सोमवार, 27 अक्टूबर 2025

क्या केवल प्रशासनिक पद पर बैठी बेटी ही मजबूत है -मिशन शक्ति अभियान पर सुलगता सवाल शालिनी कौशिक एडवोकेट का

  


    उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा माननीय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी के मार्गदर्शन में ''महिलाओं तथा बच्चों की सुरक्षा, सशक्तिकरण व सम्मान'' के उदद्देश्यों के साथ ''मिशन शक्ति'' के रूप में वृहद अभियान की शुरुआत की गई. मिशन शक्ति अभियान के पहले चरण की शुरूवात 17 अक्टूबर 2020 को की गई थी. मिशन शक्ति अभियान के 4 चरणों में सफल संचालन के पश्चात् मिशन शक्ति फेज-5, उत्तर प्रदेश में महिलाओं की सुरक्षा, सम्मान, स्वावलंबन, स्वास्थ्य और सशक्तिकरण के लिए शुरू किया गया, जिसकी शुरुआत 20 सितंबर 2025 को हुई थी। यह अभियान महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने और समाज में उनकी भागीदारी को बढ़ाने पर केंद्रित है, जिसमें स्वास्थ्य हेल्पलाइन का शुभारंभ, 'बीसी सखी' जैसी योजनाओं से जोड़ना और पुलिस द्वारा जागरूकता कार्यक्रम चलाना शामिल है।

       अभी तक के मिशन शक्ति अभियान के यदि हम पांचो चरणों की बात करें तो हम पाते हैं कि इस अभियान में महिला शक्ति को प्रशासनिक क्षेत्र में ही आगे बढ़ाने का आदर्श स्थापित किया गया है -

✒️ अमरोहा: मिशन शक्ति के तहत, एमएस सीनियर सेकेंडरी स्कूल की छात्रा निष्ठा एक दिन की थानेदार बनीं. उन्होंने महिला अपराधों पर सख्त कार्रवाई करने का निर्देश दिया.

✒️ जौनपुर: कक्षा 10 की छात्रा दिव्या यादव ने मिशन शक्ति के तहत एक दिन के लिए थानाध्यक्ष का पद संभाला और महिला सशक्तिकरण का संदेश दिया.

✒️ शाहजहांपुर: टियारा अरोरा को एक दिन के लिए मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) बनाया गया. उन्होंने स्वास्थ्य विभाग का निरीक्षण किया और फरियादियों की समस्याएं सुनीं.

✒️ रायबरेली (सलोन): कन्या पूर्व माध्यमिक विद्यालय की छात्रा सोनाली जोशी ने एक दिन के लिए नगर पंचायत की कार्यकारी अधिकारी (EO) का पद संभाला और बालिकाओं को सशक्त बनाने के उद्देश्य से कार्य किया.

✒️ रायबरेली (महाराजगंज): उच्च प्राथमिक विद्यालय सलेथू की कक्षा सात की छात्रा अंशिका वर्मा को एक दिन के लिए खंड शिक्षा अधिकारी (BEO) बनाया गया, और उन्होंने विभागीय योजनाओं की जानकारी ली.

✒️ मिर्जापुर: पटेहरा कला के कंपोजिट विद्यालय की कक्षा 7 की छात्रा सुनैना को एक दिन के लिए खंड विकास अधिकारी (BDO) बनाया गया. उन्होंने स्वयं सहायता समूहों को जोड़ने पर जोर दिया.

✒️ शामली : उत्तर प्रदेश सरकार के 'मिशन शक्ति' अभियान के मद्देनजर शामली जनपद में सराहनीय और अनूठी पहल करते हुए महिलाओं को सशक्त और जागरूक बनाने के लिए ज़िले की 21 प्रतिभाशाली बेटियों को एक दिन के लिए प्रशासनिक पदों की जिम्मेदारी सौंपी गई। अभियान के तहत बेटियों के उम्दा प्रदर्शन ने न केवल जनपद का मान बढ़ाया, बल्कि होनहार बेटियों ने प्रशासनिक अनुभव प्राप्त कर सशक्त भारत का चेहरा भी प्रस्तुत किया।

         मिशन शक्ति अभियान उत्तर प्रदेश में अपने पांच चरण पूर्ण कर चुका है. पांचो अभियान में बेटियों को डी एम, एस पी, मुख्य चिकित्सा अधिकारी जैसे वरिष्ठ प्रशासनिक पदों की जिम्मेदारी ही सौंपी गई. ये एक सराहनीय पहल है बेटियों में शक्ति व ऊर्जा भरने के संबंध में, किन्तु ये मिशन शक्ति अभियान सम्पूर्ण नहीं कहा जा सकता जब तक कि इसमें नारी शक्ति के आरम्भ से लेकर आज तक के स्वरूप को अनदेखा कर दिया जायेगा.

नारी पर आरम्भ से लेकर आज तक दो दो परिवारों की जिम्मेदारी रही है, इसलिए उसकी शक्ति को अनदेखा या उपेक्षित किया ही नहीं जा सकता. नारी सबसे पहले गृहणी होती है, 

वह ही प्रथम शिक्षिका का मानद दर्जा पाती रही है. कहा भी जाता रहा है कि एक नारी का शिक्षित होना दो परिवारों का शिक्षित होना है. सावित्री बाई फुले की जयंती 3 जनवरी को पूरा देश मनाता है और वे प्रथम शिक्षिका के रूप में सम्मान पाती आई हैं,


नारी ने समाज सेवा के क्षेत्र में भी बड़े बड़े कीर्तिमान स्थापित किये हैँ,दीदी माँ साध्वी ऋतंभरा जी, हिंदू धर्म की शिक्षाओं के महत्व और समाज के लोगों पर पड़ने वाले इनके प्रभावों पर प्रवचन देती हैं। बेटियों की जिम्मेदारी संभालती हैं और उनके घर बसाने में पूर्ण सहयोग करती हैँ. उनके द्वारा पालन पोषण प्राप्त आज बहुत सी बेटियां प्रशासनिक पदों पर विराजमान हैँ और देश की शोभा बढ़ा रही हैँ.


