अपने बेटे समान नौकर को भेजकर कानून का मज़ाक उड़ाने वाले नौकर के खिलाफ महिला वकील द्वारा थाने में FIR देने पर सामाजिक लोगों से लाला जी बोले - "देखो महिला वकील ने क्या किया"?
द्वारा
शालिनी कौशिक
एडवोकेट
कैराना (शामली)
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अपने बेटे समान नौकर को भेजकर कानून का मज़ाक उड़ाने वाले नौकर के खिलाफ महिला वकील द्वारा थाने में FIR देने पर सामाजिक लोगों से लाला जी बोले - "देखो महिला वकील ने क्या किया"?
द्वारा
शालिनी कौशिक
एडवोकेट
कैराना (शामली)
सड़क हादसे में गृहणी (होममेकर) की मृत्यु होने पर सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए उनके घरेलू योगदान का मूल्य कम से कम ₹30,000 प्रतिमाह तय किया है।
मोटर दुर्घटना के दावों से जुड़ी अपील पर फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एनके सिंह की बेंच ने कहा कि
होममेकर का योगदान घर से कहीं आगे तक जाता है और देश-निर्माण में अहम भूमिका निभाता है। कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि मोटर वाहन अधिनियम के तहत मुआवज़ा तय करते समय होममेकर की मौत या अक्षमता के कारण परिवार को होने वाले घरेलू देखभाल के नुकसान को अलग से मान्यता दी जानी चाहिए।
➡️ सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुख्य बिंदु:
⚫ घरेलू देखभाल का नुकसान:
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मोटर वाहन अधिनियम (Motor Vehicles Act) के तहत दुर्घटना का मुआवजा तय करते समय, 'घरेलू देखभाल के नुकसान' (Loss of Domestic Care) को मुआवजे की एक अलग और स्वतंत्र श्रेणी माना जाएगा।
⚫ न्यूनतम आय का निर्धारण:
गृहणी द्वारा परिवार के लिए किए जाने वाले कार्य (खाना बनाना, बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल, घर का प्रबंधन आदि) को केवल इसलिए कम नहीं आंका जा सकता क्योंकि वे सीधे तौर पर कोई वेतन नहीं कमातीं। कोर्ट ने उनकी मासिक आर्थिक आय न्यूनतम ₹30,000 तय की है।
⚫ मुआवजे का दायरा:
इस राशि के तहत तीन प्रमुख नुकसानों को कवर किया जाता है—परिवार के सुचारू संचालन में योगदान, बच्चों को मिलने वाली मां की देखभाल, और पति व माता-पिता को मिलने वाला भावनात्मक/पारिवारिक सहयोग।
पहले हादसों में गृहणियों का मुआवजा तय करने के लिए उन्हें आमतौर पर कुशल या अकुशल दिहाड़ी मजदूर मानकर बहुत ही कम राशि (काल्पनिक आय) आंकी जाती थी। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार उनका योगदान अतुलनीय है, इसलिए उन्हें केवल 'होममेकर' नहीं बल्कि 'राष्ट्र निर्माता' माना जाना चाहिए। इस प्रकार यह नया निर्देश (guideline) अब दुर्घटना दावों के मामलों में पीड़ित परिवारों को एक बहुत बड़ी राहत और न्याय प्रदान करता है।
Case : SHISHUPAL @ SHISH RAM AND ORS. SURJEET AND ORS. v. SURJEET AND ORS | SLP(C) No. 33915/2025
द्वारा
शालिनी कौशिक
एडवोकेट
कैराना (शामली)
