रविवार, 18 मार्च 2012

जियो जील के जाल, टिप्पणी फिर से खोलो-

हुवे समर्थक पाँच सौ, दिव्या दिव्य कमाल ।

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हुवे समर्थक पाँच सौ, दिव्या दिव्य कमाल । 
बढे चढ़े उत्साह नित, जियो जील के जाल ।

जियो जील के जाल, टिप्पणी फिर से खोलो ।
रहा सभी को साल, साल में सम्मुख बोलो ।

होय ईर्ष्या मोय, बताओ औषधि डाक्टर ।
शतक समर्थक पूर,  करे कैसे यह रविकर ।।

2 टिप्‍पणियां:

डा. श्याम गुप्त ने कहा…

"रविकर रवितनया बने,मिलें टिप्पणी साठ ,
चाहे जो लिखिये यथा, सब लेंगे निज माथ।
सब लेंगे निज माथ,जिया गद्गद होजाये ,
लिखिये कुछ भी खूब,जिया को जो भी भाये।
लिखो दनादन खूब, उगा या छुपा हो दिनकर,
करो नहीं यह चाह , रहे यदि रविकर, रविकर ॥"

amrendra "amar" ने कहा…

खूबसूरत अहसासों से रची गई सुन्दर रचना....