सोमवार, 3 सितंबर 2012

धर्म संकट

रमा  अपने हर धर्म का पालन बाखूबी करती रही ,अच्छी बेटी ,अच्छी बहन फिर अच्छी पत्नी ,अच्छी माँ कहलाई |वक़्त अपनी गति से आगे बढ़ता रहा उसने अपनी परवाह ना करते हुए हमेशा हर पल अपनों के लिए जिया कहीं किसी को काँटा भी चुभा तो दर्द उसको हुआ वक़्त परवान चढ़ा वो सास बन गई पर उसके व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया घर में एक सदस्य के और आ जाने से वो अपने परिवार की सम्रद्धि समझ फूली नहीं समाई |उसे बहुत क्रोध आता था जब उसको  सास बहु के किस्से कडवाहट के साथ सुनाये जाते थे उसे अपने ऊपर भरोसा था की वो लोगों की इस कहावत को झूठा साबित कर देगी  कि सास बहु को बेटी नहीं मानती वो लोगों के सामने एक मिसाल रखना चाहती थी ,बहुत प्यार था उसके दिल में अपनी बहु के लिए जिस तरह अपने बेटे बेटी के लिए ---पर आने वाले वक़्त में क्या होगा कुछ पता नहीं ----बेटी प्रेग्नेंट हुई उसे अपनी माँ कि जरूरत पड़ी क्यूंकि उसकी सास उन्ही दिनों बहुत बीमार चल रही थी और कोई मदद करने वाला नहीं था अतः अपना स्नेह और फर्ज समझ कर माँ बेटी के पास चली गई डिलीवरी के लिए दो तीन महीने बचे थे खुशखबरी मिली कि बहु भी प्रेग्नेंट हो गई उसकी ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं था बधाई देते नहीं थक रही थी ---उस दिन से बहु के मन में ये इच्छा जोर मारने लगी कि सास अपनी बेटी को छोड़ कर उसकी सेवा के लिए आ जाए उसका समाधान सोचते हुए रमा और उसकी ननद ने उसे भी वहीँ बुलाने कि सोची जो बहु और बेटे दोनों को मंजूर नहीं हुई दिन बीतते रहे बहु के मन में सास के प्रति नफ़रत भरती रही सास उसके मन से अनभिग्य रही सास के कहने पर बहु ना अपने मायके गई न ही अपने मायके से किसी को बुलाया ----दो महीने बाद बेटी कि डिलीवरी हो गई इधर बहु  हर बार फोन पर बोल देती मैं ठीक हूँ अपना ध्यान रख रही हूँ आप आराम से आइये चार महीने बाद जब बहु को नोवा महीना लग गया उसकी सास और साथ में ननद भी (क्यूंकि ननद ने कहा आब मैं भी भाभी कि दिन रात सेवा करुँगी )बहु के पास पंहुच गई ----बहु को एक कप भी उठाने नहीं दिया दिन रात सेवा कि एक महीने बाद डिलीवरी हुई २६ दिन के बाद बहु कि माँ आ गई अतः बहु कि सास और ननद का वापस जाने का प्रोग्राम था ननद के पहले बच्चे के स्कूल एक महीने पहले खुल चुके थे और माँ को साथ जाना था क्यूंकि दामाद सेना में होने के कारण फील्ड पोस्टिंग में जा चूका था अतः बेटी को दो साल माँ पापा के पास ही रहना था (क्यूंकि दामाद भी यही चाहता था,क्यूंकि वहां ससुराल में बच्चे के स्कूल कि प्रोब्लम थी   )-------उस दिन से आज तक सास भी और ननद भी बहु कि आँख का काँटा हैं --------जो इस कहानी का मुख्य किरदार रमा है उसके दिल पर क्या गुजर रही है भगवान् ही जाने ,आप भी अपनी राय रखिये कि उससे कहाँ चूक हो गई जिससे उसके स्वप्न और एक आदर्श सास बनने के मंसूबे तहस -नहस हो गए उसकी क्या गलती थी ,उसके लिए तो ये भगवान् ने एक धर्म संकट पैदा किया था  ???

6 टिप्‍पणियां:

Madan Mohan Saxena ने कहा…

बेह्तरीन अभिव्यक्ति .आपका ब्लॉग देखा मैने और नमन है आपको
और बहुत ही सुन्दर शब्दों से सजाया गया है लिखते रहिये और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.

http://madan-saxena.blogspot.in/
http://mmsaxena.blogspot.in/
http://madanmohansaxena.blogspot.in/

डा. श्याम गुप्त ने कहा…

क्या एक अकेली रमा ही थी सब करने के लिए ...बहू के मायके वाले एवं बेटी के ससुराल वाले क्या कर रहे थे ...
--- गलती किसी की भी नहीं है ...आपसी संवाद की कमी है... बहू--बेटी व रमा तीनों को आपस में एवं अपने-अपने दोनों पक्षों ..ससुराल व मायका ...से बात करके कार्य को क्रियान्वन करना चाहिए ...यदि बहू सास के प्रति दुर्भावना रखती है तो बहू गलत राह पर है...

Rajesh Kumari ने कहा…

क्या एक अकेली रमा ही थी सब करने के लिए----
डा. श्याम गुप्त जी आपकी ये पंक्ति ही आलेख के मर्म तक पंहुच गई आभार आपका

शिखा कौशिक 'नूतन ' ने कहा…

saas ne dharm का palan kiya .yadi koi nadani में yah न samjhe तो uski upeksha hi karni chahiye .sarthak prastuti .aabhar

रविकर फैजाबादी ने कहा…

उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवार के चर्चा मंच पर ।।

शालिनी कौशिक ने कहा…

रमा से कोई भूल नहीं हुई नासमझी बहु की है .बहुत सुन्दर व् सार्थक प्रस्तुति