लखनऊ में बैकुंठधाम में मुलायम सिंह यादव के छोटे पुत्र प्रतीक यादव का अंतिम संस्कार कर दिया गया। प्रतीक यादव की पत्नी अपर्णा यादव के पिता व प्रतीक के ससुर अरविंद सिंह बिष्ट ने चिता को मुखाग्नि दी। इस मौके पर मुलायम सिंह यादव के बड़े बेटे अखिलेश यादव व चाचा शिवपाल सिंह मौजूद रहे। प्रतीक यादव की दोनों बेटियां प्रथमा यादव (12) और प्रतीक्षा यादव भी मौजूद रहीं।
प्रतीक यादव को मुखाग्नि उनके ससुर अरविन्द सिंह बिष्ट द्वारा दी गई. हिंदू धर्म की पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, ससुर द्वारा दामाद को मुखाग्नि देना शास्त्रों के विरुद्ध और वर्जित माना जाता है। दाह संस्कार का अधिकार केवल रक्त संबंधियों (पुत्र, भाई) का होता है, क्योंकि दामाद दूसरे गोत्र का हिस्सा बन जाता है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार प्रतीक यादव के चचेरे भाई धर्मेन्द्र यादव मुखाग्नि देने के लिए तैयार भी थे. ऐसे में ससुर द्वारा दामाद को मुखाग्नि देना हिन्दू धर्म की मान्यताओं के विपरीत है इसके मुख्य कारण निम्न अनुसार हैं -
⚫ परंपरा: ससुर और दामाद का रिश्ता ऐसा है कि ससुर दामाद का धुआं भी नहीं देखता है।
⚫ अपवाद: अगर बेटा या कोई अन्य करीबी रक्त संबंधी न हो, तो आजकल बेटियां या निकटतम परिजन ही यह अंतिम संस्कार करते हैं, लेकिन ससुर के लिए यह अनुचित माना जाता है।
⚫ सामाजिक धारणा: दामाद को 'जम' (यमराज) का रूप माना जाता है, इसलिए उन्हें शव या श्मशान से दूर रखा जाता है।
⚫ अपवाद/आधुनिक संदर्भ: विशेष परिस्थितियों में या जब कोई और न हो, तो परिवार के फैसले के अनुसार ससुर मुखाग्नि दे सकते हैं, लेकिन यह सामान्य प्रथा नहीं है।
वर्तमान समय में बेटियों को समाज में मुखाग्नि दिए जाने को समर्थन मिल रहा है.आधुनिक समय और बदलती मान्यताओं के अनुसार, बेटी बिल्कुल अपने पिता या माता को मुखाग्नि दे सकती है। यद्यपि पारंपरिक रूप से ज्येष्ठ पुत्र को यह अधिकार प्राप्त है, लेकिन शास्त्र और गरुड़ पुराण के आधुनिक व्याख्याकारों के अनुसार, पुत्र न होने पर या बेटी की इच्छा होने पर वह पूरे विधि-विधान से यह जिम्मेदारी निभा सकती है। इसके शास्त्रानुसार निम्न कारण हैं -
➡️ मुखाग्नि और बेटियां: प्रमुख तथ्य
⚫ बदलती परंपराएं: आज बेटियां न केवल मुखाग्नि दे रही हैं, बल्कि अंतिम यात्रा के अन्य कर्मकांड भी पूरे कर रही हैं, जिससे पारंपरिक सोच बदल रही है।
⚫ शास्त्रों का मत: कई आधुनिक विद्वान मानते हैं कि यदि पुत्र न हो तो पुत्री, पौत्र या भतीजा भी अग्नि दे सकते हैं। अगर बेटा नहीं है तो, गरुड़ पुराण के अनुसार पत्नी को भी मुखाग्नि देने का अधिकार है।
⚫ भावनात्मक और व्यावहारिक: बेटी के मुखाग्नि देने से परिवार के भावनात्मक जुड़ाव का पता चलता है। कई मामलों में, बेटा न होने पर बेटियों ने ही पिता की अंतिम इच्छा पूरी करने के लिए यह नजीर पेश की है।
ऐसे हालात में, जब कि प्रतीक यादव के कोई पुत्र नहीं था, ज्येष्ठ पुत्री प्रथमा यादव जिसकी उम्र 12 वर्ष है अपने पिता को मुखाग्नि दे सकती थी और अंतिम संस्कार के सभी क्रियाकलाप भली भांति पूर्ण कर सकती थी. ऐसे में जबकि मुख्य जिम्मेदारी पत्नी अपर्णा यादव की थी तो अपर्णा यादव को बेटी से ही उसके पिता को अंतिम विदाई का कार्य सम्पन्न कराना चाहिए था और हिन्दू धर्म की मान्यताओं का पालन करना चाहिए था.
