रविवार, 26 जून 2022

रितिका का प्यार और लिव-इन - भारतीय संस्कृति को धक्का



रितिका सिंह - एक फैशन ब्लॉगर - जिसे उसके पति आकाश गौतम ने आगरा में उसके अपार्टमेंट की चौथी मंजिल से फेंककर मार डाला और यह पति रितिका का खुद चुना हुआ था, प्रेम विवाह किया था दोनों ने और यही प्यार रितिका को फिर होता है विपुल अग्रवाल से, जो एक डेंटिस्ट का पति है और दस साल के बेटे का पिता और यह प्यार इतना परवान चढ़ता है कि वह पति आकाश गौतम से तलाक लिए बगैर और विपुल अग्रवाल का तलाक हुए बिना रहने लगती है विपुल अग्रवाल के साथ, जिसे आज के समय में आधुनिकीकरण का नाम दिया जाता है - 
"लिव -इन" 

प्रसिद्द समाजशास्त्री आर.एन.सक्सेना कहते हैं कि-
''ज्यों ज्यों एक समाज परंपरा से आधुनिकता की ओर बढ़ता है उसमे शहरीकरण ,औद्योगीकरण ,धर्म निरपेक्ष मूल्य ,जनकल्याण की भावना और जटिलता बढ़ती जाती है ,त्यों त्यों उसमे कानूनों और सामाजिक विधानों का महत्व भी बढ़ता जाता है .''
     सक्सेना जी के विचार और मूल्यांकन सही है  किन्तु यदि हम गहराई में जाते हैं तो हम यही पाते हैं कि मानव प्रकृति जो चल रहा है ,चला आ रहा है उसे एक जाल मानकर छटपटा उठती है और भागती है उस तरफ जो उसके आस पास न होकर दूर की चीज़ है क्योंकि दूर के ढोल सुहावने तो सभी को लगते हैं .हम स्वयं यह बात अनुभव करते हैं कि आज विदेशी भारतीय संस्कृति अपनाने के पीछे पागल हैं तो भारतीय विदेशी संस्कृति अपनाने की पीछे पागल हैं ,देखा जाये तो ये क्या है ,मात्र एक छटपटाहट परिवर्तन के लिए जो कि प्रकृति का नियम है जिसके लिए कहा ही गया है कि -
   ''change is the rule of nature .''
 और यह सांस्कृतिक परिवर्तन चलता ही रहता है क्योंकि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और वह मानव ही इसलिए है क्योंकि उसकी एक संस्कृति है ,उसके पास संस्कृति है ,संस्कृति ही वह अनुपम धरोहर है जो मनुष्य को पशु से श्रेष्ठ घोषित करती है और इसी की सहायता से मानव पीढ़ी दर पीढ़ी प्रगति की ओर उन्मुख होता है .
       संस्कृति का अर्थ होता है विभिन्न संस्कारों के द्वारा सामूहिक जीवन के उद्देश्यों की प्राप्ति ,यह परिमार्जन की एक प्रक्रिया है .संस्कारों को संपन्न करके ही एक मानव सामाजिक प्राणी बनता है .
      राबर्ट बीरस्टीड लिखते हैं -''संस्कृति वह सम्पूर्ण जटिलता है जिसमे वे सभी वस्तुएं सम्मिलित हैं ,जिन पर हम विचार करते हैं ,कार्य करते हैं और समाज के सदस्य होने के नाते अपने पास रखते हैं .''

