शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2011

घर लागे नारी बिना, डूबा हुआ जहाज

कान्ता कर करवा करे, सालो-भर करवाल ||

 (शुभकामनाएं)
कर करवल करवा सजा,  कर सोलह श्रृंगार |
माँ-गौरी आशीष दे,  सदा बढ़े शुभ प्यार ||
   करवल=काँसा मिली चाँदी
कृष्ण-कार्तिक चौथ की,  महिमा  अपरम्पार |
क्षमा सहित मन की कहूँ,  लागूँ  राज- कुमार ||
Karwa Chauth
(हास-परिहास)
कान्ता कर करवा करे, सालो-भर करवाल |
  सजी कन्त के वास्ते, बदली-बदली  चाल ||
  करवाल=तलवार  
करवा संग करवालिका,  बनी बालिका वीर |
शक्ति  पा  दुर्गा   बनी,  मनुवा  होय  अधीर ||
करवालिका = छोटी गदा / बेलन जैसी भी हो सकती है क्या ?

 शुक्ल भाद्रपद चौथ का, झूठा लगा कलंक |
सत्य मानकर के रहें,  बेगम सदा सशंक ||

  लिया मराठा राज जस, चौथ नहीं पूर्णांश  |
चौथी से ही चल रहा,  अब क्या लेना चांस ??


(महिमा )  
नारीवादी  हस्तियाँ,  होती  क्यूँ  नाराज |
गृह-प्रबंधन इक कला, ताके पुन: समाज ||

 मर्द कमाए लाख पण,  करे प्रबंधन-काज |
घर लागे नारी  बिना,  डूबा  हुआ  जहाज  ||

बुधवार, 19 अक्टूबर 2011

जनाना न्याय का उध्बोधन गीत


                                                                                    -प्रेम प्रकाश
(1)
याद आता है
अभिनेता महान का हिट संवाद
मर्द को दर्द नहीं होता जनाब
गूंजती है आवाज
सनसनाहट से भरी एमएमएस क्लिप में
बांग्ला की कुलीन अभिनय परंपरा की बेटी की
आई वांट ए परफेक्ट गाइ  
और फिर उतरने लगते हैं पर्दे पर
एक के बाद एक दृश्य
शालिनी ने लकवाग्रस्त पति को
दिया त्याग रातोंरात
अधेड़ मंत्री के यहां पड़े छापे में मिली
पौरुष शास्त्र की मोटी किताब
वियाग्रे की गोलियां
मुस्टंड मर्दानगी के लिए ख्यात
हकीम लुकमान के लिखे अचूक नुस्खे
मिस वाडिया ने अपनी आत्मकथा में
उड़ाया इंच दर इंच मजाक
अपने सहकर्मी की गोपनीय अंगुली का

(2)
नामर्दों के लिए कोई जगह नहीं
उन्हें नहीं मिलेगी तोशक न मिलेगी रजाई
न वे झूल सकेंगे झूला न बना सकेंगे रंगोली
और न खेल सकेंगे होली
अवैध मोहल्लों के किसी गली-कूचे या मैदान में
 ऊंची एड़ी पर खड़ी दुनिया
 नहीं देखना चाहती किसी नामर्द की शक्ल
अपनी किसी संतान में

(3)
मर्द न होना किसी मर्द के लिए 
बिल्कुल वैसा ही नहीं है
जैसा किसी औरत का न होना औरत
स्त्री-पुरुष का लिंग भेद मेडिकल रिपोर्ट नहीं
बीसमबीस क्रिकेट का स्कोर बोर्ड
करता है जाहिर
पुरुष इस खेल को सबसे तेज और
जोरदार खेलकर ही साबित हो सकते हैं जवां मर्द
और तभी मछली की तरह उतरेगी
उसके कमरे में कैद तलाब में कोई औरत

