अलिफ़ =1,बे=2,जीम=3,दाल=4,हे=5,=वाओ=6, ज़े=7,बड़ी हे =8,तूए के =9,ये =10 छोटा काफ =20,लाम=30,मीम=40,नून के =50,सीन=60,ऐन =70,फे=80,स्वाद =90, बड़े काफ =100,रे =200,शीन =300,ते =400,से=500,खे=600,जाल -700,जवाद =800 जोए =900,गैन=1000,मुस्लिम भाई सामान्यतः किसी कार्य को आरंभ करने से पूर्व बिस्मिल्लाह हिर रहमानिर रहीम यानी ‘अल्लाह के नाम से शुरू करता हूं’ कहकर ईश्वर को अवश्य याद करते हैं । इस वाक्य में आये शब्दों को अबजद के आधार के उपरोक्तानुसार अंक आबंटित कर योग करने पर आने वाला अंक 786 होता है इसीलिये मुस्लिम इस अंक को सौभाग्यकारी अंक मानते है। जिस प्रकार सामान्यतः कोई नया कार्य आरंभ करने पर मुस्ल्मि भाई बिस्मिल्लाह हिर रहमानिर रहीम कहते है ठीक उसी तरहा अधिकांश हिन्दू कोई नया कार्य आरंभ करने पर ‘हरे रामा हरे कृष्णा कहते हैं एक अनोखी बात है कि हिन्दुओ में प्रचलित वाक्यांश हरे रामा हरे कृष्णा में आये शब्दों को अबजद के आधार के उपरोक्तानुसार अंक आबंटित करने पर भी आने वाला योग अंक 786 ही होता है। है न यह अजब संयोग !! या फिर हिन्दू मुस्लिम एकता का अनोखा उदारहरण । आलेख लिखने वाले ब्लागर आदिल रशीद साहब को इसके लिये बधाई।
'भारतीय नारी'-क्या होना चाहिए यहाँ जो इस ब्लॉग को सार्थकता प्रदान करे ? आप साझा करें अपने विचार हमारे साथ .यदि आप बनना चाहते हैं 'भारतीय नारी ' ब्लॉग पर योगदानकर्ता तो अपनाE.MAIL ID प्रेषित करें इस E.MAIL ID PAR-shikhakaushik666@hotmail.com
मंगलवार, 7 अगस्त 2012
हरे रामा हरे कृष्णा का इस्लामी लिंक
गुरुवार, 26 जनवरी 2012
अमृता प्रीतम की कहानी में व्यक्त वर्तमान रेगिस्तान माननीय उच्च न्यायालय के दरवाजे तक
''माँ के गले से लगी बाँहों ने जब बच्चे को आँखों में इत्मीनान से नींद भर दी, तो पूजा ने उसे चारपाई पर लिटाते हुए, पैरों के बल चारपाई के पास बैठकर अपना सिर उसकी छाती के निकट, चारपाई की पाटी पर रख दिया और कहने लगी—‘‘क्या तुम जानते हो, मैंने अपने पेट को उस दिन मन्दिर क्यों कहा था ? जिस मिट्टी में से किसी देवता की मूर्ति मिल जाए, वहाँ मन्दिर बन जाता है—तू मन्नू देवता मिल गया तो मेरा पेट मन्दिर बन गया....’’
और मूर्ति को अर्ध्य देने वाले जल के समान पूजा की आँखों में पानी भर आया, ‘‘मन्नू, मैं तुम्हारे लिए फूल चुनने जंगल में जाती हूँ। बहुत बड़ा जंगल है, बहुत भयानक, चीतों से भरा हुआ, भेड़ियों से भरा हुआ, साँपों से भरा हुआ...’’
और पूजा के शरीर का कंपन, उसकी उस हथेली में आ गया, जो मन्नू की पीठ पर पड़ी थी...और अब वह कंपन शायद हथेली में से मन्नू की पीठ में भी उतर रहा था।
उसने सोचा—मन्नू जब खड़ा हो जाएगा, जंगल का अर्थ जान लेगा, तो माँ से बहुत नफरत करेगा—तब शायद उसके अवचेतन मन में से आज का दिन भी जागेगा, और उसे बताएगा कि उसकी माँ किस तरह उसे जंगल की कहानी सुनाती थी—जंगल की चीतों की, जंगल के भेड़ियों की और जंगल के साँपों की—तब शायद....उसे अपनी माँ की कुछ पहचान होगी।
पूजा ने राहत और बेचैनी का मिला-जुला साँस लिया। उसे अनुभव हुआ जैसे उसने अपने पुत्र के अवचेतन मन में दर्द के एक कण को अमानत की तरह रख दिया हो....
पूजा ने उठकर अपने लिए चाय का एक गिलास बनाया और कमरे में लौटते हुए कमरे की दीवारों को ऐसे देखने लगी जैसे वह उसके व उसके बेटे के चारों ओर बनी हुई किसी की बहुत प्यारी बाँहें हों...उसे उसके वर्तमान से भी छिपाकर बैठी हुई....
पूजा ने एक नज़र कमरे के उस दरवाजे की तरफ देखा—जिसके बाहर उसका वर्तमान बड़ी दूर तक फैला हुआ था....
शहर के कितने ही गेस्ट हाउस, एक्सपोर्ट के कितने ही कारखाने, एअर लाइन्स के कितने ही दफ्तर और साधारण कितने ही कमरे थे, जिनमें उसके वर्तमान का एक-एक टुकड़ा पड़ा हुआ था....
परन्तु आज बृहस्पतिवार था—जिसने उसके व उसके वर्तमान के बीच में एक दरवाज़ा बन्द कर दिया था।
बन्द दरवाज़े की हिफाजत में खड़ी पूजा को पहली बार यह खयाल आया कि उसके धन्धे में बृहस्पतिवार को छुट्टी का दिन क्यों माना गया है ?
इस बृहस्पतिवार की गहराई में अवश्य कोई राज़ होगा—वह नहीं जानती थी, अतः खाली-खाली निगाहों से कमरे की दीवारों को देखने लगी...
इन दीवारों के उस पार उसने जब भी देखा था—उसे कहीं अपना भविष्य दिखाई नहीं दिया था, केवल यह वर्तमान था...जो रेगिस्तान की तरह शहर की बहुत-सी इमारतों में फैल रहा था....
और पूजा यह सोचकर काँप उठी कि यही रेगिस्तान उसके दिनों से महीनों में फैलता हुआ—एक दिन महीनों से भी आगे उसके बरसों में फैल जाएगा।
और पूजा ने बन्द दरवाज़े का सहारा लेकर अपने वर्तमान से आँखें फेर लीं।‘‘
सचमुच अमृता प्रीतम की कहानी में व्यक्त वर्तमान रेगिस्तान शहर की बहुत सी इमारतों से फैलता हुआ आज माननीय उच्च न्यायालय के दरवाजे तक आ पहुंचा था।
यह अजब संयोग ही किलखनऊ शहर बीते ब्रहस्पतिवार को एक अनोखे मुकदमे का साक्षी बना जब घरों में चौका बरतन करने वाली राजाजीपुरम निवासी एक कुंवारी माँ ने अपने बच्चों के पिता का नाम जानने के लिये उच्च न्यायालय लखनऊ में हलफनामा पेश कर दस लोगों का डी0एन0ए0 टेस्ट करवाने की गुहार लगायी। इस कुंवारी मां का दर्द उसके द्वारा माननीय उच्च न्यायालय में प्रस्तुत हलफनामें मे अंकित इन शब्दों में साफ साफ झलकता है-
‘‘मेरे बच्चों के 10 पिता हैं तो मैं किसका नाम दूं। मुझे किसी ने बेटी बहन बीवी और मां नहीं समझा सिर्फ औरत समझा जिसने प्रकृति के गुण दोषों को अपने गर्भ में पालकर उन्हें इन्सान के रूप में निर्माण कर जन्म देने का गुनाह किया है। मेरे बच्चों के दस पिता हैं तौ मैं किसका नाम दूँ। डी0 एन0 ए0 जांच में जवाब खुद ही मिल जायेगा।’’
इस कुंवारी मां के द्वारा माननीय न्यायालय के समक्ष जिन दस व्यक्तियों का डी0एन0ए0 टेस्ट कराने का अनुरोध किया है उनमें एक नामी पत्रकार एक डाक्टर एक वकील तथा एक इंजीनियर और एक ठेकेदार भी शामिल है। इस सूची को देखने के बाद बस एक ही बात मस्तिष्क में गूंजती है कि ‘इस हम्माम में सब नंगे हैं।’ एक कुंवारी मां के सौजन्य से मा0 न्यायालय के सम्मुख पहुचे इस अनोखे मुकदमें में फरवरी माह की 9 तारीख को पुनः सुनवाई होनी है।
शनिवार, 31 दिसंबर 2011
हिन्दी विकीपीडिया और कविताकोश पर काव्य-संग्रह ‘टूटते सितारों की उडान’ का लिंक
संग्रह के नाम के अनुरूप इस संग्रह में सम्मिलित सभी रचनाकारों की रचनाऐं जीवन की आपा धापी में पल पल बिखरते जा रहे टूटते , छटपटाते रिश्तों का सच प्रगट करती हुयी सी जान पडती हैं। भारतीय नारी ब्लाग हेतु इस संग्रह मे सम्मिलित महिला रचनाकारों की रचनाओं की बानगी प्रस्तुत है जिसमें उन्होंने महानगरीय जीवन की भीड़ में हर पल बिखरते जा रहे टूटते ,और, छटपटाते रिश्तों की सच्चाई को प्रमुखता से स्वर दिया है। क्रमानुसार जिसकी बानगी इस प्रकार है-
1 मूल रूप से रूडकी (उत्तर प्रदेश) निवासिनी सुश्री संगीता स्वरूप जी केन्दीय विद्यालय की शिक्षिका रह चुकी हैं तथा वर्तमान में देश की राजधानी में निवासित हैं उनका एक काव्य संग्रह ‘उजला आसमां’ पूर्व में प्रकाशित हो चुका है। उन्होंने उस तथागत महात्मा बु़द्ध से कुछ सवाल पूछे हैं जो अपनी पत्नी और पुत्र को बेसहारा छोडकर चले गये थे । उनके सवाल किसी भी संवेदनशील प्राणी को निरूत्तर करने के लिये ही लिखे गये जान पडते हैं-
.................तथागत सिद्धार्थ -
कौन से ज्ञान की खोज में
किया था तुमने पलायन जीवन से ?
सुना है तुम नहीं देख पाए
रोगी काया को
या फिर वृद्ध होते शरीर को
और मृत्यु ने तो
हिला ही दिया था तुमको भीतर तक
थे इतने संवेदनशील
तो कहाँ लुप्त हो गयी थीं
तुम्हारी संवेदनाऐं
जब पुत्र और पत्नी को
छोड गये थे सोता हुआ
और अपने कर्तव्य से बिमुख हो
चल पडे थे
दर-बदर भटकने..........
2-मूल रूप से इन्दौर में जन्मी और राजस्थान के कोटा जनपद में विवाहित दर्शन कौर वर्तमान में मायानगरी मुंबई में निवास कर रही हैं जिनकी रचनाओं में महानगरी में खो गया मानवीय रिश्ता इस प्रकार दिखा
........नाहक, तुम्हें बाँधने की कोशिश
छलावे के पीछे भागने वाले औंधे मुंह गिरते हैं
इस तपती हुयी मरू भूमि में
चमकती सी बालू का राशि
जैसे कोई प्यासा हिरन,
पानी के लिये
कुलांचे भरता जाता है
अंत में थककर दम तोड देता है
तुम्हारे लिये
इस मरूभूमि में मै भी भटक रही हूँ
काश कि तुम मिल जाते।...............
3-विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में छप चुकी वरिष्ठ हिन्दी कवियत्री सुश्री वन्दना गुप्ता जी की रचना का एक अंश देखें-.
...........न जाने कब
कैसे, कहाँ से
एक काला साया
गहराया
और मुझे
मेरी स्वतंत्रता को
मेरे वजूद को
पिंजरबद्ध कर गया
चलो स्वतंत्रता पर
पहरे लगे होते
मगर मेरी चाहतो
मेरी सोच
मेरी आत्मा को तो
लहूलुहान ना
किया होता
उस पर तो
ना वार किया होता
आज ना मैं
उड़ पाती हूँ
ना सोच पाती हूँ
हर जगह
सोने की सलाखों में
जंजीरों से जकड़ी
मेरी भावनाएं हैं
मेरी आकांक्षांऐं है
हाँ , मैं वो
सोन चिरैया हूँ
जो सोने के पिंजरे
में रहती हूँ
मगर बंधन मुक्त
ना हो पाती हूँ..
......................
4-राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित श्रीमती महेश्वरी कानेरी जी सेवानिवृति के उपरांत देहरादून उत्तराखंड में निवास कर रही हैं। उनकी एक रचना का अंश देखें -
जीवन तो जीया है मैने
लेकिन कब वो अपना था?
रिश्तों के टुकडों में,
सब कुछ बँटा- बँटा था।
कभी रीति और रिवाजों
की ओढी थी चुनरी....
कभी परंपराओं का
पहना था जामा.....
आँखों में स्वप्न नहीं
समर्पण रहता , हर दम
रिश्तों का फर्ज निभाते
जीवन कब बीत गया
दायित्व के बोझ तले
बरबस मन, ये कहता
कौन हूँ मैं ? कौन हूँ मैं?.
.....................
5-सुधीनामा नामक ब्लाग की संचालिका वरिष्ठ ब्लागर सुश्री साधना वैद जी की एक रचना का अंश देखें -
........तुम्हारे घर के सामने के दरख्त की
सबसे ऊँची शाख पर
अपने मन में सालों से घुटती एक
लंबी सी सुबकी को
मैं चुपके से टाँग आयी थी
इस उम्मीद के कि कभी
पतझड के मौसम में
तेज हवा के साथ
उस दरख्त के पत्ते उडकर
तुम्हारे आंगन में आकर गिरे तो
उसके साथ वह सुबकी भी
तुम्हारी झोली में जा गिरे!...........
6-कानपुर निवासिनी सुश्री सुषमा ‘आहुति’ जी की एक रचना की बानगी देखिये
..........एक सवाल मेरा मुझसे ही रहता है,
क्यूं हर रिश्ता दर्द देता है?
हर खुशी के साथ क्यूं गम होता है?
होठों पर मुस्कान रहती है दिल उदास रहता है
चलते हैं तलाश में मंजिल की हम,
पर राहें मुझसे ही सवाल करती हैं।............
इस काव्य-संग्रह में सम्मिलित प्रमुख व्लागर सर्वश्री रूप चंद्र जी शास्त्री ‘मयंक’ आदि कुछ रचनाकारों के नाम हिन्दी कविता की प्रतिष्ठित वेवसाइट । कविताकोश में भी उपलब्ध हैं अतः उनके पन्ने पर इस काव्य-संग्रह का लिंक ... भी कविताकोश में जोड दिया गया है जिसे पढने के लिये इस लिंक पर क्लिक करते हुये पहुंचा जा सकता है ।

