शनिवार, 16 जून 2012

तुम्हारी आराधना,,, डा श्याम गुप्त की कविता ...

प्रिये !
उस दिन जब तुम्हें
 पहली बार देखा ;                    
टूट गयी पल भर में,
मन की लक्ष्मण रेखा ।

हम तो थे प्यार में,
बड़े ही सौदाई ;
एक ही भ्रूभंग में
होगये धराशायी ।

कितने पल-छिन ,
कितने मुद्दों की साधना,
एक ही क्षण में होगई,
तुम्हारी आराधना ।

कि,  तेरे पलकों की छाँव में,
तभी से -जीते हैं, मरते हैं ;
और सुहाने दुस्वप्न  की तरह ,
उस पल को -
आज तक याद करते हैं ।।

3 टिप्‍पणियां:

Ayodhya Prasad ने कहा…

लाजवाब ....बहुत खूब

Sriprakash Dimri ने कहा…

बहुत भाव पूर्ण कोमल अभिव्यक्ति

डा. श्याम गुप्त ने कहा…

धन्यवाद अयोध्या जी व डिमरी जी...