      बोगार्डस के अनुसार -''संस्कृति किसी समूह के कार्य करने व् सोचने की समस्त विधियां हैं .''
और भारतीय संस्कृति जिसकी पहचान ही है मानव में मानवीय मूल्यों दया,करुणा,भाईचारा .सहृदयता ,कोमलता [संवेदनाओं से भरा हुआ मन ],आपसी सद्भाव ,ममता ,समर्पण ,सरलता ,सहजता ,सरसता जैसे सुन्दर गुणों को व्यक्तित्व में समेटे होना ,यह वह संस्कृति है जो मानव को इंसान से देवता बना देती है ,यह वह संस्कृति है जो कहती है कि -
''धन से भोजन मिलता है -भूख नहीं ,
  धन से दवा मिलती है -स्वास्थ्य नहीं ,
  धन से साथी मिलते हैं -सच्चे मित्र नहीं ,
  धन से एकांत मिलता है -शांति नहीं ,
  धन से बिस्तर प्राप्त कर सकते हैं -नींद नहीं ,
  धन से आभूषण मिलते हैं -रूप नहीं ,
  धन से  सुख मिलता है -आनंद नहीं ,
    इसलिए धनवान होने से ज्यादा चरित्रवान होना आवश्यक है .''
श्री कृष्ण गोयल कहते हैं -''मनुष्य परमात्मा का अंश है ,उसमे परमात्मा के दिव्य ज्ञान ,गुण तथा शक्तियां सुप्त अवस्था में पड़े हैं अपने मन को ध्यान तथा एकाग्रता द्वारा परमात्मा का चिंतन करके दिव्यता को ग्रहण करना तथा प्रसारित करना भारतीय संस्कृति का लक्ष्य रहा है ,इसी कारण भारतीय संस्कृति की जड़ें बहुत गहरी तथा विस्तृत है .भारतीय संस्कृति आध्यात्म तथा मानवता पर आधारित है तथा चेतना के विकास द्वारा प्रेम ,समरसता  तथा मानवीय मूल्यों को सम्पूर्ण मान्यता प्रदान करती है .इसमें चरित्र तथा आंतरिक गुणों पर विशेष बल दिया गया है .मनुष्य के कर्म तथा व्यवहार में दिव्य गुण परिलक्षित होना सफल संस्कृति की ही देन है .''
    हमारी भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता है आपसी भाईचारा और परिवार प्रेम और यही परिवार प्रेम मानव संस्कृति के एक महत्वपूर्ण पहलू की आवश्यकता को भी सामने लाता है जिसे विवाह कहते हैं .विवाह के बारे में बोगार्डस लिखते हैं -
      ''विवाह स्त्री पुरुष के पारिवारिक जीवन में प्रवेश करने की एक संस्था है .''
 इसी संबंध में प्रभु व् अल्टेकर कहते हैं -
   ''पति-पत्नी एवं बच्चों से युक्त मानव ही पूर्ण मानव है .वेदों में अविवाहित व्यक्ति को अपवित्र माना गया है .धार्मिक दृष्टि से वह अपूर्ण है और संस्कारों में भाग लेने योग्य नहीं है .''
    विदेशी विद्वान जहाँ विवाह को यौन संबंधों का नियमन मात्र ही मानते हैं वहीँ भारतीय संस्कृति इसे एक पवित्र धार्मिक संस्कार के रूप में परिभाषित करती है .
     विदेशी विद्वान डब्ल्यू .एच.आर.रिवर्स के अनुसार -
   ''जिन साधनों द्वारा मानव समाज यौन संबंधों का नियमन करता है उन्हें विवाह की संज्ञा दी जा सकती है .''
 जबकि भारतीय संस्कृति जो कि मुख्यतः आर्य मान्यताओं को मानने वाली है और जिस मान्यता को हिन्दू मान्यता का स्वरुप आज प्रमुखतः प्राप्त हो चुका है वहां विवाह एक धार्मिक संस्कार है ,गृहस्थ आश्रम स्वर्ग है ,यहाँ विवाह धार्मिक कर्तव्य की पूर्ति ,पुत्र प्राप्ति ,पारिवारिक सुख ,सामाजिक एकता पितृ ऋण से मुक्ति ,पुरुषार्थों की पूर्ति आदि उद्देश्यों से किया जाता है .डॉ.कपाड़िया ने हिन्दू विवाह को परिभाषित करते हुए कहा है कि -
 ''हिन्दू विवाह एक संस्कार है ....हिन्दू विवाह के तीन उद्देश्य हैं -धार्मिक कार्यों की पूर्ति ,संतान प्राप्ति और यौन सुख .''
 ऐसे में एक नए तरह का सम्बन्ध सामने आता है न ढोल ,न नगाड़ा ,न किसी से रायशुमारी बस सिर्फ पहचान ..एक लड़का ..एक लड़की ..आधुनिकता की ओर बढ़ती सभ्यता के समय में स्वयं साथ रहने का फैसला करते हैं ,जिसमे किसी तीसरे का कोई हस्तक्षेप नहीं ,कोई स्थान नहीं ,कोई पारिवारिक जिम्मेदारी नहीं ,कोई सामाजिक दायित्व नहीं ,जब तक साथ रहना संभव हो रहे ,जब सम्बन्ध असहज हो गए ..हिंसक हो गए तब अलग हो गए ...भले ही साथ रहने से कोई भावनात्मक सम्बन्ध बने हों ,शारीरिक संबंध बने हों ,कोई दायित्व नहीं ,भले ही अलग होने से सम्बन्ध के साथ दिल के भी शीशे की तरह टुकड़े-टुकड़े हो गए हों ,कोई एहसास नहीं ...सिर्फ यही एहसास कि एक प्रयोग कर रहे थे ...सफल हो जाते तो पति-पत्नी की तरह ज़िंदगी गुजार देते और असफल रहे तो जैसे सफर पूरा होने पर ट्रेन के यात्री बिछड़ जाते हैं ऐसे ही बिछड़ गए ...और आज युवा इस सोच की राह पर आगे बढ़ रहा है .फिल्म अभिनेत्री ईशा देओल भी मानती हैं कि -
  ''शादी से पहले लगभग २ साल लिव इन में रहना ज़रूरी है .''
प्रसिद्द मॉडल मेहर भसीन कहती हैं कि -
''आज के समय में लिव इन इसलिए ज़रूरी है क्योंकि तलाक का प्रतिशत बढ़ता जा रहा है .विवाह टूट रहे हैं .अब वह ज़माना नहीं रहा कि लोग मजबूरी में रिश्तों को ढोहें ,इसलिए लिव इन का विकल्प लोगों को आकर्षित कर रहा है क्योंकि यहाँ रिश्तों में जबरदस्ती नहीं है .'' 
 लिव इन को लेकर युवाओं की सकारात्मक सोच ही आज इस सम्बन्ध को भारतीय संस्कृति पर चोट साबित करने हेतु पर्याप्त है .जिस सम्बन्ध को भारतीय संस्कृति मात्र दो व्यक्तियों का मिलन न मानकर दो परिवारों दो सभ्यताओं का मिलन मानती है ,जहाँ नारी और पुरुष का ये रिश्ता सामाजिक समझदारी ,पारिवारिक सहयोग से निर्मित होता है ,जिस संस्कृति का गौरव परिवार-प्रेम ,भाईचारा है ,जिसमे माता पिता को देवोभवः की उपाधि दी गयी है उस देश में जहाँ सीता जैसी आर्य पुत्री जो सर्व सक्षम हैं ,भूमि से ऋषि मुनियों के रक्त से उत्पन्न आर्य कन्या हैं ,तक श्री राम को अपने वर के रूप में पसंद करते हुए भी अपने पिता के प्रण को ऊपर रखती हैं और माता गौरी से कहती हैं -

''मोर मनोरथ जानहु नीके ,बसहु सदा उर पुर सबही के ,
कीनेउ प्रगट न कारन तेहि ,अस कही चरण गहे वैदेही .''
अर्थात मेरी मनोकामना आप भली-भांति जानती हैं ,क्योंकि आप सदैव सबही के ह्रदय मंदिर में वास करती हैं ,इसी कारण मैंने उसको प्रगट नहीं किया ,ऐसा कहकर सीता ने उमा के चरण पकड़ लिए .[बालकाण्ड ]



 और ऐसे ही श्रेष्ठ आर्यपुत्र भगवान राम के बारे में महाराजा जनक के कुलगुरु शतानन्द जी भी यही महाराजा दशरथ को बताते हैं कि धनुष यज्ञ सम्पन्न होने पर सीता से राम विवाह सम्पन्न हो गया किन्तु वे सीता का पत्नी रूप में ग्रहण पिता की आज्ञा के अनुसार ही करेंगें ,ऐसी उनकी मनोकामना है .


