सोमवार, 9 जून 2014

देख देश का हाल, अर्ध आबादी सहमें-रविकर

हमें हार की फ़िक्र नहिं, गले नौ-लखा डाल । 
इतराते टहला किये, रविकर नजर निहाल । 

रविकर नजर निहाल, नजर लेकिन अब लागी। 
हो छिनतई बलात, मार्ग में मरी अभागी। 

उत्तर दिया प्रदेश, रहो छुप अपने गृह में ।  
देख देश का हाल, अर्ध आबादी सहमें ॥  

4 टिप्‍पणियां:

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन पेड़ों के दर्द को क्यों नही समझते हम - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (10-06-2014) को "समीक्षा केवल एक लिंक की.." (चर्चा मंच-1639) पर भी होगी!
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

shikha kaushik ने कहा…

sateek abhivyakti .

Vaanbhatt ने कहा…

सराहनीय कटाक्ष...