रविवार, 24 जुलाई 2011

एक बहस-आज की महिलाएं क्या अपने से कम पढ़े लिखे व् कम रसूखदार को जीवन साथी बनाना पसंद करेंगी ?

भारतीय समाज जहाँ एक उक्ति आमतौर पर प्रचलित है कि-''बहु अपने से नीचे घर से लाओ और बेटी को अपने से ऊँचे घर में दो .''पता है ये किस लिए  सिर्फ इसलिए कि जिससे बहु और बेटी अपने अपने घर में सेवा भाव लेकर जाएँ .आज इस उक्ति का अनुसरण कितने लोग कर रहे हैं मेरे विचार में शायद कुछ दिल के हाथों मजबूर ही इसका अनुसरण कर रहे हैं नहीं तो अधिकांशतया आज के युवक अपने से ऊँचे घरों की लड़कियों से ही विवाह की इच्छा रखते हैं किन्तु यदि आज की युवतियों की बात करें तो स्थिति थोड़ी भिन्न कही जा सकती है .युवतियां जहाँ उनकी इच्छा कहें या राय पूछी जाती है या जहाँ वे अपना जीवनसाथी स्वयं चुनती है वहां उनकी प्रमुखता एक ऐसे युवक की रहती है जो उन्हें बहुत प्यार करे व् उनकी इच्छा के अनुसार ही चलने को तैयार हो .ऐसा केवल आज ही नहीं हो रहा है पहले भी ऐसा हुआ है .भारत का सबसे लोकप्रिय राजनीतिक परिवार में इंदिरा गाँधी और प्रियंका गाँधी दोनों ही के विवाह प्रेम विवाह हैं और दोनों ही की तुलना में  उनके पति का रसूख यदि कहा जाये तो कुछ भी नहीं है .आज योग्यता पढाई लिखाई व् रसूख पर हावी हो रही है और मेरे विचार में युवतियां युवकों की योग्यता को अपने जीवनसाथी के चयन में ज्यादा तरजीह दे रही हैं .इसके साथ ही साथ आज दो बातें जो आज के युवकों के लिए युवतियों की पसंद में सम्मिलित हो चुकी हैं वे हैं युवक की अधिक तनख्वाह व् उसका अपने घर से अलग रहना क्योंकि आम तौर पर आज की युवतियां अपने जीवनसाथी के परिवार की जिम्मेदारी एक बोझ स्वीकार कर चलती हैं क्योंकि आज भारत में लगभग एकल परिवार का चलन है और अकेले परिवार में रहने वाले बच्चे जब अपने माँ-बाप को उनके माँ-बाप से अलग चैन से रहते देखते हैं तो अपने भविष्य में भी पहले से ही पृथक रहने की ही सोचकर चलते हैं और अपने जीवनसाथी के परिवार को मात्र एक बोझ मानते हैं इसीलिए जहाँ तक मेरा विचार है आज की युवतियां अपने जीवन साथी की अच्छी तनख्वाह वाली नौकरी और उसके अलग रहने को महत्व देती हैं वहीँ आपका क्या विचार है ?
आप अपने विचारों से टिपण्णी के माध्यम से अवगत कराएँ .
                       शालिनी कौशिक

8 टिप्‍पणियां:

डॉ0 अशोक कुमार शुक्ल ने कहा…

Kya is blog ko mai yani aamantrit na kiya hua koi bhi vyakti dekh athawa likh sakata hai.

Learn By Watch ने कहा…

इस मामले में महिलाएं ही अपने विचार प्रस्तुत करें तो बेहतर होगा, मैंने भी महिलाओं से कुछ प्रश्न पूछे थे पर कई लोगों ने उत्तर नहीं दिए, देखते हैं इस पर क्या उत्तर आते हैं

शिखा कौशिक ने कहा…

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बेनामी ने कहा…योगेन्द्र जी- आपकी समस्या बहुत बड़ी है .शायद आप उन ही लड़कियों से मिले हैं जिन्हें अब तक घर की -माता पिता की सेवा का अवसर ही नहीं मिला .नौकरी करने वाली बहुत सी लड़कियां घर की व्यवस्था भी बखूबी निभाती हैं .यह सही है की आज साड़ी पहनना चलन में न होने के कारण मुश्किल लगता है पर नए रिश्तों से जुड़ने के लिए कुछ तो करना ही चाहिए .आप को आपकी पसंद की वधु मिले ऐसी मेरी शुभकामनायें हैं . खाना बनाने की बात पर आप से सहमत हूँ .सहयोग तो दोनों और से होना ही चाहिए .

