सोमवार, 17 अक्टूबर 2011

आवश्यक सूचना

                                 

                                                                                   
'भारतीय नारी ब्लॉग'' के योगदानकर्ताओं से विनम्र निवेदन है कि वे अपनी पोस्ट प्रकाशित करने से पूर्व यह देख लें कि पिछली पोस्ट कब प्रकाशित की गयी है ?प्रत्येक पोस्ट के प्रकाशन के मध्य पांच घंटे का अन्तराल तो होना ही चाहिए .
                  सभी योगदानकर्ताओं को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि आपकी पोस्ट ''भारतीय नारी ''ब्लॉग के उद्देश्यों पर खरी उतरती हो .यह नारी समस्याओं को उठानें,उन पर वैचारिक वार्तालाप,बहस से सम्बंधित मंच है .अत: हर पोस्ट इसी सोच पर केन्द्रित होनी चाहिए .आप सभी विद्वान-विदुषी योगदानकर्ताओं से और अधिक मैं  अल्प -बुद्धि  क्या निवेदन कर  सकती   हूँ ?आप सभी का सहयोग पूर्व की  भांति ही मिलता रहेगा  ऐसी ही आकांक्षाओं के साथ 
                                                               शिखा कौशिक                

रविवार, 16 अक्टूबर 2011

२०२५ के प्रश्न-उत्तर --अतुकांत रचना पर तुक है |

पहले बता किस बहना का बन्धु-भाई है || 

पुरुष- प्रश्न
कितने अपरचित ले गए
धनिया उखाड़ कर -
मैंने छुआ तो  मुझको 
बाहर भगा  दिया ?
सब्जी बनाई थी 
खुश्बू भी आ सके --
 ऐ बेमुरौवत
क्यों ठोकर लगा दिया |
     File:India sex ratio map.svg        
स्त्री -उत्तर 
किचेन  में  तुम्हारी,  
 तीन  पीढ़ी  से  --
क्या घर  की  कोई  बेटी,  
खाना  बनाई है ?
तेरी  न  कोई  फुफ्फी, 
बाबा-कलाई  सूनी --
तूने  भी अपने घर 
कब राखी मनाई  है ?
भूल जा रे लोलुप, 
धनिया नहीं मिलेगी -
पहले बता, 
किस बहना का बन्धु-भाई है ??

