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मंगलवार, 1 अप्रैल 2014

एक प्रश्न

एक प्रश्न


दहेज़- प्रथा पर
कितने ही निबंध
लिखें होंगें उसने;
कितना ही बुरा
कहा होगा;
लेकिन 'वो'
कली फिर से मसल
दी गई;
नाम 'पूनम' हो या 'छवि'
या कुछ और;
कब रुकेगा
कत्लों का
यह दौर?पूछती
है हर बेटी
इस मूक समाज से;
जो विरोध में
आते हैं दहेज़-हत्या के
क्या निजी तौर पर वे
भी नहीं लेते 'दहेज़'?
एक प्रश्न
जिसका नहीं है
आज किसी के पास
संतोषजनक जवाब....

शिखा कौशिक 'नूतन '

सोमवार, 1 अप्रैल 2013

वो लड़की आँखों के अंगारों से ठन्डे ज़ज्बात तपा देती है !

Mad_girl : Latin girl with an angry and desperate look isolated on a white background Stock Photo 

वो  लड़की  पगली  है ,
बावली है , बहकी हुई है ,
तभी तो ठहाका लगा देती है !
उसके ठाहके की गूँज   
सोये  हुए  ज़मीर जगा  देती है !! 


दुष्कर्म पीडिता की मौत पर
आक्रोशित होती है ,रोती है
और जब उस पीडिता का
पिता लेता है इस हादसे
का मुआवजा और भाई
मांगते हैं नौकरी
तब वो लड़की चीखकर

कहती है बेशर्मों बंद करो
ये सब,  वहशीपन
तुममे भी कम नहीं !
मजाक मत बनाओ मेरी
सखी साथ हुई
दरिदगी  का  !



ये कहकर हो जाती है चुप
फिर बिखरे  बालों को कसकर
पकड़ती है हथेलियों  में ,
सिर उठाकर देखती है
सहमी नज़रों से इधर-उधर ,
आँखों के अंगारों से
ठन्डे ज़ज्बात तपा देती है !
वो लड़की पगली है

बावली है , बहकी हुई है ,
तभी तो ठहाका लगा देती है !



 वो कहती है बैठो सडको पर
जब तक दुष्कर्मी सब
चढ़ न जाये फाँसी  पर  ,
ठुकरा दो मुआवज़े ,
नौकरी की पेशकश और
फ़्लैट ,बस याद रखो
वे आँहें ; वे टीस जो
बिटिया ने भरी -सही हैं !
ज़ख्म देने वालों को
 इतने सस्ते में मत छोड़ो !


 ये कहकर खींचती है
लम्बी सांसे और चुप हो जाती है ,
फिर सोचती है अपना नाम
पर याद नहीं आता ,
वो सड़क पर पड़ा एक पत्थर
आकाश में उछाल देती है ,
बुझे आशा के दिए दिल में जगा  देती है ,

वो लड़की पगली है
बावली है , बहकी हुई है ,
तभी तो ठहाका लगा देती है !




शिखा कौशिक 'नूतन '



शुक्रवार, 19 अगस्त 2011

लघु कथा -दोषी कौन


                                                                                [google se sabhar ]