वकालत के क्षेत्र में झंडे गाड़ने में भी नारी पीछे नहीं हैं और बहुत पहले से ही महिला अधिवक्ता भी समाज को मिलती रही हैँ.कॉर्नेलिया सोराबजी (15 नवंबर 1866 - 6 जुलाई 1954) एक भारतीय महिला थी, जो मुम्बई विश्वविद्यालय से पहली महिला स्नातक, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में कानून का अध्ययन करने वाली पहली महिला थी(वास्तव में, किसी भी ब्रिटिश विश्वविद्यालय में अध्ययन करने वाली पहली भारतीय राष्ट्रीय, भारत में पहली महिला वकील , और भारत और ब्रिटेन में कानून का अभ्यास करने वाली पहली महिला। 2012 में, लंदन के लिंकन इन में उनकी प्रतिमा का अनावरण किया गया था।


भारत क़ृषि प्रधान देश है और भारतीय खेती मूलतः वर्षा पर निर्भर है. ये कठिन कार्य भारतीय पुरुष प्रधान समाज नारी के सहयोग के बिना करने में सक्षम नहीं है. भारत का इतिहास साक्षी है खेती के कठिन क्षेत्र में नारी के गरिमामय योगदान का और आरम्भ से लेकर आज तक नारी केवल खेत पर पति के लिए खाना लाने का ही कार्य नहीं करती रही बल्कि किसान बनकर भी अपना योगदान देने से पीछे नहीं रही है.


घर में झाडू को लक्ष्मी का दर्जा दिया गया है.यहाँ तक कि अगर गलती से झाड़ू को पैर लग जाये तो उससे माफ़ी मांगने तक की भारतीय परंपरा है. पहले महात्मा गाँधी जी द्वारा और अब प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी द्वारा झाड़ू को हाथ में लेकर स्वच्छता अभियान की शुरुआत की गई. सफाई में ही भगवान का वास होता है यही सन्देश देते हुए प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा कुम्भ आयोजन के दौरान सफाई कर्मियों के पैर भी स्वयं धोये गए. ऐसे में हम शक्ति के इस स्वरूप को अनदेखा व उपेक्षित कैसे कर सकते हैँ जबकि हम स्वयं की निजी जिंदगी में भी सफाई कर्मियों महिला के सहयोग से ही स्वच्छ वातावरण में रहने का सुख प्राप्त कर पाते हों.



राजनीति एक ऐसा क्षेत्र जिसमें आने से पुरुष भी कतराते हैँ क्योंकि यहाँ खींचतान कुछ ज्यादा होती हैँ, जिम्मेदारी बहुत ज्यादा होती है. सामान्य बैकग्राउंड के व्यक्ति का इसमें स्थान बनाना बहुत कठिन होता है किन्तु भारतीय नारी अपनी योग्यता और मेहनत के दम पर राजनीति के शीर्ष स्थानों पर काबिज होने मे सफल रही है और जनता की सेवा करने के अपने जज्बे को सदैव ईमानदारी से निभाती रही है.


  आज भारतीय नारी विमान उड़ा रही है,ट्रेन चला रही है,बस चला रही है, इ रिक्शा भी चला रही है, बसों मे कंडक्टर का कठिन दायित्व भी निभा रही हैं, आंगनबाड़ी बनकर घर घर सरकार की योजनाओं को पहुंचा रही है. 


     और भी बहुत से दायित्व हैँ जो आज की बेटियां निभा रही हैं किन्तु मिशन शक्ति अभियान के लिए जो पद प्रशासन द्वारा चुने गए हैँ वे मात्र प्रशासनिक पद हैँ जहाँ नारी खुद निर्णय लेने का अधिकार भी नहीं रखती. एक शिक्षिका के रूप मे वह सोचने समझने की शक्ति देती है, एक समाज सेविका के रूप मे वह जीवन मे उन्नति का पथ प्रशस्त करती है, एक वकील के रूप मे वह न्याय दिलाती है, एक नेता के रूप में वह गलत के खिलाफ मजबूती से लड़ना सिखाती है, आंगनबाड़ी के रूप मे वह सरकारी योजनाओं का जनता से परिचय कराती है एक सफाईकर्मी के रूप मे वह स्वच्छता से जीना सिखाती है किन्तु इतने सब महत्वपूर्ण योगदानों के बावजूद सरकारी योजनाओं मे नारी के इन शक्ति स्वरूपों का कोई महत्व नहीं है. मिशन शक्ति के तहत किसी बेटी को यह सन्देश नहीं दिया जाता कि नारी के इनमें से किसी भी शक्ति स्वरुप को जीवन मे उतारा जाये. नहीं बताया जाता कि नारी का सबसे बड़ा शक्ति स्वरुप उसका गृहणी होना है और अगर वह एक गृहणी के रूप मे एक दिन भी अगर घर को अच्छी तरह से संभाल सके तो यह शक्ति की सच्ची पहचान होगी और अगर वह देश और समाज में सभ्यता, ईमानदारी की नस्लें तैयार कर सके तो एक सुन्दर भविष्य का निर्माण होगा, समाज और देश का भविष्य उज्ज्वल बनेगा. नारी शक्ति के दायित्व बहुत अधिक हैँ और उन्हें ध्यान में रखते हुए सरकार को मिशन शक्ति का दायरा अभियान के छठवें चरण में बढ़ाना ही होगा.

धन्यवाद 🙏🙏

द्वारा 

शालिनी कौशिक 

एडवोकेट 

कैराना (शामली )

सोमवार, 22 सितंबर 2025

मुस्लिम महिला तलाक के बाद भी भरण पोषण की हकदार -पटना हाईकोर्ट

 


 पटना हाईकोर्ट ने कहा है कि 

"एक मुस्लिम महिला तलाक के बाद भी धारा 125 CrPC के तहत अपने पति से भरण-पोषण (maintenance) मांग सकती है, अगर तलाक के बाद इद्दत अवधि में उसके भविष्य के लिए पति ने “उचित और न्यायसंगत प्रावधान” नहीं किया। "

जस्टिस जितेंद्र कुमार ने फैमिली कोर्ट के आदेश को सही ठहराया, जिसमें एक मुस्लिम पुरुष को अपनी पत्नी को महीने ₹7,000 देने का निर्देश दिया गया था। पति ने दलील दी थी कि 

"उनकी शादी आपसी सहमति (mubarat) से खत्म हो गई थी, "

लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया।

➡️ मामला संक्षेप में-

पत्नी ने आरोप लगाया कि 

" शादी के तुरंत बाद पति की क्रूरता के कारण उसे अपने माता-पिता के घर लौटना पड़ा। उसने कोई आय न होने का हवाला देते हुए ₹15,000 प्रति माह की मांग की। उसने बताया कि उसका पति विदेश में काम करता है और लगभग ₹1 लाख प्रति माह कमाता है। "

पति ने क्रूरता के आरोप को खारिज किया और कहा कि

" शादी 2013 में मुबारत (आपसी तलाक) से खत्म हो गई थी। उसने दावा किया कि उसने पहले ही ₹1,00,000 की राशि एलिमनी, दीन मोहर और इद्दत खर्च के रूप में दे दी है।"

