गुरुवार, 22 दिसंबर 2011

काव्य संग्रह "टूटते सितारों की उड़ान" को माँ का आशीर्वाद .....


प्रकाशित काव्य संग्रह को आशीर्वाद देती पूज्यनीया माँजी
उत्कर्ष प्रकाशन मेरठ द्वारा प्रकाशित काव्य संग्रह "टूटते सितारों की उड़ान" में प्रकाशित मेरी कविताओं की समीक्षा श्रेष्ठ कवियत्री वंदना गुप्ता जी के द्वारा ..........
..........उत्तर प्रदेश में रहने वाले प्रशासनिक अधिकारी श्री अशोक कुमार शुक्ला जी की कवितायेँ यथार्थ बोध कराती हैं ."इक्कीसवां बसंत" कविता में कवि ने बताया कि कैसे युवावस्था में मानव स्वप्नों के महल खड़े करता है और जैसे ही यथार्थ के कठोर धरातल पर कदम रखता है तब पता चलता है कि वास्तव में जीवन खालिस स्वप्न नहीं . "कैसा घर" कविता व्यवस्था पर गहरा कटाक्ष है .तो दूसरी तरफ "गुमशुदा" कविता में रिश्तों की गर्माहट ढूँढ रहे हैं जो आज कंक्रीट के जंगलों में किसी नींव में दब कर रह गयी है .इनके अलावा "तुम", "दूरियां", "परिक्रमा" ,"बिल्लियाँ" आदि कवितायेँ हर दृश्य को शब्द देती प्रतीत होती हैं यहाँ तक कि बिल्लियों के माध्यम से नारी के अस्तित्व पर कैसा शिकंजा कसा जाता है उसे बहुत ही संवेदनशील तरीके से दर्शाया है........
"चिड़ियों के पंख आज बिखरे हैं फर्श पर

और गुमसुम चिड़ियों को देखकर सोचता हूँ

मैं कि आखिर इस पिंजरे के अन्दर

कितना उडा जा सकता है

आखिर क्यों नहीं सहा जाता

अपने पिंजरे में रहकर भी

खुश रहने वाली

चिड़ियों का चहचहाना"


तो दूसरी तरफ "वेताल" सरीखी कविता हर जीवन का अटल सत्य है. हर कविता के माध्यम से कुछ ना कुछ कहने का प्रयास किया है जो उनके लेखन और सोच की उत्कृष्टता को दर्शाता है .

श्रीमती वन्दना गुप्ता जी

आपका आभार कि आपने संपूर्ण कविता संग्रह के संदर्भ में मेरी कविताओं को गहनता से पढकर सार्थक समीक्षा प्रस्तुत की। "इक्कीसवां बसंत" कविता की पृष्ठभूमि के लिए इसी ब्लॉग पर लिंक है पूर्णतः सच्ची घटना से प्ररित कुछ पंक्तियाँ ...


और यह रही "बिल्लियाँ" नामक पूरी कविता----


बिल्लियॉ


खूबसूरत पंखों वाली नन्हीं चिडियों को

एक पिंजरें में कैद कर लिया था हमने ,

क्योंकि उनके सजीले पंख लुभाते थे हमको,

इस पिंजरे में हर रोज दिये जाते थे

वह सभी संसाधन

जो हमारी नजर में

जीवन के लिये जरूरी हैं,

लेकिन कल रात बिल्ली के झपटटे ने

नोच दिये हैं चिडियों के पंख

सहमी और गुमसुम हैं

आज सारी चिडिया

और दुबककर बैठी हैं पिजरें के कोने में
,
पहले कई बार उडान के लिये मचलते

"चिड़ियों के पंख आज बिखरे हैं फर्श पर

और गुमसुम चिड़ियों को देखकर सोचता हूँ

मैं कि आखिर इस पिंजरे के अन्दर

कितना उडा जा सकता है

आखिर क्यों नहीं सहा जाता

अपने पिंजरे में रहकर भी

खुश रहने वाली

चिड़ियों का चहचहाना"


इस कविता की पृष्ठभूमि की चर्चा फिर कभी इसी ब्लॉग पर करूंगा
वन्दना जी पुनः आभार
अगर आप में से कोई भी इस काव्य संग्रह को पढना चाहता है तो उत्कर्ष प्रकाशन मेरठ द्वारा प्रकाशित काव्य संग्रह "टूटते सितारों की उड़ान" प्राप्त करने के लिए लेखक से अथवा सत्यं शिवम् जी से इस नंबर पर संपर्क कर सकते हैं ..........9934405997 इस मेल पर संपर्क किया जा सकता है.contact@sahityapremisangh.com

4 टिप्‍पणियां:

sangita ने कहा…

aapke is kavya sangrh ke vishaya men apni mausiji Smt.Sadhna Vaid se bhi suna hae . aaj sirf aek rachna hi padhi hae shandar hae aasha hae prasiddhi ki oonchaiyon ko chhuyenge shubhkamnayen.

veerubhai ने कहा…

प्रकाशन और समीक्षा दोनों के लिए और लेखक को ख़ास तौर पर बधाई बेहतरीन काव्य रचने के लिए .

वन्दना ने कहा…

अशोक कुमार जी प्रस्तुत काव्य संग्रह के लिये आपको हार्दिक बधाई और अब माँ का आशीर्वाद मिल गया है तो उसके बाद तो आप नित्य नयी बुलंदियां ्छूयेंगे।

पुष्पेन्द्र वीर साहिल ने कहा…

badhai!