शुक्रवार, 21 अक्तूबर 2011

स्त्री-पुरुष विमर्श गाथा ....एक एतिहासिक दृष्टि ...डा श्याम गुप्त....


 

                                      स्त्री वस्तुतः मानव जीवन या कहें तो.....सृष्टि, जीवन- जगत  का  आधार है | सृष्टि के समन्वय, समन्वित जीवन ,समन्वित सामाजिक व्यवस्था का मूल है | अतः ------स्त्री-पुरुष विमर्श का इतिहास -मूलतः मानव के सामाजिक विकास का इतिहास है,  जो आदिमानव से प्रारम्भ होता है | यहाँ पर हम इसे निम्न शीर्षकों में --काल खंडानुसार - 7  खण्डों में वर्णन करेंगे ....

--भाग १-- आदि मानव -स्त्री-पुरुष ...
--भाग २- सहजीवन व श्रम-विभाजन..
--भाग ३ - स्त्री सत्तात्मक समाज..
--भाग ४ - पुरुष सत्तात्मक समाज ...
--भाग ५ - पुरुष अधिकारत्व समाज...
--भग ६  - आत्म-विस्मृति का युग
---भाग -७- नव-जागरण काल ....


                                  भाग -आदिमानव -स्त्री-पुरुष
 
             एक प्रागैतिहासिक  पुरा कथा है;   जो उस समय की गाथा है जब मानव ने ज्ञान का फल नहीं चखा था, वह किसी बाटिका में भी नहीं रहता था , वनचारी था, एकाकी घुमंतू, जानवरों की भांति गुफा मानव |
 
            झरने में झुक कर जल पीतेहुए उस आदिमानव ने सामने की पहाडी पर किसी आकृति को चलते हुए देखा |  वह आश्चर्यचकित हुए बिना न रह सका |  अब तक वह स्वयं को एकाकी ही समझता था |  उसने जल्दी जल्दी झरना पार किया और उस आकृति का पीछा करने लगा |वह आकृति पहाडी के पीछे जाकर लुप्त होगई | वहां एक गुफा देखकर वह उसमें प्रवेश कर गया |  उसने उसी आकृति को झुक कर कुछ खाते हुए देखा | आहट होते ही आकृति तेजी से हाथ का हथौड़ा लेकर पलटी और अपनी जैसी ही आकृति को देखकर आश्चर्य चकित रह गयी |  आने वाला शत्रु नहीं है यह आश्वस्त होते ही उसने आश्चर्य मिश्रित प्रसन्नता का स्वर निकाला | और कहा---
     " मुझे चौंका दिया, यदि मैं अभी वार कर देता तो !"
     " कोई बात नहीं, मुझे बचना आता है ",  उसने अपना हथौड़ा दिखाते हुए       कहा |
        उसने उसे खाने को फल दिए | आगंतुक ने उसे अपनी गुफा में आमंत्रित किया और अपने एकत्रित फल खाने को दिए और उसकी गुफा में ही रहने के लिए आमंत्रित किया | उसने आगंतुक को ध्यान से देखा और तौला, आगंतुक डील-डौल में उससे अधिक था, उसने उसे छूकर देखा;  उसकी मांस-पेशियाँ भी अधिक स्पष्ट व शरीर उससे अधिक सुगठित था, उसका हथौड़ा भी अधिक बड़ा व भारी था |  उसकी गुफा भी अधिक बड़ी, आरामदेह व सुरक्षित थी, फल भी अधिक मात्रा में एकत्रित व ताजा थे जबकि उसके फल कम थे एवं हिंसक जानवरों के कारण अधिक एकत्र भी नहीं हो पाते थे | वह अपने फल व हथौड़ा उठाकर आगंतुक की गुफा में चली आयी |
                 और यही वह समय था जब स्त्री ने स्वेच्छा से प्रथम बार ..पुरुष से सहजीवन   संरक्षण - समन्वय स्वीकार किया |