इस कविता-संग्रह को । हिन्दी विकीपीडिया पर उपलब्ध हिन्दी पुस्तकों की सूची में भी जोडा गया है जो अभी अपने प्रारंभिक स्वरूप में है ...
यदि आप चाहें तो स्वयं भी इसमें पठनीय सामग्रियों को जोड कर इसे और अधिक विकसित कर सकते हैं।
प्रकाशित काव्य संग्रह को आशीर्वाद देते पूज्यनीय पिता जी
आप को भारतीय नारी परिवार की ओर से नव वर्ष ''२०१२'' की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ ढेरों बधाइयाँ।
शुक्रवार, 16 दिसंबर 2011
तुम्हीं सो गये दास्तां कहते कहते....ब्लागर डा0 सन्ध्या गुप्ता जी के निधन पर विनम्र श्रद्वांजलि
वे विगत नवम्बर 2010 तक अपने ब्लाग पर सक्रिय रूप से लिखती रहीं फिर अचानक ब्लाग जगम में लगातार अनुपस्थित रही थी । इस अनुपस्थिति की बाबत अचानक अगस्त 2011 में एक दिन अचानक अपने ब्लाग पर‘फिर मिलेंगे’... नामक शीर्षक के छोटे से वक्तब्य के साथ प्रगट हुयी थीं तब उन्होने अवगत कराया था कि वे जीभ के गंभीर संक्रमण से जूझ रही थीं और शीघ्र स्वस्थ होकर लौट आयेंगी ।

सिदो कान्हु मुर्मू विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर हिंदी विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ.संध्या गुप्ता अब इस दुनियां में नहीं रही। पिछले कई माह से बीमार चल रही डॉ.गुप्ता ने गुजरात के गांधी नगर में आठ नवम्बर 2011 को सदा के लिए आंखें मूंद ली हैं। वह अपने पीछे पति सहित एक पुत्र व एक पुत्री को छोड़ गयी है। पुत्र प्रो.पीयूष यहां एसपी कॉलेज में अंग्रेजी विभाग के व्याख्याता है। उनके आकस्मिक निधन पर विश्वविद्यालय परिवार ने गहरा दुख प्रकट किया है। प्रतिकुलपति डॉ.प्रमोदिनी हांसदा ने 56 वर्षीय डॉ.गुप्ता के निधन पर शोक प्रकट करते हुए कहा कि दुमका से बाहर रहने की वजह से आखिरी समय में उनसे कुछ कहा नहीं जा सका इसका उन्हें सदा गम रहेगा। उन्होंने दिवंगत आत्मा की शांति के लिए ईश्वर से प्रार्थना करते हुए कहा कि हिंदी जगत ने एक अनमोल सितारा खो दिया है।
डॉ.गुप्ता को उनकी काव्यकृति 'बना लिया मैंने भी घोंसला' के लिए मैथिलीशरण गुप्त विशिष्ट सम्मान से सम्मानित किया गया था।
आज उन्हे श्रद्वांजलि स्वरूप प्रस्तुत है उनके ब्लाग पर नवम्बर 2010 को प्रकाशित उनकी कविता तय तो यह था...
तय तो यह था...
तय तो यह था कि
आदमी काम पर जाता
और लौट आता सकुशल
तय तो यह था कि
पिछवाड़े में इसी साल फलने लगता अमरूद
तय था कि इसी महीने आती
छोटी बहन की चिट्ठी गाँव से
और
इसी बरसात के पहले बन कर
तैयार हो जाता
गाँव की नदी पर पुल
अलीगढ़ के डॉक्टर बचा ही लेते
गाँव के किसुन चाचा की आँख- तय था
तय तो यह भी था कि
एक दिन सारे बच्चे जा सकेंगे स्कूल...
हमारी दुनिया में जो चीजें तय थीं
वे समय के दुःख में शामिल हो एक
अंतहीन...अतृप्त यात्राओं पर चली गयीं
लेकिन-
नहीं था तय ईश्वर और जाति को लेकर
मनुष्य के बीच युद्ध!
ज़मीन पर बैठते ही चिपक जायेंगे पर
और मारी जायेंगी हम हिंसक वक़्त के हाथों
चिड़ियों ने तो स्वप्न में भी
नहीं किया था तय!
नवभारत टाइम्स दैनिक ई पत्र पर श्रद्धांजलि के लिये क्लिक करें
तय तो यह था....विनम्र श्रद्वांजलि
और यह रही डा0 सन्ध्या जी की उनके ब्लाग पर दिनांक 18 सितम्बर 2008 को प्रकाशित पहली पोस्ट
बृहस्पतिवार, १८ सितम्बर २००८
कोई नहीं था.....
कोई नहीं था कभी यहां
इस सृष्टि में
सिर्फ
मैं...
तुम....और
कविता थी!
प्रस्तुतकर्ता sandhyagupta पर ८:३२:०० पूर्वाह्न
कोलाहल से दूर ब्लाग पर श्रद्धांजलि के लिये क्लिक करें
सचमुच
तय तो यह था कि
आदमी काम पर जाता
और लौट आता सकुशल
परन्तु ...
तुम्हीं सो गये दास्तां कहते कहते....
ईश्वर डा0 सन्ध्या गुप्ता जी को स्वर्ग में स्थान दे इसी हार्दिक श्रद्वांजलि के साथ......
गुरुवार, 17 नवंबर 2011
माननीय राष्ट्रपति भारतीय गणराज्य से स्व0 अमृता प्रीतम जी की विरासत को बचाने के लिये किये जा रहे अनुरोध अनुष्ठान

हिन्दू संस्कृति में जब कोई अनुष्ठान किया जाता है तो सर्वपृथम अनुष्ठान स्थल पर देवताओं का आह्वाहन करते हैं । इस अवसर पर देवताओं के साथ असुर आत्माओं का भी आह्वाहन करने की परंपरा रही है । कहा जाता है कि यदि इन्हें आंमंत्रण न दिया जाय तो ये स्वयं बिना बुलाये आकर अनुष्ठाान में बिध्न डालने आ जाती है । सम्मान पूर्वक पहले हे बुला लेने की दशा में अनुष्ठान में बिध्न की संभावना समाप्त हो जाती है। आज मुझे यह परंपरा इसलिये याद आयी क्योंकि माननीय राष्ट्रपति भारतीय गणराज्य से स्व0 अमृता प्रीतम जी की विरासत को बचाने के लिये किये जा रहे अनुरोध अनुष्ठान में ऐसे विध्नकारी तत्वो की आवाजाही लगातार बनी हुयी है ।
कुछ बानगी पेश हैंः.
********* ने कहा३
हां अशोक जी बिल्कुल मूर्खतापूर्ण मुहिम है ण्ण्ण्इस प्रकार तो सारा देश ही साहित्यिक धरोहर बन जायगाण्ण्ण्ण्ण्किसी साहित्य्कार की क्रितियां धरोहर हुआ करती हैंण्ण्ण्उनके मकान नहीं ण्ण्ण्
.********** ने कहा३ .
.यह उसी प्रकार की मूर्खता है जो राजघाटध् शक्ति स्थल पर सभी प्रधानमन्त्रियों के स्थल बनाकर की जारही हैण्ण्ण्इस प्रकार सारी दिल्ली कब्र्गाह बन जायगीण्ण्ण्ण्बन्द कीजिये ये व्यर्थ की चौंचले बाजी ण्ण्ण्ण्
********** ने कहा३
अशोक शुक्ला जी / क्या सोच कर आपने ये नेक सलाह दे डाली. मैंने केवल नारी.पक्ष को रखा तो दूध ही बना डाला और आपको बताऊँ तथाकथित पुरुष जो होते हैं ऐसे बिल्ला होते हैं जिनपर हमेशा कीड़े.मकोड़े ए मक्खियाँ ही भिनभिनाया करते हैंण- आप भी नारी.विमर्श करके अपनी रोटी ही तो सेंकने पर लगे हुए हैंण. जरा अपने अन्दर झाँका भी कीजिय
********** ने कहा३
. यह ओछी मनोव्रित्ति आज के व्यापारी साहित्य्कार की है------ण्ण्ण्ण्क्या प्रेम्चन्द या अम्रता का मकान नष्त होजाने से समाज में उनकी मौजूदगी उनका काल्जयी साहित्य नष्ट होजायगा ----
...छोडये ये व्यर्थ की बातें -----हित्य रचिये-----ण्ण्ण्कहिये -----ण्ण्ण्छ----पवाइये----ण्ण्ण्ण्ण्---बिना किसी भी लाभ की सोच के-----ण्ण्ण्
********** ने कहा३
...वैसे ये अम्रता..इमरोज़ है कौन ?
********** ने कहा३
हर चीज़ नाशवान है ! ३अपने वश में है उतना तो हम अफ़सोस करें ए बाकी चिंता परमात्मा पर छोड़दें तो बेहतर नहीं होगा घ् माफ़ करें ए अगर मैं आपकी भावनाओं को ठेस पहुंचा रहा हूं ३
३और अब जब मकान ढह ही चुका है ए वहां किसी प्रयास से फिर वहां वैसा ही मकान बना भी दिया जाए ; जिसकी संभावना है भी नहीं द्ध तो भी वह बात तो बननी नहीं न !
********** ने कहा३
सच भी है . अपने आप का पता और कोई नहीं होता ए अपना आप ही होता है------बाकी नश्वर चीज़ों में किसी का अस्तित्व तलाशना ए और ख़ुद को तबाह करके तलाशना सही नहीं ।
आपसे अपनत्व महसूस होने के कारण कह रहा हूं ३
ख़ुद को संभालें ३
********** ने कहा३
लेकिन इमरोज़ ने जो फैसला लिया ए वो सोच समझ कर ही लिया होगा ण्
इस नश्वर संसार में किसी भी वस्तु से मोह नहीं पालना चाहिए ए यह गीता का उपदेश है ण्
यादें दिल में रहेंगी ..लेकिन उस मकां की नहीं ए उन पलों की जो एक साथ गुजारे गए ण्
आपकी कोमल भावनाओं को ठेस न पहुंचेए यही कामना है
********** ने कहा३
क्या कवि. साहित्यकार ण्ण्ण्नामए याद रखे जाने के लिये लिखते हैंण्ण्ण्क्या कभी किसी साहित्य्कार ने स्वयं यह कहा घ्घ्घ्घ्घ्
********** ने कहा३
महज़ ईंट पत्थर गारे से घर नहीं बनता और उनके मिट जाने से मिटता भी नहींण्ण्ण्घर घरवालों से बनता हैण्ण्ण्इमरोज़ जी ने क्या खूब कहा हैरू.
********** ने कहा३
आप भी नारी.विमर्श करके अपनी रोटी ही तो सेंकने पर लगे हुए हैं.
********** ने कहा३
जिस्म गयाए जान गयी एरूह गयी
अब ईंट. पत्थरों को समेटने से क्या होगा
मै तो फ़िज़ा के जर्रे जर्रे मे बिखर गयी
अब मिट्टी को खंगालने से क्या होगा
********** ने कहा३
साहित्यकार और लेखको ने आज तक समाज का उत्थान कम किया है और पतन ज़्यादा | अस्तु इनकी संख्या भी आजकल काफ़ी बढ़ गयी है हर एक कस्बे मे दस बारह धरोहर बन जाएँगी |
********** ने कहा३
राष्ट्रपति को अपना काम करने दो बेटा ऐसे फ़िजूल मे अगर उसको उलझाओगे तो महत्वपूर्ण कार्य अटक जाएँगे |
********** ने कहा३
क्या राष्ट्रपति के पास कोई काम नही होता ? इस विशाल भारत मे अनेको लेखिकाए और लेखक हुए है और उनके मूरीद भी बड़ी संख्या मे है तो क्या राष्ट्रपति पूरे पाँच साल इन्ही स्मारको के पीछे भागता रहे ?
********** ने कहा३
पता नही क्या हो गया है आजकल के लड़के लड़कियो को चार आखर क्या पढ़ लेते है नाम के लिए कुछ ना कुछ शगूफा करते ही रहते है |
********** ने कहा३
बेटी, कोई ढंग का काम करो |बाबा का आशीर्वाद तुम्हारे साथ है | अमृता प्रीतम को छोड़ दो उसके आशिको के भरोसे |
तमाम विध्न बाधाओ के बाद भी अनेक साहित्य प्रेमी इस मुहिम से जुडे है माननीय राष्ट्रपति के कार्यालय से मुझे एक मेल आया है जिसमे लिखा है कि स्वयं राष्ट्रपति सचिवालय इस प्रकरण को देख रहा है । मेरा विश्वाश है कि हमें शीध्र ही कुछ न कुछ सार्थक परिणाम मिलेंगें। कृपया अपना उत्साह बनाये रखें ।
यह है हमारी मुहिम
1ः-स्व0 अमृता प्रीतम जी के निवास स्थान 25 हौज खास के परिसर को सांस्कृतिक धरोहर के रूप में अधिग्रहीत करते हुये उस स्थान पर स्व0 अमृता प्रीतम जी की यादो से जुडा एक संग्रहालय बनाया जाय।
2ः-यदि किन्ही कारणों से उपरोक्तानुसार प्रार्थित कार्यवाही अमल में नहीं लायी जा सकती तो कम से कम यह अवश्य सुनिश्चित किया जाय कि संदर्भित स्थल 25 हौज खास पर बनने वाले इस नये बहुमंजिला भवन का नाम स्व0 अमृता प्रीतम के नाम पर रखते हुये कमसे कम इसके एक तल को स्व0 अमृता प्रीतम के स्मारक के रूप में अवश्य संरक्षित किया जाय।
कृपया एक पहल आप भी अवश्य करें
भवदीय
डा0अशोक कुमार शुक्ला !
शुक्रवार, 11 नवंबर 2011
11.11.11 को 11.11 बजे कुल 11 कडियों की सहायता से स्व0 अमृता प्रीतम की धरोहर को बचाने की मुहिम