   ऐसे आदर्श चरित्र भारतीय संस्कृति की शोभा हैं और ऐसे ही विवाह जैसे संस्कार के समय हिन्दू धर्म में पति-पत्नी द्वारा अग्नि के समक्ष लिए जाने वाले फेरे भारतीय संस्कृति की इस संबंध के प्रति प्रतिबद्धता व्यक्त करते हैं -जिनका विवरण कुछ यूँ है -

१- ॐ ईशा एकपदी भवः -हम यह पहला फेरा एक साथ लेते हुए वचन देते हैं कि हम हर काम में एक दूसरे  का ध्यान पूरे प्रेम ,समर्पण ,आदर ,सहयोग के साथ आजीवन करते रहेंगे .

  २- ॐ ऊर्जे द्विपदी भवः -इस दूसरे फेरे में हम यह निश्चय करते हैं कि हम दोनों साथ साथ आगे बढ़ेंगे .हम न केवल एक दूजे को स्वस्थ ,सुदृढ़ व् संतुलित रखने में सहयोग देंगे बल्कि मानसिक व् आत्मिक बल भी प्रदान करते हुए अपने परिवार और इस विश्व के कल्याण में अपनी उर्जा व्यय करेंगे .
 ३-ॐ रायस्पोशय  त्रिपदी भवः -तीसरा फेरा लेकर हम यह वचन देते हैं कि अपनी संपत्ति की रक्षा करते हुए सबके कल्याण के लिए समृद्धि का वातावरण बनायेंगें .हम अपने किसी काम में स्वार्थ नहीं आने देंगे ,बल्कि राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानेंगें .
 4- ॐ मनोभ्याय चतुष्पदी  भवः -चौथे फेरे में हम संकल्प लेते हैं कि आजन्म एक दूजे के सहयोगी रहेंगे और खासतौर पर हम पति-पत्नी के बीच ख़ुशी और सामंजस्य बनाये रखेंगे .
 ५- ॐ प्रजाभ्यःपंचपदी भवः -पांचवे फेरे में हम संकल्प लेते हैं कि हम स्वस्थ ,दीर्घजीवी संतानों को जन्म  देंगे और इस तरह पालन-पोषण करेंगे ताकि ये परिवार ,समाज और राष्ट्र की अमूल्य धरोहर साबित हो .
 ६- ॐ रितुभ्य षष्ठपदी  भवः -इस छठे फेरे में हम संकल्प लेते हैं कि प्रत्येक उत्तरदायित्व साथ साथ पूरा करेंगे और एक दूसरे का साथ निभाते हुए सबके प्रति कर्तव्यों का निर्वाह करेंगे .
     ७-ॐ सखे सप्तपदी भवः -इस सातवें और अंतिम फेरे में हम वचन देते हैं कि हम आजीवन साथी और सहयोगी बनकर रहेंगे .
         और लिव इन जिसके बारे में अर्चना पूरण सिंह बड़े उत्साह से कहती हैं कि -
''हम बिना शादी साथ रहे हैं ,ऐसी कोई भी घोषणा हमने नहीं की ,एक स्त्री-पुरुष जो २४ घंटों में १० घंटे साथ बिताते हैं ;उनमे कोई ऐसा सम्बन्ध न हो ऐसा संभव नहीं है .महानगरों की यही विशेषता है कि यहाँ कोई किसी से नहीं पूछता .अपने तरह से जीवन जीने की स्वतंत्रता ,आसान और बेरोकटोक ज़िंदगी ,ये सब बातें बड़े शहरों में इन संबंधों को पनपने का मौका देती हैं ,तेज रफ़्तार ज़िंदगी में यहाँ हर संबंध आम है .जीवन साथी का चुनाव करना यहाँ कठिन है .विवाह स्त्री संबंधों की एक मंजिल है यह मंजिल सुखद हो इसके लिए लिव इन एक जरिया हो सकता है .कम से कम टूटती हुई शादियां ,बिखरते परिवारों और बिना माँ-बाप के पल रहे बच्चों से तो अच्छा है .''
    और इनकी यह उन्मुक्तता स्वयं गृहलक्ष्मी पत्रिका में सोनी चैनल के लेडीज़ सेक्शन में नीना गुप्ता से एक प्रश्न के जरिये मुंह बंद करने को विवश प्रतीत होती है .जिसमे पूछा गया है -
  ''मैं २० साल की कामकाजी महिला हूँ .मैं एक व्यक्ति के साथ 'लिव इन रिलेशनशिप' में हूँ  जो मुझसे बहुत प्यार करता है .हम लोग लिव इन रिलेशनशिप' में पिछले एक साल से हैं इस रिलेशनशिप में बंधने से पहले हम दोनों ने एक दूसरे को अच्छी तरह से जाना समझा पर पिछले कुछ समय से वह मेरी उपेक्षा कर रहा है .मैं इस बात से घबराई हूँ कि कहीं वह मुझको धोखा तो नहीं दे रहा है .मैं सचमुच उससे बहुत प्यार करती हूँ और उसके साथ रहना चाहती हूँ कहीं वह इस रिलेशनशिप को छोड़ तो नहीं देगा .?''
    यही डर  इस संबंध की नीव है और कंगूरा भी ,यही आगाज है यही अंजाम है और चाँद-फ़िज़ा ,विपाशा बासु-जॉन अब्राहम ,राजेश खन्ना-अनीता जैसे मामले इस संबंध के परिणाम स्वरुप सभी के सामने हैं .ये वह सम्बन्ध नहीं जिसे भारतीय संस्कृति में जन्म-जन्मान्तर का सम्बन्ध कहा जाता है ,जिसमे पति पत्नी के सम्मान की खातिर राक्षसों के राजा रावण का कुल सहित विनाश करता है ,जिसमे पत्नी पति के प्राणों को यमराज से भी छीन लाती है.
      आज का युवा उन्मुक्त ज़िंदगी का आदी हो रहा है .दबाव से बचने में लगा है ,अपनी पसंद को सर्वोपरि रखता है ,हर चीज़ पैसे से खरीदना चाहता है और चिंता ,जिम्मेदारी से मुक्त ज़िंदगी का चयन करते हुए लिव इन को सकारात्मक नजरिये से देख रहा है जो निश्चित रूप से भारतीय संस्कृति पर चोट है और जिसके लिए भारतीय संस्कृति भी तनवीर गाज़ी के शब्दों में बस यही कहती नज़र आती है -
    ''जवाँ सितारों को गर्दिश सीखा रहा था ,
       कल उसके हाथ का कंगन घुमा रहा था ,
    उसी दिए ने जलाया मेरी हथेली को
       जिसकी लौ को हवा से बचा रहा था .''
ऐसे में, यही अंजाम होना था रितिका का, जो हुआ, क्योंकि आज के युवा वर्ग ने प्यार शब्द का जो मजाक बनाया है वह केवल देह का आकर्षण और धन की आपूर्ति तक ही सीमित है और जब वह आकर्षण खत्म हो जाता है और आपूर्ति हो नहीं पाती है तब यह प्यार ऐसे ही उड़ जाता है जैसे आँधी के आते ही काले बादल और गधे के सर से सींग. 