                      यह शायद वह समय था जब जल से जीव के विकास का स्थलीय जीव में व तदुपरांत मानव के रूप में विकास होरहा होगा... भारतीय भूभाग मानव का प्रथम पालना बना , अर्थात प्रथम मानव उत्पत्ति इस भूखंड पर ही हुई | पृथ्वी का समस्त भूभाग पेंजिया, गोंडवाना लेंड व लारेंशिया में विभाजित हुआ | यह उत्तरी महा भूभाग -( पेंजिया के विभाजन के बाद आदि काल में पृथ्वी - बीचो- बीच में टेथिस महा सागर था और उत्तर व दक्षिण में महा भूखंडों से निर्मित थी)- शायद पामीर का पठार , तिब्बत, उत्तरी भारतीय भूखंड, ईरान, इराक अरब ....आदि का सम्मिलित भू भाग...जम्बू द्वीप या गोंडबाना लेंड रहा होगा...भारतीय भूभाग इस भूखंड के मध्य में स्थित था, शायद इसीलिये आज भी मध्य भारत का भूभाग गोंडवाना लेण्ड के नाम से जाना जाता है | क्योंकि पृथ्वी के भूभाग बार बार अपनी स्थिति बदल रहे थे , टूट व बन रहे थे अतः नए नए धरती स्थलों का निर्माण होने से ये भूभाग पूर्व, पश्चिम, उत्तर दक्षिण की ओर आते जाते रहे | भारतीय भूखंड  उत्तर की ओर खिसक कर जब एक प्रायद्वीप की भांति स्थिर हुआ तो वह जल से चारों ओर व पामीर के पठार से उत्तर की ओर घिरा होने से जीवन के लिए सर्व-उपयुक्त स्थल भूभाग रहा होगा अतःयह भूखंड मानव का प्रथम पालना बना | भारतीय भूखंड से आदि-मानव का उत्तर-पश्चिम की ओर( यूरोप व भूमध्य सागर के उत्तर के देश) प्रयाण करना प्रारम्भ हुआ | पृथ्वी के दक्षिणी महा भूभाग के उत्तर की ओर खिसकने पर द अमेरिकी, अफ्रीकी भूखंडों का निर्माण व भारतीय प्रायद्वीप का उत्तरी भूखंड से मिलकर सम्पूर्ण -भारत भूखंड बनने पर हिमालय आदि उत्तरी पर्वत श्रेणियों की उत्पत्ति हुई जिससे जीवन की उत्पत्ति व विकास के लिए के लिए और अधिक अनुकूल परिस्थितियाँ बनीं एवं कालान्तर में ...भारतीय मानव का उत्तर भारत से विन्ध्य पार दक्षिण भारत की ओर अपनी वर्त्तमान संस्कृति सहित क्रमिक प्रयाण प्रारम्भ हुआ |
                                                                                                                       -----चित्र ..गूगल साभार 

------------क्रमश : भाग - सहजीवन....

13 टिप्‍पणियां:

रविकर ने कहा…

शायद इसीलिये आज भी मध्य भारत का भूभाग गोंडवाना लेण्ड के नाम से जाना जाता है |


वह अपने फल व हथौड़ा उठाकर आगंतुक की गुफा में चली आयी |---
और यही वह समय था जब स्त्री ने स्वेच्छा से प्रथम बार ..पुरुष से सहजीवन व संरक्षण - समन्वय स्वीकार किया |



त्योहारों की नई श्रृंखला |
मस्ती हो, खुब दीप जले |
धनतेरस-आरोग्य- द्वितीया
मौज मनाने चले चले ||

बहुत बहुत आभार ||

रविकर ने कहा…

चला बिहारी ब्लॉगर बनने माता का भक्त भला
बस्तर की अभिव्यक्ति -जैसे, झरना फूट चला
महिला-पुरुष विमर्शी गाथा, इतिहासिक दृष्टि डला
शुक्ला बोल पड़े मतदाता, कोलाहल बड़ा खला

लिंक आपकी रचना का है
अगर नहीं इस प्रस्तुति में,
चर्चा-मंच घूमने यूँ ही,
आप नहीं क्या आयेंगे ??
चर्चा-मंच ६७६ रविवार

http://charchamanch.blogspot.com/

ajit gupta ने कहा…

यह कथा कहाँ से ली है, इसका संदर्भ नहीं दिया है।

Poonam ने कहा…

very good article..

वर्ज्य नारी स्वर ने कहा…

बढ़िया जानकारी दी है..सुन्दर आलेख.

हास्य-व्यंग्य का रंग गोपाल तिवारी के संग ने कहा…

Upyogi jankari aapko aur aapke pariwar ko dipawali ki hardik shubhkamna.

चन्दन..... ने कहा…

इन विषयों पर ऐसे तो बहुत हि कम लेख मिलते हैं और आपकी लेखनी तो कमाल कर गयी| बहुत हि सुन्दर लेख!

दिवाली कि हार्दिक शुभकामनाएं!

अशोक कुमार शुक्ला ने कहा…

डा0 श्याम जी जब से आप इस ब्लाग पर आये हैं तब से लेकर आज तक आपकी प्रत्येक पोस्ट अत्यंत ज्ञानवर्धक और संग्रहणीय रही है ।
बहुत बडी और महान सोच है
दीपावली की हार्दिक शुभकामनाऐं!!

डा. श्याम गुप्त ने कहा…

---धन्यवाद शुक्ला जी, चन्दन जी, तिवारी जी , नारी स्वर ( वर्ज्य क्योंकर ?), पूनम जी व रविकर ... ...आभार ...

डा. श्याम गुप्त ने कहा…

अजित जी...बहुत-बहुत धन्यवाद व आभार .....बहुत से विषय-भाव के साहित्य , पुस्तकें व शास्त्रादि पढने के उपरांत आपका स्वयं का वैचारिक-तंत्र बनता है | यह आलेख मेरा अपना मंथनोपरांत विचारभाव( इंटरप्रिटेशन ) है |
यदि प्रारंभिक आदि-कथा का प्रश्न है तो वह मैंने शायद कभी कहीं पढ़ी-सुनी होसकती है जो मानस में अभिरंजित रही होगी | कल्पित-कथा भी हो सकती है ...वास्तविक सूत्र (मुझे याद नहीं ....) तो माँ शारदे ही होती है|

shivam ने कहा…

अति उत्तम...!!!
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Unlucky ने कहा…

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In a Hindi saying, If people call you stupid, they will say, does not open your mouth and prove it. But several people who make extraordinary efforts to prove that he is stupid.Take a look here How True

डा. श्याम गुप्त ने कहा…

--धन्यवाद ..शिवम जी ..

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