सोमवार, 4 मार्च 2013

दामिनी गैंगरेप कांड :एक राजनीतिक साजिश ?

दामिनी गैंगरेप कांड :एक राजनीतिक साजिश ?
  

भारतीय राजनीति साजिशें रचती रही है और साजिशों का शिकार होती रही है किन्तु एक और तथ्य इसके साथ उल्लेखनीय है कि यहाँ जो दिग्गज बैठे हैं उन्हें साजिशें रचने में रुचि है उन्हें खोलने में नहीं .इन साजिशों का कुप्रभाव उनके विरोधी दिग्गज पर पड़ता है किन्तु बर्बाद हमेशा जनता होती है .सत्ता के लिए रची जाने वाले ये साजिशें जनता के लिए बर्बादी ही लाती हैं इन राजनीतिज्ञों के लिए नहीं क्योंकि ये तो जोड़ तोड़ जानते हैं और अपने को सभी तरह की परिस्थितियों में ढाल लेते हैं .
     यूँ तो सत्ता का तख्ता पलटने को साजिशें निरंतर चलती रहती हैं किन्तु ये साजिशें तब और अधिक बढ़ जाती हैं जब किसी भी जगह चुनाव की घडी निकट आ जाती है .पहले हमारे नेतागण अपने कार्यों द्वारा जनसेवा कर जनता का समर्थन हासिल करते थे पर अब स्थिति पलट चुकी है और जनता के दिमाग को प्रभावित करने के लिए सेवा दबंगई में परिवर्तित हो चुकी है .गुनाहों की दलदल में गहराई तक धंस चुकी हमारी राजनीति की इस सच्चाई को हम सभी जानते हैं किन्तु हमें इस बारे में एक बार फिर सोचने को विवश किया है सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश और वर्तमान में भारतीय प्रैस परिषद् के अध्यक्ष ''माननीय मार्कंडेय  काटजू जी ''के इस बयान ने ''कि मैं यह मानने को तैयार नहीं कि वर्ष २००२ के गुजरात दंगों में मोदी का हाथ नहीं था .''कानूनी प्रक्रिया को भली प्रकार जानने वाले ,उसका सम्मान करने वाले और देश की वर्तमान परिस्थितियों से जागरूकता के साथ जुड़े रहने वाले माननीय काटजू जी का ये बयान इसलिए महत्वपूर्ण है कि ये कथन एक ऐसे नेता की ओर इंगित है जिसे सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित एस.आई.टी.द्वारा तीन बार इस मामले में क्लीन चिट दी गयी है और जिसके बारे में ये तथ्य भी आज सबके सामने है  कि वे गुजरात में विकास के अग्रदूत हैं .
    ये बयान और किसी तरफ हमारा ध्यान आकर्षित करे या न करे किन्तु हमें सत्ता लोलुप नेताओं की साजिशों की गहराई में जाने को अवश्य विवश करता है और ध्यान  दिलाता है अभी हाल  में ही देश क्या सम्पूर्ण विश्व को हिला देने वाले ''दामिनी गैंगरेप कांड ''की जिसके बारे में बहुत से तथ्य ऐसे हैं जो संदेह के घेरे में इस कांड को ले आते हैं।यूँ तो देखने में यह कांड ६ दरिदों के द्वारा अपनी हवस को बुझाने के लिए किया गया एक सामान्य गैंगरेप कांड ही दिखाई देता है इस कांड की निम्न बातें जो कि संदेह के घेरे में हैं वे निम्न लिखित हैं -
-सबसे पहले तो पुलिस द्वारा व्यापारी की बात पर ध्यान न दिया जाना और बस को दिल्ली जैसी जगह जहाँ आतंकवादियों की गहमागहमी के कारण पुलिस सतर्कता कुछ ज्यादा ही रखी जाती है ,बस को आराम से २ घंटे तक घूमने देना .
 -दूसरे बस का घुमते रहना तो पुलिस की नज़र में न आना किन्तु घटना की सूचना पर उसका ४ मिनट में वहां पहुँच जाना .
