मंगलवार, 13 सितंबर 2011

क्या नौकरी करने के बावजूद भी औरत को सुरक्षा और सम्मान नहीं मिल पाता ?


लिव इन रिलेशनशिप  को लेकर यूरोप में कैसी भी दीवानगी देखने में आ रही हो, लेकिन भारतीय संस्कृति में यह अभी तक पूरी तरह से घूल-मिल नहीं पाई है। इसकी सबसे बड़ी वजह है कि भारतीय समाज पारिवारिक बंधनों में बहुत भरोसा करता है। ऐसे में दो युवाओं द्वारा अगर लिव इन रिलेशनशिप  जैसा कदम उठाया भी जाता है, तो भी पारिवारिक बंधनों के चलते ऐसे रिश्ते  कामयाब नहीं हो पाते हैं। ऐसा ही एक वाकिया हाल ही में टीवी और समाचार चैनलों पर सुर्खियों में बना हुआ है। यह मामला है एयरफोर्स की बर्खास्त पूर्व फ्लाइंग ऑफिसर अंजलि गुप्ता का, जिनके सूइसाइड के मामले में उनके प्रेमी ग्रुप कैप्टन अमित गुप्ता पर पुलिस का शिकंजा कसता जा रहा है। पुलिस का कहना है कि लिव-इन रिलेशनशिप में धोखा मिलने की वजह से अंजलि ने सूइसाइड किया है। अंजलि के परिवार वालों के मुताबिक, अंजलि और अमित पिछले सात सालों लिव-इन रिलेशनशिप में थे। उनका कहना है कि अमित ने अपनी पहली पत्नी से तलाक के बाद अंजलि से विवाह करने का वादा किया था, लेकिन अब वह इससे मुकर रहा था। अंजलि भी पिछले एक साल से भोपाल में ही रह रही थी। अंजलि की मां ने आरोप लगाया है कि अमित ने ही अंजलि को अपने सीनियरों के खिलाफ शारीरिक उत्पीड़न करने का आरोप लगाने के लिए उकसाया था। और, अंजलि ने 3 सीनियर अधिकारियों के खिलाफ एयरफोर्स के अधिकारियों से शिकायत की थी। इसके बाद उसका कोर्ट मार्शल कर दिया गया था। उसके बाद से अंजिली और अमित साथ रह रहे थे। अमित का पत्नी से तलाक होने वाला था। 
जाहिर है, लिव इन रिलेशनशिप  के चक्कर में अपनी जिंदगी को बर्बाद कर लेने वाली अंजलि गुप्ता इस रिष्ते की जटिलताओं का ही शिकार हुई है। अंजलि गुप्ता का कॅरिअर अच्छा चल रहा था, लेकिन अपने प्रेमी अमित के चक्कर में उन्होंने अपने सीनियर अधिकारियों के उपर झूठे इल्जाम लगाए। इसका नतीजा ये निकला कि उनका कॅरिअर पूरी तरह चैपट हो गया, उनके खिलाफ कोर्ट मार्शल भी हुआ। हालांकि इसके बाद भी अंजलि संभल गई थी और वो एक खुशहाल जिंदगी जी सकती थी, अगर अमित लिव इन रिलेशनशिप  के रिष्ते को पूरी ईमानदारी के साथ निभाता और उसका साथ देता। लेकिन अमित ने सिर्फ अंजलि का इस्तेमाल किया और जैसा कि अंजलि की मां के बयानों से लगता है कि उसने बरसों तक अंजलि का यौन शोषण करने के बाद भी अपनी पहली पत्नी को छोड़कर उससे शादी करने का इरादा नहीं जताया। इसी के चलते अब अंजलि आत्महत्या पर मजबूर हुई है।
Source :
http://khabarindiya.com/index.php/articles/show/3279_desh_dunia?utm_source=feedburner&utm_medium=feed&utm_campaign=Feed%3A+khabarindiya+%28KhabarIndiya.Com%२९
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सीनियर अधिकारियों ने अंजलि के साथ क्या किया ?
इसे केवल अंजलि और उसके अधिकारी ही जानते हैं।
नौकरी और रूपये को औरत की मज़बूती के लिए आज ज़रूरी माना जाता है लेकिन यह सब होने के बावजूद भी अंजलि ने आत्महत्या कर ली , क्यों ?
केवल एक सही सोच और एक सही तरीक़े के अभाव में।

लिव इन रिलेशनशिप भी इसी अभाव की कोख से जन्मा है और समय के साथ साथ और बहुत से मसले सामने आते चले जाएंगे।
अंजलि उनमें से एक बानगी भर है।

15 टिप्‍पणियां:

bhuneshwari malot ने कहा…

आपने सही कहा ।लिव इन रिलेषनषिप पष्चिमी भोगवादी संस्कृति में कामयाब होसकती है।भारत जैसे देष मे जहां पति -पत्नि के संबध ज्ञान व विवेकपूर्ण व्यवहार से जीवन भर चलते है वहां नही। । ।लिव इन रिलेषनषिप विवाह जैसी पवित्र संस्था को चुनौती देने के बराबर है व स्त्रियों के ष्षोषण को बढावा देना हे।

Santosh Kumar ने कहा…

I agree with you. Live-in relationships are sickness. These are infectious diseases spread by Western culture. These things are damaging our Holy Indian culture.