इसी तरह कडी दर कडी जुडते हुये बच जायेगी स्व0 अमृता प्रीतम की धरोहर स्व0 अमृता प्रीतम जी के निवास के25 हौज खास को बचाकर उसे राष्ट्रीय धरोहर के रूप में संजोने के लिये अनेक साहित्य प्रेमियों द्वारा माननीय राष्ट्रपति भारतीय गणराज्य एवं दिल्ली सरकार से अनुरोध किया है। ऐसा विश्वास है कि इस मुहिम का असर अवश्य ही होगा । फिलहाल इस मुहिम में शामिल लोगों के प्रयासों का हाल लिंक के रूप में आप सबके साथ साझा कर रहा हूँ साथ ही यह भी उम्मीद करूँगा कि आप भी अपना अमूल्य सहयोग देकर इस मुहिम को आगे बढाते हुये महामहिम से इस प्रकरण में हस्तक्षेप का अनुरोध अवश्य करेंगें।

अमृता जी का पुराना घर जिसकी नेम प्लेट उनकी कलात्कता को दर्शाती है
1 मुहिम की शुरूआत करने के लिये हरकीरत ‘हीर’ जी के ब्लाग मुहिम का लिंक है
बिक ही गया अमृता का मकान!!!!
2 इस मुहिम के बाद महामहिम को भेजे गये पत्र की प्रति और राष्ट्रपति भारतीय गणराज्य के कार्यालय द्वारा एक सप्ताह के उपरांत कृत कार्यवाही जानने संबंधी ब्लाग कोलाहल से दूर पर इस मुहिम का लिंक है
कोलाहल से दूर
!!

अमृताजी की तस्बीरो की नुमाइश लगा बैठे ये हैं इमरोज
3 विक्षुब्ध होकर नामक ब्लाग पर
रोमेन्द्र सागरजी के द्वारा भी एक लिंक दिया गया है।!!
4 भारतीय नारी ब्लाग पर ही सुश्री शिखा कौशिक द्वारा चलायी गयी मुहिम का लिंक है!!!!

यह रही राष्ट्रपति भवन की शिकायत प्राप्ति रसीद
5 महामहिम राष्ट्रपति भारतीय गणराज्य को भेजे गये पत्र के साथ
भारतीय नारी ब्लाग पर इन पंक्तियों के लेखक द्वारा प्रारंभ की गयी मुहिम का लिंक है
6 ‘भारतीय ब्लाग समाचार’ नामक ब्लाग पर
सुश्री शिखा कौशिक द्वारा प्रारंभ की गयी मुहिम का लिंक है

और यह रही धूल धूसरित मकान की आज की सूरत
7 डेली न्यूज पत्रिका खुशबू ने अपनी पत्रिका में
अमृता जी की विरासत को बचाने के लिये चलायी गयी मुहिम का लिंक है

8 अमृता प्रीतम की याद में नामक ब्लाग पर
रंजना रंजू भाटिया जी द्वारा अमृता जी की विरासत को बचाने के लिये चलायी गयी मुहिम का लिंक है
9 अनन्या नामक ब्लाग पर सुश्री अंजू जी द्वारा भी इस मुहिम को चलाया गया है जिसका लिंक है

चित्र अंजू जी के ब्लाग से साभार
10 हिन्दी के लोकप्रिय दैनिक नवभारत टाइम्स पर भी इस संबंध में मुहिम चलायी गयी है पहले इन पंक्तियों के लेखक द्वारा चलायी गयी मुहिम का लिंकजिसका लिंक है
और अब लीजिये नवभारत टाइम्स पर सुश्री शिखा कौशिक द्वारा चलायी मुहिम का लिंक
11 कृपया एक पहल आप भी अवश्य करें महामहिम राष्ट्रपति जी का लिंक यहां है ।!!!!
कृपया एक पहल आप भी अवश्य करें महामहिम 11.11.11 को 11.11 बजे कुल 11 कडियों की सहायता से स्व0 अमृता प्रीतम की धरोहर को बचाने की मुहिम !
सोमवार, 7 नवंबर 2011
स्व0 अमृता प्रीतम की सांस्कृतिक विरासत को बचाने के लिये भारत के राष्ट्रपति को एक पत्र

यह रही राष्ट्रपति भवन की शिकायत प्राप्ति रसीद
सेवा में
श्रीमान महामहिम भारत के राष्ट्रपति
भारतीय गणराज्य
राष्ट्रपति भवन
नई दिल्ली, भारत
द्वाराः- उचित माध्यम जिलाधिकारी लखनऊ (अग्रिम प्रति ई मेल द्वारा प्रेषित)
विषयः स्व0 अमृता प्रीतम के निवास स्थान को सांस्कृतिक स्मारक के रूप में संरक्षित करने विषयक।
आदरणीय महोदय,
अति विनम्रतापूर्वक अबगत कराना है कि विभिन्न ब्लागों पर प्रकाशित आलेखों तथा समाचार पत्रों में प्रकाशित समाचारों के माध्यम से अभी हाल ही में यह ज्ञात हुआ है कि हिंदी एवं पंजाबी भाषा की महान लेखिका स्व0 अमृता प्रीतम जी का नई दिल्ली हौज खास स्थित वह भवन जिसमें वे अपनी मृत्यु पर्यन्त निवास करती रही थी वर्तमान के किसी भवन निर्माता द्वारा बहुमंजिली इमारत बनाने के उद्देश्य से तोड दिया गया है।
उत्तर प्रदेश में स्व0 मुशी प्रेमचन्द जी का जन्म स्थान लमही हो अथवा उत्तराखंड के स्व0 सुमित्रानंदन पंत जी का जन्म स्थान कौसानी , इसे संबंधित सरकारों ने न केवल राष्ट्रीय विरासत के रूप में संजोया है अपितु समय समय पर इन सांस्कृतिक विरासतो के प्रति यथानुसार शासकीय सम्मान भी प्रदर्शित किया जाता है।
पंजाबी भाषा तथा हिंदी में रचित स्व0 अमृता प्रीतम जी के साहित्य में ‘दिल्ली की गलियां’(उपन्यास), ‘एक थी अनीता’(उपन्यास), काले अक्षर, कर्मों वाली, केले का छिलका, दो औरतें (सभी कहानियां 1970 के आस-पास) ‘यह हमारा जीवन’(उपन्यास 1969 ), ‘आक के पत्ते’ (पंजाबी में बक्क दा बूटा ),‘चक नम्बर छत्तीस’( ), ‘यात्री’ (उपन्यास1968,), ‘एक सवाल (उपन्यास ),‘पिधलती चट्टान(कहानी 1974), धूप का टुकडा(कविता संग्रह), ‘गर्भवती’(कविता संग्रह), आदि प्रमुख हैं जिन्हे पंजाब राज्य सरकार तथा भारत सरकार के संस्किृति विभाग द्वारा समय समय पर विभिन्न सम्मानों से भी अलंकृत किया गया है।
स्व0 अमृता प्रीतम जी की रचनाओं के संबंध में हमारे पडोसी देश नेपाल के उपन्यासकार धूंसवां सायमी ने 1972 में लिखा था किः-‘‘ मैं जब अम्रता प्रीतम की कोई रचना पढता हूं, तब मेरी भारत विरोधी भावनाऐं खत्म हो जाती हैं।’’
हिन्दुस्तान की साहित्यिक बिरादरी की ओर से मैं महोदय को इस अपेक्षा से अवगत कराना चाहता हूँ कि ऐसी महान साहित्यकार के निवास स्थान को उनकी मृत्यु के उपरांत साहित्यिक धरोहर के रूप में संजोना चाहिये था परन्तु यह सुनाई पडा है कि स्व0 अमृता जी के इस भवन को बच्चों की जरूरत के नाम पर किसी भवन निर्माता को बेच दिया गया है।
कोई भी जरूरत सांस्कृतिक विरासत से बडी नहीं हो सकती अतः इस संबंध में महोदय से विनम्र प्रार्थना है कि इस प्रकरण में महामहिम को हस्तक्षेप करने की आवश्यकता है तथा उसे अपने स्तर से दिल्ली राज्य की सरकार को निम्न प्रकार के निर्देश देने चाहिये:-
1ः-स्व0 अमृता प्रीतम जी के निवास स्थान 25 हौज खास के परिसर को सांस्कृतिक धरोहर के रूप में अधिग्रहीत करते हुये उस स्थान पर स्व0 अमृता प्रीतम जी की यादो से जुडा एक संग्रहालय बनाया जाय।
2ः-यदि किन्ही कारणों से उपरोक्तानुसार प्रार्थित कार्यवाही अमल में नहीं लायी जा सकती तो कम से कम यह अवश्य सुनिश्चित किया जाय कि संदर्भित स्थल 25 हौज खास पर बनने वाले इस नये बहुमंजिला भवन का नाम स्व0 अमृता प्रीतम के नाम पर रखते हुये कमसे कम इसके एक तल को स्व0 अमृता प्रीतम के स्मारक के रूप में अवश्य संरक्षित किया जाय।
हिन्दुस्तान की उस साहित्यिक बिरादरी की ओर से प्रार्थी सदैव आभारी रहेगा जिसके पास अपनी बात रखने के लिये बडे बडे फोरम या बैनर नहीं है।
महामहिम महोदय द्वारा हिन्दुस्तानी सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिये किये गये इस कार्य के लिये सदैव कृतज्ञ रहेगा।
प्रार्थी /भवदीय
(अशोक कुमार शुक्ला)
‘तपस्या’ 2/614 सेक्टर एच’
जानकीपुरम्, लखनऊ
(उत्तर प्रदेश)
ईमेल: mailto:%20aahokshuklaa@gmail.com
और एक अपील
आदरणीय पाठकगण
प्रेम की उपासक अमृता जी उनकी सांस्कृतिक विरासत को बचाये रखने के लिये कोई अभियान अवश्य चलायें। पहली पहल करते हुये भारत के राष्ट्रपति को प्रेषित अपने पत्र की प्रति आपको भेज रहा हूँ । उचित होगा कि आप एवं अन्य साहित्यप्रेमी भी इसी प्रकार के मेल भेजे । अवश्य कुछ न कुछ अवश्य होगा इसी शुभकामना के साथ महामहिम का लिंक है
महामहिम राष्ट्रपति जी का लिंक यहां है । कृपया एक पहल आप भी अवश्य करें!!!!
महामहिम राष्ट्रपति जी का लिंक यहां है । कृपया एक पहल आप भी अवश्य करें!!!!
शनिवार, 5 नवंबर 2011
वाह रे वाह! इमारोज ! यह तूने क्या किया ? अमृता का घर बिक गया !

