मंगलवार, 6 नवंबर 2012

शूर्पणखा काव्य उपन्यास -- भाव भूमि..एवं वन्दना -..... डा श्याम गुप्त....

         

     शूर्पणखा काव्य उपन्यास-- नारी विमर्श पर अगीत विधा खंड  काव्य  रचयिता डा श्याम गुप्त  

                                 भाव भूमि..व वन्दना

                                           
                                                 विषय व भाव भूमि
 
              स्त्री -विमर्श  व नारी उन्नयन के  महत्वपूर्ण युग में आज जहां नारी विभिन्न क्षेत्रों में पुरुषों से कंधा मिलाकर चलती जारही है और समाज के प्रत्येक क्षेत्र में प्रगति की  ओर उन्मुख है, वहीं स्त्री उन्मुक्तता व स्वच्छंद आचरण  के कारण समाज में उत्पन्न विक्षोभ व असंस्कारिता के प्रश्न भी सिर उठाने लगे हैं |
             गीता में कहा है कि .."स्त्रीषु दुष्टासु जायते वर्णसंकर ..." वास्तव में नारी का प्रदूषण व गलत राह अपनाना किसी भी समाज के पतन का कारण होता  है | इतिहास गवाह है कि बड़े बड़े युद्ध, बर्बादी,नारी के कारण ही हुए हैं , विभिन्न धर्मों के प्रवाह भी नारी के कारण ही रुके हैं | परन्तु अपनी विशिष्ट क्षमता व संरचना के कारण पुरुष सदैव ही समाज में मुख्य भूमिका में रहता आया है | अतः नारी के आदर्श, प्रतिष्ठा या पतन में पुरुष का महत्त्वपूर्ण हाथ होता है | जब पुरुष स्वयं  अपने आर्थिक, सामाजिक, पारिवारिक, धार्मिक व नैतिक कर्तव्य से च्युत होजाता है तो अन्याय-अनाचार , स्त्री-पुरुष दुराचरण,पुनः अनाचार-अत्याचार का दुष्चक्र चलने लगता है|
                 समय के जो कुछ कुपात्र उदाहरण हैं उनके जीवन-व्यवहार,मानवीय भूलों व कमजोरियों के साथ तत्कालीन समाज की भी जो परिस्थिति वश भूलें हुईं जिनके कारण वे कुपात्र बने , यदि उन विभन्न कारणों व परिस्थितियों का सामाजिक व वैज्ञानिक आधार पर विश्लेषण किया जाय तो वे मानवीय भूलें जिन पर मानव का वश चलता है उनका निराकरण करके बुराई का मार्ग कम व अच्छाई की राह प्रशस्त की जा सकती है | इसी से मानव प्रगति का रास्ता बनता है | यही बिचार बिंदु इस कृति 'शूर्पणखा' के प्रणयन का उद्देश्य है |
                   स्त्री के नैतिक पतन में समाज, देश, राष्ट्र,संस्कृति व समस्त मानवता के पतन की गाथा निहित रहती है | स्त्री के नैतिक पतन में पुरुषों, परिवार,समाज एवं स्वयं स्त्री-पुरुष के नैतिक बल की कमी की क्या क्या भूमिकाएं  होती हैं? कोई क्यों बुरा बन जाता है ? स्वयं स्त्री, पुरुष, समाज, राज्य व धर्म के क्या कर्तव्य हैं ताकि नैतिकता एवं सामाजिक समन्वयता बनी रहे , बुराई कम हो | स्त्री शिक्षा का क्या महत्त्व है? इन्ही सब यक्ष प्रश्नों के विश्लेषणात्मक व व्याख्यात्मक तथ्य प्रस्तुत करती है यह कृति  "शूर्पणखा" ; जिसकी नायिका   राम कथा के  दो महत्वपूर्ण व निर्णायक पात्रों  व खल नायिकाओं में से एक है , महानायक रावण की भगिनी --शूर्पणखा | अगीत विधा के षटपदी छंदों में निबद्ध यह कृति- वन्दना, विनय  व  पूर्वा पर  ..शीर्षकों के साथ  ९ सर्गों में रचित है |