(4)
मर्दाना पगड़ी की कलगी खिलती रहे
अब ये चाहत नहीं चुनौती है पुरुषों के आगे
उसे हर समय दिखना होगा
सख्त और मुस्तैद
नहीं तो सुनना पड़ सकता है ताना
वंशी बजाते हुए नाभी में उतर जाने वाले कन्हाई
कहीं पीछे छूट गए
औरतों ने देना शुरू कर दिया है
पुरुष को पौरुष से भरपूर होने की सजा
जिस औजार से गढ़ी जाती थीं  
अब तक मन माफिक मूर्तियां
अब उनका इस्तेमाल मिस्त्री नहीं
बल्कि करने लगे हैं बुत
मैदान वही
बस  योद्धाओं के बदल गए हैं पाले
मर्दाना तर्क जनाना हाथों में
ज्यादा कारगर और उत्तेजक रणनीति है
जैसे को तैसा...
जनाना न्याय का उध्बोधन गीत है             
( http://angikaa.blogspot.com/2011/07/blog-post_22.html)

बहू से आशा -एक लघु कथा

बहू  से आशा  -एक लघु कथा 
  
[imagebazar.com]se sabhar


''बहू .....बहू रानी  कहाँ  हो  ....जरा  यहाँ  तो  आओ !'' दिव्या ने ज्यों ही
 अपनी सासू माँ की आवाज सुनी अपना फेवरेट  सीरियल छोड़कर व्  पास सोये अपने दो  साल के बेटे '' राम '' के सिर पर स्नेह से हाथ फेरकर उनके कमरे की ओर चल दी .
....''आपने मुझे बुलाया मम्मी जी ?''दिव्या ने सासू माँ के कमरे में प्रवेश करते हुए पूछा .''हाँ बहू ....लेटे-लेटे आज बड़ा मन कर आया कि 'श्री रामचरितमानस '' की कुछ चौपाइयां    सुनूँ .आँखों से मजबूर न होती तो खुद ही पढ़ लेती .....तुम्हे परेशानी तो नहीं  होगी  ?'' ....''अभी  आई मम्मी जी ...परेशानी कैसी ?दिव्या ने मुस्कुराते हुए कहा .
सासू माँ हँसते हुए बोली ''....अरे कोई जबरदस्ती नहीं है ....अभी कुछ टी.वी. पर देख रही हो तो देखकर आ जाना .''...''नहीं मम्मी जी यदि आज अपनी इच्छाओं को आपकी आकांक्षाओं से ऊपर स्थान दूँगी तो कल को 'राम' की बहू से क्या आशा रखूंगी ?यह कहकर  दिव्या टी.वी.को स्विच ऑफ करने  हेतु अपने कमरे की ओर बढ़ चली .
                                                                  शिखा कौशिक 
                                                  [मेरी कहानियां ]

जिस दिन निजत्व को जानेगा अन्तरपट खुल जायेगा

अरविन्द मिश्र जी के ब्लाग पर एक टिप्पणी के रूप में प्रकाशित श्रीमती वन्दना गुप्ता जी की निम्न पंक्तियाँ साभार प्रस्तुत हैं


ना भाव हूँ ना विचार
ना कण ना क्षण
मै हूँ वो चिरन्तन सत्य
जो तुझमे हूँ आवेष्ठित

मै ही गोपी मै ही राधा
मै ही कृष्ण और मै ही परम सत्य
ना तुझसे जुदा हूँ और ना ही अलग
अस्तित्व वक्त की गर्द मे दबा

मोह माया के आडम्बर मे लिपटा
तुझमे समाया तेरा "मै"
तेरी आत्म चेतना
तेरे "मै" को जानती
सूक्ष्म रूप मे तुझमे रहती

फिर कोई कैसे जानेगा
जब तू ही ना मुझे जान पाया
स्वंय को ना पहचान पाया
क्यों दुनिया से करें उम्मीद

्करो प्रयास खुद ही
स्वंय को जानने की
आत्मतत्व को पहचानने की

जिस दिन निजत्व को जानेगा
अन्तरपट खुल जायेगा
हर रूप तुझमे समा जायेगा
गोपी कृष्ण राधा तू ही बन जायेगा

मंगलवार, 18 अक्टूबर 2011

क्या आप नियमों पर ध्यान नहीं देते ?