अमृता जी का पुराना घर जिसकी नेम प्लेट उनकी कलात्कता को दर्शाती है
हरकीरत हीर जी के ब्लाग से पता चला कि अमृता जी का हौज खास वाला घर बिक गया है। विस्तार से पढने पर जाना घर बिका ही नहीं घूल घूसरित भी हो चुका है। इमरोज जी ने इस बात की दिलासा दी है कि अमृता जी की यादों से जुडी तस्बीरें और अन्य सारी चीजें वे अपने साथ ले जाये है साथ ही मकान को बेचने का कारण बच्चों को पैसे की जरूरत बताया।
वाह रे इमरोज! पैसों की चाहे जैसी भी जरूरत क्यों न रही हो , अमृता जी से जुडी से जुडी इस विरासत को बेचने में तुम्हे कोई तकलीफ नहीं हुयी? फिर तुम कैसे दावा करते थे कि अमृता तो अब भी इसी घर में बसती है और वह तुम्हारे लिये मरी नहीं है।तुमने साबित कर दिया है कि तुमने हमेशा अमृताजी का उपयोग स्वार्थ के लिये ही किया। चाहे वे जीवित रही हों या अब उनके मरने के बाद ।

अमृताजी की तस्बीरो की नुमाइश लगा बैठे ये हैं इमरोज
अपनी जीवनी में अमृता जी के द्वारा लिखे हुये शब्द यह हकीकत खुद ही बयाँ कर रहे हैं
......
1964 में जब इमरोज ने हौज खास में रहने के लिये पटेलनगर का मकान छोडा था तब अपने नौकर की आधी तनख्वाह देकर उसके पास एक सौ और कुछ रूपये बचे थे । पर उन दिनो उसने एक एडवरजाइजिंग फर्म में नौकरी कर ली थी, बारह तेरह सौ वेतन था, इसलिये उसे कोई चिंता भी नहीं थी। पर एक दिन - दो तीन महीने बाद - उसने लाउड-थिंकिंग के तौर पर मुझसे कहा था -‘मेरा जी करता है, मेरे पास इस हजार रूपया हो, ताकि जब भी जी में आये नौकरी छोड सकूँ।’ मंहगाई बढ रही थी पर इसकी कही हुयी बात , मेरा जी करता था पूरी हो जाय।
तुम्हे याद होगा इमरोज कि तुम्हारी इस ख्वाइश को पूरा करने में तब भी अमृता जी ने तुम्हारी मदद की थी और ग्रीन पार्क में किराये का मकान लेकर बाटिक का तजुर्बा शुरू किया था और इसका हश्र पुनः यहाँ लिखने की जरूरत नहीं है।
आज अमृता जी को बिदा हुये छः बरस पूरे हो चुके है तो फिर बच्चों को पैसे की जरूरत के नाम पर हौज खास के मकान का सौदा करने में भी तुम्हे कोई हिचक नहीं हुयी?
तुम कैसे परजीवी हो इमरोज जो अमृता की मौत के बाद भी विरासत के रूप में छोडे गये उसके घर पैसे की जरूरत के नाम पर बेच सकते हो।

और यह रही धूल धूसरित मकान की आज की सूरत
वाह रे इमरोज! मेरे पास शब्द नहीं है पंजाब की संस्कृतिक विभाग और तुम्हें कोसने के लिये। कोई भी जरूरत सांस्कृतिक विरासत से बडी नहीं हो सकती।
आदरणीय इमरोज जी आप मुन्शी प्रेमचन्द्र का लमही हो या सुमित्रानंदन पंत का कौसानी कभी देखना जाकर इन जगहों को कैसे रहेजकर रखी गयी हैं इन साहित्यकारों से जुडी वस्तुये और उनके निवास स्थान को?
आदरणीय इमरोज जी आप अमृता जी के सच्चे दोस्त तो नहीं अमृता के नाम पर जीने वाले सच्चे परजीवी अवश्य साबित हुये हो सो आपसे क्या उम्मीद करूँ? मुझे तो लगता है कि आप कल अमृता जी से जुडी वस्तुओं की नीलामी करते हुये भी नजर आ सकते हैं। इसलिये अमृताजी के नाम पर चलने वाली अनेक संस्थाओं तथा इनसे जुडे तथाकथित साहित्यिक लोगों से उम्मीद करूँगा कि वे आगे आकर हौज खास की उस जगह पर बनने वाली बहु मंजिली इमारत का एक तल अमृताजी को समर्पित करते हुये उनकी सांस्कृतिक विरासत को बचाये रखने के लिये कोई अभियान अवश्य चलायें। पहली पहल करते हुये भारत के राष्ट्रपति और पंजाब सरकार के संस्कृति सचिव को मै इस संदर्भ में एक पत्र अवश्य भेज रहा हुँ।
एक पहल आप भी अवश्य करें!!
महामहिम राष्ट्रपति जी का लिंक यहां है । कृपया एक पहल आप भी अवश्य करें!!!!
शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2011
मेरे अनुभव (Mere Anubhav): एक बार फिर हैवानों की हैवानियत ने किया इंसानियत को...

मैने कुछ दिन पहले (भारतीय नारी ब्लाग के सितम्बर माह के विषय ‘मादा भ्रूण हत्या’ को समर्पित एक प्रश्नावली ) पंक्तियां लि
खी थीं
चीखों जैसी किलकारियां
आज pallavi ji ke
मेरे अनुभव ब्लाग पर
एक पोस्ट देखकर बरबस ही उन किलकारियों की आवाज इस पोस्ट से आती हुयी प्रतीत हुयी सो इसके लिंक को आपके साथ साझा कर रहा हूँ
आखिर क्यों ?
किसी एक का सृजन पूज्य है
और दूसरे का त्याज्य ?
किसी का निर्माण वरदान सा हैं
और दूसरे का अभिशप्त !
मेरे अनुभव (Mere Anubhav): एक बार फिर हैवानों की हैवानियत ने किया इंसानियत को...: आप सभी को याद हो अगर तो मैंने बहुत दिनों पहले एक पोस्ट लिखी थी। जिसका शीर्षक था मरती हुई भावनायें। आज यह तस्वीर जो आप ऊपर देख रहे है उस को ...
शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2011
तिरस्कृत होती ‘‘भारतीय नारी’’ में महिलाओं का योगदान भाग -2
जैसा कि इस सामूहिक ब्लाग पर अंकित था भारतीय नारी के सरोकारों से संबंधित कोई भी सदस्य इसमें प्रतिभाग करने हेतु सदस्यता आवेदन कर सकता था और उसे व्यवस्थापिका महोदया द्वारा सदस्यता लिंक भी प्रेषित किये गये।
इस प्रकार इस सामूहिक चिट्ठे से कुल 34 योगदानकर्ता जुडे जिनमें से 19 महिला सदस्या थी ं और 15 पुरूष सहयोगी। हम पिछली पोस्ट में यह जान चुके है कि इससे जुडने वाले 15 पुरूष सहभागियों में से 12 ने अलग अलग समय पर कोई न कोई पोस्ट लिखकर इस सामूहिक ब्लाग में अपना सक्रिय योगदान दिया परन्तु तीन पुरूष योगदानकर्ता ऐसे रहे जिन्होंने ब्लाग में योगदानकर्ता के रूप मे जुडने के बाद अपने कर्तब्य /नैतिक उत्तरदायित्व की इतिश्री समझ ली।
आज चर्चा कर रहे हैं इस सामूहिक ब्लाग से जुडने वाली महिला योगदानकर्ताओ की और उनकी कारस्तानियों की।
इस सामूहिक ब्लाग से जुडने वाली कुल महिलाओं की संख्या 19 है जिसमें से मात्र 7 महिलाओं ने ही इसमें जुडने के बाद इसमें कभी न कभी कोई पोस्ट अथवा टिप्पणी देकर अपना सक्रिय योगदान अंकित कराया है । शेष 12 महिला योगदानकर्ताओं के द्वारा अब तक इसमें कोई भी पोस्ट नहीं लगायी है अतः उनका योगदान मात्र इस ब्लाग से जुडने भर तक ही सीमित रहा है। इसके बाद उन्होंने भी अपने कर्तब्य /नैतिक उत्तरदायित्व की इतिश्री समझ ली।
यह आवश्यक नहीं है कि आप किसी सामूहिक चिट्ठे पर नयी पोस्ट लगाकर ही उसमें सहयोग करें । आप प्रकाशित पोस्टों पर टिप्पणी के रूप में अपने अभिमत अंकित करते हुये भी उसके विकास में सहयोग कर सकते हैं परन्तु इस मोर्चे पर भी ये बारह महिला साथी कभी नहीं दिखलाई पडी है।
इस प्रकार आंकडों के आधार पर यह तथ्य स्वतः सिद्ध है कि इस सामूहिक ब्लाग पर इसके जन्म के समय से ही इससे जुडने वाली कुछ महिला योगदानकर्ताओं ने इसे तिरस्कृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया है।
भारतीय नारी ब्लाग से जुडने वाली कुछ महिला योगदानकर्ताओं में नैतिकता की यह सीमा है कि कुछ ब्लागरों की अनेक शोधपूर्ण प्रयासों से संग्रहीत सामग्री की कापी पेस्टिंग करते हुये अपने निजी ब्लाग पर गौरवपूर्ण ढंग से नयी पोस्ट लिखी और उसमें मूल योगदानकर्ताओं द्वारा किये गये श्रम की महत्ता को सम्मानित करने के उद्देश्य से उस सामग्री संग्रहकर्ता का नाम तक लिखना उचित नहीं समझा। ( अनावश्यक विवाद को टालने के उद्देश्य से उनके नाम का अंकन नहीं कर रहा हूँ इस ब्लाग पर विख्यात महिला लेखिकाओं के संबंध में किश्तों में लिखे मेरे आलेखों की टिप्पणियों में आपको इसका आभास हो जायेगा )
इस ब्लाग की स्थापना के तुरंत बाद माह अगस्त के लिये व्यवस्थपकों द्वारा ‘मेरी बहन’ विषय निर्धारित किया गया और माह सितम्बर के लिये महिला भ्रूण हत्या सहित अनेक विषय निर्धारित किये गये । प्रारंभिक सक्रियता के कारण इस ब्लाग की सौ पोस्ट बहुत कम समय में ही जारी हो गयी ं परन्तु योगदानकर्ताओ की निरन्तर बढती उदासीनता के कारण माह सितम्बर में निर्धारित विषय पर सामग्री का ही अभाव रहा।
आज उदासीनता की स्थिति यह है कि माह अक्टूबर का भी लगभग एक सप्ताह ब्यतीत हो चुका हे परन्तु अब तक इस माह के विषय का चयन /निर्धारण भी नहीं हो सका है। आज भी ब्लाग के मुख पृष्ठ पर अगस्त और सितम्बर माह के विषय की ही चर्चा दिखलायी पडती है।
इन सारे तथ्यों का ब्यौरा देने का आशय मात्र इतना है कि आप सभी योगदानकर्ताओ ने जिस उत्साह के साथ 23 जुलाई 2011 को इस ब्लाग को जन्म दिया था उस शिशु की उम्र अभी मात्र ढाई माह की है । किसी भी ढाई माह के शिशु की देखभाल में अगर इतनी कोताही बरती जायेगी तो निश्चित ही उस नवजात का भविष्य प्रश्नों के घेरे में ही रहेगा।
यह सत्य है कि किसी नवजात शिशु की देखभाल करने का प्रथम दायित्व उसके जन्तदाता का ही होता है परन्तु जन्मदाता की व्सस्तता या अन्य कार्यो से निजात न पाने का खामियाजा नवजात शिशु से भरवाने की बजाय किसी केयर टेकर की ब्यवस्था करना मुझे तो उचित जान पडता है।
अतः यह मेरी सहृदय इच्छा है कि किसी वािश्ठ सम्मानित महिला ब्लागर को इस ब्लाग के ब्यवस्थापकीय अधिकार प्रदान करते हुये ‘भारतीय नारी ’ नामक इस नवजात शिशु की परवरिष सुचारू रूप से करने की व्यवस्था की जाय अन्यथा यह नवजात ‘भारतीय नारी’ नामक ब्लाग भी भारतीय ब्लाग जगत में लावारिस के बिखरे पडे सैकडों नवजात ब्लागों की गति को प्राप्त हो सकता है।
ईश्वर करे ऐसा न हो! इसी शुभकामना के साथ विश्वाश करता हूँ कि पूर्व मे अंकित सुझाओं की ओर कोई न कोई महिला ब्लागर योगदानकर्ता अवश्य विचार करेगी।
आमीन!!
बुधवार, 5 अक्टूबर 2011
तिरस्कृत होती ‘‘भारतीय नारी’’ में पुरूषों का योगदान भाग -1
सुश्री शिखा जी तिलमिलाकर रह गयीं और उन्होने ऐसी महिला मानसिक रोगियों का इलाज करने के लिये ‘भारतीय नारी ’ नामक एक नये अस्पताल की नींव 23 जुलाई 2011 को रखी और उसमें भरती होने वाली पहली मरीज थी ‘पूनम पाण्डे से पूछे गये कुछ प्रश्न’।
जैसा कि इस सामूहिक ब्लाग पर अंकित था भारतीय नारी के सरोकारों से संबंधित कोई भी सदस्य इसमें प्रतिभाग करने हेतु सदस्यता आवेदन कर सकता था और उसे व्यवस्थापिका महोदया द्वारा सदस्यता लिंक भी प्रेषित किये गये।
इस प्रकार इस सामूहिक चिट्ठे से कुल 34 योगदानकर्ता जुडे जिनमें से 19 महिला सदस्या थी ं और 15 पुरूष सहयोगी। यह स्वाभाविक सा तथ्य है कि किसी भी सामूहिक चिट्ठे से जुडने के उपरांत उसके उत्थान ,प्रसार और गुणवत्ता में सक्रिय सहयोग हेतु प्रत्येक सदस्य का एक समान नैतिक उत्तरदायित्व निर्धारित होता है।
इस प्रकार का नैतिक उत्तरदायित्व निर्वहन करते हुये 15 पुरूष सहभागियों में से 12 ने अलग अलग समय पर कोई न कोई पोस्ट लिखकर इस सामूहिक ब्लाग में अपना सक्रिय योगदान दिया। हांलांकि प्रारंभ में कुछ एक अवसर ऐसे आये जब भारतीय नारी को समर्पित इस ब्लाग पर प्रकाशित इं0 सत्यम शिवम के आलेख आज स्त्री बस वासना की पूर्ति भर है क्या? पर प्रकाशित चित्रों को लेकर वरिष्ठ ब्लागर श्रीयुत दिनेशरायजी द्विवेदी जी द्वारा अपना आर्शिवाद देते समय कुछ ऐसी शब्दावली का प्रयोग किया जो व्यंग्यात्मक सी होने के साथ गहन विचारयुक्त थी। देखेंः-
इस तरह के चित्रों से इस पोस्ट को सुसज्जित करने के आप के साहस को प्रणाम है?
बस इस अर्शिवाद के बाद आदरणीय दिनेशराय जी द्विवेदी फिर कभी इस ब्लाग पर अपना आर्शिवचन देने नहीं आये।
इसी तरह भारतीय नारी पर प्रकाशित नारी देह ब्यापार पर प्रकाशित एक पोस्ट के साथ लगे एक पुलिस महिला के साथ मुहँ छिपाये देह ब्यापार में लिप्त महिलाओं के चित्र पर महिलाओं के सम्मान को बनाये रखने के उद्देश्य से कुछ आलोचनात्मक टिप्पणियां मैने भी की जिसपर इस ब्लाग की संस्थापक सहित अन्य सुधी पाठकों का सहयोग माँगा परन्तु किसी भी महिला अथवा नारी सम्मान के फरमाबरदारों का कोई संदेश अथवा टिप्पणी नहीं मिली अपितु सम्मानित लेखक महोदय जी ने यह कहा कि मैं उन पुरूषों के चित्र हासिल करूं जो इस ब्यवसाय में लिप्त हैं उन्हें भी स्थान दिया जायेगा।
अपेक्षकृत कुछ कडे शब्दो में प्रतिउत्तर भी प्राप्त हुये। मेरा मानना यह था कि यह सब इस ब्लाग के गुणात्मक विकास के लिये आवश्यक था सो समयानुसार घटित हो रहा था।
इस सामूहिक ब्लाग से जुडे 3 पुरूष साथियों ने इसमें जुडने के बाद अब तक कोई भी पोस्ट इसमें नहीं लगायी है अतः उनका योगदान मात्र इस ब्लाग से जुडने भर तक ही सीमित रहा।
यह आवश्यक नहीं है कि आप किसी सामूहिक चिट्ठे पर नयी पोस्ट लगाकर ही उसमें सहयोग करें । आप प्रकाशित पोस्टों पर टिप्पणी के रूप में अपने अभिमत अंकित करते हुये भी उसके विकास में सहयोग कर सकते हैं परन्तु इस मोर्चे पर भी ये तीन पुरूष साथी कभी नहीं आये ।
इस प्रकार इस सामूहिक ब्लाग पर इसके जन्म के समय से ही इससे जुडने वाले कुछ पुरूष योगदानकर्ताओं ने इसे तिरस्कृत ही किया है ।
आज की चर्चा को यही विराम देते हुये अवगत कराना चाहता हूँ कि अगली चर्चा इस सामूहिक ब्लाग से जुडने वाली महिला योगदानकर्ताओ की होगी जिसमें उनके सक्रिय सहयोग का भी आकलन प्रस्तुत किया जायेगा ।
रविवार, 11 सितंबर 2011
दो सौ वर्षों की प्रतीक्षा के बाद जन्मी एक सन्यासिन !
क्या आप जानते हैं कि उत्तर प्रदेश के जनपद फर्रूखाबाद के एक संपन्न परिवार की सात पीढियों में दो सौ वर्षों तक किसी कन्या का जन्म नहीं हुआ था। 24 मार्च 1907 को जब बाबू बाँके बिहारी वर्मा के घर पर पौत्री के रूप में जब एक नवजात बालिका की किलकारी गूँजी तो उनकी प्रसन्नता का ठिकाना न रहा क्योंकि इस परिवार में किसी बालिका के जन्म पूरे दो सौ साल बाद हुआ था। उन्होंने इस बालिका को अपने घर की सबसे बडी देवी माना इसी लिये उसे नाम दिया ‘महादेवी’।
पिता श्री गोविन्द प्रसाद वर्मा और माता हेमरानी देवी की इस पुत्री की शिक्षा पाँच वर्ष की अवस्था में इंन्दौर के मिशन स्कूल से प्रारंभ हुयी । परन्तु तद्समय प्रचलित सामाजिक व्यवस्था के अनुसार सन् 1916 में नौ वर्ष की आयु पूरी होने तक इनके बाबा श्री बाँके बिहारी द्वारा इनका विवाह संम्पन करा दिया गया। जब इनका विवाह हुआ तो ये विवाह का अर्थ भी नहीं समझती थीं। उन्होंने इसके संबंध में अपने ही शब्दों में लिखा हैः-
‘‘दादा ने पुण्य लाभ से विवाह रच दिया, पिता जी विरोध नहीं कर सके। बरात आयी तो बाहर भाग कर हम सबके बीच खड़े होकर बरात देखने लगे। व्रत रखने को कहा गया तो मिठाई वाले कमरे में बैठ कर खूब मिठाई खाई। रात को सोते समय नाइन ने गोद में लेकर फेरे दिलवाये होंगे, हमें कुछ ध्यान नहीं है। प्रात: आँख खुली तो कपड़े में गाँठ लगी देखी तो उसे खोल कर भाग गए।**