            प्रस्तुत है-----वन्दना --कुल १२ छंद ...
१-
तेरी भक्ति भाव के इच्छुक,
श्रेष्ठ कर्म रत,ज्ञान धर्म युत,
माँ तेरा आवाहन करते,
इच्छित वर उनको मिलते हैं |
कृपा दृष्टि हो माँ सरस्वती !
हों मन में नव भाव अवतरित ||
२-
तेरे बालक  को हे माता !
प्रारम्भिक अभिव्यक्ति स्वतः ही ,
हो जाती जब मातु रूप में ,
हृदय गुहा में तुझको पाता |
शुद्ध भाव से तुझे भजे तो,
परिमार्जित मेधा होजाती ||
३-
हे माँ ! जब तुम दिव्य लोक से ,
दिव्य रसों की वर्षा करती ;
निर्मल बुद्धि विवेक ज्ञान की;
सभी प्रेरणा मिलती जग को |
ज्ञान भाव से सकल विश्व को,
करें पल्लवित मातु शारदे ! 
४-
मानव  हो परमार्थ भाव  रत,
माँ जब करता तुम्हें स्मरण |
श्रेष्ठ ज्ञान के तत्व मिलें फिर,
गूढ़ ज्ञान के स्वर मिल जाते |
गूढ़ ज्ञान के सभी अर्थ माँ,
इस मन में ज्योतिर्मय करदो |
५-
ऋषियों ने माँ सप्त स्वरों को१ ,
आदि ऊर्जा२ और स्वयंभू३ ;
अनहद नाद४ से किया संगठित |
जग कल्याण हेतु माँ वाणी !
बनी बैखरी५ हुई अवतरित ,
हो जाते मन भाव उत्तरित ||
६-
भाषा के निहितार्थ समझकर ,
वाणी होती मंगलकारी |
मंगलमय वाणी-स्वर नर को.
आत्मीयता भाव सिखाये |
जब परमार्थ भाव मन बिकसे ,
माँ समृद्धि लक्ष्मी बन जाती ||
७-
भाव स्वरों के श्रेष्ठ ज्ञान से ,
तत्व ज्ञान के स्वर मिलते हैं |
फलित ज्ञान६  होजाता नर को,
तब होपाता ज्योति-दीप सा |
ज्ञान ज्योति से ज्योति जले जग,
मिटे तमिस्रा नव प्रभात हो ||
८-
सर्व ज्ञान संपन्न विविधि नर,
सभी एक से कब होते हैं७  |
अनुभव श्रृद्धा तप व भावना,
होते सबकेभिन्न  भिन्न हैं |
भरे जलाशय ऊपर समतल,
होते ऊंचे -नीचे तल में ||
९-
केवल बुद्धि ज्ञान क्षमता से 
गूढ़ ज्ञान के अर्थ न मिलते |
गूढ़ ज्ञान के तत्व प्राप्ति हित,
निर्मल मन तप  योग चाहिए |
उसी साधना रत सुपात्र को ,
गूढ़ ज्ञान का तत्व मिला है ||
१०-
एसे साधक को सुपात्र को,
मातु वाग्देवी की महिमा;
दैविक,गुरु या अन्य सूत्र से ,
मन में ज्योतित भाव जगाती |
श्रद्धा और स्नेह भाव मिल,
ज्ञान तत्व का अमृत८  मिलता ||
११-
माँ की कृपा नहीं होती है,
भक्ति भाव भी उर न उमंगते |
श्रृद्धा और स्नेह भाव भी,
उस मानस में नहीं उभरता |
भक्ति भाव उर बसे हे माता!
चरणों का मराल बन पाऊँ ||
१२-
श्रम ,विचार और कला भाव के,
अर्थ परक और ज्ञान रूप९  की;
सब विद्याएँ करें प्रवाहित,
सकल जगत में माँ कल्याणी !
ज्ञान रसातल पड़े श्याम' को
भी कुछ वाणी-स्वर-कण दो माँ !       .......क्रमश :---विनय ...अगली कड़ी में ..