इराक युद्ध और गर्भपात


-प्रेम प्रकाश
समय से जुड़े संदर्भ कभी खारिज नहीं होते। आप भले इन्हें भूलना चाहें या बुहारकर हाशिए पर डाल दें पर ये फिर-फिर लौट आते हैं हमारे समय की व्याख्या के लिए जरूरी औजारों से लैश होकर। इसे ही सरलीकृत तरीके से इतिहास का दोहराव भी कहते हैं। 21वीं सदी की दस्तक के साथ विश्व इतिहास ने वह घटनाक्रम भी देखा जिसने हमारे दौर की हिंसा का सबसे नग्न चेहरा सामने आया। खबरों पर बारीक नजर रखने वालों को 2003 के इराक युद्ध का रातोंरात बदलता और गहराता घटनाक्रम आज भी याद है। ऐसे लोग तब के अखबारों में आई इस रिपोर्ट को भूले नहीं होंगे कि जंग के आगाज से पहले सबसे ज्यादा चहल-पहल वहां प्रसूति गृहों में देखी गई थी। सैकड़ों-हजारों की संख्या में गर्भवती महिलाएं अपने बच्चों को समय पूर्व जन्म देने के लिए वहां जुटने लगी थीं। यही नहीं ये माताएं जन्म देने के बाद अपने बच्चे को अस्पताल में ही छोड़कर घर जाने की जिद्द करती थीं। पूरी दुनिया से जो पत्रकार युद्ध और युद्धपूर्व की इराकी हालात की रिपोर्टिंग करने वहां गए थे, उनके लिए यह एक विचलित कर देने वाला अनुभव था।
पहली नजर में यही समझ में आ रहा था कि युद्ध की विभिषिका ने ममता की गोद को भी पत्थरा दिया है। पर ऐसा था नहीं। सामान्य तौर पर युद्ध के दौरान स्कूलों-अस्पतालों पर किसी तरह का आक्रमण नहीं किया जाता। और इराक की माताएं नहीं चाहती थीं कि उनका नौनिहाल युद्ध की भेंट चढ़ें। इसलिए उसके समय पूर्व जन्म से लेकर उनकी जीवन सुरक्षा को लेकर वे प्राणपन से तत्पर थीं। करीब आठ साल पहले इराक में मां और ममता का जो आंखों को नम कर देने वाला आख्यान लिखा गया, उसका दूसरा खंड इन दिनों अपने देश में लिखा जा रहा है। हाल की एक खबर में यह आया कि उत्तर प्रदेश में करीब 40 हजार सिपाहियों की भर्ती होनी है। भर्ती का यह मौका वहां के लोगों के लिए इसलिए भी बड़ा है कि इनमें महिला-पुरुष दोनों के लिए बराबर का मौका  है।
प्रदेश में बेराजगारी का आलम यह है कि गर्भवती युवतियां अपनी कोख के साथ खिलवाड़ कर नौकरी की इस होड़ में शामिल होना चाहती हैं। धन्य हैं वे डॉक्टर भी जो अपने पेशागत धर्म को भूलकर एक अमानवीय और बर्बर ठहराए जाने वाले कृत्य को मदद पहुंचा रहे हैं। महज नौकरी की लालच में बड़े पैमाने पर गर्भपात कराने का ऐसा मामला देश-दुनिया में शायद ही इससे पहले कभी सुना गया हो। मायावती सरकार के कानों तक भी यह शिकायत पहुंची है। अच्छी बात यह है कि सरकार ने इस शिकायत को दरकिनार या खारिज नहीं किया है और वह इस मामले में निजी चिकित्सकों से निपटने की बात कह रही है।
पर असल मुद्दा इस मामले में कार्रवाई से ज्यादा उस नौबत को समझना है, जिसने ममता की सजलता को निर्जल बना दिया। क्या इस घटना से सिर्फ यह साबित होता है कि रोटी की भूख और बेरोजगारी के दंश के आगे हर मानवीय सरोकार बेमानी हैं या यह घटना इस बात की गवाही है कि संवेदना के सबसे सुरक्षित दायरे भी आज सुरक्षित नहीं रहे। यौन हिंसा से लेकर संबंधों की तोड़-जोड़ की खबरों की गिनती और आमद अब इतनी बढ़ गई है कि इन्हें अब लोग रुटीन खबरों की तरह लेने लगे हैं। इन्हें पढ़कर न अब कोई चौंकता है और न ही कोई हाय-तौबा मचती है।
बहरहाल, यह बात भी अपनी जगह नकारी नहीं जा सकती कि अपने देश में महिला सम्मान और उसके अधिकार और महत्व को लेकर बहस किसी अन्य देश या संस्कृति से पुरानी है। दिलचस्प है कि लोक और परंपरा के साथ सिंची जाती हरियाली आज समय की सबसे तेज तपिश की झुलस से बचने के लिए हाथ-पैर मार रही है। रोटी का तर्क मातृत्व के संवेदनशील तकाजे पर भी भारी पड़ सकता है, यह जानना अपने देशकाल को उसके सबसे बुरे हश्र के साथ जानने जैसा है। भारत और भारतीय परंपरा के हिमायतियों को भी सोचना होगा कि वह इस क्रूर सच का चेहरा कैसे बदलेंगे। क्योंकि अगर परंपरा का बहाव जहरीला हो जाए तो उसका आगे का सफर और गंतव्य भी सुरक्षित तो नहीं ही रहेगा।

...जब थक के सो जाती है माँ

Please See Bloggers' Meet Weekly 13

'माँ' The mother Part 1 


यह एक विशेष भेंट है जो कि हम अपने पाठकों की नज़्र कर रहे हैं।
उम्मीद है कि यह भेंट आप सभी भाई बहनों को ज़रूर पसंद आएगी।

मौत की आग़ोश में जब थक के सो जाती है माँ
तब कहीं जाकर ‘रज़ा‘ थोड़ा सुकूं पाती है माँ
 

