सोमवार, 14 जनवरी 2013

मरम्मत करनी है कसकर दरिन्दे हर शैतान की

 
मज़म्मत करनी है मिलकर बिगड़ते इस माहौल की ,
मरम्मत करनी है कसकर दरिन्दे हर शैतान की.


हमें न खौफ मर्दों से न डर इन दहशतगर्दों से ,
मुआफी देनी नहीं है अब मुजरिमाना किसी काम की.


मुकम्मल रखती शख्सियत नहीं चाहत मदद की है ,
मुकर्रम करनी है हालत हमें अपने सम्मान की.

गलीज़ है वो हर इन्सां जिना का ख्याल जो रखे ,
मुखन्नस कर देना उसको ख्वाहिश ये यहाँ सब की.


बहुत गम झेले औरत ने बहुत हासिल किये  हैं दर्द ,
फजीहत करके रख देगी मुकाबिल हर ज़ल्लाद की .

भरी है आज गुस्से में धधकती एक वो ज्वाला है ,
खाक कर देगी ''शालिनी''सल्तनत इन हैवानों की.


           शालिनी कौशिक
                    [कौशल]

शब्दार्थ-मज़म्मत-निंदा ,मरम्मत-शारीरिक दंड ,मुकर्रम-सम्मानित,मशक्कत-कड़ी मेहनत,मुकाबिल -सामने वाला ,गलीज़-अपवित्र,मुखन्नस-नपुंसक,मुकम्मल-सम्पूर्ण ,जिना-व्यभिचार
  


4 टिप्‍पणियां:

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

स्वागत इस जज्बे का और इस में हम सब शामिल है . ये सल्तनत तुम जैसे ही हौसलेमंद नारियों की शक्ति है और इसको अंजाम तक पहुँचाने तक जारी रखना है।

kumar zahid ने कहा…

Bahut zaroori Tewar se bhri ghazal...

डॉ शिखा कौशिक ''नूतन '' ने कहा…

सार्थक प्रस्तुति . हार्दिक आभार हम हिंदी चिट्ठाकार हैं

रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) ने कहा…

प्रभावशाली ,
जारी रहें।

शुभकामना !!!

आर्यावर्त (समृद्ध भारत की आवाज़)
आर्यावर्त में समाचार और आलेख प्रकाशन के लिए सीधे संपादक को editor.aaryaavart@gmail.com पर मेल करें।