( कुंजिका --१= आदि वाणी ..सरगम के सात स्वर ...२= सृष्टि के प्रारम्भ में उपस्थित आदि-ऊर्जा...३=स्वयं उत्पन्न , आदि-अनादि...४= अनंत आकाश , अंतरिक्ष में उपस्थित आदि नाद , आदि-शब्द ..५=वाणी का मुख से बोलने वाला रूप (बोली )...६= किसी भी वस्तु आदि का तत्व ज्ञान प्राप्त करके ही मानव फलित अर्थात उसका उपयोगी रूप प्रयोग में ला सकता है एवं अन्य के लिए प्रेरणा बन सकता है ....७= सर्वज्ञान संपन्न होने पर भी अपने अनुभव, तप, साधना, मनन, भावना , भक्ति व श्रृद्धा के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति उस ज्ञान को प्रयोग में ला पाता है इसी के अनुसार ज्ञानी व विवेकी जन भिन्न भिन्न स्तर पर होते हैं ....८= प्राप्त तत्व-ज्ञान का भी मूल भाव-अमृत ---व्यक्ति व ज्ञानी को उसके तप, श्रद्धा , स्नेह , व्यवहार व  ईश्वर कृपा से ही प्राप्त होता है | ...९= श्रम परक, कलापरक, अर्थ परक, विचार परक व ज्ञान परक ---ये मूलतः पांच प्रकार की भाव-विद्याएँ होती हैं ,जिनसे सारा विश्व-व्यवहार-कार्य चलता है...)

इब लौंडिया नी लौंडों को संभालो-लघु कथा


इब लौंडिया नी लौंडों को संभालो-लघु कथा 

Indian_village : Smiling indian girl joining hands; as a  welcoming gesture Stock PhotoBeautiful_indian_girl_face : Asian Young smiling woman calling by phone. Over white background

सुखबीर ....सुखबीर 'सख्त लहजे में लखनपाल आवाज़ लगता हुआ सुखबीर की दहलीज़ में घुसा .सुखबीर आँगन में खाट पर बैठा हुआ चाय पी रहा था .लखनपाल की आवाज़ सुनते ही सुखबीर ज्यों ही उठा लखनपाल वहीँ आ पहुंचा और कड़े स्वर में बोला -'सुख्बीरे   कित्ती बेर टोका था तुझे ...लौंडिया को दाब के रख ...जवान छोरी .जींस पहरेगी ..फून रखेगी ...और तो और मोटर साईकिल पे फिरेगी ..लौंडा बन के .टेम देखा है तूने ?साँझ होने आ गयी ..इब तक न आई ..मेरा बबलू भी फंस गया उसके साथ ...अच्छा सोच्चा मैंने साथ साथ आ जाया करेंगें सकूल से ..पांच किलोमीटर का रास्ता .मेरे लौंडे के साथ रहने से तेरी लौंडिया की हिफाज़त भी हो जावेगी .तू इतने इत्मीनान से क्योकर बैठा ?कोई फून आया था के ?भाग न गयी हो किसी की गैल ?तावली कर तावली...''लखनपाल की बात पर सुखबीर ठहाका  लगाकर हंस पड़ा और उसे झिड़कते हुए बोला -''बक बक पूरी होगी तेरी या ओर भी बकेगा ?मेरी लौंडिया ना भागी किसी की गैल .. तेरे लौंडे के कारण हो गया वहां सकूल में बबाल .उसने किसी नेता की लौडियां छेड़ दी ..फून से फोटू खीन्छ लिया .मेरी लौंडिया ने संभाला सारा मामला .उस लड़की को समझाया तब मानी वो ...अरनी पड़ गए थे लेने के देने .सब फून पे बताया मेरी लौंडिया ने .इब आने ही वाले . लखनपाल इब लौंडिया नी लौंडों को संभालो .सवरे बोत  बिगड़ गए .''लखनपाल ये सुनकर ''आन दे आज  हरामजादे कू... फून ना फोड़ दिया उसका तो मेरा नाम लखनपाल नी !!'' कहता हुआ खिसियाकर वहां से खिसक लिया .
                                                         शिखा कौशिक ''नूतन''

रविवार, 4 नवंबर 2012

' करवा चौथ जैसे त्यौहार क्यों मनाये जाते हैं ?'



