शनिवार, 3 नवंबर 2012

नव गीत पुराने कलशों में--गीत ----डा श्याम गुप्त...



                                     
नव  गीत पुराने कलशों में ....

नव गीत पुराने कलशों में ,
मैं भर कर के ले आया हूँ |
ज्यों विविध व्यंजन नवयुग के,
पत्तल-दौनों में लाया हूँ  |

हैं भाव नए गीतों के पर,
हैं शब्द-छंद प्राचीन विविध |
जैसे हो शुद्ध संग्रहित मधु ,
नव बोतल में भर लाया हूँ |

हो क्रान्ति नव विचारों की , हाँ -
सत्-शुचि अनुभव से अभिसिंचित |
कह  सकें कि युग मंथित स्वर के,
शुचि भाव संजो कर लाया हूँ |

नव पीढ़ी अन्वित नवोन्मेष ,
स्फूर्त व नूतन भाव-तथ्य |
भावित पूर्वजों के अनुभव से,
मज्जित, सज्जित कर लाया हूँ |

युगबोध निमज्जित नहीं रहे ,
कैसी कविता , कैसी गाथा  |
संचित  वे भूत-भविष्य भाव,
हित वर्तमान के लाया हूँ |

नवयुग की आशाओं से युत,
निज संस्कृति के संस्कार सहित |
पग रखें प्रगति के पथ पर हम,
आशा भविष्य की लाया हूँ ||

9 टिप्‍पणियां:

***Punam*** ने कहा…

नवयुग की आशाओं से युत,
निज संस्कृति के संस्कार सहित |
पग रखें प्रगति के पथ पर हम,
आशा भविष्य की लाया हूँ ||

बहुत खूब....
प्रेरक...

संगीता पुरी ने कहा…

वाह .. बहुत खूब ..

sangita ने कहा…

नई दिशाएं नए पथ पर नई सोच के साथ ,आभार सहित

Manu Tyagi ने कहा…

बहुत सुंदर

डॉ शिखा कौशिक ''नूतन '' ने कहा…

नवयुग की आशाओं से युत,
निज संस्कृति के संस्कार सहित |
पग रखें प्रगति के पथ पर हम,
आशा भविष्य की लाया हूँ ||

सुन्दर प्रस्तुति आभार

डा. श्याम गुप्त ने कहा…

धन्यवाद पूनम जी, संगीतापुरी जी, संगीता जी,मनु त्यागी एवं शिखा जी ....आभार ..

शालिनी कौशिक ने कहा…

very nice presentation.

Dr.NISHA MAHARANA ने कहा…

waah bahut sundar geet..

डा. श्याम गुप्त ने कहा…

धन्यवाद निशा जी एवं शालिनी जी ....