-तीसरे बड़े से बड़े अपराधी जिनके बारे में कोई खास खोजबीन आवश्यक नहीं होती वे तो पुलिस की गिरफ्त में आने में सालों लग जाते हैं और ये अपराधी जिनके बारे में जानकारी जुटाना ही पहले मुश्किल था उन्हें मात्र ७२ घंटे में गिरफ्तार कर लेना .
 -दामिनी व् उसके दोस्त को अपराधियों द्वारा जिन्दा सड़क पर फैंक देना आमतौर पर ऐसे मामलों में अपराधी न पीड़ित को जिंदा छोड़ते हैं न चश्मदीद को .
-और पुलिस द्वारा लगातार मुख्यमंत्री के आदेशों की अवहेलना .
       ऊपर ऊपर से साधारण  गैगरेप कांड लगने वाले इस कांड के ये तथ्य ही इस कांड को रहस्य के घेरे में ले आते हैं कि आखिर उन दरिंदों ने यहाँ इतनी सहृदयता क्यों दिखाई कि दामिनी व् उसके दोस्त को जिंदा छोड़ दिया क्योंकि यदि वे उन्हें जिन्दा न छोड़ते तो एक लड़के व् एक लड़की का साथ इस तरह से मिलने में पूरा शक लड़के पर ही जाता और दामिनी भी उसी सामान्य मानसिकता से भुला दी जाती जो एक लड़के व् लड़की के साथ को शक की नज़र से ही देखते हैं .फिर अपराधियों को इतनी शीघ्रता से जेल के सींखचों के पीछे लिया जाना ये संदेह उत्पन्न  करता है कि कहीं न कहीं ये अपराधी पुलिस की पकड़ में ही थे .जनता के क्रोध से उन्हें बचाने  और मामला कहीं जनता के दबाव में वे अपराधी खोल ही न दें इसलिए उन्हें इतनी शीघ्रता से गिरफ्तार करना दिखाया गया और दामिनी व् उसके दोस्त को यूँ ही जिंदा छोड़ा गया ताकि जनता में उन्हें लेकर सहानुभूति बढे और साजिश रचने वाले को वह मनचाहा परिणाम मिल जाये जिसके लिए एक उभरती प्रतिभा मासूम ऐसी वहशियाना हरकत की भेंट चढ़ा दी गयी .१६ दिसंबर के बाद से भी ऐसी घटनाएँ बंद थोड़े ही हुई हैं बल्कि जितनी बाढ़ अब आई हुई है इतनी शायद पहले कभी नहीं देखी होगी .खुद दिल्ली में ही एक लड़की से घर में घुसकर रेप में नाकाम रहने पर उसके मुहं में पाइप डाल दिया गया जिसके बाद से वह लड़की जीवन मृत्यु के बीच  झूल रही है और न कहीं वह राजनेता हैं जो दामिनी के मामले में फाँसी की मांग कर रहे थे और न कहीं वह जनता है जो पुलिसिया कार्यवाही से भी नहीं डर रही थी . जिंदगी फिर उसी तरह से चल पड़ी है जैसे दामिनी कांड से पहले चल रही थी .ऐसे अपराध पहले भी हुए हैं और आगे भी होंगे किन्तु इनके पीछे के हाथ कभी न दिखाई देंगे .संभव है कि गोधरा कांड की तरह इसमें भी अपराधी सजा पायें और संभव है कि वे जेल में ही निबटा दिए जाएँ क्योंकि जिस राजनीतिक साजिश का वे हिस्सा बने हैं उसने उनके भाग्य में कारावास या मृत्यु ही लिखी है कानून द्वारा या अपने हाथों द्वारा .ये भी संभव है कि ये कांड विरोधी पक्ष द्वारा सत्ता का तख्ता पलटने को ही कराया गया हो और ये भी संभव है कि सत्ता पक्ष द्वारा अपनी दबंगई दिखने को इसे अंजाम दिया गया हो फ़िलहाल ये सभी जानते हैं कि ये कभी नहीं खुलेगा .दोनों तरफ से कोरी बयानबाजी और आपसी लेनदेन ही चलता रहेगा और जनता की आँखों पर पहले के अनेकों घटनाक्रमों की तरह इस बार भी रहस्य का पर्दा पड़ा रहेगा क्योंकि ऐसी घटनाओं के सूत्रधार इस बार भी गोधरा की तरह रहस्य के घेरे में रहने वाले हैं .इससे अधिक क्या कहूं -
      ''चाँद में आग हो तो गगन क्या करे ,
       फूल ही उग्र हो तो चमन क्या करे ,
       रोकर ये कहता है मेरा तिरंगा