अस्पताल के बर्नवार्ड में बेड पर अस्सी प्रतिशत जली हुई सुलेखा का अंतिम बयाँ लिया जा रहा था .सुलेखा तड़पते हुए किसी प्रकार बोल रही थी -''मेरी इस दशा के लिए मेरे ससुराल वाले ज्यादा दोषी हैं.या मेरे मायके वाले ....मैं यह नहीं जानती पर जन्म के साथ ही मैं एक लड़की हूँ यह अहसास मुझे कराया जाता रहा .मेरी माँ मुझसे बचपन से ही सावधान करती रहती ''ठीक से काम कर ...कल को अपने घर जाएगी तो मुझे बदनाम करेगी क्या ?''पिताजी कहते ''ठीक चाल-चलन रख वर्ना कैसे ब्याह होगा ?''......विदाई के समय माँ ने कान में धीरे से कहा था -''अब बिटिया वही तेरा घर है ...भागवान औरत वही है जिसकी अर्थी उसके पति के घर से निकले .अब बिटिया हमारी लाज तेरे ही हाथ में है .मायके की लाज को संभाले मैं जब ससुराल पहुंची तो पहले दिन से ही ताने मिलने लगे -''क्या लाई है अपने घर से !एक से एक रिश्ते आ रहे थे हमारी अक्ल पर ही पत्थर पड़े थे जो इसे ब्याह लाये ...''हर त्यौहार पर भाई सिंधारा लाता ...पूछता अच्छी तो है जीजी ?मैं कह देती ''हाँ'' तो पलट कर यह न कहता ''कहाँ जीजी तू तो जल कर कोयला हो गयी है !सच कहूँ माँ -बाप -भाई के इस व्यवहार ने मुझे बहुत दुखी किया .कल जब मेरे पति ने मुझसे कहा की ....जा मेरे घर से निकल जा ...तब एक बार मेरे मन में आया कि क्या यह मेरा घर नहीं !...पर तभी ये विचार भी मेरे मन में आया कि जिस घर में मैं पैदा हुई ,चहकी,महकी ....जब वही घर मेरा नहीं तब ये घर कैसे हो सकता है ?मैं दौड़कर स्टोर रूम में गयी और मिटटी का तेल अपने पर उड़ेल लिया और आग लगा ली .अब आप लोग ही इंसाफ करते रहना कि मेरी इस दुर्दशा के लिए ससुराल वाले ज्यादा दोषी हैं या मायके वाले ....''.

गुरुवार, 18 अगस्त 2011

''बिटिया रानी ''

कन्या भ्रूण हत्या को बंद कीजिये क्योंकि बेटियां बहुत प्यारी होती हैं .क्या नहीं ?पढ़िए यह कविता -

''बिटिया  रानी  ''



Beautiful Little Girl Stock Photo
दादा जी कहते हैं मुझको ' राजदुलारी '  ,
दादी  कहती - मेरी पोती ' सबसे प्यारी' ,
पापा ' प्रिंसेस' कहते मुझको गोद उठाकर,
मम्मी कहती ' ब्यूटी क्वीन' गले लगाकर,
कहें 'लाडली' चूम के माथा नाना-नानी ,
मामा-मौसी कहते हैं ' परियों की रानी' ,
सारे घर में चहक-चहक  चिड़िया बन घूमूं  ,
पाकर सबका स्नेह  ख़ुशी से मैं  हूँ  झूमूं  .
                                     शिखा कौशिक 
[सभी फोटो गूगल से साभार ]

सोमवार, 15 अगस्त 2011

१८५७ की क्रांति और बेगम हज़रत महल !


१८५७ की  क्रांति और बेगम  हज़रत महल !

Begum Hazrat Mahal
[गूगल से साभार ]
पहला था संग्राम महा ;आजादी-खातिर ,
अंग्रेजी सरकार कुटिल और बड़ी थी शातिर,

लखनऊ में विद्रोह की डोर  थी जिसने थामी,
'बेगम  हजरत महल 'नाम,थी अवध की  रानी ,

अवध-नवाब को कैद किया कलकत्ता में था ,
इसीलिए यह काम संभाला बेगम ने था ,

नाबालिग बेटे को वारिस घोषित कर डाला ;
पर अंग्रेजो ने इसको वैध न माना ,

साजिश कर जब अवध मिलाने को थे तत्पर ;
युद्ध के बादल मंडरा आये अवध के ऊपर ,

बेगम ने हालातों से तब हार न मानी ,
ले किसान,जमीदार,सिपाही -युद्ध की ठानी ,

तीन,तीस व् मई इक्तीस -सन सत्तावन ;
अवध में था विद्रोह हुआ,लक्ष्य था पावन ,

बेगम ने विद्रोह का तब नेतृत्व किया था ;
किन्तु ये प्रयास जल्द ही विफल हुआ था ,

माह सितम्बर सन था अट्ठारह सौ अट्ठावन
ब्रिटिश सैनिको ने कब्जाया अवध का शासन ,

किन्तु बेगम ने झुकने से इंकार किया था ;
हो विवश नेपाल-गमन स्वीकार किया था ,

दुश्मन के आगे  न जिसने किया समर्पण
ऐसी बेगम के साहस को नमन करे हम !

                                        शिखा कौशिक