क्या आप नियमों पर ध्यान  नहीं  देते ?

कल ही मैंने सविनय निवेदन किया था -प्रत्येक पोस्ट के प्रकाशन के मध्य पांच घंटे का  अंतर तो होना ही चाहिए और   आज   ही पांच मिनट  के अंतर पर पोस्ट प्रकाशित कर दी   गयी   है .आप सभी से निवेदन है कि आगे से नियमों की अवहेलना न   करें   अन्यथा   मुझे   कड़े  निर्णय  लेने  के लिए बाध्य होना पडेगा  . .ये नियम आपके हितार्थ ही सृजित  किये गए हैं .
                                              
                                                                             शिखा  कौशिक  
                                                                          व्यवस्थापक  

पहाड़ और औरत

एक सा है जीवन 
पहाड़ और  औरत का 
कभी सुन्दर, कभी नीरस 
कभी खिला, कभी उजड़ा ..

कुछ सख्त मन एक समान
कितना कुछ समेटे हुए 
कुछ सीमायें है दोनों की 
समान अस्तित्व की लकीरें...

हर प्रहार सह ले
हर अपनत्व को पहचान ले
पर टूटें जब दोनों 
बिखर जाएँ कण कण में...

अपने से बाहर निकल आओ
थमकर,एकटक देखकर
पहचान लो जरा क्या है ये
पहाड़ और........और औरत.....!!    

सीटियों की विदाई : महिला सुरक्षा का शोकगीत

                                                                                                                                 
                                -प्रेम प्रकाश
सीटियों का जमाना लदने को है। सूचना क्रांति ने सीटीमारों के लिए स्पेस नहीं छोड़ी है। इसी के साथ होने वाला है युगांत संकेत भाषा के सबसे लंबे खिंचे पॉपुलर युग का। बहरहाल, कुछ बातें सीटियों और उसकी भूमिका को लेकर। कोई ऐतिहासिक प्रमाण तो नहीं पर पहली सीटी किसी लड़की ने नहीं बल्कि किसी लड़के ने किसी लड़की के लिए ही बजाई होगी। बाद के दौर में सीटीमार लड़कों ने सीटी के कई-कई इस्तेमाल आजमाए। जिसे आज ईव-टीजिंग कहते हैं, उसका भी सबसे पुराना औजार सीटियां ही रही हैं। वैसे सीटियों का कैरेक्टर शेड ब्लैक या व्हाइट न होकर हमेशा ग्रे ही रहा है। इस ग्रे कलर का परसेंटेज जरूर काल-पात्र-स्थान के मुताबिक बदलता रहा है।