फैमिली कोर्ट ने पति की दलील को खारिज कर दिया और भरण-पोषण देने का आदेश दिया। हाई कोर्ट ने भी फैमिली कोर्ट का आदेश सही ठहराया। कोर्ट ने कहा कि

" आपसी तलाक का दावा सही तरह से साबित होना चाहिए। धारा 125 CrPC की प्रकृति सारांश (summary) होती है, इसलिए शादी की स्थिति का विवाद सीधे इस मामले में नहीं तय किया जा सकता। "

हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि

" अगर तलाक मान भी लिया जाए, तो भी पत्नी को भरण-पोषण मिलना चाहिए। "

कोर्ट ने कहा, 

"मान लीजिए कि मि. मुर्शिद आलम ने तलाक दे दिया, तब भी नाजिया शाहीन को अपने पूर्व पति से भरण-पोषण पाने का अधिकार है, क्योंकि यह मामला नहीं है कि उसकी पूर्व पत्नी ने पुनः शादी कर ली हो या पति ने इद्दत अवधि में उसका उचित प्रावधान किया हो।"

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के शाहबानो (1985) और दानियल लतीफी (2001) के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि

" धारा 125 CrPC धर्मनिरपेक्ष है, और यह किसी भी व्यक्तिगत धर्म या कानून से विरोध नहीं करती। मुस्लिम पति की यह जिम्मेदारी है कि जो महिला आत्मनिर्भर नहीं है, उसे तलाक के बाद भी भरण-पोषण मिले। "

न्यायमूर्ति कुमार ने कहा कि 

"उचित और न्यायसंगत प्रावधान में रहने का स्थान, भोजन, कपड़े और अन्य आवश्यक चीजें शामिल हो सकती हैं। फैमिली कोर्ट के आदेश में कोई गलती है."

 और हाई कोर्ट ने ₹7,000 प्रति माह देने का आदेश बनाए रखा।

आभार 🙏👇


प्रस्तुति 

शालिनी कौशिक 

एडवोकेट 

कैराना (शामली )

मंगलवार, 9 सितंबर 2025

विवाहित बेटी भी अनुकम्पा नियुक्ति की हक़दार -इलाहाबाद हाई कोर्ट

 


अनुकम्पा नियुक्ति पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला आया है। हाईकोर्ट ने कहा कि

" विवाहित बेटी भी अनुकंपा पर नियुक्ति की हकदार है। बेटियों के विवाहित होने से अनुकंपा नियुक्ति देने से इनकार नहीं किया जा सकता."

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी (बीएसए) देवरिया को निर्देश जारी किया कि 

"वह अपीलकर्ता की अनुकंपा नियुक्ति के दावे पर फिर से विचार करें और आठ सप्ताह के भीतर निर्णय लें।"

 यह आदेश न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता एवं न्यायमूर्ति राम मनोहर नारायण मिश्र की खंडपीठ ने चंदा देवी की विशेष अपील पर दिया है।

➡️ संक्षेप में मामला-

देवरिया निवासी चंदा देवी के पिता संपूर्णानंद पांडेय पूर्व प्राथमिक विद्यालय गजहड़वा, ब्लॉक बनकटा, तहसील भाटपाररानी में सहायक अध्यापक के पद पर कार्यरत थे। सेवा के दौरान 2014 में उनकी मृत्यु हो गई। चंदा देवी ने अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति के लिए आवेदन किया। दिसंबर 2016 में जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी ने उनके आवेदन को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि वह विवाहित बेटी हैं, इसलिए वह शासनादेश चार सितंबर 2000 के अनुसार अनुकंपा नियुक्ति के लिए पात्र नहीं हैं। चंदा देवी ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी।

एकलपीठ ने मई 2025 में उनकी याचिका खारिज कर दी। एकल पीठ ने माना कि विवाहित बेटी भी पात्र है, लेकिन चंदा देवी यह साबित नहीं कर पाईं कि उनके पति बेरोजगार हैं और वह अपने पिता पर आश्रित थी। इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि उनके पिता का निधन 2014 में हुआ था। अब लगभग 11 साल बीत चुके हैं। ऐसे में यह दावा विचार योग्य नहीं है।

चंदा ने एकल पीठ के खिलाफ विशेष अपील दाखिल की। पक्षों को सुनने के बाद खंडपीठ ने कहा कि जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी ने चंदा देवी के आवेदन को सिर्फ इस आधार पर खारिज किया था कि वह विवाहित बेटी है। उन्होंने पिता पर निर्भरता का आधार नहीं लिया था। ऐसे में एकलपीठ का यह कहना कि उन्होंने निर्भरता साबित नहीं की उचित नहीं है। 

खंडपीठ ने स्मृति विमला श्रीवास्तव बनाम उप्र राज्य में स्पष्ट किया है कि पुत्री का विवाहित होना अनुकम्पा नियुक्ति में बाधा नहीं है। खंडपीठ ने यह भी कहा कि याची ने दावा खारिज होने के तुरंत बाद ही कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। इसलिए देरी के आधार पर याची को लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने चंदा देवी की विशेष अपील स्वीकार कर ली।

➡️ स्मृति विमला श्रीवास्तव बनाम उप्र राज्य

विवाह के पहलू पर विचार करते हुए, खंडपीठ ने निम्नलिखित निर्णय दिया:

"विवाह का पहचान से कोई निकट संबंध नहीं है और न ही होना चाहिए। एक महिला के रूप में उसकी पहचान उसके वैवाहिक संबंध के बाद भी और उसके बावजूद भी बनी रहती है। इसलिए, समय आ गया है कि न्यायालय इस बात पर सकारात्मक रूप से ज़ोर दे कि यदि राज्य को संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 में निहित समानता के मूल सिद्धांत के अनुरूप कार्य करना है , तो वह विवाहित पुत्रियों के साथ भेदभाव नहीं कर सकता, उन्हें क्षैतिज आरक्षण के लाभ से वंचित कर सकता है, जो कि पुत्र को उसकी वैवाहिक स्थिति पर ध्यान दिए बिना उपलब्ध कराया जाता है।"

➡️ श्रीमती रंजना मुरलीधर अनेराव बनाम महाराष्ट्र राज्य10 

यही विचार बॉम्बे उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ ने श्रीमती रंजना मुरलीधर अनेराव बनाम महाराष्ट्र राज्य10 मामले में व्यक्त किया था, जहाँ यह माना गया था कि लाइसेंस धारक की मृत्यु के बाद खुदरा केरोसिन लाइसेंस प्रदान करने के लिए विवाहित पुत्री को शामिल न करना न्यायोचित नहीं था। बॉम्बे उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने निम्नलिखित निर्णय दिया:

