मंगलवार, 6 सितंबर 2011

मैंने माँ की दुआओं का असर है देख लिया ;




मैंने माँ की दुआओं का असर है देख लिया ;


मौत आकर के मेरे पास आज लौट गयी .




माँ ने सिखलाया है तू रहना मोहब्बत से सदा ;


याद आते ही सैफ नफरतों की टूट गयी .




जिसने माँ को नहीं बख्शी कभी इज्जत दिल से ;


ऐसी औलाद की खुशियाँ ही उससे रूठ गयी .




मिटाया खुद को जिस औलाद की खातिर माँ ने ;


बेरूखी देख उसकी माँ भी आज टूट गयी .




कैसे रखते हैं कदम ?माँ ने ही सिखाया था ;


वो ऐसा दौड़ा की माँ ही पीछे छूट गयी .




जो आँखें देखकर शैतानियों पर हँसती थी ;


तेरी नादानियों पर रोई और सूज  गयी .

                                                    शिखा कौशिक 
                                [विख्यात ]

सोमवार, 5 सितंबर 2011

रंगमंच पर झलकती नारी की स्थिति



पिछले दिनों दिल्ली के प्यारे लाल भवन में 'सक्षम' थियेटर समूह द्वारा सआदत हसन मंटो के नाटकों की प्रस्तुति की गई. मंटो की कहानी हतक (Insult, अपमान) पर आधारित इस नाटक में समाज में देह व्यापर से जुडी महिलाओं और उनके प्रति तथाकथित सभ्य सोसाइटी की मानसिकता पर एक करारा प्रहार किया गया है.

सुगंधा जो कि एक वैश्या है के चरित्र के माध्यम से मंटो ने समाज में स्त्री के दोयम दर्जे को भी रेखांकित किया है. पुरुषवादी समाज एक स्त्री को एक उपभोग्य बस्तु बना देता है, जिसे सुगंधा स्वीकार भी कर चुकी है, फिर  भी उसके अंदर कहीं एक सच्चे प्यार की मृगतृष्णा शेष है. उसकी इसी कमजोरी का भी लाभ उठाने एक अन्य पुरुष माधो उसकी जिंदगी में आता है; जो एक म्युनिशिपैलीटी हवलदार है और खुद उसी के शब्दों में उसकी एक काफी प्यार करने वाली, उसका इंतज़ार करने वाली बीवी भी है. यह जानते हुए भी बिना कोई शिकायत किये सुगंधा उसमें अपने प्यार को तलाशती है. मगर उसका यह भ्रम भी तब टूट जाता है जब उसे उक्त प्रेमी (!) द्वारा छल द्वारा वो पैसे हड़पने का प्रयास करते हुए देखती है, जिसे उसने अपने शरीर को हर रात बेचकर जमा किये हैं. उसके यथास्थिति को स्वीकार करने का धैर्य तब बिलकुल ही टूट जाता है जब एक ग्राहक उसे अस्वीकार कर देता है. 

इन परिस्थितियों में उभरा सुगंधा का आक्रोश समाज में हाशिए पर डाल दी गई नारी के उस वर्ग की अभिव्यक्ति है, जिसके पास स्वयं चयन का कोई अधिकार नहीं. स्वीकार और अस्वीकार करना दोनों ही पर पुरुष का ही नियंत्रण है. और दोनों ही परिस्थितियों में दोष सदा स्त्री के इसी रूप का ही माना जाता रहा है और जाने कब तक इसे ही माना जाता रहेगा.



मंटो के संवेदनशील नाटकों को साकार रूप देना सहज नहीं, मगर निर्देशक श्री सुनील रावत ने इसकी बेहतर प्रस्तुति को सुनिश्चित करने में अपना यथोचित योगदान दिया है. नाटक में विभिन्न पात्रों यथा सुगंधा के रूप में अनामिका वशिष्ठ और माधो के रूप में प्रवीण यादव ने सराहनीय अभिनय किया है. या यूँ कहूँ कि सुगंधा के चरित्र को उजागर करने में अनामिका वशिष्ठ ने अविस्मरणीय योगदान दिया है, तो अतिशयोक्ति न होगी.  नाटक एक संवेदनशील विषय पर संवाद आरंभ करने में सफल रहा है. 


