शुक्रवार, 6 अप्रैल 2012

चलो अपन-तुपन खेलें...डा श्याम गुप्त की लघु कथा ..



              
                                 जून की तेज गरमी थी । सूरज आसमान में अपनी पूरी सोलह कलाओं से चमक रहा था। हवा शांत थी, पेड़ों के पत्ते तक नहीं हिल रहे थे। कुत्ते नालियों में, पानी के नलों के नीचे, कुओं की नालियों में, घरों की देहरियों के नीचे लेटे-बैठे हुए जीभ निकाल कर हांफते-हांफते ठंडक प्राप्त करने का प्रयास कर रहे थे। तीन मंजिला मकान में रहने वाले लगभग सभी लोग नीचे की मंजिल के अपेक्षाकृत ठन्डे  या कम गरम स्थान आराम फरमा रहे थे।  ऐसे में बस बच्चों की एक टोली चुपचाप से खेलने के लिए ऊपर वाले जीने की सबसे ऊपर की चौरस सीड़ी पर एकत्र हुई। सभी लगभग ६ से १० वर्ष तक के बच्चे थे।
                 चलो "छुपा-छुपी" खेलते हैं। जगदीश जो मकान मालिक का बेटा था, बोला ।
                 पर उसमें बहुत शोर होगा और बड़े लोग जागकर डांटने लगेंगे। कुसुम ने कहा ।
                 तो "मगर की धारा" खेलते हैं । माया ने सुझाव दिया ।
                 उसके लिए छत पर जाना पडेगा, और इतनी तपती छत पर कौन जायगा ? सुन्दर ने कहा ।
                 चलो 'मम्मी-पापा' खेलते हैं। सरोज ने जैसे घोषणा कर दी ।
                वो क्या होता है ? सुन्दर को विचित्र सा लगा तो उसने पूछ लिया ।
                 मैं मम्मी हूँ,  तुम पापा हो और बाकी सब बच्चे हैं । अब तुम सीडियों के नीचे  जाओ और जब मैं इशारा करूँ तब आना । सरोज ने सुन्दर से कहा ।
                 ठीक  है, कहकर सुन्दर नीचे चला गया और इंतज़ार करने लगा ।  चलो बच्चो सब सो जाओ नहीं  तो पापा आयेंगे तो नाराज़ होंगें ।  सब बच्चे लेट गए तो सरोज ने सुन्दर को इशारा किया ।  सुन्दर धड़धडाता हुआ ऊपर आकर सरोज के सामने खडा होगया । वह सुन्दर की एक बांह व कमीज के ऊपर वाले बटन को पकड़ कर बोली...
                 तुम इतनी देर से क्यों आये ?
                 देर ! सुन्दर  बोला,  तुम्हारा इशारा होते ही तो मैं तुरंत आगया।
                 उफ़ ! वह बात नहीं । मैं तो मम्मी की तरह पापा से कह रही थी जब पापा रात को देर से आते हैं । सुन्दर कुछ न समझते हुए चुपचाप खडा रहा । सरोज ने सुन्दर की और अपना मुंह बढाते हुए होठों से उसके गाल पर छुआ ।
                सुन्दर ने घबराकर उसे धक्का देदिया । सरोज लड़खड़ा कर पास  ही लेटे हुए जगदीश के ऊपर गिरी। जगदीश चीखते हुए उठा और गुस्से में सरोज की पीठ पर एक घूँसा जड़ दिया ।
                 तुम उसे क्यों पीट रहे हो ?  माया ने भौहें चढाते हुए पूछा ।
                 इसने मुझे क्यों टक्कर मारी ? जगदीश बोला।
                 सुन्दर ने मुझे धक्का दिया था । सरोज बोली ।
                 तुम मुझे गाल पर काटने की कोशिश क्यों कर रही  थीं । सुन्दर ने प्रतिवाद किया ।
                वेवकूफ ! चलो भागो यहाँ से,  हम तो मम्मी -पापा खेल रहे थे ।
                सुन्दर गुस्से से लाल-पीला होते हुए सरोज की और बढ़ा और गाल पर एक चांटा जड़ दिया फिर तेजी से भाग खडा हुआ।
                                         शाम को नीचे आँगन में महिलाओं की पंचायत छिड़ी  हुई थी ।   सरोज  ने अपनी माँ से शिकायत कर दी  जो सुन्दर की माँ तक पहुँची, उसने सुन्दर का पक्ष लिया और वाक्-युद्ध प्रारम्भ होगया जो देर तक एक दूसरे की सात पीढ़ियों तक के  गुणगान के बाद बिना किसी निष्कर्ष व परिणाम के दो घंटे बाद समाप्त हुआ।
                                         अगले दिन जब सुन्दर और जगदीश कंचे खेल रहे थे तो सरोज दौड़ती हुई आयी, बोली ,' सुन्दर, चलो   अपन -तुपन खेलते हैं नीचे चलकर।  सुन्दर ने कंचे  से निशाना लगाते हुए कहा, चलो  भागो, मुझे नहीं खेलना तुम्हारे साथ ।
              पर मैं नीचे जारहा हूँ । जगदीश बोला, वह कंचे हार रहा था अतः बहाना मिलते ही कंचे अपनी  जेब में रखकर चलता बना ।
             तुमने अपनी माँ  से शिकायत क्यों की ? सुन्दर ने  पूछा ।
             अब नहीं करूंगी । सुन्दर की बांह पकड़कर सरोज बोली ।
                      और दोनों बाहँ में बाहें डाले खेलने चल दिए।
 
                   

                
                  

1 टिप्पणी:

रविकर फैजाबादी ने कहा…

आभार सर जी |
सशक्त लेखन |

आभार ||