करवा : विवाह संस्था की नई सीख--प्रेम प्रकाश

[भारतीय nari ब्लॉग के सभी स्नेही व् सम्मानित   योगदानकर्ताओं  का ह्रदय  से  धन्यवाद  करती हूँ इस ब्लॉग को  दिन  प्रतिदिन  एक  सार्थक दिशा की ओर अग्रसर करने हेतु .प्रेम जी का यह आलेख करवा -chauth  के पावन अवसर पर कल ही प्रकाशित हो जाना चाहिए था किन्तु  तकनीकी गड़बड़ी के कारण मैं  यह करने में असमर्थ रही .aap  सभी के आलेख  पढ़  रही हूँ पर error  137 के कारण ब्लॉग नहीं खुल रहे इसलिए टिप्पणी करने में  असमर्थ हूँ .श्याम गुप्त जी का भी इस ब्लॉग पर शुभागमन हो चूका  है उनका भी आभार व्यक्त करती हूँ . ]
         शुभकामनाओं के साथ
शिखा कौशिक
करवा : विवाह संस्था की नई सीख
-प्रेम प्रकाश
परंपरा जब आधुनिकता से गलबहियां डालकर डग भरती है तो जो "फ्यूजन' क्रिएट होता है, उसकी स्वीकार्यता आश्चर्यजनक रूप से काफी बढ़ जाती है। बात नवरात्र के गरबा रास की हो या करवा चौथ की, नए दौर में पुरानी परंपराओं से जुड़ने वालों की कमी नहीं है। करवा चौथ की कथा पारंपरिक पतिव्रता पत्नियों की चाहे जैसी भी छवि पेश करती रही हो, इस व्रत को करने वाली नई दौर की सौभाग्यवतियों ने न सिर्फ इस पुराकथा को बदला है बल्कि इस पर्व को मनाने के नए औचित्य भी गढ़े हैं। विवाह नाम की संस्था आज दांपत्य निर्वाह का महज संकल्प भर नहीं है, जहां स्त्री-पुरुष संबंध के तमाम  स्तरों और सरोकारों को महज संतानोत्पत्ति के महालक्ष्य के लिए तिरोहित कर दिए जाएं। संबंधों के स्तर पर व्यावहारिकता और व्यावहारिकता के स्तर पर एक-दूसरे के मुताबिक होने-ढलने की ढेर सारी हसरतें, नए दौर में विवाह संस्था के ईंट-गारे हैं।
करवा चौथ की पुरानी लीक आज विवाह संस्था की नई सीख है। खूबसूरत बात यह है कि इसे चहक के साथ सीखने और बरतने वालों में महज पति-पत्नी ही नहीं, एक-दूसरे को दोस्ती और प्यार के सुर्ख गुलाब भेंट करने वाले युवक-युवती भी शामिल हैं। दो साल पहले शादी के बाद बिहार से अमेरिका शिफ्ट होने वाले प्रत्यंचा और मयंक को खुशी इस बात की है कि वे इस बार करवा चौथ अपने देश में अपने परिवार के साथ मनाएंगे। तो वहीं नोएडा की प्राइवेट यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाली प्रेरणा इस खुशी से भर रही है कि वह पहली बार करवा चौथ करेगी और वह भी अपने प्यारे दोस्त के लिए। दोनों ही मामलों में खास बात यह है कि व्रत करने वाले एक नहीं दोनों हैं, यानी ई·ार से अपने साथी के लिए वरदान मांगने में कोई पीछे नहीं रहना चाहता। सबको अपने प्यार पर फख्र है और सभी उसकी लंबी उम्र के लिए ख्वाहिशमंद।