"विवाहित पुत्री का यह बहिष्कार किसी तर्क या अन्य न्यायोचित मानदंड पर आधारित प्रतीत नहीं होता है। किसी पुत्री का विवाह, जो लाइसेंस धारक की कानूनी प्रतिनिधि है, लाइसेंस धारक की मृत्यु पर उसके नाम पर लाइसेंस हस्तांतरण के मामले में उसके लिए अहितकर नहीं माना जा सकता। भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत किसी भी व्यापार या व्यवसाय को करने का नागरिक का अधिकार सुरक्षित है। अनुच्छेद 19(6) के तहत किसी भी व्यापार या व्यवसाय को करने के लिए आवश्यक व्यावसायिक या तकनीकी योग्यताओं के संबंध में उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। इसी प्रकार, संविधान के अनुच्छेद 15 द्वारा लैंगिक भेदभाव निषिद्ध है। 1979 के लाइसेंसिंग आदेश में "परिवार" अभिव्यक्ति के दायरे से विवाहित पुत्री का बहिष्कार न केवल अनुच्छेद 15 का उल्लंघन है, बल्कि यह संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) द्वारा गारंटीकृत अधिकार का भी उल्लंघन करता है ।"

       इस प्रकार विवाहित पुत्री भी अनुकम्पा नियुक्ति की हकदार है.

आभार 🙏👇


प्रस्तुति 

शालिनी कौशिक 

एडवोकेट 

कैराना (शामली )

शनिवार, 6 सितंबर 2025

जिठानी-देवरानी अलग परिवार -इलाहाबाद हाई कोर्ट

  


इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा हाल ही में बरेली के जिला कार्यक्रम अधिकारी द्वारा आंगनवाड़ी कार्यकर्ता की नियुक्ति को रद्द किये जाने को रद्द कर दिया गया, जिसमें कहा गया था कि 

"एक भाभी (जेठानी) को सरकारी आदेश के तहत 'एक ही परिवार' का हिस्सा तब माना जाता है, ज़ब दोनों भाई एक ही घर और रसोई में साथ रहते हैं।"

जस्टिस अजीत कुमार की पीठ ने कुमारी सोनम की याचिका को स्वीकार करते हुए यह फैसला सुनाया, जिनकी नियुक्ति 13 जून, 2025 को बरेली के जिला कार्यक्रम अधिकारी ने रद्द कर दी थी। रद्द करने का आधार यह था कि उसकी जेठानी पहले से ही उसी केंद्र में आंगनवाड़ी सहायक के रूप में सेवा कर रही थी।

जबकि याचिकाकर्ता का तर्क यह था कि उसकी जेठानी (भाभी) एक अलग घर नंबर के साथ एक अलग घर में रहती है और इसलिए, वह उसके पति के परिवार की परिभाषा में नहीं आती है, भले ही वह उसके ससुर के परिवार से संबंधित हो। याचिकाकर्ता के वकील ने संबंधित परिवार रजिस्टर दस्तावेज को भी इंगित किया, जिससे पता चलता था कि उसकी जेठानी वास्तव में अलग रहती थी। संदर्भ के लिए, 21 मई, 2023 को सरकारी आदेश के तहत खंड 12 (iv) के तहत बनाए गए बार के संबंध में तर्क दिया गया था, यह प्रावधान है कि एक ही परिवार की दो महिलाओं को एक ही केंद्र में आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और आंगनबाड़ी सहायक के रूप में नियुक्त नहीं किया जाएगा.

इसके अलावा, याचिकाकर्ता के वकील ने सरकारी विभाग में परिवार के आश्रितों को चिकित्सा सहायता के उद्देश्य से चिकित्सा विभाग में सरकारी कर्मचारी के लिए प्रदान किए गए परिवार की परिभाषा के साथ-साथ आदेश XXXII-A, नियम 6 के तहत दी गई परिवार की परिभाषा का उल्लेख किया कि कल्पना के किसी भी खिंचाव से भाभी (जेठानी) को चयन के प्रयोजनों के लिए परिवार की परिभाषा के भीतर नहीं माना जा सकता है और आंगनबाड़ी कार्यकर्ता के पद पर नियुक्ति।

इस पृष्ठभूमि के खिलाफ, शुरुआत में, न्यायालय ने आदेश को इस आधार पर अस्थिर पाया कि यह याचिकाकर्ता को कोई नोटिस या सुनवाई का अवसर दिए बिना पारित किया गया था, इसके बावजूद प्रतिकूल नागरिक परिणाम हुए। इसके अलावा, जीओ के खंड 12 (iv) की ओर मुड़ते हुए, न्यायालय ने इस प्रकार धारण करने के लिए 'एक ही परिवार' के अर्थ की जांच की: 

"बहू (जेठानी) परिवार की सदस्य नहीं बनेगी और बहू (जेठानी) को परिवार का सदस्य माना जा सकता है, बशर्ते दोनों भाई एक साथ रसोई और घर में रह रहे हों।"

➡️ भारतीय परम्परा के अनुसार "परिवार"-

परिवार वह व्यक्तियों का समूह है जो जन्म, विवाह या गोद लेने से आपस में जुड़े होते हैं और जो एक ही घर में रहते हैं। इसमें पति, पत्नी, बच्चे, और कई बार दादा-दादी, चाचा-चाची जैसे करीबी रक्त संबंधी शामिल हो सकते हैं। परिवार समाज की सबसे बुनियादी इकाई है जो भावनात्मक संबंध और एक आर्थिक इकाई के रूप में काम करती है, जिससे सदस्यों को सामाजिक, भावनात्मक और आर्थिक सहारा मिलता है। 

🌑 परिवार के प्रकार:

✒️ एकल परिवार (Nuclear Family):

इसमें माता-पिता और उनके अविवाहित बच्चे शामिल होते हैं। 

✒️ संयुक्त परिवार (Joint Family):

इस बड़े परिवार में पति-पत्नी, बच्चे, दादा-दादी, चाचा-चाची, और उनके बच्चे, जैसे कई पीढ़ी के सदस्य एक साथ रहते हैं। 

✒️ उदाहरण:

एकल परिवार: एक पति, पत्नी और उनके बच्चे। 

संयुक्त परिवार: दादा-दादी, माता-पिता, उनके बच्चे और उनके भाई-बहन सभी एक ही घर में रहते हैं।,

अब क्योंकि वर्तमान पारिवारिक व्यवस्था और कानूनी दृष्टिकोण के अनुसार परिवार में पति पत्नी और बच्चे ही आते हैँ, ऐसे में उपरोक्त मामले में अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि यह नहीं कहा जा सकता है कि 

"भाभी (जेठानी) और याचिकाकर्ता दोनों एक ही परिवार की महिलाएं थीं। इसलिए, आक्षेपित आदेश को प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के उल्लंघन के आधार पर और मेरिट के आधार पर भी अस्थिर कर दिया गया था। नतीजतन, रिट याचिका की अनुमति दी गई, और आक्षेपित आदेश को रद्द कर दिया गया। जिला कार्यक्रम अधिकारी को निर्देश दिया गया कि याचिकाकर्ता को उसके कर्तव्यों का निर्वहन करने के लिए आंगनबाड़ी कार्यकर्ता के रूप में बहाल किया जाए।"

    इस प्रकार यहाँ इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पति पत्नी और बच्चे को ही एक परिवार मानते हुए जेठानी को देवरानी के परिवार से अलग माना और देवरानी को आंगनबाड़ी कार्यकर्ता के पद पर वापस बहाल करने के आदेश जारी किये.

