मंगलवार, 17 जनवरी 2012

परी मेरी अब सोयेगी

रात ये कितनी बाकि है,
पुछ रहा हूँ तारों से;
पवन सुखद बनाने को,
अब कहता हूँ बहारों से ।

चाँद को ही बुलाया है,
निद्रासन मंगवाया है;
परी मेरी अब सोयेगी,
भँवरों से लोरी गवाया है ।

डैडी की सुन्दर गुड़िया है,
मम्मी की जान की पुड़िया है;
क्यों रात को पहरा देती है,
ज्यों सबकी दादी बुढ़िया है ।

स्वयं पुष्पराज ही आयेंगे,
खुशबू मधुर फैलायेंगे;
निद्रादेवी संग चाकर लाकर,
मिल गोद में सब सुलायेंगे ।

परी मेरी न रोयेगी,
परी मेरी अब सोयेगी ।

3 टिप्‍पणियां:

Atul Shrivastava ने कहा…

सुंदर रचना।

veerubhai ने कहा…

कोमल भाव की सुन्दर रचना - 'पूछ' रही है तारों से कर लें वर्तनी की अशुद्धि कविता के वजन को भी घटाती है -'बाकी' लिखें .कविता में भाव सौन्दर्य है कोमल भावना का प्रस्फुटन है .

शिखा कौशिक ने कहा…

bahut sundar bhavon ko samete prastuti .aabhar