भारतीय समाज में दांपत्य संबंध के तमाम अंतर्विरोधों के बावजूद उसे बनाए, टिकाए और निभाते चलने की वजहें ज्यादा कारगर हैं। यह बड़ी बात है और खासकर उस दौर में जब लिव-इन और समलैंगिक जैसे वैकल्पिक और खुले संबंधों की वकालत सड़क से अदालत तक गूंज रही है। अमेरिका और स्वीडन जैसे देशों में तलाक के मामले जहां 54-55 फीसद हैं, वहीं अपने देश में यह फीसद आज भी बमुश्किल 1.1 फीसद है। जाहिर है कि टिकाऊ और दीर्घायु दांपत्य के पीछे अकेली वजह परंपरा निर्वाह नहीं हो सकती। सचाई तो यह है कि नए दौर में पति-पत्नी का संबंध चर-अनुचर या स्वामी-दासी जैसा नहीं रह गया है। पूरे दिन करवा चौथ के नाम पर निर्जल उपवास के साथ पति की स्वस्थ और लंबी उम्र की कामना कुछ  दशक पहले तक पत्नियां इसलिए भी करती थीं कि क्योंकि वह अपने पति के आगे खुद को हर तरीके से मोहताज मानती थी, लिहाजा अपने "उनके' लंबे साथ की कामना उनकी मजबूरी भी थी। आज ये मजबूरियां मेड फॉर इच अदर के रोमांटिक यथार्थ में बदल चुकी हैं। परिवार के संयुक्त की जगह एकल संरचना एक-दूसरे के प्रति जुड़ाव को कई स्तरों पर सशक्त करते हैं। यह फिनोमिना गांवों-कस्बों से ज्यादा नगरों-महानगरों में ज्यादा इसलिए भी दिखता है कि यहां पति-पत्नी दोनों कामकाजी हैं, दोनों परिवार को चलाने के लिए घर से लेकर बाहर तक बराबर का योगदान करते हैं। इसलिए जब एक-दूसरे की फिक्र करने की बारी भी आती है तो उत्साह दोनों ओर से दिखता है। पत्नी की हथेली पर मेंहदी सजे, इसकी खुशी पति में भी दिखती है, पति की पसंद वाले ट्राउजर की खरीद के लिए पत्नी भी खुशी से साथ बाजार निकलती है। यही नहीं अब तो बच्चे पर प्यार उडे़लने में भी मां-पिता की भूमिका बंटी-बंटी नहीं बल्कि समान होती जा रही है।
करवा चौथ के दिन एक तरफ भाजपा नेता सुषमा स्वराज कांजीवरम या बनारसी साड़ी और सिंदूरी लाली के बीच पारंपरिक गहनों से लदी-फदी जब व्रत की थाली सजाए टीवी पर दिखती हैं तो वहीं देश के सबसे ज्यादा चर्चित और गौरवशाली परिवार का दर्जा पाने वाले बच्चन परिवार में भी इस पर्व को लेकर उतना ही उत्साह दिखता है। साफ है कि नया परिवार संस्कार अपनी-अपनी तरह से परंपरा की गोद में दूध पी रहा है। यह गोद किसी जड़ परंपरा की नहीं समय के साथ बदलते नित्य नूतन होती परंपरा की है। भारतीय लोक परंपरा के पक्ष में अच्छी बात यह है कि इसमें समायोजन की प्रवृत्ति प्रबल है। नए दौर की जरूरतों और मान्यताओं को आत्मसात कर बदलती तो है पर बिगड़ती नहीं। करवा चौथ का बदला स्वरूप ही ज्यादा लोकप्रिय हो रहा है। अब यह पर्व कर्मकांडीय आस्था के बजाय उसी तरह सेलिब्रोट किया जा रहा है जैसे मदर्स-फादर्स और वेलेंटाइन डे। यह अलग बात है कि बदलाव के इस झोंके में बाजार ने अपनी भूमिका तलाश ली है, सबके साथ वह भी हमारी खुशियों में शामिल है।
-प्रेम प्रकाश
वरिष्ठ उप संपादक
राष्ट्रीय सहारा 