आभार 🙏👇



द्वारा 

शालिनी कौशिक 

एडवोकेट 

कैराना (शामली )

बुधवार, 3 सितंबर 2025

महिला आयोग गंभीर महिला सुरक्षा को लेकर

  


( ई रिक्शाओं पर महिला आयोग गंभीर )

उत्तर प्रदेश राज्य महिला आयोग महिलाओं के साथ ई-रिक्शा में हो रही छेड़छाड़ की घटनाओं को लेकर गंभीर है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पूर्व में जारी किये गए निर्देशों को अमल में लाने की कार्यवाही करते हुए महिला आयोग ने भी निर्देश दिया है कि अब हर ई-रिक्शा पर चालक का नाम और मोबाइल नंबर स्पष्ट रूप से लिखा होना चाहिए.

➡️ उत्तर प्रदेश महिला आयोग की अध्यक्ष-

उत्तर प्रदेश राज्य महिला आयोग की वर्तमान अध्यक्षा डॉ. बबीता सिंह चौहान हैं, जिनकी नियुक्ति सितंबर 2024 में की गई थी. उन्होंने इस पद की जिम्मेदारी संभालने के बाद से प्रदेश में महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर काम किया है और कई जिलों का दौरा भी किया है, जिसमें उन्होंने जेलों का निरीक्षण किया और अस्पतालों में बेबी किट बांटी.

➡️ महिला आयोग की महत्वपूर्ण बैठक-

महिला आयोग की अध्यक्ष डॉ बबीता सिंह चौहान ने बाराबंकी में अफसरों के साथ एक महत्वपूर्ण बैठक की और यह निर्णय लिया. उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी महिलाओं की सुरक्षा को लेकर गंभीर हैं. बैठक में आयोग ने महिलाओं की सुरक्षा को लेकर कई अहम बिंदुओं पर चर्चा की.इसके साथ ही आयोग ने हेल्पलाइन 1090 और 181 की कार्यप्रणाली की समीक्षा कराने का आश्वासन दिया, ताकि पीड़ित महिलाओं को तुरंत सहायता मिल सके.

➡️ हेल्पलाइन नंबर 1090 --

विमेन पावर लाइन ( Women Power Line) उत्तर प्रदेश पुलिस का एक अभियान है जो यौन उत्पीड़न, और इसकी जड़ों में समाज की पितृसत्तात्मक मानसिकता की गलतफहमी के विरोध पर केंद्रित है। यह महिलाओं की सुरक्षा के लिए काम करने वाला सरकारी कॉल सेंटर है । यह 24x7 काम करता है। महिलाओं की सुरक्षा हेतु वीमेन पावर लाइन 1090 की स्थापना की गयी है । इस काल सेण्टर में 1090 नम्बर पर प्रदेश के किसी भी कोने से महिलायें / लड़कियां किसी भी वक्त काल करके अपने साथ होने वाली छेड़खानी की घटनाओं की शिकायत कर सकती हैं। जहां पीड़िता की पहचान गोपनीय रखी जाती है ।

➡️ हेल्पलाइन नम्बर 181--

 181 महिला हेल्पलाइन का उद्देश्य हिंसा से प्रभावित महिलाओं को 24 घंटे सहायता और आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रदान करना है। यह हेल्पलाइन एक ही नंबर के माध्यम से देश भर में महिलाओं से संबंधित सरकारी योजनाओं और कार्यक्रमों की जानकारी भी प्रदान करती है। 181 हेल्प लाइन नंबर 24 घंटे चालू रहेगा। आपात स्थिति में इस नंबर पर डायल कर महिलाएं कानूनी मदद ले सकेंगी। 181 हेल्पलाइन नंबर की खासियत यह होगी कि शिकायत दर्ज कराने वाले का नाम गोपनीय रखा जाएगा।

➡️ महिला आयोग की अध्यक्ष के निर्देश--

महिला आयोग की अध्यक्ष द्वारा उत्तर प्रदेश के सभी थानों में महिला डेस्क को और मजबूत करने के निर्देश भी जारी किये गए हैं. महिलाओं की सुरक्षा के दृढ निश्चय के साथ महिला आयोग के इन कदमों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि महिलाएं बिना किसी डर के अपनी शिकायत दर्ज करा सकें और उन्हें त्वरित न्याय मिले.

➡️ ई रिक्शा पर पूर्व अभियान- 

 पूर्व में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी के निर्देश पर उत्तर प्रदेश ट्रैफिक पुलिस ने ऑटो टेंपो और ई रिक्शा में ड्राइवर का नाम उसका मोबाइल नंबर मालिक का नाम समेत अन्य जानकारियां शीशे पर आगे लिखने का एक अभियान चलाया था. जिसमें शुरू शुरू में कई गाड़ियों पर इसका पालन भी हुआ, हालांकि बीच में फिर शिथिलता बरती गई है जिससे बाद में ई रिक्शाओं पर इस निर्देश का कहीं कोई असर नहीं दिखाई दिया.

➡️ अब ई रिक्शाओं को मानना होगा निर्देश- 

अब महिला आयोग की अध्यक्ष का इस मुद्दे को लेकर गंभीर होने पर इस मामले में तेजी देखने को मिल सकती है जिससे आने वाले दिनों में तमाम ई रिक्शा और ऑटो रिक्शा के शीशे पर उनके ड्राइवर का नाम मोबाइल नंबर समेत अन्य जानकारियां सार्वजनिक तौर पर लिखी जाने की आशा की जा सकती है.