ममता बिखेरती सन्यासिन महादेवी वर्मा (चित्र कविताकोश से साभार)
महादेवी वर्मा पति.पत्नी सम्बंध को स्वीकार न कर सकीं। कारण आज भी रहस्य बना हुआ है। आलोचकों और विद्वानों ने अपने.अपने ढँग से अनेक प्रकार की अटकलें लगायी हैं। महादेवी जी के जीवन के उत्तरार्ध में उनकी सेवा सुसुश्रा करने वाले श्री गंगा प्रसाद पाण्डेय के अनुसार.
’’ससुराल पहुँच कर महादेवी जी ने जो उत्पात मचायाए उसे ससुराल वाले ही जानते हैंण्ण्ण् रोनाए बस रोना। नई बालिका बहू के स्वागत समारोह का उत्सव फीका पड़ गया और घर में एक आतंक छा गया। फलतरू ससुर महोदय दूसरे ही दिन उन्हें वापस लौटा गए। ’’
1916 में विवाह के कारण कुछ दिन तक महादेवी जी की शिक्षा स्थगित रही। विवाहोपरान्त महादेवी जी ने 1919 में बाई का बाग स्थित क्रास्थवेट कॉलेज इलाहाबाद में प्रवेश लिया और कॉलेज के छात्रावास में रहने लगीं। महादेवी जी की प्रतिभा का निखार यहीं से प्रारम्भ होता है।
1921 में महादेवी जी ने आठवीं कक्षा में प्रान्त भर में प्रथम स्थान प्राप्त किया तथा इनकी कविता लेखन प्रतिभा का प्रस्फुटन भी इसी समय हुआ। वैसे तो वे वे सात वर्ष की अवस्था से ही कविता लिखने लगी थीं और 1925 तक जब मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की थीएतो एक सफल कवयित्री के रूप में प्रसिद्ध हो चुकी थीं। विभिन्न पत्र.पत्रिकाओं में आपकी कविताओं का प्रकाशन होने लगा था।
विद्यार्थी जीवन में वे प्रायः राष्ट्रीय और सामाजिक जागृति संबंधी कविताएँ लिखती रहीं:-
’’विद्यालय के वातावरण में ही खो जाने के लिए लिखी गईं थीं। उनकी समाप्ति के साथ ही मेरी कविता का शैशव भी समाप्त हो गया।’’
मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण करने के पूर्व ही उन्होंने ऐसी कविताएँ लिखना शुरू कर दिया थाए जिसमें व्यष्टि में समष्टि और स्थूल में सूक्ष्म चेतना के आभास की अनुभूति अभिव्यक्त हुई है। उनके प्रथम काव्य.संग्रह संग्रह 'नीहार' की अधिकांश कविताएँ उसी समय की है।
पिता जी की मृत्यु के बाद महादेवी वर्मा के पति श्री स्वरूप नारायण वर्मा कुछ समय तक अपने ससुर के पास ही रहेए पर अपनी पुत्री महादेवी वर्मा की मनोवृत्ति को देखकर उनके बाबू जी ने श्री वर्मा को इण्टर करवा कर लखनऊ मेडिकल कॉलेज में प्रवेश दिलाकर वहीं बोर्डिंग हाउस में रहने की व्यवस्था कर दी। जब महादेवी इलाहाबाद में पढती थी तो श्री वर्मा उनसे मिलने वहाँ भी आते थे। किन्तु महादेवी वर्मा उदासीन ही बनी रहीं। विवाहित जीवन के प्रति उनमें विरक्ति उत्पन्न हो गई थी।
इस सबके बावजूद श्री स्वरूप नारायण वर्मा से कोई वैमनस्य नहीं था। सामान्य स्त्री-पुरुष के रूप में उनके सम्बंध मधुर ही रहे। दोनों में कभी-कभी पत्राचार भी होता था। यदा-कदा श्री वर्मा इलाहाबाद में उनसे मिलने भी आते थे। एक विचारणीय तथ्य यह भी है कि श्री वर्मा ने महादेवी जी के कहने पर भी दूसरा विवाह नहीं किया।

1984 में लखनऊ में नवगीत गोष्ठी मे महादेवी जी (चित्र कविताकोश से साभार)
महादेवी जी का जीवन तो एक संन्यासिनी का जीवन था ही। उन्होंने जीवन भर श्वेत वस्त्र पहना, तख्त पर सोया और कभी शीशा नहीं देखा।। भगवान बुद्ध के प्रति गहन भक्तिमय अनुराग होने के कारण और अपने बाल-विवाह के अवसाद को झेलने वाली महादेवी बौद्ध भिक्षुणी बनना चाहती थीं। यायावरी की इच्छा से बद्रीनाथ की पैदल यात्रा की और रामगढ़, नैनीताल में 'मीरा मंदिर' नाम की कुटीर का निर्माण किया। यह सन्यासिन 11 सितम्बर के दिन वापस उसी लोक में चली गयी जहाँ रहते हुये पूरे दो सौ वर्षों तक अपने परिवार को अपने आने की प्रतीक्षा करवाती रही थी।
रविवार, 4 सितंबर 2011
पूनम पाण्डेय से पूछे गये सवाल से चीख जैसी किलकारियाँ तक का सफरनामा!


