रविवार, 6 मई 2012

मेरे गीत सुरीले क्यों हैं.....डा श्याम गुप्त




मेरे गीतों में आकर के तुम क्या बसे,
गीत का स्वर मधुर माधुरी होगया।
अक्षर अक्षर सरस आम्रमंजरि हुआ,
शब्द मधु की भरी गागरी होगया।

तुम जो ख्यालों में आकर समाने लगे,
गीत मेरे कमल दल से खिलने लगे।
मन के भावों में तुमने जो नर्तन किया,
गीत ब्रज की भगति- बावरी होगया। ......मेरे गीतों में ..... ॥

प्रेम की भक्ति सरिता में होके मगन,
मेरे मन की गली तुम समाने लगे।
पन्ना पन्ना सजा प्रेम रसधार में,
गीत पावन हो मीरा का पद होगया।

भाव चितवन के मन की पहेली बने,
गीत कबीरा का निर्गुण सबद होगया।
तुमने छंदों में सज कर सराहा इन्हें ,
मधुपुरी की चतुर नागरी होगया। .........मेरे गीतों में..... ॥

मस्त में तो यूहीं गीत गाता रहा,
तुम सजाते रहे,मुस्कुराते रहे।
गीत इठलाके तुम को बुलाने लगे,
मन लजीली कुसुम वल्लरी होगया।

तुम जो हंस हंस के मुझको बुलाते रहे,
दूर से छलना बन कर लुभाते रहे।
भाव भंवरा बने, गुनगुनाने लगे ,
गीत कलिका -नवल-पांखुरी होगया। .....मेरे गीतों में... ॥

तुम ने कलियों से जब लीं चुरा शोखियाँ ,
बनके गज़रा कली खिलखिलाती रही।
पुष्प चुनकर जो आँचल में भरने चले ,
गीत पल्लव सुमन आंजुरी होगया ।

तेरे स्वर की मधु माधुरी मिल गयी,
गीत राधा की प्रिय बांसुरी होगया ।
भक्ति के भाव में तुमने अर्चन किया,
गीत कान्हा की प्रिय सांवरी होगया । .... मेरे गीतों में.... ॥



बेटी - हाइकु-कैलाश शर्मा [ Kashish - My Poetry ]


बेटी - हाइकु

   (1)
घर की शान 
प्रेम का प्रतिमान 
प्यारी बेटियाँ.

   (२)
दुर्गा की पूजा
कन्या की भ्रूण हत्या
दोगलापन.

   (३)
क्या देगा बेटा 
लाई थी मैं भी प्यार
आने तो देते.

   (४)
बेटे की चाह 
माँ हुई भागीदार
बेटी की हत्या.

   (५)
कैसे जी पाती
आफरीन बन के
न आना अच्छा.

   (६)
क्यों भूल गये
वह भी औरत थी
तुम्हें जन्मा था.

   (७)
नसीब लायी 
जन्म पूर्व मरना
सिर्फ़ बेटी ही.

   (८)
खुशियाँ गूंजी
आँगन है चहका
बिटिया आयी.

कैलाश शर्मा

शुक्रवार, 4 मई 2012

छोट छोट शहरों में पैदा, बड़े बड़े शैतान

भ्रूण भ्रान्तवश भंगकर, भटके भट भकुवान । 
पुत्र-मोहवश पापधी,  बूढ़ भये अकुलान ।

घर से मार-भगाए  बेटे  ।
बहना आगे आय समेटे  ।

छोट छोट शहरों में पैदा,  बड़े बड़े शैतान ।। 

लघु कथा- ''माँ मैं इसलिए बच गया ''


लघु कथा- ''माँ मैं इसलिए बच गया ''