      उत्तर प्रदेश महिला आयोग द्वारा महिला सुरक्षा के लिए ई रिक्शाओं पर इस नियम का कड़ाई से लागू किये जाने का यह फैसला अति सराहनीय कहा जायेगा क्योंकि ई रिक्शाएं आज परिवहन का मुख्य साधन बन चुकी हैं और महिलाओं के द्वारा यातायात-परिवहन का सुगम साधन होने के कारण बहुतायत में इस्तेमाल की जा रही हैँ और जहाँ तक इनके चालक की या वाहन की पहचान की बात है उसका कोई साधन ई रिक्शा में नजर नहीं आता और क्योंकि योगी सरकार के निर्देश ई रिक्शाओं पर नाकाफी दिखाई दिए हैँ ऐसे में महिला सुरक्षा के लिए महिला आयोग की गंभीरता अनिवार्य और सराहनीय कदम है.

द्वारा

शालिनी कौशिक

एडवोकेट

कैराना ( शामली )


बुधवार, 20 अगस्त 2025

16 साल की मुस्लिम लड़की को वैध विवाह का अधिकार -सुप्रीम कोर्ट

 


(Shalini kaushik law classes)

सुप्रीम कोर्ट जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर महादेवन की खंडपीठ ने मंगलवार (19 अगस्त) को राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका को ख़ारिज कर दिया गया। याचिका द्वारा पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट के 2022 के उस फैसले को चुनौती दी गई थी जिसमें कहा गया था कि 16 साल की मुस्लिम लड़की किसी मुस्लिम पुरुष से वैध विवाह कर सकती है और दंपति को धमकियों से सुरक्षा प्रदान की गई थी। 

     जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर महादेवन की खंडपीठ ने निर्णय में कहा कि 

 "राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) इस मुकदमे से अनजान है और उसे हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने का कोई अधिकार नहीं है।"

खंडपीठ ने पूछा कि-

"राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग को धमकियों का सामना कर रहे दंपति के जीवन और स्वतंत्रता की सुरक्षा प्रदान करने वाले हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती क्यों देनी चाहिए?" 

खंडपीठ ने कहा,

 "NCPCR के पास ऐसे आदेश को चुनौती देने का कोई अधिकार नहीं है... अगर दो नाबालिग बच्चों को हाईकोर्ट द्वारा संरक्षण प्राप्त है तो NCPCR ऐसे आदेश को कैसे चुनौती दे सकता है... यह अजीब है कि NCPCR, जो बच्चों की सुरक्षा के लिए है, उसने ऐसे आदेश को चुनौती दी।"

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के वकील ने दलील दी कि

 "वे कानून का सवाल उठा रहे थे कि क्या 18 साल से कम उम्र की लड़की को सिर्फ़ पर्सनल लॉ के आधार पर कानूनी तौर पर शादी करने की योग्यता रखने वाला माना जा सकता है?"

जिस पर सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ की जस्टिस नागरत्ना ने कहा,

 "कानून का कोई सवाल ही नहीं उठता, कृपया आप किसी उचित मामले में चुनौती दें।" 

याचिका खारिज करते हुए खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा: 

"हम यह नहीं समझ पा रहे हैं कि NCPCR ऐसे आदेश से कैसे व्यथित हो सकता है। अगर हाईकोर्ट, अनुच्छेद 226 के तहत अपनी शक्ति का प्रयोग करते हुए दो व्यक्तियों को संरक्षण प्रदान करना चाहता है तो NCPCR के पास ऐसे आदेश को चुनौती देने का कोई अधिकार नहीं है। याचिका खारिज की जाती है।"

खंडपीठ ने कहा-

"ऐसे मामलों को आपराधिक मामलों की तरह न देखें। हमें आपराधिक मामलों और इस मामले में अंतर करना होगा।"

 जस्टिस नागरत्ना ने आगे कहा, 

"देखिए, अगर लड़की किसी लड़के से प्यार करती है और उसे जेल भेज दिया जाता है तो उस लड़की को कितनी पीड़ा होती है, क्योंकि उसके माता-पिता भागने को छिपाने के लिए POCSO का मामला दर्ज करा देते हैं।" 

Case Details : 

NATIONAL COMMISSION FOR PROTECTION OF CHILD RIGHTS (NCPCR) Versus GULAAM DEEN AND ORS.| SLP(Crl) No. 10036/2022, NCPCR vs JAVED AND ORS Diary No. 35376-2022, NCPCR vs FIJA AND ORS SLP(Crl) No. 1934/2023

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प्रस्तुति 

शालिनी कौशिक 

एडवोकेट 

कैराना (शामली )

सोमवार, 11 अगस्त 2025

पत्नी की परिभाषा दस्तावेज से बड़ी -इलाहाबाद हाईकोर्ट

 

( shalini kaushik law classes)

इलाहाबाद हाई कोर्ट का मानना है कि जो पुरुष और महिला एक लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह साथ रहे हैं तो पत्नी का भरण-पोषण का हक बनता है। इसलिए भरण-पोषण के लिए विवाह को साबित करना जरूरी नहीं है।

भरण पोषण के एक मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि 

" भरण-पोषण के मामले में पत्नी की परिभाषा दस्तावेज से बड़ी है। पुरुष और महिला लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह साथ रहे हैं तो भरण-पोषण का हक बनता है। लिहाजा, भरण-पोषण के लिए विवाह को साबित करना जरूरी नहीं है। कानून का मकसद न्याय है न कि ऐसे रिश्तों को नकारना जो समाज में पति-पत्नी की तरह माने जाते है।"

इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति राम मनोहर नारायण मिश्रा की अदालत ने देवरिया निवासी याची की पुनरीक्षण याचिका स्वीकार कर ली। कोर्ट ने पारिवारिक न्यायालय का आदेश रद्द कर नए सिरे से मामले की सुनवाई करने के लिए वापस भेज दिया। साथ ही कांस्टेबल पति को मामले के निस्तारण होने तक याची को 8,000 रुपये प्रति माह अंतरिम भरण-पोषण देने का आदेश दिया है।

मामले में याची ने 2017 में पति के निधन के बाद कांस्टेबल देवर संग शादी होने का दावा किया । देवरिया के पारिवारिक न्यायालय में याची ने आरोप लगाया कि हिंदू रीति से विवाह होने के बाद देवर (पति ) दहेज की मांग करने लगा और दहेज़ न मिलने पर दूसरी शादी रचाकर याची व याची के बच्चों को घर से निकाल दिया। वहीं, विपक्षी ने शादी होने से इन्कार कर दिया। 

इस पर पारिवारिक न्यायालय ने याची की भरण-पाेषण की मांग यह कहते हुए खारिज कर दी कि वह वैध शादी के प्रमाण नहीं दे सकी। लिहाजा, वह विपक्षी की पत्नी नहीं है। इसके खिलाफ याची ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। 

