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गुरुवार, 5 मार्च 2015

कैसे रंगे बनवारी ...डा श्याम गुप्त....



कैसे रंगे बनवारी

सोचि सोचि राधे हारी, कैसे रंगे बनवारी,
कोऊ तौ न रंगु चढ़े, नीले अंग वारे हैं |
बैजनी वैजंतीमाल, पीत पट कटि डारि,
ओठ लाल-लाल श्याम. नैन रतनारे हैं |
हरे बांस वंसी हाथ, हाथन भरे गुलाल ,
प्रेम रंग सन्यो कान्ह, केस कज़रारे हैं |
केसर अबीर रोरी, रच्यो है विसाल भाल,
रंग रंगीलो तापै,  मोर-मुकुट धारे हैं || 

चाहें कोऊ रंगु डारौ, चढिहै न लालजू पे,
क्यों न चढ़े रंग, लाल, राधा रंगु हारौ है |
राधे कहो नीलु तन, चाहें स्याम-घन सखि !
तन कौ है कारौ, पै मन कौ न कारौ है |
जन कौ दुलारौ कहौ, सखियन प्यारौ कहौ,
तन कौ रंगीलौ कहौ, मन उजियारो है |
एरी सखि ! जियरा के प्रीति रंग ढारि देऊ,
श्याम रंग न्यारौ चढ़े, सांवरो नियारो है ||
 

मंगलवार, 26 मार्च 2013

कैसी रंग तरंग ??????????... डा श्याम गुप्त ...


                                           
                                     सूनी सब गलिया पडीं,अब कित रंग तरंग |
                                   बस कविता औ ब्लॉग पर, दिखते होली-रंग ||  


बाट  जोहता सुबह से, कोई तो आजाय |
होरी है कहता हुआ, मुख पे रंग लगाय |


                              नल में पानी है नहीं, कैसे रंग घुल पाय  |
                              सूखे सूखे ही चलो अब  रंग लेउ  उड़ाय |


 घर से निकले सोचते, लौटें भीगे अंग |
 अपने अपने  मस्त सब,लौटे हम बेरंग |

                                     घूरत ही पूरे भये, तुरत बीस सेकिंड |
                                अब रंग कैसे डालते, कानूनी प्रतिबन्ध | 

घूरन की का जरूरत, दो क्षण रंग उड़ाय |
 हाथ जहां चाहे परे,  बस रंग देऊ चढ़ाय |