शालिनी कौशिक
     (एडवोकेट) 
कैराना (शामली) 


 

शुक्रवार, 24 जून 2022

नाजायज़ सम्बन्ध नारी सशक्तिकरण नहीं

 



अभी अभी प्राप्त समाचारों के अनुसार उत्तर प्रदेश के आगरा में अपार्टमेंट की चौथी मंजिल की बालकनी से गिरने पर महिला की मौत हो गई। घटना को देख मौके पर लोगों की भीड़ जमा हो गई। इस दौरान अपार्टमेंट के लोगों ने महिला के पति सहित तीन लोगों को मौके से दबोच लिया है। महिला अपार्टमेंट में किसी व्यक्ति के साथ लिव इन रिलेशनशिप में रह रही थी. महिला की उम्र करीब 30 साल थी और उसका नाम रितिका सिंह था. वह फिरोजाबाद के विपुल अग्रवाल के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रह रही थी। महिला का उसके पति आकाश गौतम से विवाद चल रहा था। बताया गया है कि आज आकाश अपने दो परिचितों और परिवार की दो महिलाओं के साथ फ्लैट पर आया था। जिसके बाद आपस में मारपीट हो गई। जिसका यह अंजाम सामने आया है.

      यह केवल एक घटना नहीं है बल्कि आज ये रोजमर्रा की जिंदगी में अमल में आ चुकी है. नारी सशक्तिकरण के इस दौर में नारी शक्ति से भी ऊपर का स्वरुप धारण करती जा रही है. पहले कभी होते थे, या अब भी होते होंगे पुरुषों के विवाहेत्तर सम्बन्ध, पर अब स्त्रियों ने भी बाजी मारी है और रोशन किया है स्त्रियों का नाम भी विवाहेत्तर सम्बन्धों की गली में, आज समाज में ऐसी स्त्रियाँ भी चर्चा में बनी हुई हैं जिनका अपने पहले पति से सम्बन्ध विच्छेद नहीं होता और वे दूसरे के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रहना आरंभ कर देती हैं. यही नहीं, जो जो कार्य पहले पुरुष करते थे, आज स्त्रियाँ उन किसी भी कार्य में पीछे नहीं रहना चाहती हैं. पहले पुरुष अपनी पत्नी से चिढ़कर उसे जिंदगी भर के लिए खुद की ही पत्नी का जीवन जीने के लिए बाध्य करने के लिए आसानी से तलाक द्वारा आजादी नहीं देता था, आज वह स्त्री कर रही है. पति की संपत्ति हथियाने और स्वयं के नाम के साथ समाज में पति का नाम जुड़ा रखने के लिए तलाक की प्रक्रिया को निस्तारण तक पहुंचने ही नहीं दे रही है और क्योंकि भारतीय कानून का स्त्रियों के प्रति नर्म रुख रहा है तो ऐसे में पत्नी से तलाक मिलना भी पुरूषों के लिए टेढ़ी खीर हो गया है.

         ऐसे में, रितिका सिंह का यह मामला कानून की नजर में भले ही रितिका के पक्ष में जाए किन्तु भारतीय समाज और संस्कृति को देखते हुए रितिका सिंह को अतिक्रमण कारी ही कहा जाएगा और यही कहा जाएगा कि आज हम भले ही आधुनिकीकरण के दौर में प्रवेश कर चुके हों, किंतु समाज के द्वारा निर्मित मानकों की अवहेलना लक्ष्मण रेखा पार करने के रूप में यदि माता सीता जैसी पतिव्रता नारी पर भारी पड़ सकती है तो समाज की अन्य नारियों की तो बिसात ही क्या है? भारतीय संस्कृति में पहले तो नारी के दूसरे विवाह की संकल्पना ही नहीं थी, अब अगर कानून ने दूसरे विवाह का भारतीय नारी को अधिकार दिला ही दिया है तो उसका मतलब ऐसे नाजायज संबंधों की ओर बढ़ना तो बिल्कुल भी नहीं है. कम से कम पहले विवाह के कानूनी रूप से पूरी तरह खत्म होने तक तो समाज के रीति रिवाजों का संस्कारों का सम्मान रखना ही चाहिए.