      याची के अधिवक्ता ने आधार कार्ड, बैंक रिकॉर्ड और गवाहों के बयान पेश कर दलील दी कि दोनों लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह रहे हैं और पहले पति की मृत्यु के बाद दूसरी शादी वैध है। याची का दूसरा पति यूपी पुलिस में कांस्टेबल है, वेतन के अलावा खेती से भी उसकी आमदनी है जबकि याची बेसहारा है। लिहाजा, वह भरण-पोषण की हकदार है। 

     विपक्षी के अधिवक्ता ने दलील दी कि विपक्षी कभी शादीशुदा नहीं था, बच्चे भाई की संतान हैं और याची पैतृक संपत्ति से पहले ही लाभ ले रही है। 

इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति राम मनोहर नारायण मिश्रा की एकल पीठ ने पारिवारिक न्यायालय के आदेश को रद्द कर दिया और निर्णय देते हुए कहा कि अदालत ने विवाह का प्रमाण न होने के तकनीकी आधार पर अर्जी खारिज कर कानूनी व तथ्यात्मक गलती की है।

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प्रस्तुति 

शालिनी कौशिक 

एडवोकेट 

कैराना (शामली )

सोमवार, 21 जुलाई 2025

पिता की मृत्यु के बाद मां ही बच्चे की प्राकृतिक अभिभावक-बॉम्बे हाई कोर्ट

  


एक मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा-

" हिंदू अल्पसंख्यक और संरक्षकता अधिनियम, 1956 की धारा 6 के तहत वैधानिक योजना, यह प्रदान करती है कि मां पिता के बाद प्राकृतिक अभिभावक बन जाती है, और कानून उसे प्राथमिकता देता है जब तक कि यह साबित न हो जाए कि वह अयोग्य है"

न्यायालय ने आगे कहा-

 "धारा 6 (a) में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि अविवाहित लड़की के मामले में, पिता और उसके बाद, मां नाबालिग की प्राकृतिक अभिभावक है , कानूनी रूप से बोलते हुए, नाबालिग लड़की को मां की हिरासत में दिया जाना चाहिए जब तक कि यह स्थापित न हो जाए कि उसके पास नाबालिग के कल्याण को सुरक्षित करने के लिए प्रतिकूल हित या अक्षमता है।"

न्यायालय ने कहा कि 

" नाबालिग का कल्याण सर्वोच्च विचार है, हालांकि विशेष विधियों के प्रावधान माता-पिता या अभिभावकों के अधिकारों को नियंत्रित करते हैं। "

 न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि

" केवल इसलिए कि दादा-दादी ने कुछ वर्षों तक बच्चे का पालन-पोषण किया था, उन्हें प्राकृतिक अभिभावक पर बेहतर अधिकार नहीं देता है। यह देखा गया है कि केवल इसलिए कि दादा-दादी या अन्य रिश्तेदारों ने कुछ अवधि के लिए बच्चे का पालन-पोषण किया था, प्राकृतिक अभिभावक को बच्चे की कस्टडी के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है जब तक कि यह नहीं दिखाया जाता है कि नाबालिग का कल्याण खतरे में पड़ जाएगा।"

अदालत ने कहा कि

" मां अब व्यवसाय में लगी हुई है और उसके पास अपना और अपने बच्चे का भरण-पोषण करने के लिए पर्याप्त कमाई है। "

   किन्तु बच्ची और उसके दादा-दादी के बीच भावनात्मक बंधन को पहचानते हुए, अदालत ने याचिकाकर्ता को जिला न्यायाधीश के समक्ष सप्ताहांत और त्योहारों और छुट्टियों के दौरान नियमित पहुंच की अनुमति देने के लिए एक हलफनामा दायर करने का निर्देश दिया। तदनुसार, याचिका की अनुमति दी गई, और मां को बेटी की अंतरिम कस्टडी दी गई।

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शालिनी कौशिक

एडवोकेट

कैराना (शामली)


शुक्रवार, 18 जुलाई 2025

सुप्रीम कोर्ट ने आदिवासी महिलाओं को पुरुषों के समान दिया उत्तराधिकार का अधिकार,

 


 अपने हाल ही के एक निर्णय में उच्चतम न्यायालय ने आदिवासी महिलाओं को पुरुषों के समान उत्तराधिकार के अधिकार प्रदान करने का ऐतिहासिक फैसला सुनाया है. राम चरण एवं अन्य बनाम सुखराम एवं अन्य के उत्तराधिकार से संबंधित विवाद में आदिवासी परिवार की महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा -

"कि महिलाओं को उत्तराधिकार से वंचित करना अनुचित और भेदभावपूर्ण है। न्यायालय ने कहा कि यद्यपि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम अनुसूचित जनजातियों पर लागू नहीं होता, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि आदिवासी महिलाएं स्वतः ही उत्तराधिकार से वंचित हो जाती हैं। न्यायालय ने आगे कहा कि यह देखा जाना चाहिए कि क्या कोई प्रचलित प्रथा मौजूद है, जो पैतृक संपत्ति में महिला आदिवासी हिस्सेदारी के अधिकार को प्रतिबंधित करती है।"

       प्रस्तुत मामले में पक्षकार ऐसी किसी प्रथा का अस्तित्व स्थापित नहीं कर सके, जिसमें महिलाओं को उत्तराधिकार से वंचित किया गया हो। न्यायालय ने कहा,

 " रीति-रिवाज भी समय के बंधन में नहीं रह सकते। दूसरों को रीति-रिवाजों की शरण लेने या उनके पीछे छिपकर दूसरों को उनके अधिकार से वंचित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।" न्यायालय ने कहा कि लिंग के आधार पर उत्तराधिकार के अधिकार से वंचित करना संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है, जो कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है। केवल पुरुष उत्तराधिकारियों को उत्तराधिकार देने का कोई औचित्य नहीं है।"

न्यायालय ने आगे कहा 

" कि महिलाओं के अधिकारों पर प्रतिबंध लगाने वाले किसी विशिष्ट आदिवासी रीति-रिवाज या संहिताबद्ध कानून के अभाव में न्यायालयों को "न्याय, समता और सद्विवेक" का प्रयोग करना चाहिए, अन्यथा "महिला (या उसके) उत्तराधिकारी को संपत्ति में अधिकार से वंचित करना केवल लैंगिक विभाजन और भेदभाव को बढ़ाता है, जिसे कानून को समाप्त करना चाहिए।" 

