शनिवार, 1 अक्टूबर 2011

तेरे लाज के घूँघट से


                                            

उमड़ आयी बदली 
तेरे लाज के घूँघट से 
द्वार पर  खड़ी तू 
बेतस बाट जोहती 
झलक गये तेरे केशू
तेरे आँखों के अर्पण से |

पनघट पे तेरा आना 
भेष बदल गगरी छलकाना 
छलक गयी गगरी तेरी 
तेरे लाज के घूँघट से |

सजीले पंख सजाना 
प्रतिध्वनित  वेग से 
झरकर गिर आयी 
तेरे पाजेब की रुनझुन से |

रागों को त्याग 
निष्प्राण तन में उज्जवल 
उस अनछुई छुअन में 
बरस गयी बदली 
तेरे लाज के घूँघट से 
उमड़ आयी बदली 
तेरे लाज के घूँघट से 
- दीप्ति शर्मा 


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शुक्रवार, 30 सितंबर 2011

मिट रही हैं बेटियां मिटती रहे---बेटे को पढ़ने दो |

शिखा जी को लिखा 

पथ दिखा सहेली कहाँ गईं ?
वो शिखा सहेली कहाँ गईं ??
ब्लॉग जगत वीराना है -
तू वापस आ जा जहाँ गई ||

कुशलक्षेम हम चाहें तो--
वाह में बदलें आहें तो
सही रास्ता चुन पाए  --
सम्मुख हों दो राहें तो ||

दीदी के भी दर्शन दूर |
दूर  कर  रहे कोई टूर |
सुख-दुःख के हैं साथी हम 
क्यूँ आने से हो मजबूर??

 बेटे को पढ़ने दो |
* घट रही है रोटियां घटती रहें---गेहूं  को सड़ने  दो |
* बँट रही हैं बोटियाँ बटती रहें-- नंगों को लड़ने  दो |

* गल रही हैं चोटियाँ गलती रहें--- पानी को घटने दो |
* मिट  रही हैं बेटियां मिटती रहे---बेटे को पढ़ने दो |

* घुट रही है बच्चियां घुटती रहें-- बर्तन को मलने दो ||
* लग रही हैं बंदिशें लगती रहें--- दौलत को बढ़ने दो |

* पिट रही हैं गोटियाँ पिटती रहें---रानी को चलने दो |
* मिट रही हैं हसरतें मिटती रहें--जीवन को मरने दो ||



सोमवार, 26 सितंबर 2011

पहले श्रृद्धा, फिर श्राद्ध करे



  हमारी संस्कृति कई रीति रिवाजों और परम्पराओं का समन्वय लिए हुए है। हिन्दुओं में श्राद्ध प्रथा बहुत प्राचीन है,जो आज भी अति शुभ मानी जाती है। हमारे धर्म शास्त्रों के अनुसार मृतात्मों को उचित गति मिले, इसके हेतु मरणोउपरांत पिडदान, श्राद्ध और तर्पण की व्यवस्था की गई है। श्राद्ध का अर्थ है श्रद्धापूर्ण व्यवहार तथा तर्पण का अर्थ है तृप्त करना, श्राद्ध-तर्पण का अर्थ है पितरो को तृप्त करने की प्रक्रिया है। आश्विन मास में श्राद्ध पक्ष में पितरोेें का तर्पण किया जाता है और पितरों की मृत्यु के नियत तिथि पर यथाशक्ति बम्ह भोज और दान दिया जाता है। शास्त्रोें में व गुरू पुराण में कहा गया है कि संसार में श्राद्ध से बढकर और कल्याणप्रद ओर कोई मार्ग नहीं है,अतः बुद्धिमान व्यक्ति को प्रयत्नपूर्वक श्राद्ध करना चाहिए। पितृ-पूजन से संतुष्ट होकर पितर मनुष्यों के लिए आयु, पुत्र, यश, स्वर्ग , कीर्ति , पुष्टि, बल, वैभव, पशु, सुख, धन और धान्य देते है।

 मुगल बादशाह शाहजंहा ने भी हमारी संस्कृति  के श्राद्ध पक्ष की सराहना की है,जब उनके क्रूर्र पुत्र सम्राट  औरंगजेब ने उन्हें जेल में बंद कर यातना दे रहा था और  पानी के लिए तरसा रहा था । आकिल खाॅ के ग्रंथ वाके आत आलमगीरी के अनुसार शाॅहजहा ने अपने पुत्र के नाम पत्र में मंर्मात वाक्य लिखे थे ‘है पुत्र तू भी विचित्र  मुसलमान है, जो अपने जीवित पिता को जल के लिए  तरसा रहा है,शत्-शत् बार प्रशंसनीय है,वे हिन्दु जो अपने मृत पिता को भी जल देते है।’