बेटे के लिए सुंदर सुशील बहु कहां से आयेगी ?



        प्रकृति का एक चक्र है यदि उसके साथ छेडछाड की जाती है,तो वह चक्र रूक जायेगा ,इस संसार के विकास का पहिया थम जायगा ,तब सृष्टि नहीं विनाश होगा और विनाश के हम सब जिम्मेदार होगे । आजकल पानी की एक गंभीर समस्या है ,लोगो को पीने तक का पानी नही मिल रहा है क्योकि पानी के चक्र के लिए जो वनस्पति, पेड पोधे वन जरूरी है ,उसके साथ मानव ने छेडछाड की है ।  
           इसी प्रकार  बेटी को जन्म न देकर कन्या -भूण की हत्या करके हमने प्रकृति के सिद्धात को तोडने की कोशिश की है जिसका परिणाम भयावह होगा । नारी जिसे करूणा की प्रतिमूर्ति,मातृत्व की साकार प्रतिमा,सजृन व धैर्य की देवी माना जाता है। भारत में जहॉ नारी की देवी के रूप मंे उपासना की जाती है,वहॉ इस नारी शक्ति को भ्रूण में ही समाप्त किया जा रहा है। दरिन्दगी का यह खेल कन्या शिशु हत्या के रूप मे सदियों से चला आ रहा है, पहले कन्या को जन्म लेते ही लोग नमक चटा देते थे,जिससे नवजात शिशु कन्या की मौत हो जाती थी या कन्या शिशु को पैदा होते ही घर के पिछवाडे छोड दिया जाता था वही वह भूख,सर्दी और गर्मी से दम तोड देती थी ।अब यह खेल कन्या भू्रण हत्या के रूप में जारी है गा्रमीण क्षेत्रो से अधिक शहरी क्षेत्रो में कन्या भू्रण देखने
को मिलती है।
 ।

           बिना मातृत्व के एक स्त्री को अधूरी माना जाता है,जिस पूर्णता को प्राप्त होने पर जहॉ उसे आत्म संतोष का आभास होता है,लेकिन ज्योहिं यह पता पडता है कि यह भू्रण कन्या है तो वह उसे नष्ट करने के लिए तैयार हो जाती है। इसका सबसे बडा कारण समाज में छाया नर का वर्चस्व,साथ ही नारी जन्म से जुडी अभिशप्त परिस्थतियॉ। पुरानी मूढ मान्यताओं के विषय में यह भी समझ लिया जाता है कि शिक्षा का प्रचार प्रसार होगा,जनजागृति आयेगी ,वे मिटती चली जायेगी ,परंतु कन्या-भू्रण हत्या पढे लिखेे समाज में भी हो रही है ।
नेपोलियम ने कहा था कि ‘तुम मुझे सुदृढ मॉ दो मैं तुम्हें  एक सुदृढ राष्ट् दूगा ।  गांधीजी ने कहा था कि एक शिक्षित नारी सारे परिवार का  उद्धार कर सकती है । 
         यह एक विचारणीय पहलू है कि यदि हम कन्या- भू्रूण की ंहत्या कर देगे तो इस समाज का,परिवार का, देश का, रूप कैसा होगा?। जब इस पृथ्वी पर बेटिया ही नही रहेगी तो कहॉ से  आयेगी उनके लिए बहुए?यदि आपके मन मे बेटे की कामना हैै तो साथ मे बहु की कामना भी करनी होगी इसके लिए बेटियोे  को भू्रूण में बचाना होगा । उनको जन्म देकर ,अच्छे संस्कार व शि़क्षा देकर हमारे देश, समाज व परिवार के सुन्दर भविष्य की आधारशीला तैयार करनी होगी । दूधो नहाओ, पूतो फलो के आशीवार्द को बदलना होगा। यदि पुत ही पैदा होगे तो उसके लिए सुंदर सुशील बहू कहॉ से आयेगी?
 हरियाणा राजस्थान,पंजाब व दक्षिणी दिल्ली में शिक्षा पूरी तरह से असफल रही है ,कन्या-भ्रूण हत्या अनपढ लोगो से ज्यादा पढे लिखे लोग कर रहे है ,,यह समाज के लिए शर्म की बात है । पढे लिखे डाक्टरों द्वारा पैसो के लालच में कन्या-भू्रण हत्या की जा रही है,केवल समाज में पुरूष ही पुरूष होगे तो समाज कैसा होगा?
              नारी परिवार की मूल मजबूत दीवार है वह अपने आचरण का प्रभाव पत्नि रूप से पति पर मातृरूप से भावी सन्तान पर डाल सकती है  ।
कल्पना करे जिस समाज में केवल पुरूष होगे वह समाज कैसा होगा। धर्म दया,प्रेम,सहयोग की भावनाए नारी के कारण ही इस समाज में जीवित है ,नारी नही तो कुछ नही .......।       आज हम यह जानते हुए भी कि बेटे से अधिक बेटिया ही माता-पिता की सेवा करती है और बेटिया स्वंय अपनी प्रतिभा व मेहनत के बलपर चारो दिशाओं मे अपनी उपस्थिति दर्ज कर रही है फिर भी हम कन्या पैदा करना नही चाहते है हम झूठा आवरण ओढे हुए है,भीतर कुछ बाहर कुछ।   
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रविवार, 4 सितंबर 2011