Dog : Pomeranian dog isolated on a white background Stock Photo
गूगल से  साभार 


सब्जी मंडी में अचानक रूपाली का चार वर्षीय  बेटा अर्णव ज्यों ही उससे हाथ छुड़ाकर भागा  तो  रूपाली का सारा ध्यान अर्णव की  ओर  चला गया . अर्णव ने तेजी  से भागकर एक पिल्ले को नाले में गिरने से बचा लिया .इसके बाद अर्णव रूपाली की ओर दूर से ही मुस्कुराता हुआ दौड़कर आने लगा कि तभी एक तेज़ रफ़्तार से   आती   बाईक  को   देखकर रूपाली सिहर  उठी  .अर्णव उसकी  चपेट  में आ   ही  जाता तभी एक युवक ने तेज़ी से आकर  अर्णव को अपनी  ओर खींच  लिया और...एक हादसा होने से बच गया .रूपाली भागकर उस युवक के पास  पहुंची  और उसका शुक्रिया  अदा  किया  फिर  अर्णव को अपनी बांहों में भरकर रो   पड़ी .अर्णव मासूमियत से माँ के आंसू  पोछते   हुए  बोला -''माँ मैंने उस पिल्ले को बचाया  था  न  नाले में गिरने से उसी तरह इस भईया ने मुझे उस बाईक से बचा लिया .मैं इसी  लिए बच गया .वो  देखो  वो प्यारा  सा  पिल्ला   कैसे पूंछ   हिला  रहा है !'' रूपाली ने रुधे गले से ''हाँ बेटा '' कहा और उसका हाथ पकड़कर सब्जी लेने के लिए दुकान की ओर चल दी .

                                                                                              शिखा कौशिक 
                                                                                      [मेरी कहानियां ]

गुरुवार, 3 मई 2012

ASH- A MOTHER ...WHAT FIGURE




आज  अखबार में एक खबर पढ़ी कि-''चर्चाओं में ऐश   का फिगर  ''.खबर  में बताया गया है की ऐश  के बढे वजन को लेकर कुछ  लोगों ने इसे एक सदमा  करार दिया है .कैसी मनोवृति  है हमारी  ?क्या आज भी आप ऐश  को केवल अपना मनोरंजन करने वाली एक अभिनेत्री मानते हैं ?वो एक छः माह की बेटी की माँ हैं .क्या उनका कर्तव्य केवल आपके आकर्षण का केंद्र बने रहना होना  चाहिए .हमारे लिए यह एक सदमा नहीं एक राहत की खबर है कि हमारी प्रिय अभिनेत्री वास्तविक जीवन में एक सफल माँ का किरदार निभा  रही है .सदमा हम तब कह सकते थे जब वो बेटी को जन्म देते ही फिल्मों की ओर   रूख कर लेती .ऐश को भावी जीवन में खूब खुशियाँ मिले हम तो यही चाहेंगें .

                                         शिखा कौशिक 
                         [विचारों का चबूतरा ]

बुधवार, 2 मई 2012

लोकार्पण----बेंगलूर में डा श्याम गुप्त के उपन्यास 'इन्द्रधनुष ' का लोकार्पण ......



                          

                  डा श्याम गुप्त के उपन्यास 'इन्द्रधनुष' का लोकार्पण दिनांक 12-05-2012 शनिवार को सुबह 11 बजे कर्नाटक हिन्दी प्रचार समिति, जय नगर , अशोका पिलर के समीप ,बेंगलूरू, कर्नाटक के सभा भवन में हो रहा है। आप सभी सादर आमंत्रित हैं।
                                        
                                                                         ---- डा श्याम गुप्त ..

मंगलवार, 1 मई 2012

बारात कौन लाये ....डॉ श्याम गुप्त की कहानी...




