रविवार, 7 अगस्त 2011

बडे भैया की हसरतों ने बनाया उसे ‘तसलीमा नसरीन’ !

भाई बहन के अटूट संबंधो की सूची में आज का नाम ऐसा नाम है जो अपनी हिन्दू सहेलियों के कारण कई बार प्रताडित हुआ लेकिन अंततः अपनी साफगोई के लिये ही प्रसिद्ध हुआ। सन् 1992 में अयोध्या में विवादित ढांचा ढहाने के बाद बांग्लादेश में गैर मुस्लिम परिवारों की स्थिति को बखान करती उनकी रचना ‘लज्जा’ ने उनके लिये बांग्लादेश के रास्ते तो बंद किये ही हिन्दुस्तानी कट्टर पंथियों का रोष भी जब तब उन पर टूटता रहा। आज उनका जीवन संसार के कई देशों में राजनयिक शरण की बदौलत ही सुरक्षित रह सका है। उनके द्वारा लिखे गये अपने बचपन के अनुभवों को श्री अमर गोस्वामी जी ने हिन्दी पाठकों के लिये अनुदित किया और वाणी प्रकाशन ने ‘मेरे बचपन के दिन’ नाम से इसे प्रकाशित किया है। तसलीमा नसरीन के उसी संग्रह से कुछ अंश उद्घृत कर रहा हूँ जो तसलीमा की नाम की पहचान से संबंधित है और उनके प्रति उनके बड़े भाई के आत्मिक स्नेह और अटूट लगाव को भी प्रदर्शित करते हैं:-
‘‘.................अक़ीक़ा के पहले , मेरा क्या नाम रखा जाय , इसे लेकर घर में एक बैठक हुयी । बड़े मामा ने उषा नाम रखने का सुझाव दिया। रूनू खाला ने शोभा, झुनू खाला ने पांपड़ी (पंखुडी) नाम रखने के लिये कहा । दरवाजे पर खड़े होकर बड़े भैया अपने अँगूठे में चौखट को कुरेदते रहे। कोई भी नाम उन्हें पसन्द नहीं आ रहा था। चौखट पर खडे खडे भैया की नाराजगी पर किसी की नजर नहीं पड़ी। यह स्वाभाविक ही था। नाम रखने की जिम्मेदारियाँ बड़ों की थीं, इसमें बच्चों की कैसी भागीदारी। बड़े भैया मूँगफली खा रहे थे , अचानक सारस की तरह उन्होंने अपने मुहँ खोला , उनकी जीभ आँधी में काँपते हुये बाँस के पत्तों की तरह हिलने लगी, उनके मुहँ स ेमूँगफनी के टुकडे छिटककर बाहर आ गए, उसेे साथ गले से विचित्र प्रकार के शब्द भी निकलने लगे । अगर घर के कुत्ते बिल्लियों केी आवाज, कौए की काँव काँव , बच्चों के रोने, आँगन में लोगों की चीख पुकार , खेल के मैदान में बच्चों के शोरगुल आदि चिरपरिचत शब्दों की तुलना की जाय तो बडे भैया के मूँगफली से भरे मुँह से निकलने वाले शब्द उन जैसे शब्दों मे से एक होते हुये भी उनसे अलग थे।रूनू खाला को लगा िकवह विचित्र आवाज दरवाजे के पास से ही आ रही थी।
चौखट पर खड़ी रूनू खाला ने लपककर बड़े भैया का कन्धा पकड़ लिया और उन्हे कमरे के बीचों बीच लकड़ी के खम्भे के पास लाकर खड़ा कर दिया । बड़े मामा, रूनू खाला , नानी, माँ ,हाशिम मामा वगैरह सभी की नजरे मुँह फाडकर रोते हुये बड़े भैया पर टिक गईं। बड़े भैया के मुहँ में अभी भी मूँगफली भरी हुयी थी।
रूनू खाला ने बड़े भैया की ठुड्डी उठाकर पूछा, ‘‘अरे रो क्यों रहा है? किसी ने मारा है क्या?’’
बडे भैया अपने गाल पर बहते हुये आँसुओं को हथेली से पोंछने के बाद अपने रोने की आवाज कम करके बोले, ‘‘मेरी बहन का नाम रखना होगा नसरीन।’’
मामा-खाला सब एक दूसरे की ओर देखकर बड़े जोर से हँस पडे। जैसे मंज पर कोई सरकस का जोकर आ गया हो।
अब बड़े भैया को घेरे के भीतर ले आया गया- बड़े मामा, हाशिम मामा, रूनू और झूनू खाला के घेरे में।
‘‘नसरीन नाम ही तुझे क्यों पसन्द है? तूने कहाँ सुना यह नाम? तुझसे किसने यह नाम रचाने के लिये कहा?’’