Thank you for raising a noble cause.

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

Shukriya !

बारिशें ने कहा…

टिप्पणियाँ निरंतर सुने और कीहै दे रही है ... कई सवाल हैं जो जेहन को घेरते हैं ... मूल्यों से पलायन अन्हूनियों को जन्म देता है ... लिव इन रेलाश्न्शिप के लिए पश्चिम जैसा माहौल अभी नहीं बना है ... दुरूह्ताओं और जटिलताओं के लिए परिक्व्ता अभी नहीं दिख रही ... ऐसे सम्बन्ध उचित हैं याँ अनुचित यह चर्चा अलग है ... कोई भी बदलाव ज़रूरतों से जुदा हो तो मूल्य बदलते रहते हैं और दुविधाएं नहीं होतीं ... पर वैचारिक पुष्टि का आभाव विकारों और असंगतियों को जगाता है और हानि तो होती ही है न ... बेटियाँ आज भी मूल्यों के दायरों में सुरक्षित ही ही अच्छी रहती है हाँ इतना अवश्य है कि मूल्यों के ढाँचे सुरक्षा दें और आजादी दें ... कैद ना करें ... यह पुरुष वर्ग परभी उतना ही लागो हो ...

kanu..... ने कहा…

sahi kaha anwar ji.pashchim andhanukaran hame gart ki aur le ja raha hai.ho sakta hai kuch deshon me is tarah ke rishtey safal ho par bharat me jadon tak sanskaar bethe hue hai jo ase rishton ko falne fulne nahi de sakte. bharat me ye sirf shoshan ka ek aur tareeka bankar ubhrega...

मैं और मेरा परिवेश ने कहा…

जब हम अपने दायरों से बाहर निकल जाते हैं तो हमें अवांछित का सामना करने के लिए भी मानसिक रूप से तैयार रहना चाहिए। या तो आजादी चुनिये, खुश रहिये और इसकी तकलीफ भी सहिये या बंधन में सुरक्षित रहिये, घुटते हुए

vandana ने कहा…

इस मुक्तिबोध से

दुष्यंत ने तो बांधा

प्रण को प्रमाण में

किन्तु अंगूठी भी छल गयी तुम्हें

मात्र दुर्वासा का शाप न था

यह तो दुष्यंत की मुक्ति थी

प्रण से संकल्प से

मात्र एक बहाना बना छलना

छलनाओं में जीती हुई

रिश्तों से भागती

आज की शकुंतला


विदेशी संस्कृति के पीछे भाग कर भी हम अपने आप को गुलाम मानसिकता का शिकार नहीं बल्कि आधुनिक सोच वाला मानते हैं ..!!!!

shashi purwar ने कहा…

bahut prabhavkari ...sundar abhivyakti .... keep it up ..
meri poem aapka intjar kar rahi hai ...
apka swagat hai . bahut dino se aap nahi dikhi .. :)

दीपांकर कुमार पाण्डेय (दीप) ने कहा…

सार्थक पोस्ट..
बहुत सुंदर

Human ने कहा…

bahut ki acha lekh aur main is baat se ittefaaq rakhta hun ki samaaj me aisi cheezen vastuvadita aur vaasna ko mahatva dene se badhti hain.
Thanks

Minakshi Pant ने कहा…

सुन्दर विषय पर चर्चा अच्छा लगा पढकर आपकी बात से सहमत |

रविकर ने कहा…

बहुत सुन्दरता से पिरोये शब्द ||

बहुत बहुत बधाई |

किसी का दर्द हमें तकलीफ देता है ने कहा…

जल्दी ही हमारे ब्लॉग की रचनाओं का एक संकलन संभावित है. मैं आपको पढता रहा हूँ, अच्छा लगता है.

सादर आमंत्रण आपको... ताकि लोग हमारे इस प्रकाशन के द्वारा आपकी सर्वश्रेष्ट रचना को हमेशा के लिए संजो कर रख सकें और सदैव लाभान्वित हो सकें.

हमसे प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से जुड़े लेखकों का संकलन छापने के लिए एक प्रकाशन गृह सहर्ष सहमत है. हमें प्रसन्नता होगी इस प्रयास में आपका सार्थक साथ पाकर, यदि संभव हो सके तो आपके शब्दों को पुस्तिकाबद्ध रूप में देखकर.



सादर, संवाद की अपेक्षा में... जन सुनवाई

अधिक जानकारी हेतु लिंक http://jan-sunwai.blogspot.com/2011/09/blog-post.html

Sapna Nigam ( mitanigoth.blogspot.com ) ने कहा…

सार्थक लेख.

डा. श्याम गुप्त ने कहा…

'केवल एक सही सोच और एक सही तरीक़े के अभाव में।'-----एक दम सही उदघाटन....

---सिर्फ स्त्री ही नहीं पुरुष के लिए भी सच है ...केवल एक सही या गलत सोच ...भौतिकता का अंधानुकरण ...लीवन नष्ट करने या बनाने के लिए काफी है...