शुक्रवार, 29 जून 2012

क्या लिखूं कैसे लिखूं,... डा श्याम गुप्त ....

क्या लिखूं कैसे लिखूं,
अब कुछ लिखा जाता नहीं ;
बेखुदी मैं हम हैं डूबे,
कुछ ख्याल आता नहीं |

उनके ख्यालों की अतल-
गहराइयों में डूब कर ,
होश खो बैठे हैं हम,
अब होश से नाता नहीं |

उनका उठना बैठना,
चलना  मचलना उलझना,
बेरुखी  और वो रूखे अंदाज़ से,
लट  झटकना;
और  लिपट रहना -
मेरी यादों से अब जाता नहीं |

अब तो बस उस शोख के ,
दीदार का है इंतज़ार ;
उनकी इस तस्वीर से ,
अब दिल बहल पाता नहीं ||


6 टिप्‍पणियां:

रविकर फैजाबादी ने कहा…

jabardast bhav-

lokendra singh rajput ने कहा…

वाह, अद्भुत

Rajesh Kumari ने कहा…

सुन्दर एह्सांसों ,भावों से सुसज्जित पोस्ट

महेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा…

अच्छी रचना

veerubhai ने कहा…

कोई बे -कली सी बे -कली है ,बे -कसी सी बे -कसी है ,जिधर देखूं ,नजर तू आए ...बढ़िया प्रस्तुति है आशिकी सी आशिकी है ... .कृपया यहाँ भी पधारें -
ram ram bhai
रविवार, 1 जुलाई 2012
कैसे होय भीति में प्रसव गोसाईं ?

डरा सो मरा
http://veerubhai1947.blogspot.com/

veerubhai ने कहा…

कोई बे -कली सी बे -कली है ,बे -कसी सी बे -कसी है ,जिधर देखूं ,नजर तू आए ...बढ़िया प्रस्तुति है आशिकी सी आशिकी है ... .कृपया यहाँ भी पधारें -
ram ram bhai
रविवार, 1 जुलाई 2012
कैसे होय भीति में प्रसव गोसाईं ?

डरा सो मरा
http://veerubhai1947.blogspot.com/