भोर कहाँ इस मधुर रात का,
छोर कहाँ तेरी बातों का।
बने नहीं व्यबधान समय गति,
रुके न क्रम तेरी बातों का।
जैसे बहती सरिता जल की,
अविरल धारा कल-कल स्वर में ।
मंद मंद वीणा-धुन स्वर या ,
उतरें मन के गुह्य अंतर में ।
तेरी स्वर वीणा गुंजन से,
ह्रदय-तंत्र झंकृत है प्रियतम ।
बनी रहे यह रात सुहानी ,
बने नया क्रम जज्वातों का ।
सृष्टि औ लय के अगणित क्रम सी,
रात सुहागन बने सनातन ।
ये कोकिल स्वर-बैन तुम्हारे,
जग-वीणा के स्वर बन जाएँ ।
तेरी बातें अनहद स्वर सी ,
इस अंतस के अर्णव में प्रिय ।
झंकृत हों बन आदि-नाद धुन,
नवल सृष्टि के स्वर सज जाएँ ।
भला हुआ कब आदि-अंत प्रिय ,
प्रणय-मिलन के अनुनादों का ।
भोर न हो इस मधु-यामिनि का,
छोर न हो तेरी बातों का ।।