दिनांक 23 जुलाई 2011 को पर शिखा कौशिक द्वारा पूनम पाण्डेय से पूछे गये सवालों से एक सिलसिला आरंभ हुआ था जो भारतीय नारी ब्लाग के रूप में आपके सामने आया था ।
इसकी यात्रा का यह सिलसिला बीते कल एक महत्वपूर्ण मोड पर था , इस ब्लाग के लिये वह एक विशेष दिवस था जिसकी आहट हममें से कोई नही जान सका ।
आज इस महत्व को मैं भी तब अनायास ही जान सका जब इस ब्लाग पर नयी पोस्ट चीख जैसी किलकारियाँ का प्रबंधन करने अपने डैश बोर्ड पर जा पहुँचा। डैश बोर्ड पर जैसे ही संदेशों का प्रबंधन करे विकल्प पर चटका लगाया तो यह देखकर सुखद आश्चर्य हुआ कि भारतीय नारी ब्लाग पर अब सौ अधिक संदेशों की पूँजी इकट्ठा हो चुकी है।
संदेशो की सूची के विस्तार में गया तो यह रोचक आँकडा नजर आया कि इस ब्लाग सौवीं पोस्ट मादा भ्रूण हत्या पर मेरे द्वारा लिखी गयी पंक्तियाँ चीखों जैसी किलकारियाँ! है।
मेरे लिये यह गौरव का क्षण अनजाने ही आ गया कि सुश्री शिखा कौशिक के द्वारा जिस पहली पोस्ट के साथ भारतीय नारी की यात्रा को उन्होंने आरंभ किया था उसमें सौंवा पडाव मेरी रचना के रूप में रहा। बधाई! आप सब योगदानकर्ताओं को , शिखा जी को और आप सभी पाठकों को जिनके सक्रिय सहयोग से सैकडे की यह यात्रा इतनी जल्दी पूरी हो सकी।
आशा करता हूँ कि आप सबके सहयोग और आर्शिवाद से इस ब्लाग पर एक हजारवीं पोस्ट भी इसी तरह जल्दी ही प्रकाशित होगी। एक बार फिर आप सबको बधाई।
बुधवार, 31 अगस्त 2011
जन्मदिवस मुबारक हो अमृता जी!
पिछले माह जुलाई में जब भारतीय नारी ब्लाग पर अमृमा प्रीतम के बारे में लिखने की श्रंखला प्रारंभ की थी तो मेरी यह योेजना थी कि प्रति सप्ताह औसतन दो पोस्ट लिखते हुये अमृता जी के जन्म दिवस 31 अगस्त को इसका समापन करूँगा परन्तु कुछ कारणों के चलते ऐसा संभव नहीं हो न सका। एक तो यह पूरा महीना स्वतंत्र भारत के इतिहास में भ्रष्टाचार के विरूद्ध अन्ना हजारे की गांधीवादी लडाई के चलते इस विषय से संबंधित आलेखों के सामयिक महत्व का रहा और दूसरे भारतीय नारी ब्लाग पर संस्थापको द्वारा अगस्त महीने के लिये बहन विषय नियत कर दिया गया।
वहरहाल , बहन विषय पर तो अमृताजी के संबंध में भी कुछ सामग्री जुटा पाया जिसे आपके साथ साझा भी किया, इसी विषय पर अमृता जी से जुडी कुछ सामग्री और है जिसे व्यवस्थित न कर पाने के कारण नहीं प्रस्तुत कर सका अब इसे भैया दूज या ऐसे ही किसी अन्य अवसर पर साझा करूंगा। इसके अतिरिक्त अन्य विभूतियों के जीवन से जुडी बहन विषयक सामग्री को भी प्रस्तुत करने का प्रयास करता रहा। आज जब इस माह का अंतिम दिन है और साथ ही अमृता प्रीतम जी का जन्म दिवस भी है तो इस अवसर पर अपनी पूर्व योजनानुसार भारतीय नारी ब्लाग पर उन्हे याद करने के अवसर को चूकना नहीं चाहता सो यह पोस्ट प्रस्तुत कर रहा हूँ।
अमृता प्रीतम जी की कलम उन विषयों पर चली जो सामान्यतः भारतीय नारी के सामाजिक सरोकारों से इतर थे। जहाँ अमृता जी के अन्य समकालीन लेखकों द्वारा भारतीय नारी की तत्कालीन सामाजिक परिवेश में उनकी व्यथा और मनोदशा का चित्रण किया है वहीं अमृता जी ने अपनी रचनाओं में इस दायरे से बाहर निकल कर उसके अंदर विद्यमान ‘स्त्री’ को मुखरित किया है। ऐसा करते हुये अनेक अवसरों पर वे वर्जनाओं को इस सीमा तक तोडती हुयी नजर आती हैं कि तत्कालीन आलोचकों की नजर में अश्लील कही जाती थीं।
चित्र 1 पत्रकार मनविन्दर कौर द्वारा जागरण ग्रुप की पत्रिका सखी के अप्रैल 2003 में लिखा गया लेख
अमृता जी ने अपना जीवन वर्जनाओं का न मानते हुये वेलौस जिया, और जो कुछ किया उस पर पक्के रसीदी टिकट की मुहर लगाकर सार्वजनिक रूप से स्वीकार भी कर लिया। वह भले ही सामाजिक परिवेश में ग्राह्य रहा हो या न रहा हो। उन्होंने अपने जीवन के चालीस वर्ष साहिर लुधियानवी की किताबों के कवर डिजायन करने वाले चित्रकार इमरोज के साथ बिताये। नई दिल्ली के हौजखास इलाके का मकान के-25 इन दोनो के सहजीवन के 40 वर्षो का मौन साक्षी रहा है। अपने जीवन के अंतिम पडाव में भी अमृताजी इमरोज के साथ ही थीं।
इमरोज के अमृता से लगाव की कल्पना आप इस छोटे सक तथ्य से लगा सकते हैं कि इमरोज की नजरों में वे आज भी गुजरे कल की बात (पास्ट) नहीं हैं। वर्ष 2003 में जब अमृता जी जीवित थीं तो जागरण ग्रुप की पत्रिका सखी के लिये पत्रकार मनविन्दर कौर द्वारा उनके घर नई दिल्ली के हौज खास जाकर उनसे और इमरोज से बातचीत की गयी थी जो सखी के अप्रैल 2003 में प्रकाशित हुई थी। कालान्तर में जब अमृता जी नहीं रहीं तो 2008 में लेखिका मनविन्दर कौर ने पुनः हौज खास जाकर यह टोह लेने का प्रयास किया कि अमृता के न रहने के बाद उनके बगैर इमरोज कैसा अनुभव कर रहे है तो इमरोज का उत्तर उनके लिये हैरत में डालने वाल था। इमरोज ने कहा था किः-
‘ अमृता को पास्ट टेन्स मत कहो, वह मेरे साथ ही है, उसने जिस्म छोडा है साथ नहीं।’
चित्र 2 अमृता जी नई दिल्ली के हौज खास इलाके में रहती थी (घर का चित्र रंजना रंजू भाटिया के ब्लाग ‘अमृता प्रीतम की याद में.......’ से साभार) इस घर के प्रवेश द्वार पर आज भी इमरोज द्वारा डिजायन की गयी अमृता प्रीतमजी के नाम की ही पट्टिका लगी है। इमरोज यह बखूबी जानते थे कि अमृता का प्यार साहिर लुधियानवी थे लेकिन उन्होंने अपनी और अमृता की दोस्ती में इस बात को कभी भी किसी अडचन या अधूरेपन के रूप में नहीं देखा। साहिर लुधियानी के बारे में उनका कहना हैः-
‘साहिर के साथ अमृता का रिश्ता मिथ्या और मायावी थ जबकि मेरे साथ उसका रिश्ता सच्चा और हकीकी, वह अमृता को बेचैन छोड गया और मेरे साथ संतुष्ट रही।’
पिछले वर्ष रंजना (रंजू भाटिया) जी ने अपने ब्लाग ‘अमृता प्रीतम की याद में.......’ पर बरसों पहले इमरोज से हुयी बातचीत का एक हिस्सा प्रस्तुत किया था जिसमें उन्होंने यह सवाल किया था इस घर में अमृता का कमरा बाहर तथा इमरोज का कमरा अंदर क्यों है? इस पर इमरोज के द्वारा दिया गया उत्तर अमृता के प्रति इमरोज के लगाव का जो चित्र खींचता है वह अद्वितीय हैः-
‘मैं एक आर्टिस्ट हँू और वह एक लेखिका पता नहीं कब वो लिखना शुरू कर दे और मैं पेंटिंग बनाना। इतना बडा घर होता है फिर भी पति पत्नी ऐक ही बिस्तर पर क्यों सोते हैं ? क्योंकि उनका मकसद कुछ और होता है। हमारा ऐसा कुछ मकसद नहीं था इसलिये हम अलग सोते थे। सोते वक्त अगर मैं हिलता तो उसे परेशान होती और अगर वह हिलती तो मुझे । हम एक दूसरे को कोई परेशानी नहीं देना चाहते थे। आज शादियां सिर्फ औरत का जिस्म पाने के लिये होती हैं । मर्द के लिये औरत सिर्फ सर्विग वोमेन है कयांेकि वह नौकर से सस्ती होती है। एसे लोगों को औरत का प्यार कभी नहीं मिलता। आम आदमी को औरत सिर्फ जिस्म तक ही मिलती है प्यार तो किसी किसी को ही मिलता है। औरत जिस्म से बहुत आगे है , पूरी औरत उसी को मिलती है जिसे वो चाहती है।’
चित्र 3 इमरोज जिन्होने 40 वर्षो तक उनके साथ जीवन बिताया और आज भी उनके ही साथ रहते हैं ।
अमृता के प्रति इमरोज के इस गहरे भावनात्मक लगाव की तह में जाकर उस दिन की पडताल करने पर रंजना (रंजू भाटिया) जी को वह दिन भी दिखलाई पडा जब इमरोज ने अपना जन्मदिवस अमृता जी के साथ मनाया था। इस दिन को याद करते हुये इमरोज ने कहाः-
‘ वो तो बाइ चांस ही मना लिया। उसके और मेरे घर में सिर्फ एक सड़क का फासला था । मै उससे मिलने जाता रहता था। उस दिन हम बैठे बातें कर रहे थे तो मैने उसे उसे बताया कि आज के दिन मैं पैदा भी हुआ था। वो उठकर बाहर गयी और फिर आकर बैठ गई। हमारे गांव में जन्मदिन मनाने का रिवाज नहीं ,अरे पैदा हो गये तो हो गए, ये रिवाज तो अंग्रेजो से आया है। थोडी देर के बाद उसका नौकर केक लेकर आया। उसने केक काटा थोडा मुझे दिया और थोडा ख्ुाद खाया । ना उसने मुझे हैप्पी बर्थडे कहा और ना ही मैने उसे थैक्यू। बस दोनो एक दूसरे को देखते और मुस्कुराते रहे ।’
बस इसी तरह एक दूसरे को देखकर मुस्कुराना और बिना कुछ भी कहे सब कुछ कह जाने वाली भाषा के साथ जीने वाली अमृताजी आज हमारे बीच न हों लेकिन इस बात से इमरोज को कोई फर्क नहीं पडता क्योकि उनका मानना है कि वे उनके साथ तो आज भी हैं ना।
शनिवार, 27 अगस्त 2011
इन्टरनेट से मुट्ठी में है ज्ञान पर फिसल रही है संस्कारो की रेतःडा0 उषा यादव


27 अगस्त को उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के सभागार में वैज्ञानिक उद्देश्यों को प्रोत्साहित करने के लिये बनायी गयी लखनऊ की संस्था ‘तस्लीम’ के साथ मिलकर हिंदी बाल साहित्य में नव लेखन पर ऐक संगोष्ठी में प्रतिभाग करना ऐसा ही था जैसे किसी टाइम मशीन पर सवार होकर बीते दिनों की सैर करना।
इस गोष्ठी के मुख्य अतिथि के रूप में पधारे डा0 श्याम सिंह शशि, संस्थान के नव नियुक्त अध्यक्ष डा0 प्रेम शंकर और संस्थान के पूर्व निदेशक (अब सेवानिवृत) डा0 विनोद चन्द्र पाण्डेय ‘विनोद’ और वर्तमान निदेशक श्री एस0एस0 सिंह के अतिरिक्त डा0 उषा यादव जी को भी सुनने का अवसर यहाँ उपलब्ध हो सका। जहाँ डा0 श्याम सिंह शशि की चिंता समाज के उन बालकों के संबंध में थी जो निम्न वर्ग, पिछडे वर्ग अथवा गैर सुविधाजनक स्कूलों में पढने जाते है वहीं विनोद चन्द पाण्डेय वर्तमान बाल लेखन से संतुष्ट दिखे।
लगभग सभी वक्ताओं के द्वारा इस बात पर बल दिया कि बच्चों के लिये साहित्य लिखते समय बाल मनोविज्ञान की समझ रखना जरूरी है जिससे उनकी लिखी रचनायें बच्चों के मन को भी छू सकें। अनेक आमंत्रित विद्धजन स्वयं तो उपस्थित न थे परन्तु उनके वक्तब्य गोष्ठी में पढे गये । इन्ही में से एक थीं डा0 सरोजनी कुलश्रेष्ठ, जिनका वक्तब्य हिंदी संस्थान की उपसंपादिका डा0 अमिता दुबे द्वारा पढा गया।
सबसे रोचक वक्तब्य रहा बाल साहित्य लेखन के क्षेत्र में विशिष्ट पहचान रखने वाली डा0 उषा यादव जी का जिन्होंने बाल सहित्य में परंपरागत रूप से चिडिया, छाता, स्कूल जैसे विषयों पर लिखे जाने वाली कविता कहानियों को सिरे से खारिज करते हुये इस विषय की पुनरावृति को पूर्णतः नकल की श्रेणी में परिभाषित किया। उनका कहना था कि साहित्य वह है जो मौलिक हो और मौलिकता का तात्पर्य है वह विषय जो पूर्णतः अछूते हों।
दशको पूर्व रची गयी बाल रचनाओं में विषय पाटी और स्याही की दवात हुआ करती थी जबकि आज के परिपेक्ष्य में कम्प्यूटर और उसके माउस से बालक का परिचय होने के कारण इन नवीन विषयों पर लिखना प्रासंगिक है। संस्कार जैसे कुछ विषयों के संबंध में उनका मानना था कि वे शाश्वत है तथा उनके संबंध में लिखना आवश्यक है जिससे क्षरित होते सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा की जा सके । उनके द्वारा इसके संबंध में ऐक अनूठा उदाहरण दिया कि आज इन्टरनेट और अन्य संचार माध्यमों के कारण सारे संसार का ज्ञान हमारे बच्चों की मुट्ठी में समा तो गया है परन्तु इससे बच्चों में संस्काहीनता भी पनप रही है। उन्होंने आगाह किया कि ज्ञान से भरी इस भिंची मुट्ठी से संस्कारों की रेत लगातार फिसलती जा रही है हमें इसे सहेजना का प्रयास करना ही होगा।
इन वक्ताओ को सुनते हुये मुझे हिंदी संस्थान के इसी सभागार में वर्ष 2000 में राहुल फाउन्डेशन की ओर से आयोजित उस गोष्ठी की याद हो आयी जब सुप्रसिद्व चिंतक और विज्ञान लेखक श्री गुणाकर मुले द्वारा ‘समय से जुडे कालस्य कुटिला गतिः’ नामक विषय पर ऐक व्याख्यान को सुनने का अवसर प्राप्त हुआ था उस संगोष्ठी में उन्होंने समयरेखा पर दार्शनिक तथा वैज्ञानिक यात्रा कराने का सुख श्रोताओं को उपलब्ध कराया था। कदाचित इस गोष्ठी में जाकर भी मैं उस टाइम मशीन पर सवार होकर लौटा हूँ जिसमें समय की धारा में पीछे लौटकर 1979 तक जा पहुँचा हूँ जहाँ मैने अपनी पहली कविता लिखी थी। यह कविता मेरे स्कूल की पत्रिका के साथ साथ साप्ताहिक समाचार पत्र‘गढवाल मंडल’ मे छपी थी। विद्यालय पत्रिका की प्रति न जाने कहाँ गुम हो गयी परन्तु समाचार पत्र की कतरन आज भी सहेजी रखी है। है।
आन्दोलनरत श्री अन्ना हजारे के उद्देश्यपूर्ण वातावरण में कदाचित आपको यह आज भी सार्थक जान पडे।
संकल्प(कविता)
हमको आगे बढना है , हिमगिरि पर भी चढना है।
हिम्मत करके हमको वीरों हमको कदम बढाना है।
हम भारत के श्रेष्ठ नागरिक हमको देश जगाना है।
इसी देश के हित में मरकर अमर हमें हो जाना है।
इस धरती पर जन्म लिया तो यही हमारा धाम है।
इसकी रक्षा में मर मिटना मात्र हमारा काम है।
माँ भारत का मान बढाना इसको नित चमकाना है ।
बढे देश का मान सदा ही यही ध्येय हो हम सबका।
सभी धर्म वाले भाई हैं भाव रह अपने पनका।
और छात्र को निष्ठा पूर्वक, नित्य नियम से पढन है।
गाँधी गौतम के सिद्धांतो को फिर से अपनाना है।
माँ के गौरव मस्तक पर नया मुकुट नित मढना है।
हमको आगे बढना है , आगे कदम बढाना हैं।
हमको आगे बढना है , हिमगिरि पर भी चढना है।
अशोक कुमार शुक्ला कक्षा 9 पौडी गढवाल
(मेरी प्रथम प्रकाशित कविता, रचनाकाल सन 1978, प्रकाशक-साप्ताहिक‘गढवाल मंडल)
मंगलवार, 23 अगस्त 2011
अन्न जल त्याग कर विरोध प्रदर्शन की एतिहासिकता और मेधा पाटेकर