                         क्यों पापा ! वह स्वयं बारात लेकर क्यों नहीं जा सकती ? वह स्वयं यहाँ आकर क्यों नहीं रह सकता ? सोचिये , मेरे जाने के बाद आप लोगों का ख्याल कौन रखेगा ? शालू एक साँस में ही सबकुछ कह गयी।
                     'हाँ बेटा, यह हो सकता है। परन्तु यदि वह लड़का भी परिवार की इकलौती संतान हो तो ?' 'शाश्वत चले आ रहे मुद्दों पर यूंही भावावेश में, या कुछ नया करें , लीक पर क्यों चलें ? की भावना में बहकर , बिना सोचे समझे चलना ठीक नहीं होता; अपितु विशद- विवेचना, हानि-लाभ व दूरगामी प्रभावों,परिणामों पर विचार करके ही निर्णय लेना चाहिए।   मुख्य मुद्दा यह नहीं है कि कौन किसके घर रहने जाए, कौन बरात लाये ।  यदि पति-पत्नी, सुहृद, युक्ति-युक्त विचार वाले, उचित-अनुचित ज्ञान वाले हैं तो दोनों ही स्थितियों में वे एक दूसरे के परिवार वालों , माँ -बाप का सम्मान करंगे और परिवार जुड़ेंगे। समस्याएं नहीं रहेंगीं । शाश्वत बात वही है कि व्यक्ति मात्र को अच्छा ,न्याय एवं सत्य कानिर्वाह करने वाला होना चाहिए। " शालू के पिता पुनः कहने लगे, ' नियम, व्यक्ति व सामाजिक सुरक्षा के लिए होते हैं न कि व्यक्ति नियम के लिए । '
         " और प्रथाएं व परिपाटी ", शालू ने पूछा।
          सतीश जी ने बताया, 'बेटा !, परिपाटी, नीति, नियम,क़ानून, प्रथाएं, आस्थाएं आदि व्यक्ति मात्र के सुख-सुविधा के लिए होते हैं , किसी व्यक्ति विशेष या समूह, जाति, वर्ग या धर्म विशेष के लिए नहीं। यही मानवता, सामाजिकता, सार्वभौमिकता व धर्म है। अन्यथा आज जैसी सामाजिक विभ्रम की स्थिति उत्पन्न होती है जिसके चलते यह प्रश्न खडा हुआ है । '
                   परन्तु, पापा! यदि नवीन व्यवस्था को अपना कर देखें तो क्या हानि है ?
                 'कुछ नहीं ' , सतीश जी बोले ,' अन्यथा समाज आगे कैसे बढेगा ? परन्तु बेटी ! पहले इतिहास को भी तो देख लेना चाहिए। इतिहास भी तो नव प्रयोग ही है। इस देश में स्त्री- सत्तामक समाज का इतिहास रहा है। आज भी प्राचीन कबीलों में वह समाज है , जिसमें पति, पत्नी के घर जाकर रहता है । परन्तु उस व्यवस्था में पति को घर में स्थित व पत्नी को सक्रिय भूमिका निभानी पड़ती है; अर्थात दूसरे घर-परिवार से आने वाले प्राणी (पति या पत्नी) को घर में रहकर कार्यकर्ता की भूमिका निभानी होगी जबतक वह नई परिस्थितियों से तदाकार नहीं होजाता। घर वालों को भी चाहिए कि वे उस पर पूर्ण विश्वास व्यक्त करें , अपना समझें व सबकुछ उसके संज्ञान में लाकर कार्य करें ताकि वह शीघ्रातिशीघ्र घर का अंग बन सके। '
                    'पर मैं तो सभी कार्य कर सकती हूँ, इसीलिये तो आपने पढ़ाया है, लिखाया है। और आजकल तो शिक्षा के प्रचार-प्रसार से सभी घरों में लगभग समान परिस्थितियाँ होतीं हैं। ', शालू बोली।
                   हाँ, ठीक है, सतीश जी सोचते हुए बोले,  'आज स्त्री पहले की भांति घर में सीमित न रहकर, पुरुष के कंधे से कंधा मिलाकर चलना चाहती है ; ताकि उसकी अज्ञानता व लाचारी से उस पर अत्याचार नहो । कर्तव्यों व अधिकारों की अज्ञानता ही तो अत्याचार, अनाचार व अन्याय की जड़ होती है ; जिसका प्रतिकार त्रेता युग में राम-सीता व द्वापर में, राधा-कृष्ण ने किया था। आज पुनः वही स्थिति है, और प्रतिकार करना ही होगा, क्योंकि शिक्षा के तमाम प्रचार-प्रसार के उपरांत भी हमारे समाज में कुरीतियाँ व अनीतियाँ पैर पसारे पडीं हैं। परन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि स्त्री-पुरुष एक दूसरे के अधिकारों को चुनौती दें । आपकी स्वतन्त्रता तभी तक है जब तक आप दूसरों की स्वतन्त्रता व अधिकारों का हनन नहीं करते। '