हाथ छुड़ा के -- फिर घर चलना |

माँ का ललना |
झूले पलना ||

समय समय पर  
दूध पिलाती |
जीवन खातिर-
हाड़ गलाती |
दीप शिखा सी 
हर-पल जलना ||
माँ का ललना |
झूले पलना ||


आयु  बढती--
ताकत घटती |
पति-पुत्र में -
बंटती-मिटती |
आज बिकल है -
कल भी कल-ना ||
माँ का ललना |
झूले पलना ||


आया रिश्ता- 
बेटा बिकता |
धीरे-धीरे--
माँ से उकता |
होती परबस-
डरना-मरना ||
माँ का ललना |
झूले पलना ||


हो एकाकी ,
साँसे बाकी |
पोते-पोती 
बनती जोती |
हाथ छुड़ा के  --
फिर घर चलना ||
माँ का ललना |
झूले पलना ||

पूनम पाण्डेय से पूछे गये सवाल से चीख जैसी किलकारियाँ तक का सफरनामा!



दिनांक 23 जुलाई 2011 को पर शिखा कौशिक द्वारा पूनम पाण्डेय से पूछे गये सवालों से एक सिलसिला आरंभ हुआ था जो भारतीय नारी ब्लाग के रूप में आपके सामने आया था ।


इसकी यात्रा का यह सिलसिला बीते कल एक महत्वपूर्ण मोड पर था , इस ब्लाग के लिये वह एक विशेष दिवस था जिसकी आहट हममें से कोई नही जान सका ।


आज इस महत्व को मैं भी तब अनायास ही जान सका जब इस ब्लाग पर नयी पोस्ट चीख जैसी किलकारियाँ का प्रबंधन करने अपने डैश बोर्ड पर जा पहुँचा। डैश बोर्ड पर जैसे ही संदेशों का प्रबंधन करे विकल्प पर चटका लगाया तो यह देखकर सुखद आश्चर्य हुआ कि भारतीय नारी ब्लाग पर अब सौ अधिक संदेशों की पूँजी इकट्ठा हो चुकी है।


संदेशो की सूची के विस्तार में गया तो यह रोचक आँकडा नजर आया कि इस ब्लाग सौवीं पोस्ट मादा भ्रूण हत्या पर मेरे द्वारा लिखी गयी पंक्तियाँ चीखों जैसी किलकारियाँ! है।


मेरे लिये यह गौरव का क्षण अनजाने ही आ गया कि सुश्री शिखा कौशिक के द्वारा जिस पहली पोस्ट के साथ भारतीय नारी की यात्रा को उन्होंने आरंभ किया था उसमें सौंवा पडाव मेरी रचना के रूप में रहा। बधाई! आप सब योगदानकर्ताओं को , शिखा जी को और आप सभी पाठकों को जिनके सक्रिय सहयोग से सैकडे की यह यात्रा इतनी जल्दी पूरी हो सकी।


आशा करता हूँ कि आप सबके सहयोग और आर्शिवाद से इस ब्लाग पर एक हजारवीं पोस्ट भी इसी तरह जल्दी ही प्रकाशित होगी। एक बार फिर आप सबको बधाई।

मैं बेटी का हक मांगूगी.