[now public se sabhar ]
एक अन्ना हजारे का अनशन समूचे देश में ऐसी हलचल मचा देगा शायद इसका अनुमान शासकों को नही था। वास्तव में अनशन की की सार्थकता पर कभी भी प्रश्नचिन्ह लगाया ही नहीं जा सकता। हमारे देश में ही नहीं वरन यह विदेशों में भी यही विरोध प्रदर्शित करने का अनूठा अस्त्र रहा है। भारतीय नारी ब्लाग पर प्रखर महिला सामाजिक कार्यकत्री किरण वेदी को भारत के भावी प्रधान मंत्री के रूप में प्रस्तुत करने संबंधी पोस्ट ने मुझे इस विषय में सोचने की ओर अग्रसर किया कि अन्न जल त्याग कर अनशन करते हुये विरोध प्रदर्शित करने की दिशा में ऐतिहासिक तथ्यों और महिलाओं द्वारा किये गये प्रयासों को भी सूचीबद्ध किया जाय । इस पडताल के दौरान जो कुछ सामने आया उसे आपके सामने परोस रहा हूँ।इस संबंध में वैश्विक स्तर पर एतिहासिक तथ्यों को खंगालने पर यह पाया कि सबसे पहले इस अहिंसक तरीके से विरोध प्रदर्शन को ईसा से सैकडों साल पहले आरंभ हो चुके थे। एक उदाहरण आयरलैंड में अन्याय के प्रति विरोध दर्ज कराने का है जहाँ इसके लिये उपवास रखा जाता था। वहाँं अन्याय के प्रति विरोध दर्ज कराने हेतु अन्न त्यागने का कार्यक्रम अन्याय करने वाले के सामंती के दरवाजे पर किया जाता
था।अपने देश में भी ईसा से 400-750 वर्ष पूर्व उपवास का उल्लेख बाल्मीकि रामायण में मिलता है जब वनवास के लिये गये राम को वापिस बुलाने के लिये गये भरत वन में जाते हैं और उनसे अयोध्या लौटने की अनुनय विनय करते हैं। अत्यधिक अनुनय विनय करने पर भी जब राम के द्वारा इसे स्वीकार नहीं किया जाता तो अंत में भरत अन्न त्यागने की बात कहते हैं। (इसे तात्कालिक संदर्भ में भूख हडताल ही कहा जायेगा
)।
इसके उपरांत मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान रामचंद्र द्वार भरत जी को इसे ब्राह्मण का कार्य बताकर अन्न जल न त्यागने की सलाह दी जाती है जिसे आज्ञाकारी भरत द्वारा इस प्रतिबंध के साथ स्वीकार किया जाता है कि वे अयोध्या में राजसिंहासन पर भगवान की चरण पादुकाऐं रखकर स्वयं प्रतीकात्मक प्रशासक बनकर शासन चलायेगें ।
1995 में टिहरी बांध विरोध में 45 दिन तक भूख हडताल करने वाले सुन्दरलाल बहुगुणा के अनशन का साक्षी मैं स्वयं रहा हूँ जिसके समर्थन में सामाजिक कार्यकर्ता सुश्री मेधा पाटेकर जी के आने पर अपने पदेन दायित्यों के चलते उन्हे मैने गिरिफ्तार भी किया था और उत्तर प्रदेश राज्य की सीमा से दूर लेजाकर नई दिल्ली के राजघाट पर सम्मानपूर्वक पहुँचाया था। (इसका विस्तृत विवरण मैं किसी अन्य पोस्ट में पृथक से लिखकर आप सुधी पाठकजनों के साथ अवश्य बांoa
टूँगा)
आदरणीय मेघा जी द्वारा इसके उपरांत 2006 में पुनः सरोवर बांध की उंचाई न बढाने के लिये भूख हडताल की जिसे उनके द्वारा 28 मार्च 2006 को प्रारंभ किया गया था और लगातार अनशन के बीस दिन बीतने पर 17 अप्रैल 2006 केा भारत के उच्चतम न्यायालय ने सरदार सरोवर के विस्थापन और पुर्नवास के कार्यक्रम को अपनी देखरेख में करवाने का आदेश दिया तब जाकर मेंधा जी का अनशन समाप्त हो सका था
।
अन्न जल त्याग कर विरोध प्रदर्शित करने के अनेक उदाहरण हैं यथा सुन्दरलाल बहुगुणा द्वारा 1997 में महात्मा गांधी की समाधि पर किया गया 74 दिनों तक उपवास, 13 जून 2008 को उत्तरकाशी में भागीरथी के प्रवाह को रोककर बनायी जाने वाली परियोजना को हटाने की मांग पर उपवास आदि आदि। आज इतना ही बताना चाहता हूँ कि भारतीय नारी आज किसी भी क्षेत्र में पुरूषों से पीछे नहीं है भले ही वह क्षेत्र कितना ही बीहड क्यों न हो जैसे अन्न जल त्याग कर अपने विरोध को प्रदर्शित करने का आदरणीय मेघा पाटेकर जी का उदाहरण।
रविवार, 21 अगस्त 2011
आधी आबादी की जनभागीदारी के मायने क्या हैं ? भाग:-2
जनसंख्या के आंकडे इस बात के गवाह हैं कि जागरूकता के अनेक प्रयासों के बावजूद स़्त्री पुरूष का अनुपात लगातार घट रहा है और स्त्रियां लगातार और अधिक शोषित होती जा रही हैं । महिलाओं की स्थिति को मजबूत करने के लिये सरकार को कानून तक बनाने पड रहे हैं । अभी हाल में केन्द्र सरकार ने पंचायती राज में महिला आरक्षण पचास प्रतिशत करने का निर्णय लिया है।
इस मामले में उत्तर प्रदेश की स्थिति समूचे देश की तुलना में अच्छी कही जायेगी क्योंकि यहाँ लोक सेवाओं में महिलाओं के लिये तीस प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण पहले से अनुमन्य है। प्रदेश में जनसेवा में महिलाओं की भागी दारी के आंकडों पर नजर दौडाने पर उत्साहजनक स्थिति सामने आती है
क्रमांक जनप्रतिनिधि का पद कुल पद कार्यरत महिलाऐं प्रतिशत
1 सदस्य ग्राम पंचायत------------------------------------------ 38.56
2 ग्राम प्रधान------------------------------------------------- 38.80
3 सदस्य क्षेत्र पंचायत------------------------------------------- 38.46
4 प्रमुख क्षेत्र पंचायत------------------------------------------- 50.49
5 सदस्य जिला पंचायत-----------------------------------------
41.27
6 अध्यक्ष जिला पंचायत----------------------------------------- 59.72
यकीनन इन आंकडों पर गौर करने पर यह बात निर्विवाद रूप से सामने आती है कि पंचायतों में महिलाओं की भागीदारी लगातार बढी है। ‘सहभागी शिक्षण केन्द्र’ संगठन ने उत्तर प्रदेश की पंचायतों में महिलाओं की भागीदारी पर विस्तृत अध्ययन करते हुये यह निष्कर्ष निकाला है कि प्रदेश की महिलाओं में घर से बाहर आकर काम करने का आत्मविश्वास तो बढा ही है इसके साथ ही उनमें सत्ता की भूख भी बढ़ी है।
सत्ता में भागीदारी की भूख ने प्रदेश में अनेक अवसरों पर शार्टकट अपनाती हुयी महिलाओं के साथ घटित बहुचर्चित घटनाओं ने राजनीति में अनेक आपराधिक पटकथाओं की रूपरेखा भी तैयार की है परन्तु ये दुर्घटनायें महिलाओं की सफलता की डगर में रूकावटें डाल पाने में सफल होती नहीं प्रतीत होती हैं। अनेक विरोधाभासों के बाद भी आज परिवार के मुखिया की सोच इस लिहाज से बदली हुयी दिखती है कि जो अब तक उन्हे घर के भीतर ही रहने की सीख दिया करते थे अब वे ही उन्हे घर की देहरी से बाहर कदम निकालने की सीख दे रहे हैं
राजनेताओं की पंचायतों में भागीदारी का असल उद्देश्य रसूख बढाना और मनरेगा के मद में आने वाला धन भी हो सकता है परन्तु यह तथ्य स्वयं में प्रमाणित है कि उपरोक्त आंकडों मे समाहित निर्वाचित महिला जनप्रतिनिधियों में उत्साह जागा है । उत्तर प्रदेश के संदर्भ में ‘सहभागी शिक्षण केन्द्र’ संगठन की शालिनी ने पंचायतों में महिलाओं की भागीदारी के विस्तृत अध्ययन में यह भी पाया है कि इन महिला जन प्रतिनिधियों में लगभग साठ प्रतिशत का पूर्व में कोई राजनैतिक आधार नही रहा है। इस आधार पर यह तथ्य निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि पुराने राजनेताओं द्धारा अपनी धमक कायम रखने के लिये या आरक्षित सीट पर वजूद बनाने की चाहत में हीे सही, उत्तर प्रदेश की पंचायतों में आम महिला की भागीदारी 50 प्रतिशत आरक्षण लागू करने के पहले ही धमकदार है। बस अब केवल उन्हें अपनी जुबान और हाथ देने भर की ही जरूरत है।
गुरुवार, 18 अगस्त 2011
आधी आबादी की जनभागीदारी के मायने क्या हैं ? भाग:-1
बहुत दिन नहीं हुये जब ननिहाल के गाँव से अधेड उम्र मामी का फोन आया था कि वे पंचायत चुनाव मे प्रधानी का पद जीत गयी हैं। मामी को औपचारिक बधाई देने के बाद मैं मामी के चुनाव से जुडे तथ्यों पर विचार करने लगा। नाना राजपुरोहित थे और साथ ही स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी थे और आजादी के संघर्ष के दौरान नेहरूजी के साथ जेल गये थे। उन्होंने जेल में हुयी नेहरू जी की मुलाकात का मान अपनी पूरे जीवन भर निभाया और नाना ने अपने जीते जी कभी भी कांग्रेस से इतर किसी राजनैतिक दल के बारे में न तो सोचा और नहीं परिवार वालों को सोचने दिया।
नाना की मृत्यु के बाद बडे मामा गांव के प्रधान हुये। तब तक ग्राम प्रधान के साथ मनरेगा, मिड डे मील , जैसी अनेक आकर्षक योजनाओं के न जुडने से यह पद युवा वर्ग की चाहत से दूर था। घर की महिलाओं को गांव की राजनीति से जुडने की न तो कोई चाह थी और न ही कोई उत्साह। कुछ समय बीतने के बाद ग्राम प्रधान का पद अनुसूचित जाति के लिये आरक्षित होने वाला था दुर्भाग्य से तभी मामा का देहान्त हो गया और उसके बाद दूसरे गांव के आरक्षित व्यक्ति द्वारा चुनाव जीतने से ननिहाल में प्रधानी का रूतबा भी खतम हो गया।
यह स्थिति कमोवेश बीस वर्षो तक चली जब तक ग्राम प्रधान का पद आरक्षित श्रेणी के अंतरगत चिन्हित रहा। पिछले पंचायत चुनाव में पता चला कि प्रधानी का पद महिला अभ्यर्थी के लिये आरक्षित घोषित हुआ है तो मेरे ममेरे भाइयों में जैसे जोश आ गया। उन्होंने मामी को प्रधान पद के उम्मीदवार के रूप में चुनाव में उतार दिया।
बेचारी मामी जिन्होंने कभी गांव की देहरी पार नहीं की थी पूरे गांव में जाकर वोट मांग आँयी और परिणाम सामने है कि वे निर्वाचित हो चुकी हैं। इस पूरे घटनाक्रम को उद्घृत करने का उद्देश्य मात्र यह बताना था कि आज से बीस पच्चीस साल पहले हमारे प्रदेश में परिवार के मुखिया जो महिलाओं को घर के भीतर ही रहने की सीख दिया करते थे अब वे ही उन्हे घर की देहरी से बाहर कदम निकालने की सीख दे रहे हैं ।