' करवा चौथ जैसे त्यौहार क्यों मनाये  जाते  हैं ?'


अरी सुहागनों ! जरा धीरे से हंसो ,
यूं ना कहकहे लगाओ 
जानते हैं आज करवा चौथ है ,
पर तुम्हारी  कुछ माताएं ,
बहने ,बेटियां और सखियाँ 
असहज महसूस कर रही हैं आज के दिन 
क्योंकि वे सुहागन नहीं हैं !!




वर्ष भर तुमको रहता है 
इसी त्यौहार का ;इसी दिन का इंतजार ,
पर जो सुहागन नहीं हैं 
उनसे पूछो इस त्यौहार के आने से पूर्व के दिन 
और इस दिन कैसा सूनापन 
भर जाता है उनके जीवन में !








अरे सुनती नहीं हो !
धीरे चलो !
तुम्हारी पाजेब की छम-छम 
'उन' की भावनाओं को आहत कर रही हैं ,
वे इस दिन कितना भयभीत हैं !
जैसे किसी महान अपराध के लिए 
वर्ष के इस दिन दे दी जाती है 
उन्हें 'काले पानी ' की सजा !

इतना श्रृंगार  कर ,
चूड़ियाँ खनकाकर ,
हथेलियों पर मेहँदी रचाकर,
लाल साड़ी पहनकर ,
सिन्दूर सजाकर 
तुम क्यों  गौरवान्वित हो रही हो 
अपने सौभाग्यवती होने पर  ! 
  






कल तक कितनी ही तुम्हारी 
जाति  की यूं ही होती थी गौरवान्वित 
पर आज चाहती हैं छिपा लें 
खुद को सारे ज़माने से इस दिन 
ऐसे जैसे कोई  अस्तित्व ही नहीं है 
उनका इस दुनिया में !

ये भी भला कोई सौभाग्य हुआ 
जो पुरुष के होने से है अन्यथा 
स्त्री को बना देता है मनहूस ,
कमबख्त और हीन !

ऐसे त्यौहार क्यों मनाये  जाते  हैं ?
जो स्त्री -स्त्री को बाँट  देते  हैं ,
एक  को देते  हैं हक़   
हंसने का ,मुस्कुराने का 
और दूसरी को 
लांछित कर ,लज्जित कर ,
तानों की कटार  से काँट देते हैं !

                                शिखा कौशिक 'नूतन'


शनिवार, 3 नवंबर 2012

छोटी-सी गुड़िया

छोटी-सी वो गुड़िया थी गुड़ियों संग खेला करती थी,
खेल-कूद में, विद्यालय में सदा ही अव्वल रहती थी ।

भोली थी, नादान थी वो पर दिल सबका वो लुभाती थी,
मासूमियत की मूरत थी, बिन पंख ही वो उड़ जाती थी ।

बचपन के उस दौर में थी जब हर पल उसका अपना था, 
दुनिया से सरोकार नहीं था, उसका अपना सपना था । 

यूँ तो सबकी प्यारी थी पर पिता तो 'बोझ' समझता था, 
एक बेटी है जंजाल है ये, वो ऐसा ही रोज समझता था । 

शादी-ब्याह करना होगा, हर खर्च वहन करना होगा,
लड़के वालों की हर शर्तें, हर बात सहन करना होगा ।

कन्यादान के साथ में कितने 'अन्य' दान करने होंगे,
घर के साथ इस महंगाई में, ये देह गिरवी धरने होंगे ।

