शनिवार, 3 सितंबर 2011

एक अजन्मी बच्ची की बातें : words of a baby girl .....


माँ ! माँ ! सुन रही हो?सुनो ना माँ! अरे इधर उधर मत देखो माँ ! में तुम्हारे अन्दर से बोल रही हू  ,नहीं समझी ना ? में तुम्हारी बच्ची बोल रही हू. पता है .मेरे छोटे छोटे हाथ पाँव है अब ... में महसूस करने  लगी हू  हर हलचल को ,हर आहट को.(Dear mom are u there? i am your baby girl  inside you. please give me a chance to see this world .i can feel this world now ....)
कल जब तुम कहीं  गई थी वहा जाने केसी  मशीन लगाई गई थी तुम्हारे शरीर पर, सच कहू ? बड़ा दर्द हो रहा था माँ...एसी जगह मत जाया करो ना ,पता है  मैं बहुत खुश हू की जब कल रात में दादी कह रही थी मत ला इसे इस दुनिया में तब तुमने इसका विरोध किया ,तुम नहीं जानती माँ में कितनी खुश हो गई की तुमने मुझे प्यारी सी दुनिया में लाने की बात सोची....


माँ जब मै बाहर की दुनिया मे आ जाउंगी तब अपनी मुस्कान से तुम्हारा घर भर दूंगी....अपने नन्हे कदमो मे बंधी पायल से जब ठुमक कर चलूंगी ना तब तुम बहुत खुश होगी सच मानो मेरी बात, और हाँ मे अपने खिलोने वाले बर्तनों मे तुम्हारे लिए खाना बनाउंगी,जब तुम थकजाओगी तो तुम्हे खूब सारी पप्पी दूंगी...अपने खेल मे तुम्हे भी शामिल कर लूंगी ....


जब मे बड़ी हो जाऊंगी ना माँ तब तुम्हारे काम मे तुम्हारी मदद  करूंगी, खूब पढाई करुँगी ,हर सुख दुःख मे तुम्हारे साथ रहूंगी....तुम चाहे मानो या ना मानो पर तुम्हे गर्व होगा की तुमने बेटी को जन्म दिया....तुम डरो मत माँ मै कभी तुम्हारे और पापा को सबके सामने शर्मिंदा नहीं होने दूंगी  ,कभी तुम्हे बेटी को जन्म देने का दुःख नहीं होने दूंगी, बस तुम मुझे अच्छे संस्कार देना ,खूब सारा प्यार देना,और मै तुम्हे माँ होने की सच्ची  ख़ुशी दूंगी


तुम कितनी प्यारी हो माँ ,तुम दादी की बातों में मत आना माँ ,  मेरा विश्वास करो में वो कुछ भी नहीं करूंगी जो सब दादी बोल रही थी.सच्ची कहती हू तुम्हे कभी तंग नहीं करूंगी आज तुम मेरा सहारा बनकर खडी हो माँ , कल में तुम्हारा सहारा बनूंगी.तुम्हारी आँखों के हर आंसू को अपने नन्हे नन्हे हाथों से पोंछ दूँगी. एक बात कहूँ  तुम मुझे खूब पढाना माँ पढ़लिखकर अपने पैरों पर खड़ा करना तब तुम्हे मेरे दहेज़ के लिए पैसा जुटाने की जरुरत नहीं पड़ेगी ,मुझे सम्मान से जीना सिखाना माँ. और हाँ दहेज़ के लोभी लोगो के घर में मेरी शादी कभी मत करना...


माँ एक बात बोलू दादी को समझाना मै बोझ नहीं हू उन्हें कहना मै उनके बुढ़ापे का सहारा बनूँगी. मै उनके सर मे अपने नन्हे नन्हे हाथों से तेल लगाउंगी ,जब उनका सर दर्द होगा मे दबा दिया करुँगी,पूजा मे उनकी मदद करुँगी बस मुझे बाहर की प्यारी दुनिया देख लेने दो.




मै अपनी आँखों से देखना चाहती हू इस प्यारी दुनिया को,सब तुम्हरे अन्दर रहकर सुनती हू बस.हवा,पानी,पेड़ पंछी सब को अपनी आँखों मे बसा लेना चाहती हू....मे जानती हू जब तुम हरी घास पर चलती हो तो एक ख़ुशी की लहर दोड जाती है तुम्हार अन्दर और इसे मे महसूस करती हू , ये सब मे खुद अपने अन्दर महसूस करना चाहती हू...माँ तुम मुझे दोगी ना ये मौका? माँ मै तुम्हारे हाथों  का स्पर्श  चाहती हू, अपने गालों पर तुम्हारी प्यारभरी चपत चाहती हू ,तुम्हारी और पापा की नोक झोंक देखना चाहती हू, तुम सब का दुलार चाहती हू बोलो माँ दोगी ना मुझे एक मौका जीने का?इस दुनिया मै आने का? बोलो ना माँ चुप क्यों हो आने दोगी ना मुझे इस दुनिया मे.....
dear mom please give me a chance to take birth in this sweet world....mom please dont be a part of Female Foeticide please....please save me....

