रविवार, 12 अगस्त 2012

आखिर कब...

कब तक तुम नारी को
सवालों के घेरे में
कैद करके रखोगे !
और उसके मुख से निकले
हर शब्द, हर आचरण की
शल्य चिकित्सा में
प्राण प्रण से जुटे रहोगे !  
देखो, तुम्हारे सवालों के
तीक्ष्ण बाणों ने
किस तरह उसके तन मन को
छलनी कर रख दिया है !
क्यों सदियों से उसे
उन गुनाहों का दण्ड
भुगतना पड़ रहा है
जिनके उत्तरदायी तो
कोई और थे लेकिन
जिनके परिमार्जन के लिये
भेंट उसे चढ़ा दिया गया !
वह चाहे सीता हो या कुंती,
पांचाली हो या प्रेम दीवानी मीरा
हर विप्लव का कारण
उसे ही ठहराया गया और
सबके क्रोध की ज्वाला में
झुलसना उसीको पड़ा !
परोक्ष में छिप कर बैठे
इन सभी दुखांत नाटकों के
सूत्र धारों के असली चेहरे
कोई पहचान न पाया
और शुद्धिकरण के यज्ञ में
आहुति उसीकी पड़ी !
क्यों आज भी अपने हर
गुनाह के धब्बों को  
पोंछने के लिये तुम्हें
एक स्त्री के पवित्र आँचल
की आवश्यकता पड़ती है ?
क्यों तुम दर्पण में
अपना चेहरा नहीं देख पाते ?
क्या सिर्फ इसलिए कि
बलिवेदी पर भेंट चढ़ाने के लिये
एक बेजुबान पशु के मस्तक की
व्यवस्था करना तुम्हारे लिये
बहुत आसान हो गया है ? 
आज भी शायद इसीलिये
हर शहर में, हर गाँव में
हर गली में, हर मोड़ पर
अपमान और ज़िल्लत की शिकार
सिर्फ औरत ही होती है
और इन सबके गुनाहगार
शर्मिंदगी की सारी कालिख
औरत के चेहरे पर पोत
अपने चेहरों पर शराफत और
आभिजात्य का मुखौटा चढ़ाये  
बेख़ौफ़ सरे आम घूमते हैं !
क्या आज की नारी भी
अपनी अस्मिता की रक्षा
करने में अक्षम है ?
कब वह अपने अंदर की
दुर्गा, काली, चंडिका और
महिषासुरमर्दिनी को जागृत
कर पायेगी और अपने  
चारों ओर पसरे असुरों का
संहार कर अपने लिए
एक भयमुक्त समाज की
रचना कर पायेगी ?
आखिर कब ?
   
साधना वैद

11 टिप्‍पणियां:

आशा बिष्ट ने कहा…

prabhawshali rachna

Asha Saxena ने कहा…

बहुत कुछ कह् गई यह रचना
मनोभाव उजागत कर गयी
सत्य के करीब ले गयी
और विशिष्ट हो गयी |
आशा

शिखा कौशिक ने कहा…

SATEEK PRASHON KO UTHHAYA है AAPNE .STRI KE PRATI PURUSH MANSIKTA ME AB TAK KUCHH BHI PARIVARTAN N AANA PURUSH AHAM KA PARINAM है .SARTHAK PRASTUTI .AABHAR

शालिनी कौशिक ने कहा…

बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति. प्रोन्नति में आरक्षण :सरकार झुकना छोड़े.
WORLD's WOMAN BLOGGERS ASSOCIATION

Shanti Garg ने कहा…

बहुत ही बेहतरीन और प्रभावपूर्ण रचना....
मेरे ब्लॉग

जीवन विचार
पर आपका हार्दिक स्वागत है।

Rajesh Kumari ने कहा…

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगल वार १४/८/१२ को चर्चाकारा राजेश कुमारी द्वारा चर्चामंच पर की जायेगी आपका स्वागत है|

udaya veer singh ने कहा…

खूबसूरत...गहरे भाव

veerubhai ने कहा…

आक्रोश और वेदना और सवालों के सलीब ताने है कविता का पूरा ताना -बाना ....फ़ूड फॉर थाट...स्वतंत्रता दिवस की पूर्व सध्या पर इस रचना का प्रकाशन अनेक अर्थ लिए है जब कि मीरा कुमार और सोनिया एक ही संसद में एक ही समय पर हैं ,क्या कर रहीं हैं ये यहाँ ?सोनिया तो सुना है बड़ी ताकतवर महिला हैं टाइम मैगजीन के अनुसार विश्व की पहली पच्चीस में से एक हैं ?२०१२ में ये सब क्यों ?
ram ram bhai
मंगलवार, 14 अगस्त 2012
क्या है काइरोप्रेक्टिक चिकित्सा की बुनियाद ?
http://veerubhai1947.blogspot.com/

रविकर फैजाबादी ने कहा…

चुलबुल बुलबुल ढुलमुला, घुलमिल चीं चीं चोंच |
बाज बाज आवे नहीं, हलकट निश्चर पोच |

हलकट निश्चर पोच, सोच के कहता रविकर |
तन-मन मार खरोंच, नोच कर हालत बदतर |

कर जी का जंजाल, सुधारे कौन बाज को |
बेहतर रखो सँभाल, स्वयं से प्रिये लाज को ||

डा. श्याम गुप्त ने कहा…

--- दंड भी जो कारण होता है उसी को मिलता है चाहे आरोपित कारण ही क्यों न हो...आरोपण न होपाए इसे कर्म करना चाहिए ...दूसरों को कोसने से क्या होगा...
---आखिर गीतिका, फिजा, मधुमिता, कविता ....कांड में दोष किसका है सोचने की बात है...
---शिकार और शिकारी सदा ही बने रहेंगे समाज में... शिकार होने से बचना हमारा दायित्व है...

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

सार्थक रचना !