छोटी-सी एक नौकरी है, ये कैसे मैं कर पाउँगा, 
रोज ये रोना रोता था, मैं जीते जी मर जाऊंगा । 

जितनी जल्दी उतने कम दहेज़ में काम बन जायेगा, 
किसी तरह शादी कर दूँ, हर बोझ तो फिर टल जायेगा । 

इस सोच से ग्रसित बाप ने एक दिन कर दी फिर मनमानी, 
बारह बरस की आयु में गुडिया की ब्याह उसने ठानी । 

सोलह बरस का देख के लड़का करवा ही दी फिर शादी, 
शादी क्या थी ये तो थी एक जीवन की बस बर्बादी । 

छोटी-सी गुड़िया के तो समझ से था सबकुछ परे, 
सब नादान थे, खुश थे सब, पर पीर पराई कौन हरे । 

ब्याह रचा के अब गुड़िया को ससुराल में जाना था, 
खेल-कूद छोड़ गृहस्थी अब उस भोली को चलाना था । 

उस नादान-सी 'बोझ' के ऊपर अब कितने थे बोझ पड़े, 
घर-गृहस्थ के काम थे करने, वो अपने से रोज लड़े । 

इसी तरह कुछ समय था बीता फिर एक दिन खुशखबरी आई, 
घर-बाहर सब खुश थे बड़े, बस गुड़िया ही थी भय खाई । 

माँ बनने का मतलब क्या, उसके समक्ष था प्रश्न खड़ा, 
तथाकथित उस 'बोझ' के ऊपर आज एक दायित्व बढ़ा । 

कष्टों में कुछ मास थे गुजरे, फिर एक दिन तबियत बिगड़ा, 
घर के कुछ उपचार के बाद फिर अस्पताल जाना पड़ा । 

देह-दशा देख डॉक्टर ने तब घरवालों को धमकाया, 
छोटी-सी इस बच्ची का क्यों बाल-विवाह है करवाया ? 

माँ बनने योग्य नहीं अभी तक देह इसका है बन पाया, 
खुशियाँ तुम तो मना रहे पर झेल रही इसकी काया । 

शुरू हुआ ईलाज उसका पर होनी ही थी अनहोनी, 
मातम पसर गया वहां पर सबकी सूरत थी रोनी । 

बच्चा दुनिया देख न पाया, माँ ने भी नैन ढाँप लिए, 
चली गई छोटी-सी गुड़िया, बचपन अपना साथ लिए । 

साथ नहीं दे पाया, उसके देह ने ही संग छोड़ दिया, 
आत्मा भी विलीन हुई, हर बंधन को बस तोड़ दिया । 

एक छोटी-सी गुड़िया थी वो चली गई बस याद है, 
ये उस गुड़िया की कथा नहीं, जाने कितनों की बात है । 

ऐसे ही कितनी ही गुड़िया समय पूर्व बेजान हुई, 
कलुषित सोच और कुरीत के, चक्कर में बलिदान हुई ।

LISTEN WOMAN ! I AM MAN !!


LISTEN WOMAN ! I AM MAN !!


Husband beating wife Stock Photo - 11435589

LISTEN WOMAN ! I AM MAN !!             
THE CREATOR  AND CONTROLLER 
OF MY DESTINY IS ''GOD''
BUT ...YOUR FATE HAS BEEN 
DIRECTED BY  'ME' .

LISTEN WOMAN ! I AM MAN !!
WHENEVER YOU COME IN FRONT OF ME 
KEEP YOUR EYES DOWN 
AND HOLD YOUR TONGUE !


LISTEN WOMAN ! I AM MAN !!
I AM HIGHER THAN YOU 
IN INTELLIGENCE AND 
PHYSICAL POWER 
SO THAT DO'NT TRY 
TO INTERRUPT ME !