शनिवार, 15 अक्टूबर 2011

नई सदी में नारी........ डा श्याम गुप्त ..


             
                    पश्चिमी जगत के पुरुष विरोधी रूप से उभरा नारी मुक्ति संघर्ष आज व्यापक मूल्यों के पक्षधर के रूप में अग्रसर हो रहा है । यह मानव समाज के उज्जवल भविष्य का संकेत है। बीसवीं सदी का प्रथमार्ध यदि नारी जागृति का काल था तो उत्तरार्ध नारी प्रगति का । इक्कीसवी सदी क़ा यह महत्वपूर्ण पूर्वार्ध नारी सशक्तीकरण क़ा काल है। आज सिर्फ पश्चिम में ही नहीं वरन विश्व के पिछड़े देशों में भी नारी घर से बाहर खुली हवा में सांस लेरही है, एवं जीवन के हर क्षेत्र में पुरुषों से भी दो कदम आगे बढ़ा चुकी है। अब वह शीघ्र ही अतीत के उस गौरवशाली पद पर पहुँच कर ही दम लेगी जहां नारी के मनुष्य में देवत्व व धरती पर स्वर्ग की सृजिका तथा सांस्कृतिक चेतना की संबाहिका होने के कारण समाज 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता ' क़ा मूल मन्त्र गुनुगुनाने को बाध्य हुआ था ।
            
नारी की आत्म विस्मृति, दैन्यता व पराधीनता के कारणों में विभिन्न सामाजिक मान्यताएं व विशिष्ट परिस्थितियाँ रहीं हैं, जो देश, काल व समाज के अनुसार भिन्न भिन्न हैं। पश्चिम के दर्शन व संस्कृति में नारी सदैव पुरुषों से हीन, शैतान की कृति, पृथ्वी पर प्रथम अपराधी थी। वह पुरोहित नहीं हो सकती थी । यहाँ तक कि वह मानवी भी है या नहीं, यह भी विवाद क़ा विषय था। इसीलिये पश्चिम की नारी आत्म धिक्कार के रूप में एवं बदले की भावना से कभी फैशन के नाम पर निर्वस्त्र होती है तो कभी पुरुष की बराबरी के नाम पर अविवेकशील व अमर्यादित व्यवहार करती है।
                 
पश्चिम के विपरीत भारतीय संस्कृति व दर्शन में नारी क़ा सदैव गौरवपूर्ण व पुरुष से श्रेष्ठतर स्थान रहा है। 'अर्धनारीश्वर ' की कल्पना अन्यंत्र कहाँ है। भारतीय दर्शन में सृष्टि क़ा मूल कारण  अखंड मातृसत्ता - अदिति भी नारी है। वेद माता गायत्री है। प्राचीन काल में स्त्री ऋषिका भी थी, पुरोहित भी | वह गृह-स्वामिनी, अर्धांगिनी, श्री, समृद्धि आदि रूपों से सुशोभित थी। कोई  भी पूजा, यज्ञ, अनुष्ठान उसके बिना पूरा नहीं होता था। ऋग्वेद की ऋषिका -शची पोलोमी कहती है--
" अहं केतुरहं मूर्धाहमुग्रा विवाचनी । ममेदनु क्रतुपति: सेहनाया उपाचरेत ॥ "---ऋग्वेद -१०/१५९/२..   अर्थात-मैं ध्वजारूप (गृह स्वामिनी ) तीब्र बुद्धि वाली एवं प्रत्येक विषय पर परामर्श देने में समर्थ हूँ । मेरे कार्यों क़ा मेरे पतिदेव सदा समर्थन करते हैं । 
हाँ, मध्ययुगीन अन्धकार के काल में बर्बर व असभ्य विदेशी आक्रान्ताओं की लम्बी पराधीनता से उत्पन्न विषम सामाजिक स्थिति के घुटन भरे माहौल के कारण भारतीय नारी की चेतना भी अज्ञानता के अन्धकार में खोगई थी।
                                   
