की तकदीर में देखो ,हरदम रोना-धोना है ,
मिलना उसको नहीं है कुछ भी ,सब कुछ हर पल खोना है ,
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तड़प रहेगी उसके दिल में ,जग में कुछ कर जाने की ,
नहीं पायेगी वो कुछ भी कर ,बोझ जनम का ढोना है ,
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सपना था इस जीवन में कि सबके काम वो आएगी ,
सच्चाई ये उसका जीवन ,सबकी रोटी पोना है ,
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टूट रही है तिल-तिल गलकर ,कुछ भी हाथ न आता है ,
पता चल गया भाग्य में उसके ,थक हारकर सोना है ,
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नारी जीवन में देने को ,प्रभु की झोली खाली है ,
''शालिनी '' का मन तड़पाकर ,भला देव का होना है ,
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शालिनी कौशिक 
[कौशल ]

बुधवार, 7 मार्च 2018

महिला दिवस पर--कहानी हमारी -तुम्हारी ---डा श्याम गुप्त ...


महिला दिवस पर--कहानी हमारी -तुम्हारी ---डा श्याम गुप्त ...

                

महिला दिवस पर---
कहानी हमारी -तुम्हारी
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ये दुनिया हमारी सुहानी न होती ,
कहानी ये अपनी कहानी न होती ।
ज़मीं चाँद -तारे सुहाने न होते ,
जो प्रिय तुम न होते, अगर तुम न होते।

न ये प्यार होता, ये इकरार होता ,
न साजन की गलियाँ, न सुखसार होता।
ये रस्में न क़समें, कहानी न होतीं ,
ज़माने की सारी रवानी न होती ।

हमारी सफलता की सारी कहानी ,
तेरे प्रेम की नीति की सब निशानी ।
ये सुंदर कथाएं फ़साने न होते,
सजनि! तुम न होते,जो सखि!तुम न होते ।

तुम्हारी प्रशस्ति जो जग ने बखानी,
कि तुम प्यार-ममता की मूरत,निशानी ।
ये अहसान तेरा सारे जहाँ पर ,
तेरे त्याग -दृढता की सारी कहानी ।

ज़रा सोचलो कैसे परवान चढ़ते,
हमीं जब न होते, जो यदि हम न होते।
हमीं हैं तो तुम हो सारा जहाँ है ,
जो तुम हो तो हम है, सारा जहाँ है।

अगर हम न लिखते, अगर हम न कहते ,
भला गीत कैसे तुम्हारे ये बनते।
किसे रोकते तुम, किसे टोकते तुम ,
ये इसरार इनकार, तुम कैसे करते ।

कहानी हमारी -तुम्हारी न होती ,
न ये गीत होते, न संगीत होता।
सुमुखि ! तुम अगर जो हमारे न होते
सजनि! जो अगर हम तुम्हारे न होते॥