LISTEN WOMAN ! I AM MAN !!
MY STATUS IS VERY 
HIGH THAN YOU 
POOH ...POOH...
YOU ARE FROM CATTLE CLASS 
AND AS A HUMAN 
YOU ARE LOW RACIAL !


LISTEN WOMAN ! I AM MAN !!
YOU ARE MY SHADOW MERELY 
YOU HAVE NO EXISTENCE 
NO PERSONALITY 
WITHOUT ME !

LISTEN WOMAN ! I AM MAN !!
DO'NT BREAK LAWS 
MADE BY ME 
IF YOU BREAK 
I'LL PUNISH YOU !

LISTEN WOMAN ! I AM MAN !!
I DETERMINE PUNISHMENT ALSO 
AND WHATEVER PUNISHMENT 
I'LL AWARD YOU 
NO APPEAL LIES AGAINST 
MY ORDER ANYWHERE !

LISTEN WOMAN ! I AM MAN !!
YOU HAVE TO ENTERTAIN ME 
DO WHATEVER I SAY 
FOLLOW MY ORDERS 
THIS IS YOUR DUTY 
DO'NT THINK ANYTHING ELSE !!

                                                                   SHIKHA KAUSHIK 'NUTAN'







नव गीत पुराने कलशों में--गीत ----डा श्याम गुप्त...



                                     
नव  गीत पुराने कलशों में ....

नव गीत पुराने कलशों में ,
मैं भर कर के ले आया हूँ |
ज्यों विविध व्यंजन नवयुग के,
पत्तल-दौनों में लाया हूँ  |

हैं भाव नए गीतों के पर,
हैं शब्द-छंद प्राचीन विविध |
जैसे हो शुद्ध संग्रहित मधु ,
नव बोतल में भर लाया हूँ |

हो क्रान्ति नव विचारों की , हाँ -
सत्-शुचि अनुभव से अभिसिंचित |
कह  सकें कि युग मंथित स्वर के,
शुचि भाव संजो कर लाया हूँ |

नव पीढ़ी अन्वित नवोन्मेष ,
स्फूर्त व नूतन भाव-तथ्य |
भावित पूर्वजों के अनुभव से,
मज्जित, सज्जित कर लाया हूँ |

युगबोध निमज्जित नहीं रहे ,
कैसी कविता , कैसी गाथा  |
संचित  वे भूत-भविष्य भाव,
हित वर्तमान के लाया हूँ |

नवयुग की आशाओं से युत,
निज संस्कृति के संस्कार सहित |
पग रखें प्रगति के पथ पर हम,
आशा भविष्य की लाया हूँ ||

शुक्रवार, 2 नवंबर 2012

नारी सशक्तिकरण का एक रूप ये भी है

नारी सशक्तिकरण का एक रूप ये भी है -
[नवभारत टाइम्स से साभार ]

आज करवा चौथ है। इस बार क्यों न कुछ ऐसा हो कि चांद निकलने पर 

साजन अपनी सजनी को कुछ इस तरह देखे...





ये भी खूब रही -
नई दिल्ली।। शशि थरूर की पत्नी सुनंदा को '50 करोड़ की गर्लफ्रेंड' कहना नरेंद्र मोदी को खासा भारी पड़ा है। उनकी इस टिप्पणी पर दिल्ली महिला आयोग ने कड़ा ऐतराज जताया।इस मामले पर संज्ञान लेते हुए गुरुवार को आयोग की अध्यक्ष बरखा सिंह ने प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई और मांग की कि मोदी इसके लिए सुनंदा थरूर से माफी मांगें। बरखा सिंह ने आलोचना करते हुए मोदी पर बातों-बातों में एक शेर दाग दिया। उन्होंने कहा-
 'नफरतें पालना दुर्भाग्‍य रहा हो जिसका, 
वो किसी रिश्‍ते की अज़मत कहां पहचानता है। 
प्‍यार को पैसे में तौलने वाले से कहो, 
कोई बंदर अदरक का मजा कहां जानता है...'

                                                                      शिखा कौशिक 'नूतन'