सोमवार, 26 दिसंबर 2011

चाहा था उन्हें



कसूर इतना था कि चाहा था उन्हें 
दिल में बसाया था उन्हें कि 
मुश्किल में साथ निभायेगें 
ऐसा साथी माना था उन्हें |
राहों में मेरे साथ चले जो
दुनिया से जुदा जाना था उन्हें
बिताती हर लम्हा उनके साथ
यूँ करीब पाना चाहा था उन्हें
किस तरह इन आँखों ने
दिल कि सुन सदा के लिए
उस खुदा से माँगा था उन्हें
इसी तरह मैंने खामोश रह
अपना बनाना चाहा था उन्हें |
- दीप्ति शर्मा

1 टिप्पणी:

डा. श्याम गुप्त ने कहा…

क्या टिप्पणी की जाय ----एक साधारण, सामान्य, घिसा-पिटा कथ्य.....स्टेटमेन्ट है....जो न कविता है न गीत...