मंगलवार, 31 जुलाई 2012

राखी का त्यौहार.... डा श्याम गुप्त...

        

                  (घनाक्षरी छंद )
                        १.
भाई और  बहन का प्यार कैसे भूल जायं ,
बहन ही तो भाई का प्रथम सखा होती है |
भाई ही तो बहन का होता है प्रथम मित्र,
बचपन की यादें कैसी मन को भिगोती हैं |
बहना दिलाती याद,ममता की माँ की छवि,
भाई में बहन, छवि पिता की संजोती है  |
बचपन महकता ही रहे सदा यूंही श्याम ,
बहन को भाई, उन्हें बहनें  प्रिय होती हैं  ||
                       २.
भाई औ बहन का प्यार दुनिया में बेमिसाल,
यही प्यार बैरी को भी राखी भिजवाता है |
दूर देश  बसे  , परदेश या  विदेश में हों ,
भाइयों को यही प्यार खींच खींच लाता है |
एक एक धागे में बसा असीम प्रेम बंधन,
राखी का त्यौहार रक्षाबंधन बताता है |
निश्छल अमिट बंधन, श्याम'धरा-चाँद जैसा ,
चाँद  इसीलिये  चन्दामामा  कहलाता है ||
                        ३.
रंग विरंगी सजी राखियां कलाइयों पर,
देख  देख भाई  हरषाते  इठलाते  हैं  |
बहन जो लाती है मिठाई भरी प्रेम-रस ,
एक दूसरे को बड़े प्रेम से खिलाते हैं |                                                                      
दूर देश बसे जिन्हें राखी मिली डाक से,
 बहन की ही छवि देख देख मुसकाते हैं |                                                 
 अमिट अटूट बंधन है ये प्रेम-रीति का,                                                   
सदा बना रहे श्याम ' मन से मनाते हैं ||








4 टिप्‍पणियां:

veerubhai ने कहा…

कोमल भाव से संसिक्त बेहतरीन प्रासंगिक रचना . .डॉ .श्याम गुप्त को बधाई .

veerubhai ने कहा…

कोमल भाव से संसिक्त बेहतरीन प्रासंगिक रचना . .डॉ .श्याम गुप्त को बधाई .

veerubhai ने कहा…

कोमल भाव से संसिक्त बेहतरीन प्रासंगिक रचना . .डॉ .श्याम गुप्त को बधाई .

डा. श्याम गुप्त ने कहा…

ट्रिपल धन्यवाद वीरू भाई जी......