      कुर्सियां ही भ्रष्ट हों तो वतन क्या करे .''
 

   शालिनी कौशिक
  [कौशल ]

15 टिप्‍पणियां:

राजन ने कहा…

लेख से तो सहमत नहीं ।पर इस मामले में मुझे बस ये बात नहीं समझ नहीं आई थी कि केवल इस घटना के बाद अचानक विरोध प्रदर्शन क्यों शुरू हो गए।दिल्ली और एनसीआर में ऐसी बहुत सी घटनाएं होती हैं न्यूज चैनलों पर जिनके बारे में लगातार दिखाया जाता है एनजीओ वाले भी धरना प्रदर्शन करते रहते हैं लेकिन इसी घटना के बाद ऐसा क्या हुआ कि पब्लिक इस तरह अचानक जमा हो गई और उग्र हो गई?

शायद मैं टीवी पर पूरा घटनाक्रम देखता तो समझ पाता कि इसकी शुरुआत कैसे हुई।

डा. श्याम गुप्त ने कहा…

----जनता के स्मृति बहुत ही संक्षिप्त होती है ....
---और काटजू जैसे न्यायाधीश को सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित कमेटी के रिपोर्ट पर यह वक्तव्य शोभा नहीं देता ... इसे राजनैतिक-भावना ही माना जायगा...
--- संदेह तो प्रत्येक बात पर व्यक्त किया जा सकता है ..यहाँ फूल-प्रूफ क्या होता है...

तुषार राज रस्तोगी ने कहा…

कुछ काल्पनिक सा लेख लगा सच कहूँ तो | पर शायद प्रदर्शन इसलिए शुरू हो गए क्यों की मीडिया ने इस केस को कुछ ज्यादा हाईलाइट किया जैसे कभी पुराने जेसिका लाल तथा अन्य कासीस में हुआ था | आभार |


कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
Tamasha-E-Zindagi
Tamashaezindagi FB Page

Rajendra Kumar ने कहा…

कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों पर आपने प्रकाश डालने का सार्थक प्रयास किया है,आये दिन ऐसी घटनाये घटित हो रही है परन्तु हम और मीडिया सब घटनाओ के प्रति ज्यादा उत्सुक नही दीखते हैं.इस घटना को राजनितिक जामा पहनाने का रूप दिया जा रहा है.

anshumala ने कहा…

हमरे मुंबई में एक हवा है की कसाब को मारा नहीं गया है उसे पाकिस्तान को दे दिया गया है उसी तरह का आप का ये लेख भी निहायत ही बेतुका तथ्यों से परे ,

१ यदि देश की पुलिस इतनी सतर्क होती तो तो कही दूसरा आतंकवादी हमला नहीं होता , पुलिस सतर्क नहीं थी इसलिए ही ये कांड हुआ ,

२ पुलिस न तो वहां ४ मिनट में पहुंची थी और न ही तुरंत इलाज दिया था आप को लडके का बयान सुनना चाहिए थे जिसमे उसने बताया की कैसे उड़े दो घंटे तक सड़क पर ही पड़ा रहना पड़ा उन्हें शारीर ढकने के लिए कपडे भी नहीं दिए गए और पुलिस क्षेत्र के विवाद में ही उलझी रही ।

३ क्योकि बस सी सी टीवी में आ गई थी और उसकी पहचान हो गई क्योकि अपराधी गरीब तबके के थे , क्योकि जनता और मिडिया का दबाव बहुत ही ज्यादा हो गया था ।

४ उन लोगो ने उसे जिन्दा नहीं छोड़ा था मरा समझ कर ही छोड़ा था और उसके बाद बस से कुचलने का भी प्रयास किया था , उसके शरीरी में इतनी बुरी तरह राड घुसा दी गई थी क्या वो उसे मरने के लिए नहीं थी ।

आप को इस केस के बारे में शायद ठीक से कोई भी जानकारी नहीं है ।

MANU PRAKASH TYAGI ने कहा…

राजनेताओ को आपस में लडने से ही फुर्सत नही है

दिगम्बर नासवा ने कहा…

सच क्या है ये तो पता नहीं पर हर दल के लोग ऐसे हैं ... देश की चिंता कम से कम इन राजनेताओं को तो नहीं ही है ...

शालिनी कौशिक ने कहा…

@ ANSHUMALA JI ,
MAIN AAPKI BAT KO SAMAJH SAKTI HOON AAP BHI AAM BHARTIY NAGRIK HAIN JISE JO DIKHAYA JATA HAI VAH VAHI DEKHTA HAI .
-PULIS KE 4 MINAT ME PAHUNCHNE KEE BAT MAINE KAHI USKE BAD KEE NAHI JIS PULIS KO 2 GHANTE GHOOMTI BAS N DIKHI USE SOOCHNA PAR ITNI JALDI PAHUNCHNE KEE FURSAT KAISE MIL GAYI YAH VICHARNIY HAI .
-KSHETR VIVAD TO TABHI HUA N JAB VAH VAHAN PAHUNCH GAYI JO AAP KAH RAHI HAIN VAH USKE BAD KEE BAT HAI .-HAT ME AAYE SHIKAR KO KOI NAHI CHHODTA KEVAL VAHI JISKA VAISA KARNE KE KOI UDDESHAY HO .UNHONE UN DONO KO JINDA CHHOD DIYA YE SOCHKAR KI HAM SADAK PAR INHEN KUCHAL DENGE YE KAM TO KOI NAUSIKHIYA HI KAR SAKTA HAI YA KOI SAZISHAN .
-ROD GHUSANA MAUT KO SAMBHAVIT KARTA HAI N KI NISHCHIT .AUR INKE LIYE KANOON ME ALAG PRAVDHAN HAIN .
-AUR ADHIKANSHTAYA VAHSHIPAN US NABALIG NE KIYA JO KI VAH KAR RAHA THA JO SAMAJ SE USE MILA THA .
-BAS KO ITNI CHHOOT MILI THI KYA YE AASHCHARY NAHI HAI KI VAH GHOOMTI RAHE AUR RAPE KE BAD PEEDIT KO KUCHALTI RAHE .
-VAISE KASAB VALI BAT BHI KOI AASHCHARY NAHI 'ANDHA KANOON ''FILM TO AAPKO YAD HI HOGI .
ISLIYE THODA GAHRAI SE SOCHIYE AAJ NAHI TO KAL AAPKO MERI BAT SAMJH ME ZAROOR AAYEGI .VAISE KISI KEE SAHMATI YA ASAHMATI MAINE NAHI MANGI YE MERE VICHAR THE ZAROORI NAHI KI KOI BHI INSE SAHMAT HO.
AAP KA APNE VICHAR PRASTUT KARNE KE LIYE AABHAR .