शालिनी कौशिक

एडवोकेट

कैराना (शामली) 

मंगलवार, 21 जून 2022

द्रौपदी मुर्मू - महिलाओं का गौरव

  


आज भारत में बहुत परिवर्तन आये हैं. बहुत से परिवर्तन दुःखद हैं तो कुछ सुखद भी हैं और उन परिवर्तनों में सबसे बड़े परिवर्तन ये हैं कि आज भारत का वह समाज, जो हमेशा से हमारे आदिवासी समाज के अधिकार छीनने का कार्य करता था, आज वह उसे समाज में अग्रणी का अधिकार देने के लिए आगे आ रहा है और यही नहीं कि आदिवासी समाज को बल्कि आदिवासी समाज की महिला को देश का सर्वोच्च पद देने की तैयारी की जा रही है और वह भी उस दल द्वारा, जिसने कभी उच्च पद के लिए अपने दल की ही बहुत सी श्रेष्ठ व्यक्तित्व की धनी महिलाओं की अनदेखी की, वह भी मात्र इसलिए कि वे महिलाएं थी, पर आज ये परिवर्तन आ रहे हैं भले ही राजनीतिक लाभ लेने के लिए आ रहे हैं, किन्तु सुखद हैं क्योंकि इनसे सदियों से दबे कुचले आदिवासी समुदाय और महिलाओं को आगे बढ़कर अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए सुअवसर प्राप्त हो रहे हैं. एक संघर्षशील  महिला, आदिवासी समुदाय की महिला श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जी को एनडीए का राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार घोषित किया गया है और जहां तक आज संसद में और भारतीय राज्यों की विधानसभाओं में एनडीए का प्रतिनिधित्व है, द्रौपदी मुर्मू जी का भारत का राष्ट्रपति चुना जाना लगभग तय है. ऐसे में, भले ही राजनीतिक लाभ के लिए, महिला सशक्तिकरण के एक और नए युग के आरंभ के लिए भारतीय जनता पार्टी, एनडीए का बहुत बहुत धन्यवाद और देश की आगामी राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू जी और समस्त भारतीय महिलाओं को हार्दिक शुभकामनाएं.

शालिनी कौशिक

         एडवोकेट

कैराना (शामली) 

शुक्रवार, 17 जून 2022

नंगी राजनीति - लघुकथा

  


राजनीति किसी इंसान को कैसे दरिन्दा बना देती है? आज और अभी सोलह वर्षीय स्नेहा ने अपनी आंखों से देखा था. नेता जी के समर्थक किस तरह चुनाव में उनका विरोध कर रही दलित बस्ती को तहस नहस कर के गए थे, यह झोपड़ी के कोने में दुबकी वह देखती रही थी पर उसके लहुलुहान पिता ने यह कहकर संतोष की सांस ली थी कि - अच्छा हुआ गुंडों की नज़र जवान बेटियों पर नहीं पड़ी नहीं तो हम नंगे ही हो जाते। "

रविवार, 20 मार्च 2022

अभिव्यक्त क्या करे " शालिनी "

 


भावुकता स्नेहिल ह्रदय ,दुर्बलता न नारी की ,
संतोषी मन सहनशीलता, हिम्मत है हर नारी की .
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भावुक मन से गृहस्थ धर्म की , नींव वही जमाये है ,
पत्थर दिल को कोमल करना ,नहीं है मुश्किल नारी की.
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होती है हर कली पल्लवित ,उसके आँचल के दूध से ,
ईश्वर के भी करे बराबर ,यह पदवी हर नारी की .
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जितने भी इस पुरुष धरा पर ,जन्मे उसकी कोख से ,
उनकी स्मृति दुरुस्त कराना ,कोशिश है हर नारी की .
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प्रेम प्यार की परिभाषा को ,गलत रूप में ढाल रहे ,
सही समझ दे राह दिखाना ,यही मलाहत नारी की .
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भटके न वह मुझे देखकर ,भटके न संतान मेरी ,
जीवन की हर कठिन डगर पर ,इसी में मेहनत नारी की .
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मर्यादित जीवन की चाहत ,मर्म है जिसके जीवन का ,
इसीलिए पिंजरे के पंछी से ,तुलना हर नारी की .
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बेहतर हो पुरुषों का जीवन ,मेरे से जो यहाँ जुड़े ,
यही कहानी कहती है ,यहाँ शहादत नारी की .
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अभिव्यक्त क्या करे ''शालिनी ''महिमा उसकी दिव्यता की, 
कैसे माने कमतर शक्ति ,हर महिका सम नारी की .
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                      शालिनी कौशिक 
                                एडवोकेट 
                      कांधला (शामली) 