द्वारा
शालिनी कौशिक
एडवोकेट
कैराना (शामली)
मुस्लिम समुदाय मे एक शब्द प्रचलित है - खतना, जिसे अंग्रेजी में (Female Genital Mutilation - FGM) कहते हैं FGM का मतलब फीमेल जेनिटल म्यूटिलेशन (Female Genital Mutilation - FGM) है, और हिंदी में 'विस्तार में इसे महिला जननांग विकृति' या 'महिला खतना' कहा जाता है। यह एक अत्यंत हानिकारक प्रथा है।
➡️ प्रक्रिया -
इसमें गैर-चिकित्सीय कारणों से महिलाओं या छोटी बच्चियों के बाहरी जननांगों को आंशिक या पूरी तरह से काट दिया जाता है या उन्हें अन्य प्रकार से चोट पहुँचाई जाती है
➡️ आयु -
यह आमतौर पर बचपन से लेकर 15 वर्ष की आयु तक की लड़कियों पर की जाती है।
➡️ स्वास्थ्य प्रभाव:
इसका कोई स्वास्थ्य लाभ नहीं है, बल्कि यह बेहद दर्दनाक होती है। इससे गंभीर रक्तस्राव, संक्रमण, प्रसव में जटिलताएं और मानसिक आघात जैसी आजीवन समस्याएं हो सकती हैं।
➡️ मानवाधिकार उल्लंघन:
संयुक्त राष्ट्र (UN) इसे लड़कियों और महिलाओं के मानवाधिकारों का उल्लंघन मानता है।
वैश्विक स्थिति: यह अफ्रीका, मध्य पूर्व और एशिया के कुछ हिस्सों में प्रचलित है। वर्तमान में, विश्व स्तर पर 23 करोड़ से अधिक महिलाओं और लड़कियों पर यह अत्याचार किया जा चुका है।इसे रोकने के लिए कई देशों में कानूनन इसे अपराध घोषित किया गया है.
अब भारत में भी इसे लेकर बहस छिड़ गई है। एक पक्ष इसे मुस्लिम महिलाओं के गरिमा से जीने के अधिकार का उल्लंघन बता रहा है और दूसरा पक्ष इसे मुस्लिम धार्मिक आस्था का अभिन्न अंग बता रहा है, ऐसे में इस महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई के लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के नेतृत्व में नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ (जिसमें जस्टिस नागरत्ना, सुंदरेश, अमनुल्लाह, कुमार, मसीह, वराले, महादेवन और बागची शामिल हैं) का गठन किया गया है.
सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संवैधानिक पीठ के सामने दाऊदी बोहरा समुदाय में प्रचलित फिमेल जेनिटल म्यूटिलेशन (FGM) की प्रथा पर तीखी बहस छिड़ गई है. जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को दाऊदी बोहरा समुदाय के कुछ वर्गों में प्रचलित फीमेल जेनिटल म्यूटिलेशन (FGM) की प्रथा को लेकर मौखिक रूप से चिंता जताई.
बहस में याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि यह प्रथा महिलाओं के गरिमा के साथ जीने के अधिकार का उल्लंघन है किन्तु इस प्रथा के समर्थकों का कहना है कि यह उनकी धार्मिक आस्था का अभिन्न हिस्सा है और उन्हें अनुच्छेद 25 के तहत इसे जारी रखने का अधिकार है.
एक पक्ष के अनुसार प्रथा को महिलाओं के लिए गरिमा के साथ जीने का उल्लंघन कहने और दूसरे पक्ष द्वारा धार्मिक आस्था का अभिन्न हिस्सा कहने से यह मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने संवेदनशील मुद्दा बन गया है क्योंकि एक तरफ अनुच्छेद 25 और 26 के तहत मिलने वाली धार्मिक स्वतंत्रता है तो दूसरी तरफ मानवीय गरिमा, स्वास्थ्य और महिलाओं की यौन स्वायत्तता.
