शनिवार, 1 अक्तूबर 2011

तेरे लाज के घूँघट से


                                            

उमड़ आयी बदली 
तेरे लाज के घूँघट से 
द्वार पर  खड़ी तू 
बेतस बाट जोहती 
झलक गये तेरे केशू
तेरे आँखों के अर्पण से |

पनघट पे तेरा आना 
भेष बदल गगरी छलकाना 
छलक गयी गगरी तेरी 
तेरे लाज के घूँघट से |

सजीले पंख सजाना 
प्रतिध्वनित  वेग से 
झरकर गिर आयी 
तेरे पाजेब की रुनझुन से |

रागों को त्याग 
निष्प्राण तन में उज्जवल 
उस अनछुई छुअन में 
बरस गयी बदली 
तेरे लाज के घूँघट से 
उमड़ आयी बदली 
तेरे लाज के घूँघट से 
- दीप्ति शर्मा 


www.deepti09sharma.blogspot.com
                                                   

13 टिप्‍पणियां:

kanu..... ने कहा…

sundar rachna

सियाना मस्कीनी ने कहा…

आग कहते हैं, औरत को,
भट्टी में बच्चा पका लो,
चाहे तो रोटियाँ पकवा लो,
चाहे तो अपने को जला लो,

रविकर ने कहा…

खुबसूरत प्रस्तुति ||

वर्ज्य नारी स्वर ने कहा…

!!!*** शुभकामनाएं***!!!

कुश्वंश ने कहा…

खुबसूरत प्रस्तुति

Atul Shrivastava ने कहा…

सुंदर भावमयी प्रस्‍तुति......

जयकृष्ण राय तुषार ने कहा…

खूबसूरत कविता बधाई

Suresh kumar ने कहा…

बहुत ही सुन्दर रचना ....

Rewa ने कहा…

wah kya likha hai apne....bahut sundar

डा० व्योम ने कहा…

अच्छी रचना।

V.P. Singh Rajput ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति.

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" ने कहा…

sunder prastuti......

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

bahut sunder prastuti.