शब्दार्थ -मलाहत-सौंदर्य 
                                     

रविवार, 13 मार्च 2022

लड़की को लड़ने न देगी ये जनता

अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी
आंचल में है दूध और आंखों में पानी. 
        और यह उपरोक्त उक्ति सही कही जाएगी 10 मार्च 2022 को आए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के परिणामों को देखने के पश्चात, नारी समाज की संघर्षशील महिला प्रत्याशियों की जिस तरह उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में जमानत जब्त हुई है वह नारी को लेकर आम जनता की सोच को दिखाने के लिए पर्याप्त है.
           देश की राजनीति में संघर्षरत कॉंग्रेस पार्टी द्वारा उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में 40% महिलाओं को टिकट दिए गए. कॉंग्रेस पार्टी की 159 महिला उम्मीदवारों में मात्र एक महिला उम्मीदवार विजयी हुई और 158 उम्मीदवारों को 3000 से कम वोट मिलें जिससे उन सभी बाकी महिला उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई.
              संघर्षशील, गरीब, पीड़ित-शोषित और दलित समाज की महिलाओं को कॉंग्रेस पार्टी ने टिकट दिए. कॉंग्रेस पार्टी इस समय जनता की नजरों में उसके लिए कुशल नेतृत्व वाली पार्टी नहीं है किन्तु जिन महिलाओं को कॉंग्रेस पार्टी ने टिकट दिए थे, वे तो हमारे बीच से ही थी और हमने स्वयं उनका संघर्ष देखा था. कॉंग्रेस पार्टी की कुछ विशेष महिला उम्मीदवारों का परिचय इस प्रकार है -
1 - आशा सिंह - उन्नाव सदर सीट से एक रेप पीड़िता की माँ, उस रेप पीड़िता की माँ, जिसके रेप के आरोप में सत्तारूढ़ पार्टी का विधायक ही आरोपी हो, ऐसे में आशा देवी के संघर्ष का अंदाजा लगाया जाना आम जनता के लिए शायद कठिन नहीं होगा. आशा सिंह की मदद के लिए कॉंग्रेस पार्टी ने राजस्थान और मध्य प्रदेश के कार्यकर्ताओं की टीम लगाई और आशा सिंह ने घर घर जाकर अपनी पीड़ा सबके सामने रखी उसके बाद भी संवेदनहीन जनता द्वारा इन्हें वोट मिली मात्र - 1555- जमानत जब्त 👎


2- सदफ जफर- नागरिकता संशोधन अधिनियम और एन आर सी के विरोध में जेल जा चुकी सदफ जफर को कॉंग्रेस पार्टी ने लखनऊ मध्य से टिकट दिया था. सदफ केंद्र सरकार के कानूनों का विरोध कर रही थी, सही कर रही थी या गलत, ये न्यायालय के निर्णय के अधीन है, अपनी जनता के हितों को लेकर लड़ रही थी, कोई अनैतिक कार्य नहीं कर रही थी, सदफ जफर ने खुलासा किया था, 'मुझे महिला पुलिस स्टेशन में पुलिस हिरासत में बेरहमी से पीटा गया था। यहां तक कि पुरुष पुलिस वालों ने भी मुझे पीटा। पुरुष पुलिस अधिकारियों ने मेरे पेट में लात मारी और उन्होंने मेरे बाल बेरहमी से खींचे। मेरे परिवार को मेरी गिरफ्तारी के बारे में सूचित नहीं किया गया. सदफ जफर ने लखनऊ सेंट्रल सीट से कांग्रेस का टिकट मिलने के बाद एनडीटीवी से कहा कि वह उत्तर प्रदेश के लोगों के लिए महत्वपूर्ण मुद्दों को उठाने और उनका समाधान करने के लिए लड़ेंगी। सदफ जफर ने कहा है, मैं प्रियंका गांधी की शुक्रगुजार हूं और मैं पहले भी बहादुर थी अब भी बहादुर हूं।'' संविधान ने सभी भारतीय नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी है. कॉंग्रेस पार्टी ने सही समझकर उन्हें टिकट दिया किन्तु जनता ने नारी का अपनी आदत के अनुसार साथ नहीं दिया. उन्हें वोट मिली - 2927-जमानत जब्त 👎


3- निदा अहमद - टीवी पत्रकारिता छोडकर राजनीति में सेवा का जज्बा ले ETV और समाचार प्लस की तेज तर्रार पत्रकार निदा अहमद को कॉंग्रेस ने सम्भल से टिकट दिया. राजनीतिक परिवार से होने के बावजूद जनता को ये राजनीति में योग्य नेतृत्व देने वाली नजर नहीं आई और वोट मिली मात्र - 2256- ज़मानत जब्त 👎


4-  अर्चना गौतम - मिस कोस्मो वर्ल्ड - 2018, मिस यू पी - 2014, अर्चना गौतम को कॉंग्रेस पार्टी ने हस्तिनापुर से टिकट दिया और क्योंकि ये कॉंग्रेस पार्टी से थी, इसलिये विपक्ष के हमेशा से नारी विरोधी सोच रखने वाले नेताओं ने इनके खिलाफ बदजुबानी का हथियार अपनाया, जिसका मात्र प्रियंका गांधी के कड़े विरोध के सिवाय इनके दलित चेहरा भी होने के कारण आंखों पर पट्टी बांधे हुए जनता द्वारा कोई विरोध नहीं किया गया, मात्र एक अभिनेत्री होने पर हेमा मालिनी जनता का कोई काम न कर बार बार विजय हासिल करती हैं, वहीं अर्चना गौतम को वोट मिली मात्र - 1519 - जमानत जब्त 👎