FGM अर्थात महिला खतना की प्रथा का का विरोध करने वाले याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ लूथरा ने बेंच के सामने तर्क रखते हुए कहा कि
यह प्रथा 7 साल की छोटी बच्चियों पर की जाती है और इससे उनके शरीर में ऐसा बदलाव आता है जिसे ठीक नहीं किया जा सकता, जिसका असर उनकी यौन और प्रजनन स्वास्थ्य पर पड़ता है....... कई परिवार इस प्रथा का पालन इसलिए करते हैं क्योंकि उन्हें डर रहता है कि अगर वे इसका पालन नहीं करेंगे तो उन्हें समाज से निकाल दिया जाएगा........ इस प्रथा को अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं माना जा सकता और इसलिए इसे अनुच्छेद 26 के तहत किसी धार्मिक संप्रदाय के अधिकारों का संरक्षण नहीं मिलना चाहिए.
वहीं, जस्टिस जॉयमाल्य बागची की टिप्पणी प्रस्तुत मामले में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है, जिसमें उन्होंने कहा कि
"इस प्रथा को रोकने के लिए शायद बहुत जटिल संवैधानिक व्याख्याओं की जरूरत ही न पड़े क्योंकि इस प्रथा पर आर्टिकल 25 के तहत स्वास्थ्य के आधार पर ही रोक लगाई जा सकती है....... संविधान का अनुच्छेद 25, जो धार्मिक स्वतंत्रता देता है, उसमें स्पष्ट लिखा है कि धार्मिक स्वतंत्रता सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के दायरे में ही मिलेगी..... जहां तक महिलाओं के खतना (FGM) का सवाल है, हमें शायद दूसरे अधिकारों पर विचार करने की भी जरूरत न पड़े. इसके लिए सिर्फ स्वास्थ्य और सार्वजनिक स्वास्थ्य शब्द ही काफी हो सकते हैं...... इस प्रथा का पालन न करने पर समाज से बहिष्कृत किए जाने के परिणामों के साथ-साथ इस धार्मिक प्रथा का किसी व्यक्ति की शारीरिक और मानसिक समग्रता पर पड़ने वाले प्रभाव की भी जांच किए जाने की जरूरत है."
जिसका समर्थन करते हुए एडवोकेट सिद्धार्थ लूथरा ने कहा कि
इस प्रथा में क्लिटोरिस के आस-पास की त्वचा को हटा दिया जाता है जिससे कम से कम 10,000 तंत्रिका-सिरों (nerve endings) को ऐसा नुकसान पहुंचता है जिसकी भरपाई कभी नहीं हो सकती...... यह महिलाओं के शरीर के एक बहुत जरूरी अंग को काटना है और इसका सीधा असर उनकी शारीरिक, प्रजनन और भावनात्मक सेहत पर पड़ता है. जहां कोई प्रथा किसी व्यक्ति की शारीरिक स्वायत्तता में दखल देती है और किसी जरूरी अंग को नुकसान पहुंचाती है तो वह अनिवार्य रूप से अनुच्छेद 25 और 26 के तहत तय सीमाओं यानी सार्वजनिक व्यवस्था, स्वास्थ्य और नैतिकता का उल्लंघन करती है.
एडवोकेट सिद्धार्थ लूथरा के अनुसार 59 देशों ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया है.
पीठ की माननीय जस्टिस नागरत्ना ने टिप्पणी करते हुए कहा कि
यह प्रथा अनुच्छेद 25 के तहत नैतिकता के आधार पर भी सवालों के घेरे में आएगी.
न्यायमूर्ति वराले ने इसके प्रभाव को कई गुना बताते हुए चिंता व्यक्त की जबकि न्यायमूर्ति बागची ने टिप्पणी की कि
इस प्रथा का मूल उद्देश्य महिलाओं की कामुकता (sexuality) को नियंत्रित करना था.
तब सीनियर एडवोकेट लूथरा ने पीठ से अपील की कि
बेंच को समुदाय के भीतर काम करने वाले ढांचे (power structures) और उन सामाजिक मजबूरियों पर भी विचार करना चाहिए जिनका सामना लोगों को करना पड़ता है.