 अगर हमारे मन में जीवित माता-पिता बुर्जगों के प्रति श्रद्धा नहीं है तो उनके मरने के बाद उनका श्राद्ध मनाने का औचित्य क्या है,हम श्राद्ध इस डर से मनाते है कि हमारे पितरों की आत्मा कही भटक रही होगी तो हमें कही नुकसान नही पहुचाए,उनका अन्र्तमन उनको धिक्कारता हैकि हमने अपने मृतक के जीते जी उन्हें बहुत तकलीफ पहुचाई है,इसलिए मरने के बाद ये  पितृ हमें भी तकलीफ पहुॅचा सकते है।इसलिए हम श्राद्ध    पक्ष मनाकर अपने पितरों को खुश करने का प्रयास करते   है। 
जिस काग की सालभर पूछ नहीं होती है  उन्हें श्राद्ध पक्ष में कागो-वा-2 करके छत की मुडेर पर  बुलाया जाता है और पितरो के नाम से पकवान खिलाये  जाते है और पानी पिलाया जाता है,खा लेने पर यह सोचकर सन्तुष्ट हो जाते है कि हमारे पिृत हमसे प्रसन्न   है।
                     
  आज की युवा-पीढी में श्राद्ध मनाने के प्रति श्रद्धा   भाव खत्म हो चुका है,वह समाज की नजर में प्रंशसा  पाने और दिखावे के लिए लम्बे-चैडे भोज का आयोजन  करती है।हमे हमारे बुर्जगों को जीते जी
प्यार ,सम्मान व  श्रद्धा देनी होगी।

श्राद्ध पक्ष हमें अपने पूर्वजों के प्रति   अगाध श्रद्धा और स्मरण भाव के लिए प्रोत्साहित करता है, हमें इसे सादगीपूर्वक मनाकर भावी पीढी को भी  अनुसरण करने की प्ररेणा मिलेगी। 


प्रेषकः.
   श्रीमति भुवनेश्वरी मालोत
                        अस्पताल चैराहा
                        महादेव कॅालोनी
                        बांसवाडा राज

रविवार, 25 सितंबर 2011

आज मेरी दादी का श्राद्ध है

यह वाक्य आज कल खूब सुनने में आता है ,सुनकर अपने देश की संस्कृति और रिवाजों पर गर्व होता है जहाँ  मरने के बाद भी अपने बुजुर्गों को पूजा जाता है देखने सुनने में भी अच्छा लगता है ,यह बात अलग है की इस रीत को निबाहने में वास्तव में बुजुर्गों के लिए सम्मान है या भगवान् का डर या फिर अपने जीवन में सुख शांति की कामना !यह व्यक्ति दर  व्यक्ति पर निर्भर करता है !मेरा मकसद यहाँ इस प्रथा का विश्लेषण करना नहीं बल्कि एक सच्चाई से आप लोगों को रूबरू करना है ,जो मुझे आज तक अन्दर से कचोट रही है !
   आज दादी का श्राद्ध है ...उसकी पोती ने आकर बताया !उस दादी का जिसका जिंदगी और रिश्तों से विश्वास उठ चुका था !जो दादी कभी अपने घर की महारानी थी अपने पति की आँख का तारा थी ,पढ़ी लिखी अच्छी नोकरी पर आसीन एक सम्मान जनक जिंदगी जीने वाली थी !कुछ साल पहले अचानक पति के गुजरने के बाद मानो वह तन मन से पंगु हो गई थी उसका आसमान उसकी धरती मनो भगवान् ने छीन ली थी!एक ही बेटा बहु थे !अपने साथ माँ को ले आये ,समाज से वाहवाही पाई !माँ ने प्यार में धीरे धीरे अपनी सारी जमापूंजी बेटे बहु को देदी,क्या करती एक ही बेटा था सो देनी ही थी !फिर कुछ समय बाद न जाने कोन सी भावना दादी के अन्दर पनप रही थी की जब भी मिले वो कहती थी बेटा अब जिंदगी से मन ऊब गया !हाथो पैरों ने भी धोखा देना शुरू कर दिया दो कदम भी चल नहीं पाती थी !
फिर एक दिन अचानक शोर मचा न जाने दादी कहाँ चली गई दो तीन दिन तक ढूँढ़ते रहे !फिर पुलिस की सहायता से पता चला की वहां के मुर्दा घर में एक बूढी औरत जो कटी हुई रेलवे ट्रेक से उठाई गई थी एक गठरी में बंधी हुई मिली !
जो दो कदम चल नहीं सकती थी वो दो किलोमीटर कैसे रेलवे ट्रेक पर जा सकती है आज तक रहस्य बना हुआ है !पुलिस आई चली गई मिडिया वाले आये चले गए ,जो डाएरी दादी लिखती   थी   वो कहाँ गई आज तक पता नहीं !कहानी पूरी तरह बदल दी गई !(रसूख वाले लोग हैं क्षमा करना किसी कारन वश पूरी पहचान नहीं बता सकती)कौन न्याय दिलाये क्या वो बेटा जिसके लिए माँ पूरे दिन इन्तजार करती थी की आफिस से आकर माँ से एक दो बात करेगा और वो बेटा आफिस से आते ही सीधा पत्नी के पास जाता था !माँ इससे ज्यादा कुछ नहीं चाहती थी !या वो बहु न्याय दिलाएगी जो एक बार कह रही थी कि मेरी सास को तो  खाना भी टाइम से चाहिए ........क्या कुछ ज्यादा मांग लिया  था ????
आज उस दादी का श्राद्ध है ..........
       

