मंगलवार, 9 अगस्त 2011

समाज का डर


समाज का डर


समाज का डर हम पर,कुछ इस तरह छाया है 
की कुरीतियों का फैला अंधियारा हमारे जीवन मैं हर तरफ नजर आया है 
शादियों मैं हम कर्जा लेकर  शान-शोकत और दिखावे 
में खूब खर्च करते हैं
फिर जिंदगी भर उसका कर्ज चुकातें हैं
समाज के डर से 
जब ससुराल से रोती-बिलखती बेटी शरीर में जख्मों 
का निशान लिए वापस ना जाने की फरियाद करती हुई 
माता-पिता के पास आती है ,पर वो उसे समझाकर वापस 
ससुराल भेज देतें हैं 
समाज के डर से 
कुछ दिनों बाद उसी बेटी की हत्या या आत्महत्या का
समाचार सुन खूब हो -हल्ला मचाते हैं 
कोर्ट -कचहेरी करतें हैं,पर आई बेटी को नहीं अपनातें हैं  
समाज के डर से 
बाल -विवाह का अंजाम और कानूनी अपराध को 
जानते हुए भी आज भी कई छैत्रों में
बाल -विवाह हो रहें हैं पर इस कुरीति को हम छोड नहीं पा रहे हैं 
समाज के डर से
बिना जांच -पड़ताल किये विदेश के मोह में विदेश में बसे 
लडके से अपनी लड़की की शादी करके धोखा खातें हैं 
फिर समाज से छुपाने के लिए झूठे बहाने बनाते हैं 
समाज के डर से 
बेटी पैदा होने से नाक नीची होती है,.बेटा तो वंश चलाता है 
इस कुरीति से बेटियों की गर्भ में ही ह्त्या कर देते  है 
दहेज़ जैसी कुरीति के कारण भी बेटी को जन्म नहीं देना चाहते हैं         
समाज के डर से 
धर्म के नाम पर कब तक ढोंगी-पाखंडी बाबाओं को 
दान-पुण्य के नाम पर धन लूटातें रहेंगे 
इनकी बातों में आते रहेंगे और अपने को छलते रहेंगे 

समाज के डर से
ऐसी कितनी कुरीतियों को हम निभाते रहेंगे 
और इंसानों की  जिंदगियों से खेलते रहेंगे
समाज से कभी इन कुरीतियों ख़त्म नहीं कर पायेंगे
समाज के डर से 
समाज हमसे है हम समाज से नहीं 
बुराइयों को छोडकर अच्छाइयों को अपनाओं
शिक्षित  समाज में नई रीतियों को बनाओ
पुराने समाज की पुरानी कुरीतियों को भूल जाओ  
समाज के डर से    

6 टिप्‍पणियां:

Banti Nihal ने कहा…

आपका बहुत बहुत धन्यवाद की आपने मेरे ब्लॉग पर आकर मुझे मार्ग दर्शन दिया. आप जैसी महान व् आदरणीया से मार्ग दर्शन पाकर मन प्रसन्न हो जाता है. आपका लेख समाज का डर को पड़कर अंतरात्मा हिल गया. आपने बहुत ही खूबसूरती से लेख लिखा है.
शादियों मैं हम कर्जा लेकर शान-शोकत और दिखावे में खूब खर्च करते हैं, फिर जिंदगी भर उसका कर्ज चुकातें हैं
एक सच्चाई बताई है. बहुत बहुत आभार, शुक्रिया

Banti Nihal ने कहा…

बेटी पैदा होने से नाक नीची होती है,.बेटा तो वंश चलाता है
इस कुरीति से बेटियों की गर्भ में ही ह्त्या कर देते है
आपकी लेख के लिए मेरे पास शब्द ही नहीं है.

veerubhai ने कहा…

तमाम सामाजिक बुराइयों को रेखांकित करती ,दिशा और आइना दिखाती एक महत्वपूर्ण पोस्ट अलबत्ता पीर -फकीरों ,औलियों के चक्कर में व्यक्ति भ्रम -प्रेरित होकर ,जीवन से हताश होकर जाता है भय से नहीं .भय तो "सिर्फ महालक्ष्मी "के गिर्द ,"कन्या -धन "के गिर्द लिपटा हुआ है इस सोच से चस्पां है कि लडकी पराया धन है ,"कन्या -दान ",इसकी बेवा ,उसकी बेवा ,विधवा ,परित्यक्ता ,शमिता इन तमाम शब्दों को चलन अब प्रति -बंधित होना चाहिए .ये मुहावरे भी -"चमारी को चाची कह दी तो चौके में घुस आई " .ब्लॉग पर आपकी सक्रियता ,द्रुत टिपियाने पर ,ब्लॉग -मित्रा बने रहनें पर बधाई .
http://kabirakhadabazarmein.blogspot.com/
Wednesday, August 10, 2011
पोलिसिस -टिक ओवेरियन सिंड्रोम :एक विहंगावलोकन .
व्हाट आर दी सिम्टम्स ऑफ़ "पोली -सिस- टिक ओवेरियन सिंड्रोम" ?


सोमवार, ८ अगस्त २०११



What the Yuck: Can PMS change your boob size?

http://sb.samwaad.com/
...क्‍या भारतीयों तक पहुंच सकेगी जैव शव-दाह की यह नवीन चेतना ?
Posted by veerubhai on Monday, August ८
बहुत अच्छा काम कर रहें हैं आप .बधाई

शालिनी कौशिक ने कहा…

sahi kaha hai prerna ji aapne ye sahi hai ki samaj ka dar bahut se galat kam rokta hai kintu ye bhi sahi hai ki samaj ka dar bahut se sahi kamom ko hone se bhi rok deta hai .sarthak prastuti. aaj samaj me uchit anuchit ka antar sabhi ke dimag me aana hi chahiye.

Rajesh Kumari ने कहा…

bahut achchi prastuti hai man ko sochne par vivash karti hai.jo likha hai sab sachchaai hai.in kureetiyon me koi kami na aakar badhotri ho rahi hai.yesi shiksha kis kaam ki hai jo buraai ko nahi pahchanti.aaj kal shiksjit samaaj me yah sab ho raha hai.bade sharm ki baat hai.

शिखा कौशिक ने कहा…

सार्थक बात लिखी है आपने .समाज के डर से बहुत सारी बेटियों को दहेज़ की आग में जलने हेतु छोड़ दिया जाता है .