इस पर माननीय मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने पूछा कि
क्या लूथरा यह सुझाव दे रहे हैं कि अगर कोई धार्मिक प्रथा किसी व्यक्ति के अन्य मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है तो अनुच्छेद 25 और 26 के बावजूद कोर्ट को हस्तक्षेप करना चाहिए
जिसका जवाब में लूथरा ने "हां" कहा. उन्होंने इस बात पर खास जोर दिया कि
इस प्रथा का शिकार होने वाले लोग नाबालिग हैं जो कानूनी रूप से सहमति देने में असमर्थ हैं.
याचिका के विरोध में आए अधिवक्ता निजाम पाशा ने कहा कि यह कोई विकृति नहीं है बल्कि इसे पश्चिम में होने वाली हुडेक्टॉमी (hoodectomy) की तरह एक प्रक्रिया माना जाना चाहिए इसके साथ ही पाशा ने इस प्रथा की तुलना पुरुषों के खतना से की, जिस पर न्यायमूर्ति बागची ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इसकी तुलना पुरुषों के खतना से करना गलत है. सार्वजनिक स्वास्थ्य के आधार पर पुरुषों के सरकमसीजन और फिमेल जेनिटल म्यूटिलेशन (mutilation) में बड़ा अंतर है.
याचिका के विरोध में अधिवक्ता निजाम पाशा ने हस्तक्षेप करते हुए स्पष्ट किया कि
फिमेल जेनिटल म्यूटिलेशन (FGM) का पालन न करने की स्थिति में किसी भी सदस्य को समुदाय से निष्कासित नहीं किया जाता.
उन्होंने इस प्रक्रिया को अंग-भंग (mutilation) के रूप में परिभाषित किए जाने पर भी कड़ा विरोध जताया.
किन्तु यह स्वीकार किया कि
यह एक तथ्यात्मक पहलू है जिस पर अलग से विचार किया जाएगा.... समुदाय के भीतर इस प्रथा को न अपनाने के कोई सांसारिक या सामाजिक दुष्परिणाम नहीं हैं. भले ही व्यक्तिगत रूप से कुछ सदस्यों की यह आध्यात्मिक मान्यता हो सकती है कि इसके कुछ धार्मिक परिणाम हो सकते हैं.
न्यायमूर्ति बागची के इस सवाल पर कि
क्या दाऊदी बोहरा धर्मगुरु के निर्देशों का पालन न करने पर किसी प्रकार की सजा दी जाती है.
जिस पर तर्क रखते हुए अधिवक्ता निजाम पाशा ने कहा कि
इसका कोई सामाजिक या व्यावहारिक परिणाम नहीं होता....... जैसे नमाज अनिवार्य होने के बावजूद उसे न पढ़ने पर कोई सजा नहीं मिलती, वैसे ही इस प्रथा का पालन न करने पर भी समुदाय से बाहर निकालने (बहिष्कार) का कोई प्रावधान नहीं है........ दाऊदी बोहरा धर्म में इस प्रथा को न मानने पर न तो कोई धार्मिक प्रतिबंध है और न ही बहिष्कार का डर.
जब न्यायमूर्ति नागरत्ना ने इस प्रथा के उद्देश्य के बारे में पूछा, तो पाशा ने उत्तर दिया कि
इसका मकसद महिलाओं के यौन सुख (सेक्सुअल प्लेजर) को बढ़ाना है.
इस तर्क पर न्यायमूर्ति अमानुल्लाह ने हैरानी जताते हुए कहा कि यह तो दावे के बिल्कुल विपरीत है. न्यायमूर्ति अमानुल्लाह ने पाशा द्वारा इसकी तुलना पुरुषों के खतना से करने पर कड़ी आपत्ति जताई और उन्हें तथ्यों को सुधारने की सलाह दी. उन्होंने स्पष्ट किया कि
भले ही इस प्रथा को न मानने पर बहिष्कार न किया जाता हो, लेकिन चूंकि इसे एक अनिवार्य धार्मिक प्रथा माना जाता है इसलिए अदालत के लिए इसकी गहन जांच करना आवश्यक है.