जनसाधारण या राजनेताओं की पंचायतों में भागीदारी का असल उद्देश्य भले ही रसूख बढाना या मनरेगा और मिड डे मील के मद में आने वाला धन हो सकता है लेकिन इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि अब महिलाओं ने पंचायत में अपनी भागीदारी को स्वीकार करना आरंभ कर दिया है। मेरी श्रद्धेय मामीजी सहित (मामी जी से क्षमायाचना सहित) कुछ महिलाये अवश्य आज कठपुतली की तरह अपने पुत्रों पतियों या पिताओं की उंगलियों के इशारे पर चल रही हों लेकिन हर अगला दिन उनमें आत्मविश्वास और स्वावलंबन की सीख अवश्य भर रहा है।
उत्तर प्रदेश में जनसत्ता में महिलाओं की भागीदारी की एक और रोचक दास्तान अगली पोस्ट में भी
सोमवार, 15 अगस्त 2011
स्वतंत्रता दिवस को छुट्टी का दिवस के स्थान पर गंभीर चर्चा दिवस क्यों नहीं मानते हम लोग?
आज भारतीय नारी ब्लाग पर बहन के स्थान पर माँ के संबंध में कुछ बताना चाहता हूँ वह माँ है भारत माँ जिसे बेडियों से आजाद कराने के लिये आजादी के हजारों दीवानों ने अपने प्राण निछाावर किये । ऐसे ही एक दीवाने से जुडी एक दास्तान आपके साथ साझा कर रहा हूँ
आजादी के नायक चंद्रशेखर आजाद के जन्मदिवस के दो दिन पूर्व यानी 21 जुलाई की बात थी मै एक आवश्यक राजकीय कार्य के चलते उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक राजधानी कहे जाने वाले शहर इलाहाबाद गया हुआ था। थोडा समय बचा तो इलाहाबाद राजकीय पुस्तकालय पहुँच गया।
पुस्तकालय में पुराने समाचार पत्रों में आजादी के नायक चंद्रशेखर आजाद के संबंध में छपी खबरों को ढूँढकर उसके चित्रों के साथ एक आलेख बनाने की योजना थी। (इससे संबंधित पोस्ट 23 जुलाई 2011 को कोलाहल से दूर... ब्लाग पर जारी हुयी थी जिसे आप सबका भरपूर सम्मान और समर्थन मिला था)
आजाद जी की खबरों वाले समाचार पत्र का छायाचित्र लेने के दौरान ही उसी समाचार पत्र में छपी एक खास खबर पर निगाह अटक गयी। जिस दिन चंद्रशेखर आजाद को इलाहाबाद के एन्फेड पार्क में घेरकर पुलिस द्वारा आत्महत्या करने पर मजबूर कर दिया गया था उसी दिन समीपवर्ती जनपद फतेहपुर मे सरकारी धनराशि की वसूली हेतु पहुँचे एक सरकारी अधिकारी (तहसीलदार) को लाठी डंडों से पीट पीट कर मार डाला गया था। आजाद जी की मृत्यु के साथ यह समाचार भी समाचार पत्र के मुख्यपृष्ठ पर ही छापा गया था।
चित्र-1 .1मार्च 1931 का समाचार पत्र जिसमें चन्द्रशेखर आजाद की मृत्यु के समाचार के साथ तहसीलदार की हत्या का भी समाचार छपा था
इस महत्ववपूर्ण समाचार को पढने के बाद बाद मुझे पिछले दिनो मे महाराष्ट्र के अमरावती जिले में तेल माफियाओं के विरूद्ध कार्यवाही करने वाले एक अपर जिलाधिकारी को कैरोसीन तेल डालकर जलाकर मार डालने का समाचार याद हो आया। साथ ही याद हो आया लगभग 90 वर्ष पूर्व महात्मा गांधी का असहयोग आन्दोलन और आज के अन्ना हजारे का अनशन।
प्रशासन के प्रतीक उसके अधिकारियों से जुडी उक्त दोनो घटनाओं में मुझे यह साम्यता दिखी कि 1931 में जहाँ आम भारतीय का आक्रोश सरकारी अधिकारी की मृत्यु का कारण बना वहीं 2011 में अपनी इच्छानुसार कालाबाजारी न कर पाने में सक्षम माफिया का दुस्साहस एक सरकारी अधिकारी की मृत्यु का कारण बना।
चित्र-2 समाचार का क्लोज-अप जिसमें तहसीलदार केा लाठी डंडों से पीट-पीटकर मार डालने की सूचना थी
इस स्थान पर मैं यह विचार करने के लिये विवश हो गया कि आज से लगभग 90 वर्ष पूर्व 1920 में महात्मा गांधी के असहयोग आन्दोलन के रूप में जिस निर्णायक लड़ाई का आरंभ हुआ था उसकी गंभीर परिणति के रूप में सरकार के विरूद्ध जिस जनाक्रोश ने 1931 में शासन के प्रतीक तहसीलदार को लाठी डंडो से पीट पीट कर मार डालने जैसा विध्वंसकारी स्वरूप ले लिया था क्या वैसा ही जनाक्रोश इस देश की जनता के मध्य 80 वर्षो के बाद पुनः जाग उठा है? शायद हमें इस पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है ।
संभव है जब आप यह पोस्ट पढ़ रहे हों तब तक अन्ना हजारे के अनशन को सरकारी अनुमति मिल चुकी हो लेकिन स्वतंत्रता दिवस की यह चौसठवीं वर्षगांठ इस मायने में महत्वपूर्ण है कि हमारे लोकतंत्र में घर कर गयी अनेक गंभीर खामियों के प्रति एक गंभीर चर्चा आम जन ने आरंभ तो कर ही दी है।
इस प्रश्न का उत्तर ढूँढने में हम सबको बराबर की मेहनत करनी होगी कि कहीं हम लोकतंत्र मे घर करती जा रहीं गंभीर कमियों के प्रति नरम रवैया अपनाकर कर कोई ऐतिहासिक गलती तो नहीं कर रहे है?
स्वतंत्रता दिवस को छुट्टी का दिवस के स्थान पर गंभीर चर्चा दिवस क्यों नहीं मानते हम लोग? आइये इस दिवस को हम इस विषय में सोचने के दिवस के रूप में मनायें। जै हिन्द! जै भारत!! भारत माता की जै
शुक्रवार, 12 अगस्त 2011
समय की सुरंग में लुप्त होते यथार्थ को तलाशती लेखिका राजी सेठ!
सन् 1935 में वर्तमान पाकिस्तान के छावनी नौशेहरा नामक स्थान में जन्म लेने वाली राजी सेठ ने अंग्रेजी साहित्य से एम0ए0 करने के उपरांत तुलनात्मक धर्म और भारतीय दर्शन मे विशेष अध्ययन किया। इन्होंने लेखन की शुरूआत सन् 1974 में काफी विलंब से की। अपने सक्रिय लेखन की शुरूआत के संबंध मे वर्ष 1998 में ‘यह कहानी नहीं’ (कहानी संग्रह) के प्रकाशन के अवसर पर साहित्यिक पत्रिका ‘वागर्थ’ में अपने एक लेख में इस प्रकार लिखा हैः-
‘‘ ----फिलहाल तो इतना कि मेरी पिछले तीन-चार वर्षों में पूरी होती (सोची और लिखी तो वे कब कब जती हैं) कहानियॉ संकलित हुयी हैं । इनमें एक निरन्तरता है इस बात को स्पष्ट कर देना इसलिये जरूरी है कि जब लिखना शुरू किया था ( लिखना मैने देर से शुरू किया , जीवन के उत्तरार्र्द्ध में ) तो मन पर चयन धर्मिता का खासा दबाव पडता था लगता था रचनाकार को सदा अपना श्रेष्ठतम् ही प्रस्तुत करना चाहिये। इस मानसिकता के चलते अपने पहले कहानी संग्रह ‘अंधे मोड से आगे’ की भूमिका में यह भी लिख दिया था कि धरती पर जो कदम वजनदार पडते हैं वही अपना निशान छोडते हैं।
ज्यों ज्यों समय बीतता गया उस सोच और संकल्प में दरार आती गयी। लगा जीवन में अच्छा-बुरा, ऊंच-नीच, सफल -असफल दोनों हैं। यदि सदा ही वजनदार कदमों की बात होती रही तो अपनी यात्रा अपने आपको भी कभी नहीं दीखेगी। अनुभव के प्रत्यक्षीकरण का कोई वस्तुपरक पैमाना बन ही नहीं पाएगा जो अपने आप में एक बहुत बडी सीख है। -----’’
इनकी रचनाओं में ‘मृत्यु’ बार-बार केन्द्रीय विषय बनकर उभरती रही है। साहित्यिक पत्रिका ’हंस‘ द्वारा प्रायोजित श्रंखला ‘आत्म-तर्पण’ में हिस्सा लेने के दौरान लेखिका ने अनेक अवसरों पर इस तथ्य को रेखांकित भी किया हैः-
‘‘मृत्यु औचक आती है और कुुछ न भी करे तो संवेदनशून्य और परिपक्व (?) तो करती ही करती है। यह अजीब बात है कि मृत्यु से निबटने की समझ मृत्यु के घटित में से ही आती है। रचना की शब्दावली में यह अनुभव की कीमत है। ’’
भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा 2004 में प्रकाशित लोकोदय ग्रन्थमाला के तीसरे संस्करण ‘कहानी संग्रह’ की भूमिका में लेखिका ने इस केन्द्रीय विषय के सम्बन्ध में अपना स्पष्टीकरण कुछ इन शब्दों में व्यक्त किया हैः-
‘‘------- इसी सन्दर्भ में अपने को टटोलते यह भी स्पष्ट हुआ कि बचपन से ही मेरी मानसिकता में किसी न किसी रूप में मृत्यु का हस्तक्षेप रहा। एक अनजाना अमूर्त डर पल-पल साथ सांस लेता रहा। होश संभालते ही मैने अपने आपको मृत्यु की कामना करते पाया, जिसकी जड़ में एक दूसरा डर था कि चूंकि मैं किसी अत्यन्त निकट के आत्मीय व्यक्ति (उस समय तो उस घेरे में माता पिता ओर दादा ही थे) का अभाव सहन नहीं कर पाऊंगी, अतः मुझे उससे पहले ही प्रयाण कर जाना चाहिए। कल्पना का यह आतंक वर्षो तक मेरे साथ चला। पता नहीं इसे अतिरिक्त संवेदनशीलता कहेंगे या सम्बन्धों को लेकर अपनी अपेक्षाओं की जकड़न, पर यह मानसिकता कालान्तर में वस्तुओं, विषयों, वृत्तों , व्यक्तियों से मेरे सम्बन्ध को निर्धारित जरूर करती रही।------
---अंततः डर के इस तनाव में तरमीम हुई वास्तविकता की मुठभेड से। तब तक तो यह भी स्पष्ट नहीं था कि जिस चीज से डर रहे हैं वह वस्तुतः है क्या। जब जाना ही नही ंतो डर कैसा? ----अन्ततः मृत्यु से आमना-सामना हुआ। होना ही था। एक बार नहीं कई कई बार जल्दी-जल्दीं दारूणता की हर सरहद तोड़ते हुये, काल- अकाल के भ्रम को रौंदते हुए... एक अभीत स्तब्धता में जीवन को सौंपते हुए।---------’’
इनकी रचनाओं मंे ‘निष्कवच’(उपन्यास), ‘तत-सम’(उपन्यास), ‘अन्धे मोड से आगे’ (कहानी-संग्रह), ‘तीसरी हवेली’(कहानी- संग्रह ),‘यात्रा मुक्त’ (कहानी-संग्रह), ‘दूसरे देश काल में (कहानी-संग्रह), ‘ यह कहानी नहीं ’(कहानी-संग्रह), के अतिरिक्त जर्मन कवि राइनेर मारिया के पत्रों की दो पुस्तकों का हिंन्दी में रूपान्तरण भी किया है।
इनकी रचनाओं के अनुवाद पंजाबी, अंग्रेजी,उर्दू, कन्नड़, गुजराती, मराठी, और उड़िया आदि भाषाओं में प्रमुख रूप से हुये हैं।
इन्हें अनन्त गोपाल शेवड़े पुरस्कार, हिन्दी अकादमी पुरस्कार, तथा भारतीय भाषा परिषद् पुरस्कार सहित अनेक सम्मान भी प्राप्त हुये हैं।


