शुक्रवार, 24 अगस्त 2012

मैं नारी

 मैं नारी  

 मैं नारी
जन्म से बंधी
उस डोर से
जिसके अनेकों सिरे
फिर भी
उलझते-सुलझते
मैं तल्लीन रहती
एक-एक रिश्तों को
सहेजने  में 
पीड़ा - व्यथा अन्तर्निहित
 लेकिन अनवरत प्रत्न्शील
जीवन पथ पर
अपनों के लिए समर्पित
कभी न थकती
हजारों सपने गढ़ती
फिर जीती भरपूर
उन सपनों  में
 एकांत के क्षणों में
टूटने पर भी
विचलित नहीं
पुनः प्रयत्नशील
गतिमान जीवन में उलझती
स्वयं की भी तलाश में
मैं नारी ।                                    

4 टिप्‍पणियां:

शालिनी कौशिक ने कहा…

bahut achchhi prastuti .aabhar

शिखा कौशिक 'नूतन ' ने कहा…

sarthak post ke sath aapka is blog par shubhagaman huaa hai .aapka bahut bahut swagat .

डा. श्याम गुप्त ने कहा…

सार्थक नारी.....

Madan Mohan Saxena ने कहा…

बहुत सुंदर भावनायें और शब्द भी ...
बेह्तरीन अभिव्यक्ति ...!!
शुभकामनायें.