  बहुत दिनों बाद भारतीय नारी पर कुछ लिखने का अवसर मिला है .आप सभी को गणेश उत्सव की हार्दिक शुभकामनाए .
कनुप्रिया गुप्ता www.meriparwaz.blogspot.com

8 टिप्‍पणियां:

शालिनी कौशिक ने कहा…

kanu ji ajanmi bachchi kee pukar koi aur sune n sune bhagwan zaroorsunta hai aur isliye shayad hamne apne kuchh parichiton ke yahan dekha hai ki jab unhone beti mari hai to beta hua hai taki unhe unke karmon ka fal de sake.sarthak prastuti.
रहे सब्ज़ाजार,महरे आलमताब भारत वर्ष हमारा.

शिखा कौशिक ने कहा…

kanya-bhroon ke madhyam se samaj ke man ko jhnkjhorti sashakt rachna .KANU JI bahut-bahut aabhar .aapne september ke liye diye vishyon me se chayan kar is vishay par likha iske liye hardik dhanyvad .

वन्दना ने कहा…

एक अजन्मी बेटी के भावो को खूबसूरती से उकेरा है।

kanu..... ने कहा…

bas bhaav hai jo shabd bankar ubhar aate hai...har baar yahi sochti hu koi ma krur kse ho sakti hai aur har jab ye sochti hu to mn bhar aata hai is baat se ki meri maa kitni acchi hai...

रविकर ने कहा…

जात - पांत न देखता, न ही रिश्तेदारी,
लिंक नए नित खोजता, लगी यही बीमारी |

लगी यही बीमारी, चर्चा - मंच सजाता,
सात-आठ टिप्पणी, आज भी नहिहै पाता |

पर अच्छे कुछ ब्लॉग, तरसते एक नजर को,
चलिए इन पर रोज, देखिये स्वयं असर को ||

आइये शुक्रवार को भी --
http://charchamanch.blogspot.com/

दिगम्बर नासवा ने कहा…

मार्मिक ... गहरी संवेदनाएं लिए ...

veerubhai ने कहा…

कन्या !के संस्कार स्वभाव को शब्दों में उड़ेलती एक मार्मिक पोस्ट .
बृहस्पतिवार, ८ सितम्बर २०११
गेस्ट ग़ज़ल : सच कुचलने को चले थे ,आन क्या बाकी रही.
ग़ज़ल
सच कुचलने को चले थे ,आन क्या बाकी रही ,

साज़ सत्ता की फकत ,एक लम्हे में जाती रही ।

इस कदर बदतर हुए हालात ,मेरे देश में ,

लोग अनशन पे ,सियासत ठाठ से सोती रही ।

एक तरफ मीठी जुबां तो ,दूसरी जानिब यहाँ ,

सोये सत्याग्रहियों पर,लाठी चली चलती रही ।

हक़ की बातें बोलना ,अब धरना देना है गुनाह

ये मुनादी कल सियासी ,कोऊचे में होती रही ।

हम कहें जो ,है वही सच बाकी बे -बुनियाद है ,

हुक्मरां के खेमे में , ऐसी खबर आती रही ।

ख़ास तबकों के लिए हैं खूब सुविधाएं यहाँ ,

कर्ज़ में डूबी गरीबी अश्क ही पीती रही ,

चल ,चलें ,'हसरत 'कहीं ऐसे किसी दरबार में ,

शान ईमां की ,जहां हर हाल में ऊंची रही .

गज़लकार :सुशील 'हसरत 'नरेलवी ,चण्डीगढ़

'शबद 'स्तंभ के तेहत अमर उजाला ,९ सितम्बर अंक में प्रकाशित ।

विशेष :जंग छिड़ चुकी है .एक तरफ देश द्रोही हैं ,दूसरी तरफ देश भक्त .लोग अब चुप नहीं बैठेंगें
दुष्यंत जी की पंक्तियाँ इस वक्त कितनी मौजू हैं -

परिंदे अब भी पर तौले हुए हैं ,हवा में सनसनी घोले हुए हैं ।
http://veerubhai1947.blogspot.com/

prerna argal ने कहा…

कनुजी आपकी रचना ने तो आँखों को नम कर दिया /सच है कोई माँ अपनी कोख में अजन्मी बच्ची को नहीं मारना चाहती पर वो क्या करे समाज में फैली कुरीतियों के कारण परिवार के दवाब में आकर उनको मजबूरी में ये सब करना पढता है /बहुत ही अच्छा और सार्थक लेख /बहुत बहुत बधाई आपको/



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