                  ' क्या इसमें पुरुष का अहं आड़े नहीं आयेगा ' शालू ने प्रश्न किया।
                  'अवश्य', पुरुष का यह संस्कारगत अहं ही तो है जो सदियों की रूढ़ियों व प्रथाओं से उत्पन्न हुआ है और समस्याएं उत्पन्न करता है । यह अहं स्त्रियों में भी होता है । हाँ मूलतः यह प्रथाओं आदि अयुक्तिपूर्ण विश्लेषण से होता है। परन्तु उत्तम चरित्र-संस्कार युत स्त्री-पुरुष इस अहं को समुचित ज्ञान , वस्तुस्थिति व युक्ति-युक्त विचार भाव से शमन करते रहते हैं। '
                  ' ये क्या व्यर्थ के  प्रश्न-उत्तर सिखाये -समझाये जारहे हैं लड़की को ।  बेटियाँ तो सदा ही पति के घर जाती हैं ।'. सतीश जी की पत्नी अनुराधा ने व्यवधान डालते हुए कहा ।
                    सतीश जी हंसते हुए बोले।  'तुम भी सुनलो , वास्तव में प्रारंभिक अवस्था में तो ये प्रश्न थे ही नहीं। जब समाज विकसित हुआ, अर्थव्यवस्था अन्योन्याश्रित हुई , घर से दूर जाकर कार्य करना आवश्यक हुआ तो संतान-परिवार की सुरक्षा-पालन हेतु एक प्राणी को घर पर रहना अनिवार्य लगा । चूंकि स्त्री प्राकृतिक रूप से कम बलशाली व संतानोत्पत्ति के समय अक्रियाशील होती है अतः उसने स्वेछा से घर का कार्य संभालने का निर्णय लिया और पत्नी बनकर पतिगृह आकर रहने लगी, और परिवार बना । जब मानव घुमंतू स्वभाव छोड़कर स्थिर हुआ तो परिवार, दाम्पत्य, राजनीति, संपत्ति, स्वामित्व के प्रश्न उठने लगे । तब संतान व स्त्री को पिता व पति की अनुगामी बनाकर पितृ-सत्तात्मक समाज की रचना हुई, जिसमें पुत्र पिता की संपत्ति में व स्त्री किसी की पत्नी बनकर पति की संपत्ति के भोग की अधिकारी बनती है , और व्यवस्था सुचारू रूप से चलती रहती है । चक्रीय व्यवस्थानुसार सभी लड़कियां किसी न किसी संपत्ति की अधिकारिणी रहतीं हैं। तब समाज के व्यापक हित में 'कन्यादान' व 'पाणिग्रहण ' आदि संस्कारों की प्रामाणिक व्यवस्था स्थापित हुई। '
                   परन्तु पापा !, 'फिर ये दहेज़ व स्त्री प्रतारणा जैसी कुप्रथाओं से आज यह सामाजिक अशांति क्यों है ? उसका क्या किया जाय ?'
                 ' अशांति व अव्यवस्था तभी उत्पन्न होती है', सतीश जी ने कहा, 'जब परिवार, व्यक्ति , समूह विशेष या समाज ; लालच, लोभ , मोह व अज्ञानता के वशीभूत होकर विकृत व्यवहार करते हैं ; अथवा अज्ञान या स्वार्थ वश वस्तु स्थिति को पूर्ण रूप से जाने बिना व्यवस्थाओं पर प्रश्न चिन्ह लगाया जाता है। वस्तुतः सत्य तो यही है कि मनुष्य मात्र को ही सच्चरित्र , सत्यपर चलने वाला, युक्ति-युक्त व्यवहार वाला व दूसरों का आदर करने वाला होना चाहिए ।
                     अतः बेटी !, व्यक्ति व समाज के भूत, भविष्य व वर्त्तमान पर विशद विमर्श करके जो उचित लगे वही करो। इसके लिए सोचो, विचारों, चिंतन -मनन करो तभी निर्णय लो। दुविधाओं में परामर्श के लिए हम हैं ही।