प्रस्तुति
शालिनी कौशिक
एडवोकेट
कैराना (शामली)
उत्तर प्रदेश राज्य महिला आयोग ने महिला सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए 9 सूत्रीय कड़े दिशानिर्देश जारी किए हैं, जिनमें जिम, बुटीक और डांस क्लास में महिला ट्रेनर/कर्मचारी अनिवार्य करना, सभी स्थानों पर CCTV और अनिवार्य पुलिस सत्यापन शामिल है। इन नियमों का उद्देश्य सार्वजनिक और निजी स्थलों पर महिलाओं की सुरक्षा और गरिमा को बनाए रखना है।
➡️ महिला आयोग के 9 प्रमुख निर्देश:
⚫ बुटीक में महिला कर्मचारी:
महिला ग्राहकों की नाप (Measurement) केवल महिला टेलर या कर्मचारी ही लेंगी।
⚫ जिम और योगा सेंटर में महिला ट्रेनर:
जिम, योगा सेंटर और नाट्य कला केंद्रों में महिला ट्रेनर या ट्रेनर की मौजूदगी अनिवार्य है।
⚫ डांस क्लास में महिला टीचर:
लड़कियों को डांस सिखाने के लिए केवल महिला टीचर ही नियुक्त की जाएंगी।
⚫ स्कूल बसों में महिला सुरक्षा:
स्कूल बसों में महिला टीचर या महिला सुरक्षाकर्मी की उपस्थिति अनिवार्य है।
⚫ ड्रेसिंग रूम में महिला अटेंडेंट:
कपड़ों की दुकानों और बुटीक के ड्रेसिंग रूम में महिला अटेंडेंट जरूरी हैं।
⚫ कोचिंग सेंटरों में सुरक्षा:
लड़कियों की कोचिंग में प्राइवेट वॉशरूम और सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम होंगे।
⚫ महिला स्टाफ की अनिवार्यता:
महिलाओं से संबंधित संस्थानों में महिला कर्मचारियों की उपस्थिति अनिवार्य की गई है।
➡️ सुरक्षा उपाय अनिवार्य-
⚫ CCTV और DVR:
सभी कोचिंग सेंटर, जिम, बुटीक, और डांस क्लास में CCTV कैमरे और DVR सिस्टम लगाना अनिवार्य है।
⚫ कर्मचारियों का सत्यापन:
इन सभी संस्थानों में काम करने वाले स्टाफ का अनिवार्य पुलिस वेरिफिकेशन किया जाएगा।
आयोग ने इन निर्देशों को सख्ती से लागू करने के लिए राज्य के मुख्य सचिव को निर्देशित किया है। महिला सुरक्षा के लिए ये निर्देश सराहनीय कहे जा सकते हैं, इसके अतिरिक्त महिला आयोग को मन्दिरों और बाजारों की व्यवस्था पर भी ध्यान देना चाहिए क्योंकि महिलाओं और बच्चियों का वहां भी पूजा पाठ और सामान लाने के लिए काफी आवागमन रहता है और समय समय पर इन स्थानों पर भी महिलाओं और बच्चियों के साथ बदसलूकी के समाचार आते रहते हैं. ऐसे में इन स्थानों पर कम से कम महिला पुलिस की ड्यूटी अनिवार्य की जानी चाहिए.