२५ जुलाई २०११ १२:३३ पूर्वाह्न
योगेन्द्र जी- आपकी समस्या बहुत बड़ी है .शायद आप उन ही लड़कियों से मिले हैं जिन्हें अब तक घर की -माता पिता की सेवा का अवसर ही नहीं मिला .नौकरी करने वाली बहुत सी लड़कियां घर की व्यवस्था भी बखूबी निभाती हैं .यह सही है की आज साड़ी पहनना चलन में न होने के कारण मुश्किल लगता है पर नए रिश्तों से जुड़ने के लिए कुछ तो करना ही चाहिए .आप को आपकी पसंद की वधु मिले ऐसी मेरी शुभकामनायें हैं . खाना बनाने की बात पर आप से सहमत हूँ .सहयोग तो दोनों और से होना ही चाहिए .
comment aapke blog par nahi ho saka isliye yahai paste kar diya hai .

शिखा कौशिक ने कहा…

Ashok ji -dekh to koi bhi sakta hai par likhne ke liye to aamantran pradan hi kiya jayega .aap judna chahen to apna E.mail comment me likh den .

शालिनी कौशिक ने कहा…

योगेन्द्र जी,

आपके विचारों से मैं पूरी तरह से सहमत हूँ .महिलाएं यदि समान अधिकार चाहती हैं तो उन्हें भी वे सभी कार्य करने होंगे जिनसे वे आज तक केवल यह कहकर बचती रही हैं की वे काम पुरुषों के हैं . सही है की जब वे अपने पति से ये चाहती हैं की वे घर के काम भी सीखें तो उन्हें भी अपने पति का बाहर कमाने में सहयोग करना होगा.दूसरी बात रही सदी पहनने की तो आरम्भ से ही ये आदत सी पड़ गयी है की बहु तो साड़ी में ही अच्छी लगती है अब आज की व्यस्त जिंदगी में साड़ी केवल फैशन में आती है इसलिए इतना तो होना ही चाहिए की बहु ससुराल में साड़ी पहने और रही तीसरी बात की वह गाँव नहीं जाएगी तो ये तो बहुत गिरी हुई बात हुई की आप अपने पति को केवल अपनी मर्जी के मामले में ही अपना रही हैं जबकि ये रिश्ता तो सम्पूर्ण समर्पण से जुड़ा है और ऐसे में पति पत्नी को एक दुसरे से जुडी हर स्थिति को अपनाना होता है.

और काम तो चाहे पति हो या पत्नी सभी को आना ही चाहिए.

शिखा कौशिक ने कहा…

यह व्यक्ति -व्यक्ति पर निर्भर है .उसे कैसे संस्कार मिले हैं ?यह भी इस मामले में महत्व रखता है .जिसके लिए पैसा ही सब कुछ है वो प्रेम के भाव को नहीं जान पाता इसलिए वो तो पैसे को महत्व देगा किन्तु भावना प्रधान के लिए प्रेम ज्यादा महत्व रखता है .सोच पर निर्भर है सब .

डॉ0 अशोक कुमार शुक्ल ने कहा…

Shikha ji ko bahut bahut dhanyawad
mera e mail hai
aashokshuklaa@gmail.com
kabhi mera blog
http://fresh-cartoons.blogspot.com
bhi visit kariyega aabhari rahunga.

ईं.प्रदीप कुमार साहनी ने कहा…

बहुत अच्छा और प्रासंगिक विषय चुना आपने शालिनी जी |
महिला विशेष पर यह नित्भर करता है की वो कैसा जीवन साथी चाहती हैं | जहाँ तक मेरा ख्याल है ज्यादातर महिलाएं (९०%) हमेशा यही चाहेंगी की उनका जीवन साथी उस से बीस ही |
नए ब्लॉग के लिए आपको बहुत बहुत बधाई |