बात किशोर या नौजवान उम्र की लड़के-लड़कियों की करें तो सीटी ऐसी कार्रवाई की तरह रही है, जिसमें 'फिजिकल' कुछ नहीं है यानी गली-मोहल्लों से शुरू होकर स्कूल-कॉलेजों तक फैली गुंडागर्दी का चेहरा इतना वीभत्स तो कभी नहीं रहा कि असर नाखूनी या तेजाबी हो। फिर भी सीटियों के लिए प्रेरक -उत्प्रेरक न बनने, इससे बचने और भागने का दबाव लड़कियों को हमारे समाज में लंबे समय तक झेलना पड़ा है। सीटियों का स्वर्णयुग तब था जब नायक और खलनायक, दोनों ही अपने-अपने मतलब से सीटीमार बन जाते थे। इसी दौरान सीटियों को कलात्मक और सांगीतिक शिनाख्त भी मिली। किशोर कुमार की सीटी से लिप्स मूवमेंट मिला कर राजेश खन्ना जैसे परदे के नायकों ने रातोंरात न जाने कितने दिलों में अपनी जगह बना ली। आज भी जब नाच-गाने का कोई आइटम नुमा कार्यक्रम होता है तो सीटियां बजती हैं। स्टेज पर परफॉर्म करने वाले कलाकारों को लगता है कि पब्लिक का थोक रिस्पांस मिल रहा है। वैसे सीटियों को लेकर झीनी गलतफहमी शुरू से बनी रही है। संभ्रांत समाज में इसकी असभ्य पहचान कभी मिटी नहीं। यूं भी कह सकते हैं कि सामाजिक न्याय के बदले दौर में भी इस कथित अमर्यादा का शुद्धिकरण कभी इतना हुआ नहीं कि सीटियों को शंखनाद जैसी जनेऊधारी स्वीकृति मिल जाए। सीटियों   से लाइन पर आए प्रेम प्रसंगों के कर्ताधर्ता आज अपनी गृहस्थी की दूसरी-तीसरी पीढ़ी की क्यारी को पानी दे रहे हैं। लिहाजा संबंधों की हरियाली को कायम रखने और इसके रकबे के बढ़ाने में सीटियों ने भी कोई कम योगदान नहीं किया है। यह अलग बात है कि इस तरह की कोशिशें कई बार सिरे नहीं चढ़ने पर बेहूदगी की भी अव्वल मिसालें बनी हैं।
रेट्रो दौर की मेलोड्रामा मार्का कई फिल्मों के गाने प्रेम में हाथ आजमाने की सीटीमार कला को समर्पित हैं। एक गाने के बोल तो हैं- 'जब लड़का सीटी बजाए और लड़की छत पर आ जाए तो समझो मामला गड़बड़ है।' 1951 आयी फिल्म 'अलबेला' में चितलकर और लता मंगेशकर की युगल आवाज़ में 'शाम ढले खिड़की तले तुम सीटी बजाना छोड़ दो' तो आज भी सुनने को मिल जाता है । 
साफ है कि नौजवान लड़के-लड़कियों को सीटी से ज्यादा परेशानी कभी नहीं रही और अगर रही भी तो यह परेशानी कभी सांघातिक या आतंकी नहीं मानी गई। मॉरल पुलिसिंग हमारे समाज में अलग-अलग रूप में हमेशा से रही है और इसी पुलिसिंग ने सीटी प्रसंगों को गड़बड़ या संदेहास्पद मामला करार दिया। चौक-चौबारों पर कानोंकान फैलने वाली बातें और रातोंरात सरगर्मियां पैदा करने वाली अफवाहों को सबसे ज्यादा जीवनदान हमारे समाज को कथित प्रेमी जोड़ों ने ही दिया है। सीटियां आज गैरजरूरी हो चली हैं। मॉरल पुलिसिंग का नया निशाना अब पब और पार्क में मचलते-फुदकते लव बर्डस हैं। सीटियों पर से टक्नोफ्रेंडी युवाओं का डिगा भरोसा इंस्टैंट मैसेज, रिंगटोन और मिसकॉल को ज्यादा भरोसेमंद मानता है।
मोबाइल, फेसबुक और आर्कुट के दौर में सीटियों की विदाई स्वाभाविक तो है पर यह खतरनाक भी है। इस खतरे का 'टेक्स्ट' आधी दुनिया के पल्ले पड़ना अभी शुरू भी नहीं हुआ था कि वह इसकी शिकार होने लगी। सीटियों की विदाई महिला सुरक्षा का शोकगीत भी है क्योंकि उनके लिए अब हल्के-फुल्के खतरों का दौर लद गया है। बेतार खतरों के जंजाल में फंसी स्त्री अस्मिता और सुरक्षा के लिए यह बड़ा सवाल है।