गुरुवार, 2 फ़रवरी 2012

विडम्बना

एक तरफ बनाकर देवी,
पूजते हैं हम नारी को,
भक्ति भाव दर्शाते हैं,
बरबस सर नवाते हैं,
माँ शारदे के रूप में कभी
ज्ञान की देवी बताते हैं,
तो माँ दुर्गा के रूप में उसको,
शक्ति रूपा ठहराते हैं |

दूसरी तरफ वही नारी,
हमारी ही जुल्मो से त्रस्त है,
कुंठित सोच की शिकार है,
कहीं तेजाब का वार सहती है,
कही बलात्कार का दंश झेलती है,
कही दहेज के लिए जलाई जाती है,
कही शारीरिक यातनाएं भी पाती है;
तो कही जन्म पूर्व ही,
मौत के घाट उतारी जाती है |

एक तरफ तो दावा करते,
हैं सुरक्षित रखने का;
दूसरी तरफ वो नारी ही,
सबसे ज्यादा असुरक्षित है |

क्या अपने देवियों की रक्षा,
अपने बूते की बात नहीं ?
क्या समाज के दोहरी नीति की,
मानसिकता की ये बात नहीं ?

6 टिप्‍पणियां:

sangita ने कहा…

aek aesa satya jo kabhi sveekara nahi ja sakega. sarthak aalekh hae aapka bdhai.

pratishtha ने कहा…

nice poetry aur dil se nikali bhavana...

शिखा कौशिक ने कहा…

SATEEK V VASTVIKTA KO SWAR DETI RACHNA .AABHAR

डा. श्याम गुप्त ने कहा…

एक उपस्थित सत्य का वर्णन है....बधाई...

---यह समाज या सन्स्क्रिति का दोहरा चरित्र नहीं अपितु दुर्जन विचार-मनुष्य के अनाचरण व आपराधिक चरित्र की बात है ....क्योंकि समाज या सन्स्क्रिति का कोई भी अन्श इन सब क्रत्यों को उचित नहीं ठहराता..

dinesh aggarwal ने कहा…

समाज की दूसरी विकृत शब्द तस्वीर चित्रित करने के
लिये हृदय से आभार......
कृपया इसे भी पढ़े
नेता,कुत्ता और वेश्या

bhuneshwari malot ने कहा…

samaj ko vastvikta ka bodh krati h rachana aabhar.
visit my blog www.bhuneshwari.blogspot.com