मंगलवार, 25 अक्तूबर 2011

स्त्री-पुरुष विमर्श गाथा...भाग दो ..सहजीवन.व श्रम विभाजन ...डा श्याम गुप्त...



                   वह आकृति अपनी गुफा में से अपने फल आदि उठाकर आगंतुक की गुफा में साथ रहने चली आई | यह मैत्री भाव था, साहचर्य --निश्चय ही संरक्षण-सुरक्षा भाव था..पर अधीनता नहीं ....बिना अनिवार्यता..बिना किसी बंधन के.....| इस प्रकार प्रथम बार मानव जीवन में सहजीवन की नींव पडी | साथ साथ रहना...फल जुटाना ..कार्य करना..स्वरक्षण...स्वजीवन रक्षा...अन्य प्राणियों की भांति | चाहे कोई भी फल या खाना जुटाए...एक बाहर जाए या दोनों ...पर मिल बाँट कर खाना व रहने की निश्चित प्रक्रिया -सहजीविता - ने जीवन की कुछ चिंताओं को -खतरे की आशंका व खाना जुटाने की चिंता -अवश्य ही कुछ कम किया | और सिर्फ खाना जुटाने की अपेक्षा कुछ और देखने समझने जानने का समय मिलने लगा | 
                               फिर एक दिन उन्होंने  ज्ञान का फल चखा वास्तव में यह फल खाने-खिलाने व स्त्री द्वारा पुरुष को भटकाने -स्त्री को शैतान की कृति मानने की कथा -मुस्लिम व ईसाई जगत में ही प्रचलित  है ---हिन्दू जगत --भारतीय कथ्यों में यह कथा नहीं है ..अपितु आदि एवं साथ साथ उत्पन्न -स्त्री-पुरुष --मनु व श्रृद्धा हैं जो साथ साथ मानवता व श्रद्धात्मकता भाव से साथ साथ रहते हैं ....हाँ जयशंकर प्रसाद ने कामायनी में इडा ( बुद्धि ) नामक चरित्र की स्थापना की है जिसके कारण मनु ( मानव ) श्रृद्धा को भूल जाते हैं ...कष्ट उठाते हैं ..और पुनः स्मरण पर वे दोनों का समन्वय करते हैं |) ....स्त्री-पुरुष का भेद जाना ... वे पत्तियों से अपना शरीर ढंकने लगे, बृक्षों पर आवास बनने की प्रक्रिया हुई, अन्य अपने जैसे मानवों की खोज व सहजीवन के बढ़ने से अन्य साथियों का साहचर्य..सहजीवन..के कारण
.. सामूहिकता का विकास हुआ...नारी स्वच्छंदथी....स्त्री-पुरुष सम्बन्ध बंधन हीन  उन्मुक्त थे | एक प्रकार से आजकल के 'लिव इन रिलेशन ' की भांति |  स्त्री-पुरुष सम्बन्ध विकास से  संतति  मानव समाज के विकास  के  साथ ही संतति सुरक्षा  के प्रश्न  खड़े हुए, जो मानवता का सबसे बड़ा मूल प्रश्न बना, क्योंकि प्रायः नर-नारी दोनों ही भोजन की खोज में दूर दूर चले जाते थे व बच्चे जानवरों के बच्चों के भांति पीछे असुरक्षित होजाते थे ...| समाज बढ़ने से द्वंद्व भी बढ़ने लगे |  अतः शत्रु से संपत्ति व संतति रक्षा के लिए किसी को आवास स्थान पर रहना आवश्यक समझा जाने लगा,  इसप्रकार प्रथम बार  कार्य विभाजन,  श्रम विभाजन (Division of labour) की आवश्यकता पडी |
--------क्योंकि नारी शारीरिक रूप से चपल, स्फूर्त, प्रत्युत्पन्न मति, तात्कालिक उपायों में पुरुष से अधिक सक्षम, तीक्ष्ण बुद्धि वाली,  दूरदर्शी होने के साथ साथ, संतति की विभिन्न आवश्यकताओं व प्रेम भावना की पूर्ति हित सक्षम होने के कारण --उसने स्वेक्षा से निवास-स्थान पर असहाय संतान के साथ रहना स्वीकार किया , और  स्त्री प्रबंधन समाज  की स्थापना हुई | जो बाद में  स्त्री -सत्तात्मक समाज भी कहलाया  |

                               -----चित्र गूगल साभार ...
----------------क्रमश : भाग तीन..स्त्री-सत्तात्मक समाज.....

8 टिप्‍पणियां:

veerubhai ने कहा…

आभार इस बेहतरीन प्रस्तुति के लिए ..दिवाली मुबारक हो आपको आपके अपनों को .

रविकर ने कहा…

इसप्रकार प्रथम बार कार्य विभाजन, श्रम विभाजन (Division of labour) की आवश्यकता पडी |

शुभकामनाएं ||

virendra ने कहा…

BADHAAYEE SHYAM BHAYEE

ISEELIYE TO NAARI AADI SHAKTI RAHEE

SAARTHAK PRASTUTI

डा. श्याम गुप्त ने कहा…

धन्यवाद वीरूभाई , रविकर व वीरेंद्र जी ...आभार ..

रविकर ने कहा…

रवि को रविकर दे सजा, चर्चित चर्चा मंच

चाभी लेकर बाचिये, आकर्षक की-बंच ||

रविवार चर्चा-मंच 681

प्रेम सरोवर ने कहा…

आपका पोस्ट अच्छा लगा । मेर नए पोस्ट पर आपका बेसब्री से इंतजार रहेगा । धन्यवाद ।

डा. श्याम गुप्त ने कहा…

----रवि को रविकर दे सजा ...ऐसा लगता है रविकर रवि को सजा देरहा हो... सोच समझ कर भाई ..

की-बंच = अंग्रेज़ी शब्द है क्या ?

डा. श्याम गुप्त ने कहा…

धन्यवाद प्रेम जी....