नई सदी में नारी को समाज की नियंता बनने के लिए किसी से अधिकार माँगने की आवश्यकता नहीं है,वरन् उसे अर्जित करने की है। आरक्षण की वैशाखियों पर अधिक दूर तक कौन जासका है । परिश्रम से अर्जित अधिकार ही स्थायी संपत्ति हो सकते हैं। परन्तु पुरुषों की बराबरी के नाम पर स्त्रियोचित गुणों व कर्तव्यों क़ा बलिदान नहीं किया जाना चाहिए। ममता, वात्सल्य, उदारता, धैर्य, लज्जा आदि नारी सुलभ गुणों के कारण ही नारी, पुरुष से श्रेष्ठ है। जहां ' कामायनी ' क़ा रचनाकार " नारी तुम केवल श्रृद्धा हो" से नतमस्तक होता है, वहीं वैदिक ऋषि घोषणा करता है कि-"....स्त्री हि ब्रह्मा विभूविथ :" उचित आचरण, ज्ञान से नारी तुम निश्चय ही ब्रह्मा की पदवी पाने योग्य हो सकती हो। ( ऋ.८/३३/१६ )।
                
नारी मुक्ति व सशक्तीकरण क़ा यह मार्ग भटकाव व मृगमरीचिका से भी मुक्त नहीं है। नारी-विवेक की सीमाएं तोड़ने पर सारा मानव समाज खतरे में पड़ सक़ता है। भौतिकता प्रधान युग में सौन्दर्य की परिभाषा सिर्फ शरीर तक ही सिमट जाती है। नारी मुक्ति के नाम पर उसकी जड़ों में कुठाराघात करने की भूमिका में मुक्त बाज़ार व्यवस्था व पुरुषों के अपने स्वार्थ हैं । परन्तु नारी की समझौते वाली भूमिका के बिना यह संभव नहीं है। अपने को 'बोल्ड' एवं आधुनिक सिद्ध करने की होड़ में, अधिकाधिक उत्तेज़क रूप में प्रस्तुत करने की धारणा न तो शास्त्रीय ही है और न भारतीय । आज नारी गरिमा के इस घातक प्रचलन क़ा प्रभाव तथाकथित प्रगतिशील समाज में तो है ही, ग्रामीण समाज व कस्बे भी इसी हवा में हिलते नज़र आ रहे हैं। नई पीढी दिग्भ्रमित व असुरक्षित है। युवतियों के आदर्श वालीवुड व हालीवुड की अभिनेत्रियाँ हैं। सीता, मदालसा, अपाला, लक्ष्मी बाई, ज़ोन ऑफ़ आर्क के आदर्श व उनको जानना पिछड़ेपन की निशानी है।
               
इस स्थिति से उबरने क़ा एकमात्र उपाय यही है कि नारी अन्धानुकरण त्याग कर, भोगवादी संस्कृति से अपने को मुक्त करे। अपनी लाखों, करोड़ों पिछड़ी अनपढ़ बेसहारा बहनों के दुख-दर्दों को बांटकर उन्हें शैक्षिक, सामाजिक, व आर्थिक स्वाबलंबन क़ा मार्ग दिखाकर सभी को अपने साथ प्रगति के मार्ग पर अग्रसर होना सिखाये । तभी सही अर्थों में सशक्त होकर नारी इक्कीसवीं सदी की समाज की नियंता हो सकेगी ।


शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2011

मेरे अनुभव (Mere Anubhav): एक बार फिर हैवानों की हैवानियत ने किया इंसानियत को...


मैने कुछ दिन पहले (भारतीय नारी ब्लाग के सितम्बर माह के विषय ‘मादा भ्रूण हत्या’ को समर्पित एक प्रश्नावली ) पंक्तियां लि
खी थीं
चीखों जैसी किलकारियां
आज pallavi ji ke

मेरे अनुभव ब्लाग पर
एक पोस्ट देखकर बरबस ही उन किलकारियों की आवाज इस पोस्ट से आती हुयी प्रतीत हुयी सो इसके लिंक को आपके साथ साझा कर रहा हूँ

आखिर क्यों ?
किसी एक का सृजन पूज्य है
और दूसरे का त्याज्य ?
किसी का निर्माण वरदान सा हैं
और दूसरे का अभिशप्त !

मेरे अनुभव (Mere Anubhav): एक बार फिर हैवानों की हैवानियत ने किया इंसानियत को...: आप सभी को याद हो अगर तो मैंने बहुत दिनों पहले एक पोस्ट लिखी थी। जिसका शीर्षक था मरती हुई भावनायें। आज यह तस्वीर जो आप ऊपर देख रहे है उस को ...