शनिवार, 24 सितंबर 2011

सूखे नैन



नहीं आते आंसू,

सुख गया सागर,
इतना बहा कि अब
इंतज़ार में तेरे
मेरे सूखे नैन |

याद है मुझको
तेरा वो रूठना,
दो बुँदे बहके
तुझे मन थी लेती,
जहर गई वो बूंदें
इंतज़ार में तेरे
मेरे सूखे नैन |

आंसू नहीं मोती हैं
तुम्ही तो थे कहते,
एक भी ये मोती
तुम बिखरने नहीं देते,
खो गए वो मोती
इंतज़ार में तेरे
मेरे सूखे नैन |

वर्दी पहने जब निकले थे

दी मुस्कान के साथ विदाई,
आँखों में था पानी
दिल रुलाता था जुदाई,
सुख गया वो पानी,

इंतज़ार में तेरे
मेरे सूखे नैन |

तब भी बहुत बहा था
जब ये खबर थी आई
देश रक्षा में तुने
अपनी जान है लुटाई,
पर अब नहीं बहते,
इंतज़ार में तेरे
मेरे सूखे नैन |

जानती हूँ मैं
तुम नहीं हो आने वाले,
पर ये दिल ही नहीं मानता
तेरा इंतज़ार है करता,
करवटें बदल रोते-रोते,
इंतज़ार में तेरे
मेरे सूखे नैन |

बुधवार, 21 सितंबर 2011

पूर्णतः सच्ची घटना से प्ररित कुछ पंक्तियाँ कविता

संभवतः वर्ष 1999 के जून माह का अवसर रहा होगा। मेरी तैनाती ऋषिकेश से 15 किलोमीटर दूर पर्वतीय जनपद टिहरी गढवाल की एकमात्र अर्द्धमैदानी तहसील नरेन्द्रनगर में थी। उत्तराखंड राज्य की घोषणा हो चुकी थी बस उसे अवतरित होना बाकी था। तत्कालीन भारत सरकार के प्रधानमंत्री महोदय का उत्तराखंड आना प्रस्तावित था जिसके लिये आसपास के सभी जनपदों से प्रशासनिक अधिकारियों को शान्ति व्यवस्था हेतु जिम्मेदारी सौंपी गयी थीं । मुझे भी एक ऐसी ही मीटिंग में भाग लेने हेतु देहरादून कलक्ट्रेट पहुंचना था।

प्रातः जल्दी उठा और सरकारी कारिन्दों के साथ सरकारी जीप से देहरादून के लिये चल पड़ा। ऋषिकेश से कुछ किलोमीटर आगे बढ़ने पर थोड़ा सा रास्ता जंगल से होकर गुजरता था । इसी जगह पहँच कर देखा आगे रास्ते पर भारी भीड खडी है। सरकारी जीप को आते देखकर भीड़ इस आशय से किनारे हो गयी कि शायद पुलिस आ गयी है। कैातूहलवश जीप रोकवा कर मैं भी उतर पडा और भीड को लगभग चीरता हुआ आगे बढ आया। देखा सड़क से पचास मीटर दूर जंगल की अंदर एक युवती की अर्द्वनग्न लाश पड़ी थी।

आसपास एकत्रित भीड किसी मदारी के सामने खड़े तमाशबीनों की तरह उस लाश को देख रही थी। मैने आगे बढकर देखा युवती लगभग इक्कीस वर्ष की थी उसके शरीर पर छींटदार सूट और गले में रंगीन दुपट्टा था। गौरतलब बात यह थी उसके दाँये हाथ की कलाई पर ड्रिप के माध्मम से दवा, ग्लूकोस आदि चढ़ाये जाने वाली नली लगी थी। पास ही ऐक अधचढ़ी ड्रिप और नली भी पड़ी थी। युवती के शरीर केे निचले हिस्से केा देखने से स्पष्ठ प्रतीत होता था कि वहा गर्भवती थी। यह स्पष्ट था कि अनचाहे गर्भ से निजात पाने के दौरान किसी गंभीर काप्लिकेशन के कारण ही उसेकी मृत्यु हुयी थी और उसका तीमारदार अपनी जान छुड़ाकर उसे इस तरह छोड़कर भाग गया होगा। मैने आगामी कार्यवाही के लिये स्थानीय पुलिस को फोन किया और अपनी जीप से आगामी कार्यक्रम के लिये चल पड़ा।