द्वारा
शालिनी कौशिक
एडवोकेट
कैराना (शामली)
- प्रेम प्रकाश
भारत में मां को त्याग, समर्पण और अनंत जिम्मेदारियों के प्रतीक के रूप में महिमामंडित किया जाता है, लेकिन इस छवि के पीछे एक असहज सच छिपा है—बच्चों के लालन-पालन और शिक्षा का लगभग पूरा दायित्व आज भी महिलाओं के कंधों पर ही क्यों है? अच्छी बात यह है कि एक ऐसे दौर में जब संसद ऐतिहासिक नारी शक्ति वंदन अधिनियम पास करने जा रहा है, मातृत्व की भूमिका को लेकर भी गहरे सवाल खड़े हो रहे हैं। यह लैंगिक समानता और न्याय की दृष्टि से एक बड़ा बदलाव है जिसे हम अपने समय में देख रहे हैं, महसूस कर रहे हैं। आज पब्लिक डोमेन में इस बात को बढ़ा-चढ़ाकर और खासे तार्किक व स्पष्ट रूप से कहने वाले कई लोग हैं कि जब तक परिवार में बच्चों की देखभाल को महिलाओं का स्वाभाविक काम मानने की सोच नहीं बदलेगी, तब तक न तो महिलाओं की वास्तविक स्वतंत्रता संभव है और न ही एक संतुलित समाज का निर्माण।
भारत में घर के भीतर होने वाला श्रम बच्चों की देखभाल, उनकी पढ़ाई, पोषण से लेकर भावनात्मक विकास महिलाओं का दायित्व तकरीबन अनपेड और अनविजिवल है। यह काम आर्थिक आंकड़ों में नहीं दिखता, लेकिन इसकी अहमियत किसी भी औपचारिक नौकरी से कम नहीं है। इस संबंध में महिला अधिकारों की आजीवन लड़ाई लड़ने वाली रोज़ा लक्जमबर्ग का यह वक्तव्य खासा चर्चित रहा है कि जिस दिन औरतों के श्रम का हिसाब होगा, इतिहास की सबसे बड़ी धोखाधड़ी पकड़ी जाएगी।
दरअसल, समस्या यह है कि इस अदृश्य श्रम का सबसे बड़ा हिस्सा महिलाओं के हिस्से में आता है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन और संयुक्त राष्ट्र की महिला इकाई जैसी विश्व की कई संस्थाओं की रिपोर्टें लगातार यह बताती रही हैं कि महिलाएं पुरुषों की तुलना में कई गुना अधिक समय अनपेड केयर वर्क करती हैं। भारत के संदर्भ में यह असंतुलन और भी गहरा है, जहां सामाजिक अपेक्षाएं महिलाओं को प्राइमरी केयरगिवर के रूप में स्थापित कर देती हैं। इन सबका असर केवल घर की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि महिलाओं के करियर और आर्थिक स्वतंत्रता पर सीधा पड़ता है।
अशोका यूनिवर्सिटी के एक चर्चित अध्ययन के अनुसार भारत में लगभग आधी कामकाजी महिलाएं 30 वर्ष की उम्र के आसपास नौकरी छोड़ देती हैं और इसका सबसे बड़ा कारण बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी है। यह आंकड़ा किसी व्यक्तिगत पसंद का नहीं, बल्कि उस सामाजिक ढांचे का प्रतिबिंब है, जिसमें महिलाओं से अपेक्षा की जाती है कि वे अपने पेशेवर जीवन से पहले परिवार को प्राथमिकता दें, जबकि पुरुषों पर ऐसी कोई बाध्यता नहीं होती।
हमारे समाज में अच्छी मां की जो परिभाषा गढ़ी गई है, वह इतनी कठोर और एकतरफा है कि वह महिला की बाकी सभी पहचानों को पीछे छोड़ देती है। एक आदर्श मां वह मानी जाती है जो हर समय बच्चे के लिए उपलब्ध हो, उसकी हर जरूरत का ध्यान रखे और अपने व्यक्तिगत सपनों को पीछे छोड़ दे। इसके उलट, पिता की भूमिका अक्सर केवल आर्थिक जिम्मेदारियों तक सीमित कर दी जाती है। यह असमानता केवल महिलाओं पर जरूरत से ज्यादा मानसिक और शारीरिक बोझ नहीं डालती, बल्कि बच्चों की सोच को भी उसी दिशा में ढाल देती है। वे बचपन से ही यह मानने लगते हैं कि घर और देखभाल की जिम्मेदारी महिलाओं की है, जबकि पैसे कमाना पुरुषों का काम है।