राजन ने कहा…

shalini ji, aam bhartiya naagrik aisa hai,to phir aap kis tarah ki bhartiya naagrik hai?
waise anshumala ji ne qasaab ke udaahran se bataya na ki sabhi bhartiya ek jaisa nahin sochte balki kuch apne ati viksght dimaag (?) ka bhi istemaal karte hain.

राजन ने कहा…

is bhartiya naagrik ko ye samajh nahi aaya ki qasaab ke baare mein aap kya kahna chahti hain.
qasaab aur andha kanoon...
kya tukka hain yahan par?

राजन ने कहा…

is bhartiya naagrik ko ye samajh nahi aaya ki qasaab ke baare mein aap kya kahna chahti hain.
qasaab aur andha kanoon...
kya tukka hain yahan par?

राजन ने कहा…

oh sorry ...
upar ki tippannee mein shuruaati line ko is tarah padha jaaye...
"is aam bhartiya naagrik ko..."

शालिनी कौशिक ने कहा…

@rajan ji sabse pahle to main aapse ye kahna chahoongi ki main anshumala ji se kah rahi hoon aur jahan tak main unhen janti hoon ve apne se kiye gaye prashnon ka swayam javab de sakti hain.kya unhone aapko apna mukhtare-khas niyukt kiya hai ?
-doosre anshumala ji to saitayar likhti hain ve kabse meri tarah seedha sochne lagi .ye bhi koi bat hui ki hamne unka jaise banne kee cheshta kee to ve palat gayi.
-aur kasab aur andha kanoon koi tukka nahi balki usme janisar ko jise marne kee saza katni padti hai vah neta bad me zinda nikal aata hai .bas yahi samabndh hai kasab aur andha kanoon me .

शालिनी कौशिक ने कहा…

@rajan ji aur rahi aam bhartiy kee bat to vah ham nahi hain kyonki ham sabhi desh ke jimmedar nagrik hain aur hame bevakoof nahi banaya ja sakta jaise aam bhartiyon ko banaya ja raha hai sachcha ko apni tarah se tod mod kar prastut karke.

राजन ने कहा…

शालिनी जी,आपने ये बताकर थोडा उपकार तो किया कि आप अंशुमाला जी से बात कर रही थी लेकिन आपने ये भी देखा होगा (क्योंकि आप वैसे भी वो सब देखने में माहिर है जो दूसरों को नहीं दिखता) कि मैंने आपकी और किसी बात पर विरोध न कर केवल इसलिए वह लिखा क्योंकि आपने केवल अंशुमाला जी को जवाब न देकर आम भारतीयों को बीच में घसीटा।तो मतलब जो आपके लेख से सहमत नहीं वो अपना दिमाग लगाने के बजाए केवल सुनी सुनाई बातों पर यकीन वाले हैं।जो बात आप अपने लिए नहीं सुनना चाहती वो दूसरों के लिए क्यों कहती हैं?दूसरों को कमतर समझने वाली ये भावना मुझे कभी कभी निराश करती है अन्यथा मैं कभी भी किसके बीच में नहीं बोलता हूँ।फिर भी आपको गलत लगा आप मेरी टिप्पणी आराम से हटा सकती हैं।ब्लॉग आपका निर्णय आपका।हाँ अब मुझे लगता है मुझे थोड़ा सतर्क होना पडेगा किसीका समर्थन या विरोध करते या किसीकी टिप्पणी से कुछ कोट करते हुए ।रही बात सटायर की तो ये कहाँ हैँ ?आपके लेख में या आपकी टिप्पणी में या अंधा कानून वाले उदाहरण में थोड़ा समझना मुश्किल हो गया है।अतः इस बार बख्श दिजिए मुझ जैसे पाठक को ।