शनिवार, 30 जुलाई 2011

भारत पाकिस्तान के विभाजन के दर्द की दास्तान और अमृता ! भाग 2


अमृता जी की आत्मकथा रसीदी टिकट पढ़ रहा था और उनके पसंदीदा विषय प्रेम पर कुछ लिखना चाहता था परन्तु अचानक कैलेन्डर की ओर निगाह गयी तो पाया कि 14 अगस्त की तारीख बहुत नजदीक है । यह तारीख हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के विभाजन की तारीख है । इसी दिन विभाजन हुआ था जिसके छः हफ्ते पहले यानी 3 जुलाई 1947 को अमृता ने एक बच्चे को जन्म दिया था सो विभाजन के मंजर पर लिखे उनके उपन्यास पिंजर की चर्चा करते हैं। वास्तव में विभाजन का दर्द अमृता जी ने सिर्फ सुना ही नहीं देखा और भोगा भी था। इसी पृष्ठभूमि पर उन्होंने अपना उपन्यास पिंजर लिखा। कल्पना कीजिये ऐसी माँ की जिसके प्रसव को एक माह का समय हुआ हो और राजनैतिक अस्थिरता तथा अनिष्चितता के उस मंजर की। अमृता जी ने इसके संदर्भ में उपन्यास पिंजर में लिखा है किः.
‘‘ दुखों की कहानियां कह- कहकर लोग थक गए थे, पर ये कहानियां उम्र से पहले खत्म होने वाली नहीं थीं। मैने लाशें देखीं थीं , लाशों जैसे लोग देखे थे, और जब लाहौर से आकर देहरादून में पनाह ली, तब ----एक ही दिन में सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक रिश्ते कांच के बरतनेां की भांति टूट गये थे और उनकी किरचें लोगों के पैरों में चुभी थी और मेरे माथे में भी ----- ’’
अम्रता की रचनाओं में विभाजन का दर्द और मानवीय संवेदनाओं का सटीक चित्रण हुआ है। इनके संबंध में नेपाल के उपन्यासकार धूंसवां सायमी ने 1972 में लिखा थाः-
‘‘ मैं जब अम्रता प्रीतम की कोई रचना पढता हूं, तब मेरी भारत विरोधी भावनाऐं खत्म हो जाती हैं।’’इनकी कविताओं के संकलन ‘धूप का टुकडा’ के हिंदी में अनुदित प्रकाशन पर कविवर सुमित्रानन्दन पन्त ने लिखा थाः-
‘‘अमृता प्रीतम की कविताओं में रमना हृदय में कसकती व्यथा का घाव लेकर , प्रेम और सौन्दर्य की धूप छांव वीथि में विचरने के समान है इन कविताओं के अनुवाद से हिन्दी काव्य भाव धनी, स्वव्न संस्कृत तथा शिल्प समृद्ध बनेगा--- ’’
इनकी रचनाओं मंे ‘दिल्ली की गलियां’(उपन्यास), ‘एक थी अनीता’(उपन्यास), काले अक्षर, कर्मों वाली, केले का छिलका, दो औरतें (सभी कहानियां 1970 के आस-पास) ‘यह हमारा जीवन’(उपन्यास 1969 ), ‘आक के पत्ते’ (पंजाबी में बक्क दा बूटा ),‘चक नम्बर छत्तीस’( ), ‘यात्री’ (उपन्यास1968,), ‘एक सवाल (उपन्यास),‘पिधलती चट्टान(कहानी 1974), धूप का टुकडा(कविता संग्रह), ‘गर्भवती’(कविता संग्रह), आदि प्रमुख हैं।
इनके उपन्यासों पर फिल्मों और दूरदर्शन धारावाहिक का भी निर्माण भी हुआ है।

आज की चर्चा बस इतनी ही .... अब अगली पोस्ट में अमृता जी के अधूरे प्रेम की प्यास की चर्चा करेगे जिसके बारे में स्वयं उन्होने अपनी आत्मकथा में लिखा हैः.

‘‘ग्ंगाजल से लेकर वोडका तक यह सफरनामा है मेरी प्यास का।’’


आप इस आलेख को नवभारत टाइम्स पर शुरू हुये रीडर्स ब्लाग
कोलाहल से दूर... पर क्लिक करके भी पढ़ सकते हैं
लिंक है:-
भारत पाकिस्तान के विभाजन के दर्द की दास्तान

12 टिप्‍पणियां:

शिखा कौशिक ने कहा…

अशोक जी -बहुत सार्थक प्रस्तुति .विभाजन का दर्द अमृता सहित सभी भारतीयों को सहना पड़ा पर स्त्रियों को इसकी बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी .यह दर्द को लेखिका की रचनाओं में उभरना ही था

Rajesh Kumari ने कहा…

bahut achchi prastuti.apne aetar ke dard ko samet kar pannon me likhna bahut badi baat hai.

कविता रावत ने कहा…

‘‘ मैं जब अम्रता प्रीतम की कोई रचना पढता हूं, तब मेरी भारत विरोधी भावनाऐं खत्म हो जाती हैं।’’
..ek sache lekhak ka yahi to sachha dharm hota hai..
bahut hi achhi prastuti..aabhar!

veerubhai ने कहा…

http://kabirakhadabazarmein.blogspot.com/
शुक्ल जी बेहद सटीक समीक्षा .बहुत अच्छा लगा आपकी लिखने का मर्म जादू वही जो सिर चढ़ के बोले .

शालिनी कौशिक ने कहा…

behad sateek.aabhar.

सुनीता शानू ने कहा…

http://bhartiynari.blogspot.com/2011/07/2.html

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) ने कहा…

बहुत ही बढ़िया पोस्ट।

सादर

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति

वीना ने कहा…

बहुत सार्थक पोस्ट...

अनुपमा त्रिपाठी... ने कहा…

sarthak prastuti.

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

behtareen post!

Dorothy ने कहा…

सुंदर प्रस्तुति. आभार.
सादर,
डोरोथी.