5- नेहा तिवारी - खुशी दुबे की बड़ी बहन, जिन्हें कॉंग्रेस पार्टी द्वारा खुशी दुबे के साथ हुए अन्याय को देखते हुए, फिर खुशी दुबे की माँ की वोट गायब होने के कारण टिकट दिया गया, वो खुशी दुबे, जो राजनीतिक साजिश का शिकार है. बिकरू कांड पीड़िता, वो कांड जिस के दो घटनाक्रम ने तमाम सवाल खड़े किए हैं। सीधे पुलिस पर ये सवाल थे। मगर पुलिस ने किसी की एक न सुनी। हर पहलू को नजरअंदाज किया और मनमर्जी कार्रवाई की। हम बात कर रहे हैं नाबालिग खुशी दुबे की जिन्हें 17 धाराओं का आरोपी बना जेल भेजने और मनु पांडेय पर मेहरबानी करने की।तत्कालीन एसएसपी ने खुशी को निर्दोष बता जेल से रिहा कराने की बात कही थी लेकिन दो दिन के भीतर पुलिस मुकर गई थी। लिहाजा खुशी आज भी महिला शरणालय में बंद है। दूसरी तरफ मनु पांडेय आजाद है। अमर दुबे की 29 जून 2020 को शादी हुई थी। 30 जून को खुशी दुबे बिकरू गांव ब्याह कर पहुंची थी। एक जुलाई का दिन बीता और दो जुलाई की रात विकास दुबे ने कांड कर दिया। पुलिस ने इसमें खुशी दुबे को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. खुशी दुबे को न्याय दिलाने के लिए कॉंग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी जी आगे आई और खुशी दुबे के खिलाफ सभी राजनीतिक कुचक्रों को ठेंगा दिखाकर उनकी बड़ी बहन नेहा तिवारी को कानपुर की कल्याणपुर सीट से टिकट दिया किन्तु जनता ने न्याय का साथ नहीं दिया, वोट मिली मात्र - 2302- जमानत जब्त 👎
      ऐसा नहीं है कि यह पहली बार हो रहा है, नारी के प्रति आम जनता और राजनीतिक दलों का हमेशा से ही दमनात्मक रवैय्या रहा है. सभी जानते हैं हमारे देश के राज्य मणिपुर की महान नारी शक्ति - इरोम चानू शर्मिला को, इनके साथ भी मणिपुर की जनता और राजनीति ने जो साजिश की है वह भी शर्मनाक इतिहास में सम्मिलित की जाएगी. पिछले मणिपुर विधानसभा चुनाव इस मामले में ख़ास रहा क्योंकि 16 साल के अनशन के बाद मानवाधिकार कार्यकर्ता इरोम शर्मिला चुनाव मैदान में थीं. इरोम ने सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम (आफस्पा) के ख़िलाफ़ 16 वर्ष तक भूख हड़ताल की थी. भूख हड़ताल ख़त्म करने के बाद वह इस उम्मीद के साथ चुनाव में उतरी थीं कि जीत के बाद वे राजनीति में आएंगी और इस क़ानून को ख़त्म करेंगी.इरोम पीपुल्स रिइंसर्जेंस एंड जस्टिस अलाएंस नाम की पार्टी बनाकर चुनाव मैदान में उतरी थीं. इरोम से ज़्यादा वोट नोटा को मिले. मणिपुर की जनता ने संघर्ष की राजनीति की जगह उस यथास्थितिवादी राजनीति का चुनाव किया जिसके ख़िलाफ़ इरोम 16 वर्षों से लड़ रही थीं. इरोम विधानसभा चुनाव में थउबल सीट से मुख्यमंत्री ओकराम ईबोबी सिंह के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ीं, लेकिन उन्हें मात्र 90 वोट ही मिल सके. इस सीट पर उनसे ज़्यादा वोटा नोटा (नन आॅफ द अबव) को मिला. 143 लोगों ने नोटा पर बटन दबाया, जबकि इरोम को मात्र 90 वोट मिले. 
      कथाकार मैत्रेयी पुष्पा ने अपनी फेसबुक वॉल पर लिखा, इरोम शर्मिला, तुम को तुम्हारे राज्य में केवल नब्बे वोट मिले हैं. तुमने स्त्रियों की सुरक्षा के लिए सोलह साल अनशन उपवास रख कर संघर्ष किया. क्या इस राज्य में नब्बे ही औरतें थीं? नहीं, वोट इसलिये नहीं मिले क्योंकि तुम्हारे ऊपर किसी आका की कृपा नहीं थी, तुमने अपने संघर्ष के दम पर यह फ़ैसला लिया था. मगर हमारे देश की स्त्रियां अपना फ़ैसला आज भी अपने पुरुषों पर छोड़ती हैं.’
संजीव सचदेवा ने फेसबुक पर लिखा है, ‘इरोम शर्मिला तेरी हार तुझे मिले हुए मात्र 90 वोट साबित करते हैं कि जनता को उसके लिए भूखे रहने वाले नेता नहीं पसंद बल्कि हवाई जहाज से उड़ने वाले नोट छीनने वाले खाऊ नेता ही पसंद हैं. तेरी हार यहां के प्रजातंत्र के गिरे हुए स्तर को साबित करती है.’
       ये है भारतीय जनता जिसे कभी भोली भाली कहकर बचाया जाता है तो कभी जागरूक कहकर महिमामंडित किया जाता है. जो जब कोई बेटी अपने पिता के उन कार्यों और जीवन भर के उन त्याग-बलिदान के लिए इंसाफ़ मांगने के लिए खड़ी होती है तो उसे विद्वानों की सभा में खड़े होकर कहा जाता है - "कि मुझे तो इससे हेट हो गई" और तब उस बेटी के पिता का उस बेटी के सामने गुणगान करने से न थकने वालों में से एक भी ज़बान उस बेटी के समर्थन में नहीं उठती.
      और यही जनता इसी नारी जाति द्वारा गलत के खिलाफ आवाज़ उठाए जाने पर उससे कहती हैं कि - अपनी स्थिति देखनी चाहिए, तू स्वतंत्र है, तुझ पर कोई फर्क नहीं पड़ता आदि कहकर अधर्म के खिलाफ उठते उसके कदमों को रोकने की भरसक कोशिश करती है. ऐसे विद्रूपताओं भरे इस समाज में पता नहीं क्या सोचकर प्रियंका गांधी - लड़की हूं लड़ सकती हूं - का नारा देती हैं जबकि ये जागरूक जनता सिवाय अपने स्वार्थ को आगे बढ़ाने के किसी को आगे नहीं बढ़ाती है क्योंकि अगर बढ़ाती होती तो किसी भी हाल में इरोम चानू शर्मिला, आशा सिंह और नेहा तिवारी को हार का सामना नहीं करना पड़ता. कहा भी गया है -
" तू छोड़ दे कोशिशें इंसान को पहचानने की,
  यहां जरूरतों के हिसाब से, सब बदलते नकाब हैं.
  अपने गुनाहों पर सौ पर्दे डालकर 
  हर शख्स कहता है " ज़माना बड़ा खराब है "

शालिनी कौशिक
 एडवोकेट 
कांधला (शामली) 