बच्चों की देखभाल के इस स्त्रीकरण का व्यापक आर्थिक प्रभाव भी है। भारत में महिलाओं की श्रम भागीदारी दर पहले से ही चिंताजनक रूप से कम है, और इसका एक बड़ा कारण यही असमान केयर बर्डन है। विश्व बैंक सहित कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं यह मानती हैं कि यदि महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़े, तो देश की जीडीपी में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है। लिहाजा, सरकार औऱ समाज दोनों को इस बात को समझना होगा कि जब महिलाएं अपने जीवन के सबसे उत्पादक वर्षों में बच्चों की देखभाल के कारण नौकरी छोड़ने को मजबूर होती हैं, तो यह केवल व्यक्तिगत नुकसान नहीं, बल्कि राष्ट्रीय क्षति भी है।
महिला हित में उठी जागरूक आवाजों की यह देन है कि “डिफेमिनाइजेशन ऑफ चाइल्डकेयर” की अवधारणा पर विभिन्न मंचों पर बात हो रही है। यह अवधारणा न सिर्फ समस्या पर विचार करती है बल्कि इसके लिए समाधान भी सुझाती है। यह जागरूक अवधारणा इस दरकार को गहरे तौर पर रेखांकित कर रही है कि बच्चों की देखभाल को केवल महिलाओं की जिम्मेदारी मानने की सोच को खत्म करना और इसे परिवार व समाज की साझा जिम्मेदारी के रूप में स्थापित करना समय की मांग है। अलबत्ता इस दरकार को पूरा होने के लिए यह जरूरी होगा कि इसके लिए जरूरी सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया में पुरुष सक्रिय रूप से शरीक हों। क्योंकि बिना इसके लैंगिक समानता का आदर्श कोरा कागजी ही बना रहेगा।
आज स्थिति यह है कि महिलाओं पर केवल बच्चों की देखभाल ही नहीं, बल्कि उनकी शिक्षा, होमवर्क, स्कूल से जुड़े संवाद और भावनात्मक मार्गदर्शन की जिम्मेदारी भी अधिक होती है। यह “डबल बर्डन” उन्हें लगातार थकान, तनाव और कई बार बर्नआउट की स्थिति में पहुंचा देता है। कामकाजी महिलाएं दिनभर नौकरी करने के बाद घर लौटकर दूसरी शिफ्ट में प्रवेश करती हैं, जहां उनसे वही अपेक्षाएं की जाती हैं जो एक पूर्णकालिक गृहिणी से की जाती हैं।
लिहाजा, इस समस्या का समाधान केवल नीतियों से नहीं, बल्कि सामाजिक मानसिकता में बदलाव से संभव है। पितृत्व अवकाश को बढ़ावा देना, कार्यस्थलों पर लचीली नीतियां लागू करना, और क्रेच व डे-केयर जैसी सुविधाओं का विस्तार करना जरूरी कदम हैं, लेकिन उससे भी अधिक जरूरी है सोच में बदलाव। जब तक मां का स्वाभाविक कर्तव्य जैसी धारणाएं समाज के भीतर गहराई से जमी रहेंगी, तब तक कोई भी नीति पूरी तरह प्रभावी नहीं हो पाएगी। बच्चों को बचपन से ही यह सिखाना होगा कि घर और परिवार की जिम्मेदारियां साझा होती हैं, न कि किसी एक लिंग की।
महिलाओं के सशक्तिकरण की चर्चा अक्सर शिक्षा, रोजगार और राजनीतिक भागीदारी तक सीमित रह जाती है, लेकिन असली कसौटी घर के भीतर तय होती है। यदि एक महिला को अपने ही घर में बराबरी का अधिकार नहीं मिलता, तो बाहर की उपलब्धियां भी अधूरी रह जाती हैं। “वुमन डेवलपमेंट” से “वुमन-लेड डेवलपमेंट” की बात तब ही सार्थक होगी, जब महिलाएं केवल देखभाल की भूमिका तक सीमित न रहकर निर्णय लेने और नेतृत्व की प्रक्रिया में बराबरी से भाग लें।
आखिरकार सवाल यही है कि क्या हम बच्चों के लालन-पालन को एक साझा सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में देखने को तैयार हैं, या हम इसे अब भी महिलाओं के त्याग और कर्तव्य के रूप में ही देखते रहेंगे? जब तक इस प्रश्न का ईमानदार उत्तर नहीं खोजा जाएगा, तब तक हर मां के भीतर एक अधूरी पहचान बनी रहेगी और समाज अपनी आधी संभावनाओं को यूं ही खोता रहेगा।
(दैनिक भास्कर 15-04.26)