सवालों की बौछार के साथ ही किसी ने बड़े भैया को मूँगफली का ठोंगा भी थमा दिया । वे दाँत से उन्हें तोडते हुये उसी पर नजरें टिकाये हुए बोले, ‘‘मेरे स्कूल में एक बड़ी सुन्दर लड़की पढती है। उसका नाम नसरीन है।’’
वहाँ मौजूद लोगों ने कुछ और जानने की आशा में अपनी हँसी दबाये रखी।
हाशिम मामा ने पूछाः-‘‘नसरीन कहाँ रहती है? उसका घर कहाँ है?’’
बड़े भैया के जवाब देने के पहले ही बड़े मामा ने कहा, ‘‘यह नसरीन वगैरह नहीं चलेगा। उसका नाम रखो उषा।’’
बड़े भैया ने मूँगफली का ठोंगा फेंक दिया। वह दूर जाकर गिरा । फिर वे वहाँ से दौडते हुये निकल गये। कमरे में जाकर अपने कपड़ों की एक गठरी बनाकर बोले:-‘‘ मैं यहाँ से जा रहा हूँ।’’
‘‘अरे कहाँ जा रहा है, रूक! ’’ माँ ने पीछे से पुकारा।
बड़े भैया ने बाहर निकलते हुए कहा, ‘‘जहाँ मेरी नजरें ले जाएँ।’’ वे वाकई अपने कन्धे पर अपने कपड़े लेकर बाहर चले गए। तालाब तक जाकर वे खुद लौट आयेंगे यह सोचकर मामा खाला वगैरह सभी इत्मीनान से खाट पर बैठे रहे। मगर बड़े भैया नहीं लौटे।
शाम ढलकर जब रात गहराने लगी तब माँ रोने लगीं । बड़े मामा और हाशिम मामा बड़े भैया की तलाश में निकले। खबर पाकर नाना भी ढूँढने निकले।
रात दस बजे हाशिम मामा बड़े भैया को हाजी बाड़ी के जंगल से पकड़कर घर ले आए। उन्हें अपनी बाँहों में भरकर माँ रोते हुये बोली, ‘‘बेटा , तू जो नाम रखना चाहता है , वही नाम रखा जायेगा।’’
मेरे पिता ने सुबह घर में ऐलान कर दिया था कि उनके बेटे को अगर नसरीन नाम पसन्द है तो उसकी बहन का यही नाम रखा जाएगा। मामा-खाला के चेहरे लटक गए।राजकुमारी का ऐसा गँवारू नाम रखने का क्या मतलब? एक ऐसा नाम जिसका कोई अर्थ भी नहीं है।
बड़े भैया दूसरे दिन स्कूल से लौटकर आँगन में खड़े होकर मेरे मामा-खालाओं की ओर देखकर अपना अँगूठा चूसते हुये हँसने लगे।
‘‘हग्गू गाड़ी, अपनी बहन का पूरा नाम क्या रखेगा रे?’’ झूनू खाला ने लग्गी से आँगन में लगे नल के दक्षिण ओर आम के पेड़ से आम तोड़ते हुए पूछा।
‘‘नसरीन जहाँ तसलीमा।’’ बड़े भैया मुँह से अपना अँगूठा बाहर निकालकर बहुत खुश होकर बोले । यह देखकर झूनू खाला हँस पड़ीं।
रूनू खाला आम का भुर्ता बनाने के लिये आँगन में बैठकर एक कटोरे में आम कतर रही थीं। उन्होंने पूछा,‘‘तेरे स्कूल में वह जो लड़की नसरीन पढ़ती है,तुझे पसंद है?’’
बड़े भैया खुश होकर बोले, ‘‘हाँ है।’’
‘‘उससे शादी करेगा।’’
बड़े भैया ने अपना अँगूठा चूसते हुये शरमाकर स्वीकार में अपनी गर्दन टेढ़ी कर दी। उनके हाफ पैंट का नाडा खुलकर घुटनों तक लटक रहा था।.................‘‘

5 टिप्‍पणियां:

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

हम भी अपने बच्चे का नाम सोच रहे हैं। बच्चे का नाम रखते हुए घर में जो चुहल और हील-हुज्जत होती है उसका बहुत अच्छा चित्रण है यह।

http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/buniyad/

अशोक कुमार शुक्ला ने कहा…

Thanks anwar bhai.

शिखा कौशिक ने कहा…

very nice post Ashok ji .thanks a lot .

Rajesh Kumari ने कहा…

tasleema ji ke naam karan ke vishay me jaankari deti hui post.aabhar.

शालिनी कौशिक ने कहा…

जानकारी भी और रोचक अंदाज़ भी बहुत पसंद आया आपका प्रस्तुति करण अशोक जी.