शनिवार, 12 मार्च 2022

नारी मांगे अधिकार

 Indian Village Women Royalty Free Stock Photo


      हमारी संविधान व्यवस्था ,कानून व्यवस्था हम सबके लिए गर्व का विषय हैं और समय समय पर इनमे संशोधन कर इन्हें बदलती हुई परिस्थितयों के अनुरूप भी बनाया जाता रहा है किन्तु हमारा समाज और उसमे महिलाओं की स्थिति आरम्भ से ही शोचनीय रही है .महिलाओं को वह महत्ता समाज में कभी नहीं मिली जिसकी वे हक़दार हैं .बचपन से लेकर वृद्धावस्था तक उसके लिए ऐसे पल कम ही आते हैं जब वह अपने देश के कानून व् संविधान पर गर्व कर सके इसमें देश के कानून की कोई कमी नहीं है बल्कि कमी यहाँ जागरूकता की है इस देश की आधी आबादी लगभग एक तिहाई प्रतिशत में नहीं जानती कि कानून ने उसकी स्थिति कितनी सुदृढ़ कर रखी है .
         आज गर्व होता है जब हम लड़कियों को भी स्कूल जाते देखते हैं हालाँकि मैं जिस क्षेत्र की निवासी हूँ वहाँ लड़कियों के लिए डिग्री कॉलिज तक की व्यवस्था है और वह भी सरकारी इसलिए लड़के यहाँ स्नातक हों या न हों लड़कियां आराम से एम्.ए.तक पढ़ जाती हैं और संविधान में दिए गए समान शिक्षा के अधिकार के कारण आज लड़कियां तरक्की के नए पायदान चढ़ रही हैं .
              शिक्षा का स्थान तो नारी के जीवन में महत्वपूर्ण है ही किन्तु सर्वाधिक ज़रूरी जो कहा जाता है और जिसके बिना नारी को धरती पर बोझ कहा जाता है वह उसकी जीवन की सबसे बड़ी तकलीफ भी बन जाता है कभी दहेज़ के रूप में तो कभी मारपीट ,कभी तलाक और पता नहीं क्या क्या ,घरेलू हिंसा से संरक्षण विधेयक द्वारा कानून ने सभी महिलाओं की सुरक्षा का इंतज़ाम किया है और ऐसे ही महिलाओं को पुरुषों की अपेक्षा तलाक के ज्यादा अधिकार देकर उन्हें, जबर्दस्ती के सम्बन्ध को जिसे जनम जनम का नाता कहकर उससे ढोने की पिटने की अपेक्षा की जाती है ,मुक्ति का रास्ता भी दिया है महिलाओं को अबला जैसी संज्ञा से मुक्ति दिलाने की हमारे कानून ने बहुत कोशिश की है किन्तु कुछ सामाजिक स्थिति व् कुछ अज्ञानता के चलते वे सहती रहती हैं और इस सम्बन्ध को अपनी बर्दाश्त की हद से भी बाहर तक निभाने की कोशिश करती हैं किन्तु जहाँ शिक्षा का उजाला होगा और कानून का साथ वहाँ ऐसी स्थिति बहुत लम्बे समय तक चलने वाली नहीं है और ऐसे में जब हद पार हो जाती है तो कहीं न कहीं तो विरोध की आवाज़ उठनी स्वाभाविक है और यही हुआ अभी हाल ही में हमारे क्षेत्र की एक युवती ने पारिवारिक प्रताड़ना का शिकार होने पर अपने पति से हिन्दू विधि की धारा १३ -बी में दिए गए पारस्परिक सहमति से तलाक के अधिकार का प्रयोग किया और अपनी ज़िंदगी को रोज रोज की घुटन से दूर किया .
        साथ ही आज बहुत सी महिलाएं दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १२५ के तहत भरण पोषण के वाद दायर कर भी अपने पतियों से अपने व् अपने बच्चों के लिए कानून की छाँव में एक सुन्दर व् सार्थक आशियाना का सपना अपनी संतान की आँखों में पाल रही हैं .
         भारतीय कानून व् संविधान महिलाओं की समाज में बेहतर स्थिति के लिए प्रयासरत हैं और इसका उदाहरण दामिनी गैंगरेप कांड के बाद इस तरह के मामलों में उठाये गए कानूनी  कदम हैं .ऐसे ही विशाखा बनाम स्टेट ऑफ़ राजस्थान के मामले से भी सुप्रीम कोर्ट ने कामकाजी महिलाओं की स्थिति बहुत सुदृढ़ की है जिसके कारण तरुण तेजपाल जैसे सलाखों के पीछे हैं और रिटायर्ड जस्टिस अशोक गांगुली जैसी हस्ती पर कानून की तलवार लटकी।
        पर जैसी कि रोज की घटनाएं सामने आ रही हैं उन्हें देखते हुए कानून में अभी बहुत बदलावों की ज़रुरत है इसके साथ ही महिलाओं की आर्थिक सुदृढ़ता की कोशिश भी इस दिशा में एक मजबूत कदम कही जा सकती है क्योंकि आर्थिक सुदृढ़ता ही वह सम्बल है जिसके दम पर पुरुष आज तक महिलाओं पर राज करते आ रहे हैं समाज में स्वयं देख लीजिये जो महिलाएं इस क्षेत्र में पुरुषों की बराबरी कर रही हैं उनके आगे पुरुष दयनीय स्थिति में ही नज़र आते हैं .और जैसे कि पंचायतों में महिलाओं के लिए स्थान आरक्षित किये गए हैं ऐसे ही अब संसद व् विधान सभाओं में भी ३३% आरक्षण हो जाना चाहिए साथ ही सरकारी नौकरियों में भी उनके लिए स्थानों का आरक्षण बढ़ाये जाने की ज़रुरत है .



शालिनी कौशिक
एडवोकेट
कांधला (शामली)