परन्तु उस युवती की यह दशा देखकर मैं व्यथित हो गया था । वह युवती मेरे मष्तिश्क से जाने का नाम ही नहीं लेती थी , मेरा पीछा ही नहीं छोड़ रही थी , वह जैसे मेरी जीप में आकर ही बैठ गयी थी । परन्तु उस युवती की यह दशा देखकर मैं व्यथित हो गया था ।

वह युवती मेरे मष्तिश्क से जाने का नाम ही नहीं लेती थी , मेरा पीछा ही नहीं छोड़ रही थी , वह जैसे मेरी जीप में आकर ही बैठ गयी थी । मै सोचने लगा कि आखिर किसी की प्रेमिका रही होगी वह ? प्रेम के वशीभूत अपने प्रेमी के आलिंगन में बंधने को कैसी आतुर रही होगी वह ?

और उस सम्मोहक आलिंगन की परिणति इस रूप में होगी, क्या कभी उसने सोचा होगा ? नहीं ना! बस इसी पृष्ठभूमि में उस नवयौवना को श्रंद्धांजलि स्वरूप कुछ पंक्तियाँ लिखीं थी जो समर्पित थीं उस प्रारंभिक निश्छल आलिंगन को, और उस इक्कीसवें बसंत को जो चाहकर भी अगली बहार या पतझड़ नहीं देख सकी थी।


वह श्रंद्धांजलि पूर्व में ‘साहित्य शिल्पी’ के संस्करण में कविता ‘इक्कीसवाँ बसंत’ के नाम से जारी हुयी है जिसे आज यहाँ पुनः प्रस्तुत कर रहा हूँ।


इक्कीसवॉ बसन्त
तपते रेगिस्तान में

पानी की कामना जैसी

धुप्प अंधेरे में

रोषनी की किरण फूटने जैसी

मॉ से बिछडे हुए

किसी अबोध का मिलने पर

मॉ की छाती से चिपककर रोने जैसी

मंझधार में डूबते हुए को

किनारा पाकर मिलने वाली संतुश्टि जैसी

कुछ ऐसी ही तो थी

उस इक्कीसवें बसंत की कल्पना

लेकिन यथार्थ की कठोरता

जब तमाचा बनकर

मेरे गालों पर पडीं

तब मैने जाना कि

चॉदनी रात कैसे आग उगलती है?

चंदन का आलिंगन

कितना जहरीला हो सकता है?

दिये की लौ

कैसे झुलसा सकती है?

प्रेम की आसक्ति

कितना लाचार कर सकती है?

चहचहाती चिडिया

एक पल में सहम कर

मौन हो सकती है

निरीह मेमना

मिमियाकर तुरंत निस्तेज हो सकता है

अगर वह भी

मेरी तरह किसी

कसाई के साथ हो


‘साहित्य शिल्पी’ पर पूरी कविता पढ़ने के लिए आगामी लिंक पर क्लिक करे .........

पूर्णतः सच्ची घटना से प्ररित कुछ पंक्तियाँ कविता

रविवार, 18 सितंबर 2011

भ्रूण में मरती हुई वो मारती इक वंश पूरा

भ्रूण में मरती हुई वो मारती इक वंश पूरा

बदचलन से दोस्ती, खुशियाँ मनाती  रीतियाँ
नेकनीयत से अदावत कर चुकी  हैं नीतियाँ |
आज आंटे की पड़ी किल्लत, सडा गेहूं बहुत-
भुखमरों को तो पिलाते, किंग बीयर-शीशियाँ ||
photo of a sugar ant (pharaoh ant) sitting on a sugar crystal
देख -गन्ने सी  सड़ी,  पेरी  गयी  इंसानियत,
ठीक चीनी सी बनावट ढो  रही हैं  चीटियाँ ||


हो  रही  बंजर  धरा, गौवंश  का  अवसान  है-
सब्जियों पर छिड़क दारु, दूध दुहती यूरिया ||


भ्रूण  में  मरती  हुई  वो  मारती इक वंश पूरा-
दोष दाहिज का  मरोड़े  कांच की नव चूड़ियाँ |


हो चुके इंसान गाफिल जब सृजन-सद्कर्म से,
पीढियां  दर  पीढियां, बढती  रहीं  दुश्वारियां  ||