रविवार, 19 मई 2013

मेरा अंतर्द्वंद



दुनिया की भीड़ में,
इस जीवन की भागदौड़ में
तुम कहीं दूर आगे निकल गये हो
मेरा हाथ तुमसे छूट गया है
जैसे कोई अपना मुझसे रूठ गया है


शायद ग़लती मेरी थी
मैं ज़्यादा ही आपेक्षाएँ कर बैठी थी तुमसे
मुझे समझना चाहिए
तुम्हारा रास्ता तो पहले से ही अलग था
मैं जिसमें अपना अक्स देखती रही
वो तुम नही थे,ना ना कभी हो भी नही सकते
शायद तुम्हारी परीछाई के पीछे भाग रही थी
अब मैने अपने चंचल मन को समझा दिया है
उदासी में भी हँसना उसे सिखा दिया है


पहले एक दिन में
तुम्हारे इंतज़ार में बेचैन हो जाती थी
देखो अब मन स्याना हो चला है
और मैं भी,
देखो एक सप्ताह हो चला है
तुम्हारा कोई पैगाम आए
और मैं अभी तक साँस ले रही हूँ
बिल्कुल वैसे ही जैसे तुम व्यस्त हो,
सब काम जल्दी से निपटाने में
बिना अपनी पगली की चिंता किए,
है ना.......

9 टिप्‍पणियां:

महेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा…

अच्छी रचना है
बहुत बढिया

vandan gupta ने कहा…

सुन्दर भाव

Shikha Kaushik ने कहा…

bahut sundar bhavon ko ukera hai aapne .aabhar

vishvnath ने कहा…

बहुत सुन्दर और मजबूत लेखन .......बहुत बढ़िया .

Dr.NISHA MAHARANA ने कहा…

bahut mushkil hai mn ko samjhana ....badi khubsurti se samjhaya aapne ...badhai ...

ashokkhachar56@gmail.com ने कहा…

सुंदर प्रस्तुति!

Shalini kaushik ने कहा…

विचारणीय भावनात्मक अभिव्यक्ति आभार . बाबूजी शुभ स्वप्न किसी से कहियो मत ...[..एक लघु कथा ] साथ ही जानिए संपत्ति के अधिकार का इतिहास संपत्ति का अधिकार -3महिलाओं के लिए अनोखी शुरुआत आज ही जुड़ेंWOMAN ABOUT MAN

Guzarish ने कहा…

सभी दोस्तों का तहदिल से शुक्रिया

***Punam*** ने कहा…

सुंदर प्रस्तुति.....