बुधवार, 18 अप्रैल 2012

छोर कहाँ तेरी बातों का...श्रृंगार गीत...डा श्याम गुप्त ..

भोर कहाँ इस मधुर रात का,
छोर कहाँ तेरी बातों का।                  
बने नहीं व्यबधान समय गति,
रुके न क्रम तेरी बातों का।

जैसे बहती सरिता जल की,
अविरल धारा कल-कल स्वर में ।
मंद मंद वीणा-धुन स्वर  या ,
उतरें मन के गुह्य अंतर में ।

तेरी स्वर वीणा गुंजन से,
ह्रदय-तंत्र झंकृत है प्रियतम ।
बनी रहे यह रात सुहानी ,
बने नया क्रम जज्वातों का ।

सृष्टि औ लय के अगणित क्रम सी,
रात सुहागन बने सनातन ।
ये कोकिल स्वर-बैन तुम्हारे,
जग-वीणा के स्वर बन जाएँ ।

तेरी बातें अनहद स्वर सी ,
इस अंतस के अर्णव में प्रिय ।  
झंकृत हों बन आदि-नाद धुन,
नवल सृष्टि के स्वर सज जाएँ ।

भला हुआ कब आदि-अंत प्रिय ,
प्रणय-मिलन के अनुनादों का ।
भोर न हो इस मधु-यामिनि का,
छोर न हो तेरी बातों का ।।

 

 

11 टिप्‍पणियां:

shashi purwar ने कहा…

waah bahut sunder geet sringar ka yah roop shabdo ka samarpan aur sundarta kabile tarif hai ....behatarin post .......uttam abhivyakti hardik badhai .

sangita ने कहा…

sundar post hae.

boletobindas ने कहा…

शब्दों का मोती की तरह पिरोया है....बेहतरीन सरल कविता

nanditta ने कहा…

भला हुआ कब आदि-अंत प्रिय ,
प्रणय-मिलन के अनुनादों का ।
भोर न हो इस मधु-यामिनि का,
छोर न हो तेरी बातों का ।।

vaah ,bahut hii behatarrn rachana

nanditta ने कहा…

सृष्टि औ लय के अगणित क्रम सी,
रात सुहागन बने सनातन ।
ये कोकिल स्वर-बैन तुम्हारे,
जग-वीणा के स्वर बन जाएँ ।
आप का लेखन बेहद प्रभावशाली है बेहतरीन भावो से युक्त सुन्दर रचना.

vikram7 ने कहा…

सृष्टि औ लय के अगणित क्रम सी,
रात सुहागन बने सनातन ।
ये कोकिल स्वर-बैन तुम्हारे,
जग-वीणा के स्वर बन जाएँ ।

dheerendra ने कहा…

बढ़िया प्रस्तुति,सुंदर अभिव्यक्ति,बेहतरीन रचना,...

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Vineet Mishra ने कहा…

ati uttam...:)

Vineet Mishra ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
डा. श्याम गुप्त ने कहा…

धन्यवाद शशी पुरवार जी, सन्गीता जी एवं नन्दिता जी....

डा. श्याम गुप्त ने कहा…

धन्यवाद....विनीत, धीरेन्द्र जी एवं विक्रम ...और बिन्दास जी...सरलता-- साहित्य में सटीक व सम्पूर्ण भाव-संप्रेषण के लिये आवश्यक है...आभार..