मंगलवार, 18 अक्तूबर 2011

पहाड़ और औरत

एक सा है जीवन 
पहाड़ और  औरत का 
कभी सुन्दर, कभी नीरस 
कभी खिला, कभी उजड़ा ..

कुछ सख्त मन एक समान
कितना कुछ समेटे हुए 
कुछ सीमायें है दोनों की 
समान अस्तित्व की लकीरें...

हर प्रहार सह ले
हर अपनत्व को पहचान ले
पर टूटें जब दोनों 
बिखर जाएँ कण कण में...

अपने से बाहर निकल आओ
थमकर,एकटक देखकर
पहचान लो जरा क्या है ये
पहाड़ और........और औरत.....!!    

11 टिप्‍पणियां:

अशोक कुमार शुक्ला ने कहा…

आदरणीय महोदय
उत्तराखंड me stree ki dasha bayaan karti
आँखें वो खोलने वाली सटीक विष्लेषण पोस्ट
आभार
.
कृपया आर्शिवाद दे ! आभारी रहूँगा !!

Atul Shrivastava ने कहा…

नारी और पहाड का सुंदर तुलनात्‍मक प्रस्‍तुतिकरण।

Rajesh Kumari ने कहा…

nari aur pahad dono ki samanta ka bahut achcha vishleshan kiya hai.

वन्दना ने कहा…

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति आज के तेताला का आकर्षण बनी है
तेताला पर अपनी पोस्ट देखियेगा और अपने विचारों से
अवगत कराइयेगा ।

http://tetalaa.blogspot.com/

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

अच्छी प्रस्तुति ....टेक्स्ट का रंग ऐसा है जिससे पढने में असुविधा हो रही है ...

ASHA BISHT ने कहा…

aap sabhi ka hardik dhanyvad.. apke comment mere liye puraskar saman hai.
@sangeeta ji sachet karne ke liye bahut bahut dhanyavad.....

रविकर ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति ||
मेरी बधाई स्वीकार करें ||

अनुपमा पाठक ने कहा…

दोनों के बीच समानताओं को सुन्दरता से रेखांकित किया है!

sushma 'आहुति' ने कहा…

एक सा है जीवन
पहाड़ और औरत का
कभी सुन्दर, कभी नीरस
कभी खिला, कभी उजड़ा ..बेहतरीन प्रस्तुती.....

ASHA BISHT ने कहा…

@ravikar ji

@anupamaji

@shushmaji
aap sabhi ka dhanyvad...

डा. श्याम गुप्त ने कहा…

----और यही सा जीवन तो पुरुष का भी है .....वस्तुतः मानव-मात्र का जीवन, या कहिये "जीवन" ऐसा ही है ..इसे नारी-नर के खाँचों में बांटना उचित नहीं ...