शुक्रवार, 30 सितंबर 2011

मिट रही हैं बेटियां मिटती रहे---बेटे को पढ़ने दो |

शिखा जी को लिखा 

पथ दिखा सहेली कहाँ गईं ?
वो शिखा सहेली कहाँ गईं ??
ब्लॉग जगत वीराना है -
तू वापस आ जा जहाँ गई ||

कुशलक्षेम हम चाहें तो--
वाह में बदलें आहें तो
सही रास्ता चुन पाए  --
सम्मुख हों दो राहें तो ||

दीदी के भी दर्शन दूर |
दूर  कर  रहे कोई टूर |
सुख-दुःख के हैं साथी हम 
क्यूँ आने से हो मजबूर??

 बेटे को पढ़ने दो |
* घट रही है रोटियां घटती रहें---गेहूं  को सड़ने  दो |
* बँट रही हैं बोटियाँ बटती रहें-- नंगों को लड़ने  दो |

* गल रही हैं चोटियाँ गलती रहें--- पानी को घटने दो |
* मिट  रही हैं बेटियां मिटती रहे---बेटे को पढ़ने दो |

* घुट रही है बच्चियां घुटती रहें-- बर्तन को मलने दो ||
* लग रही हैं बंदिशें लगती रहें--- दौलत को बढ़ने दो |

* पिट रही हैं गोटियाँ पिटती रहें---रानी को चलने दो |
* मिट रही हैं हसरतें मिटती रहें--जीवन को मरने दो ||



3 टिप्‍पणियां:

Atul Shrivastava ने कहा…

बेहतरीन...
भावयुक्‍त और संदेश देती रचना।

वर्ज्य नारी स्वर ने कहा…

सुन्दर लिखा है.

S.N SHUKLA ने कहा…

बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना , बधाई