मंगलवार, 22 मई 2012

रविकर मइके जाय, पिए जो माँ की घुट्टी-

चल मन ....लौट चलें अपने गाँव .....!!

छुट्टी का हक़ है सखी, चौबिस घंटा काम |
बच्चे पती बुजुर्ग की, सेवा में हो शाम |

सेवा में हो शाम, नहीं सी. एल. ना इ. एल. |
जब केवल सिक लीव,  जाय ना जीवन जीयल |



रविकर मइके जाय, पिए जो माँ की घुट्टी |
ढूँढ़ सके अस्तित्व, बिता के दस दिन छुट्टी ||


छी छी छी हालात, काट के बोटी-बोटी-

भ्रूण जीवी स्वान

मुंडे डाक्टर मारता, गर्भ-स्थिति नव जात |
कुक्कुर को देवे खिला, छी छी छी हालात |

छी छी छी हालात, काट के बोटी-बोटी |
मारो सौ सौ लात, भूत की छीन लंगोटी |

करिहै का कानून, अभी जब कातिल गुंडे |
रहम याचिका थाम, पाक ले छूटे मुंडे ||

4 टिप्‍पणियां:

Aruna Kapoor ने कहा…

छुट्टी का हक़ है सखी, चौबिस घंटा काम |
बच्चे पती बुजुर्ग की, सेवा में हो शाम!

...छुट्टी?...वह क्या होती है जी?...एक स्त्री की दिनचर्या का सटिक उल्लेख!...आभार!

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी ने कहा…

बेहतरीन और प्रशंसनीय प्रस्तुति...बधाई...

Rajesh Kumari ने कहा…

बहुत सुन्दर सटीक व्यंगात्मक दोहे रचे हैं ...बहुत बहुत बधाई

Shanti Garg ने कहा…

बहुत ही बेहतरीन रचना....
मेरे ब्लॉग

विचार बोध
पर आपका हार्दिक स्वागत है।