गुरुवार, 18 अगस्त 2011

आधी आबादी की जनभागीदारी के मायने क्या हैं ? भाग:-1


बहुत दिन नहीं हुये जब ननिहाल के गाँव से अधेड उम्र मामी का फोन आया था कि वे पंचायत चुनाव मे प्रधानी का पद जीत गयी हैं। मामी को औपचारिक बधाई देने के बाद मैं मामी के चुनाव से जुडे तथ्यों पर विचार करने लगा। नाना राजपुरोहित थे और साथ ही स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी थे और आजादी के संघर्ष के दौरान नेहरूजी के साथ जेल गये थे। उन्होंने जेल में हुयी नेहरू जी की मुलाकात का मान अपनी पूरे जीवन भर निभाया और नाना ने अपने जीते जी कभी भी कांग्रेस से इतर किसी राजनैतिक दल के बारे में न तो सोचा और नहीं परिवार वालों को सोचने दिया।
नाना की मृत्यु के बाद बडे मामा गांव के प्रधान हुये। तब तक ग्राम प्रधान के साथ मनरेगा, मिड डे मील , जैसी अनेक आकर्षक योजनाओं के न जुडने से यह पद युवा वर्ग की चाहत से दूर था। घर की महिलाओं को गांव की राजनीति से जुडने की न तो कोई चाह थी और न ही कोई उत्साह। कुछ समय बीतने के बाद ग्राम प्रधान का पद अनुसूचित जाति के लिये आरक्षित होने वाला था दुर्भाग्य से तभी मामा का देहान्त हो गया और उसके बाद दूसरे गांव के आरक्षित व्यक्ति द्वारा चुनाव जीतने से ननिहाल में प्रधानी का रूतबा भी खतम हो गया।
यह स्थिति कमोवेश बीस वर्षो तक चली जब तक ग्राम प्रधान का पद आरक्षित श्रेणी के अंतरगत चिन्हित रहा। पिछले पंचायत चुनाव में पता चला कि प्रधानी का पद महिला अभ्यर्थी के लिये आरक्षित घोषित हुआ है तो मेरे ममेरे भाइयों में जैसे जोश आ गया। उन्होंने मामी को प्रधान पद के उम्मीदवार के रूप में चुनाव में उतार दिया।
बेचारी मामी जिन्होंने कभी गांव की देहरी पार नहीं की थी पूरे गांव में जाकर वोट मांग आँयी और परिणाम सामने है कि वे निर्वाचित हो चुकी हैं। इस पूरे घटनाक्रम को उद्घृत करने का उद्देश्य मात्र यह बताना था कि आज से बीस पच्चीस साल पहले हमारे प्रदेश में परिवार के मुखिया जो महिलाओं को घर के भीतर ही रहने की सीख दिया करते थे अब वे ही उन्हे घर की देहरी से बाहर कदम निकालने की सीख दे रहे हैं ।
जनसाधारण या राजनेताओं की पंचायतों में भागीदारी का असल उद्देश्य भले ही रसूख बढाना या मनरेगा और मिड डे मील के मद में आने वाला धन हो सकता है लेकिन इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि अब महिलाओं ने पंचायत में अपनी भागीदारी को स्वीकार करना आरंभ कर दिया है। मेरी श्रद्धेय मामीजी सहित (मामी जी से क्षमायाचना सहित) कुछ महिलाये अवश्य आज कठपुतली की तरह अपने पुत्रों पतियों या पिताओं की उंगलियों के इशारे पर चल रही हों लेकिन हर अगला दिन उनमें आत्मविश्वास और स्वावलंबन की सीख अवश्य भर रहा है।

उत्तर प्रदेश में जनसत्ता में महिलाओं की भागीदारी की एक और रोचक दास्तान अगली पोस्ट में भी

3 टिप्‍पणियां:

शिखा कौशिक ने कहा…

shok जी बहुत सटीक bat कही है आपने .सार्थक प्रस्तुति हेतु आभार
blog paheli no.1

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

Ashok ji ! सटीक और सार्थक प्रस्तुति हेतु आभार .

शालिनी कौशिक ने कहा…

चलिए चुनाव के लिए और सत्ता सुख के लिए ही सही महिलाओं को आगे बढ़ा तो रहे हैं .सार्थक पोस्ट .आभार अशोक जी