      Cute Little Girl  
                 [क्यूट बेबी से साभार ]
                           क्यूँ किया पता हे ! मात-पिता? 
                                 कि कोख में मैं एक कन्या हूँ.
                               उस पर ये गर्भ पात निर्णय
                            सुनकर मैं कितनी चिंतित हूँ?
                                हाँ !सुनो जरा खुद को बदलो
                                मैं ऐसे हार न मानूगीं;
                               हे! माता तेरी कोख में अब
                                मैं बेटी का हक़ मागूंगी  !
               बेटी के रूप में जन्म लिया;
              क्यूँ देख के मुरझाया चेहरा;
             मैं भी संतान तुम्हारी हूँ;
            फिर क्यूँ छाया दुःख का कोहरा
           लालन पालन मेरा करके
            मुझको भी जीने का हक दो
            मैं करुं तुम्हारी सेवा भी
           ऐसी मुझमे ताक़त भर दो
          बेटी होकर ही अब मैं तुमसे
          बेटो जैसा हक मांगूगी
          हे माता! तेरी कोख में अब
        मैं बेटी का हक मांगूगी.  
                                         शिखा  कौशिक 
                                  http://shikhakaushik666.blogspot.com 

       

शनिवार, 3 सितंबर 2011

०५ सितम्बर शिक्षक दिवस एवं १४ सितम्बर हिंदी दिवस विशेष......


हिंदी महिमा.....
हिंदी हिन्दुस्तानी, हिंद की ये भाषा 
इस हिंदी में छिपी हुई है, उन्नति की परिभाषा 
भारत माता की उर माला का, मध्य पुष्प है हिंदी 
माता के मस्तक पर, जैसे शोभित हो बिंदी 
यह भरती गागर में सागर, लिखता जग देख ठगा सा 
!! हिंदी ....................................... परिभाषा !!
इस हिंदी में महाकाव्य रच तुलसी हुए महान 
अर्थ गंभीर ललित श्रृंगारिक, सब करते गुणगान 
नीराजन यह भूमि भारत का, जन-जन की है यह आशा 
!! हिंदी ....................................... परिभाषा !!
अपनी संस्कृति अपनी मर्यादा, अपनी भाषा का ज्ञान 
यही एक पाथेय हमारा, रहे सदा यह ध्यान 
बिन इसके यदि बढ़ा कदम, हम बनेंगे जग में तमाशा 
!! हिंदी ....................................... परिभाषा !!
अपनी भाषा की समर्थता से, हम सामर्थ्य बढ़ाये 
प्रगति वास्तविक है तब ही, जब सब हिंदी अपनाएं 
भारत का उत्थान है हिंदी, अमृत निर्झर झरता सा 
!! हिंदी ....................................... परिभाषा !!
अपने घर में अपनी भाषा हिंदी अपमानित न होवें 
वह है अभागा अमृत पाकर कालजयी जो ना होवें 
हिंदी सेवा में जुटकर साथी, अब झटके दूर हताशा 
!! हिंदी ....................................... परिभाषा !!
हिंदी पर गर्व करेंगे जब हम, देश महान बनेगा 
दिग दिगंत में व्यापित हिंदी नवल वितान बनेगा 
भारत का मान बढेगा ऐसा, होगा अम्बर झुका-झुका सा 
!! हिंदी ....................................... परिभाषा !!

आप सबको ०५ सितम्बर शिक्षक दिवस एवं
१४ सितम्बर हिंदी दिवस की अग्रिम 
ढेर सारी शुभकामनाएं !!!!

नीलकमल वैष्णव"अनिश"