➡️ मौजूदा मामले में विवाद-

      प्रस्तुत मामले में अपीलकर्ता धैया एक अनुसूचित जनजाति की महिला थी जिसके कानूनी उत्तराधिकारी होने के नाते उसके परिजन धैय्या के नाना की संपत्ति में हिस्सा मांग रहे हैं। जिस दावे का परिवार के पुरुष उत्तराधिकारियों द्वारा विरोध किया गया और कहा गया कि आदिवासी रीति-रिवाजों के तहत महिलाओं को उत्तराधिकार से बाहर रखा गया है.अधीनस्थ अदालत, प्रथम अपीलीय जिला अदालत और हाईकोर्ट तीनों ने अपीलकर्ताओं के दावा यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि चूंकि अपीलकर्ता महिला उत्तराधिकार की अनुमति देने वाली प्रथा को साबित करने में विफल रहे, इसलिए आदिवासी महिला हिस्से की हकदार नहीं है। 

➡️ सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई-

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस संजय करोल और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई की,समवर्ती निष्कर्षों को दरकिनार करते हुए जस्टिस करोल द्वारा लिखित निर्णय में इस बात पर ज़ोर दिया गया कि 

" किसी भी निषेधात्मक प्रथा के अभाव में समानता कायम रहनी चाहिए। किसी आदिवासी महिला या उसके उत्तराधिकारियों को केवल लिंग के आधार पर संपत्ति में हिस्सेदारी से वंचित करना असंवैधानिक है। इसके अलावा, न्यायालय ने यह भी कहा कि निचली अदालत ने अपीलकर्ताओं से महिलाओं द्वारा उत्तराधिकार की अनुमति देने वाली प्रथा को साबित करने की अपेक्षा करने में गलती की, बजाय इसके कि विरोधी पक्ष को ऐसी उत्तराधिकार पर रोक साबित करने की आवश्यकता हो।"

न्यायालय ने कहा,

 “वर्तमान मामले में यदि निचली अदालत के विचार मान्य होते हैं तो किसी महिला या उसके उत्तराधिकारियों को इस प्रथा में ऐसी विरासत के सकारात्मक दावे के अभाव के आधार पर संपत्ति के अधिकार से वंचित कर दिया जाएगा। हालांकि, प्रथाएं भी कानून की तरह समय के बंधन में नहीं रह सकतीं। दूसरों को प्रथाओं की शरण लेने या उनके पीछे छिपकर दूसरों को उनके अधिकार से वंचित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।” 

न्यायालय ने आगे टिप्पणी की,

" यह सच है कि अपीलकर्ता-वादी द्वारा महिला उत्तराधिकार की ऐसी कोई प्रथा स्थापित नहीं की जा सकी, लेकिन फिर भी यह भी उतना ही सत्य है कि इसके विपरीत कोई प्रथा भी ज़रा भी सिद्ध नहीं की जा सकी, और न ही उसे सिद्ध किया जा सका। ऐसी स्थिति में धैया (आदिवासी महिला) को उसके पिता की संपत्ति में उसके हिस्से से वंचित करना, जब प्रथा मौन हो, उसके अपने भाइयों या उसके कानूनी उत्तराधिकारियों के अपने चचेरे भाई के साथ समानता के अधिकार का उल्लंघन होगा।” निषेधात्मक प्रथा के अभाव में महिला आदिवासी को उत्तराधिकार से वंचित करना अनुच्छेद 15 का उल्लंघन है। 

अदालत ने कहा, 

"ऐसा प्रतीत होता है कि केवल पुरुषों को ही अपने पूर्वजों की संपत्ति पर उत्तराधिकार प्रदान किया गया है और महिलाओं को नहीं किया गया है, उसके लिए कोई तर्कसंगत संबंध या उचित वर्गीकरण नहीं है, खासकर उस स्थिति में जब कानून के अनुसार इस तरह का कोई निषेध प्रचलित नहीं दिखाया जा सकता। अनुच्छेद 15(1) में कहा गया कि राज्य किसी भी व्यक्ति के साथ धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव नहीं करेगा। यह अनुच्छेद 38 और 46 के साथ संविधान के सामूहिक लोकाचार की ओर इशारा करता है, जो यह सुनिश्चित करता है कि महिलाओं के साथ कोई भेदभाव न हो।" 

 इस प्रकार अदालत ने अपील को स्वीकार करते हुए धैया के कानूनी उत्तराधिकारी अपीलकर्ताओं को संपत्ति में समान हिस्सा प्रदान किया। 

Case Title: 

RAM CHARAN & ORS. VERSUS SUKHRAM & ORS.

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प्रस्तुति 

शालिनी कौशिक 

एडवोकेट 

कैराना (शामली )

गुरुवार, 10 जुलाई 2025

खेती की जमीन और बेटी

 


बेटियों के अधिकारों लिए आरम्भ से लेकर आज तक बहुत से संघर्ष किये गए और बहुत से फैसले लिए गए. उन सभी को देखते हुए 2005 में हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम में जो बदलाव का निर्णय देश के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिया गया उसे मील का पत्थर, यदि कहा जाये तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी.

     माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा 2005 में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम में एक महत्वपूर्ण बदलाव किया गया। जिसके अंतर्गत बेटियों को पिता की पैतृक संपत्ति में बराबर का हिस्सा देने का प्रावधान किया गया। इससे पहले बेटियों को शादी के बाद पिता की सम्पत्ति में अधिकार प्राप्त नहीं होता था. किन्तु अब बेटी को विवाह के बाद भी बेटे जितना हक सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रदान कर दिया गया है.

➡️ अब खेती पर भी बेटियों का अधिकार-

 खेती की जमीन पर बेटियों का कोई अधिकार नहीं होता था. भारत के कई राज्यों में खेती की जमीन में बेटियों को अधिकार नहीं दिया जाता था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 2020 और फिर 2024 में बेटियों को खेती की जमीन में भी बेटों के बराबर हिस्सा प्राप्त करने का अधिकार दे दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों को भी इस भेदभाव को खत्म करने का निर्देश जारी किया है.

➡️ विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा (2020) केस में सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला-

विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा, हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 के तहत बेटियों के सहदायिक अधिकारों से संबंधित एक ऐतिहासिक मामला था। इस मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि संशोधन से पहले या बाद में जन्मी बेटियां, बेटों के समान, संयुक्त परिवार की संपत्ति में सहदायिक (coparcener) होंगी. 

यह मामला 2005 के हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम की व्याख्या से संबंधित था, जो बेटियों को बेटों के समान सहदायिक अधिकार देता है. विशेष रूप से, यह सवाल था कि क्या संशोधन से पहले जन्मी बेटियां, बेटों के समान, संयुक्त परिवार की संपत्ति में सहदायिक अधिकार प्राप्त कर सकती हैं. 

सर्वोच्च न्यायालय ने 11 अगस्त, 2020 को फैसला सुनाया कि संशोधन पूर्वव्यापी रूप से लागू होगा, जिसका अर्थ है कि यह 1956 में अधिनियम के लागू होने की तारीख से लागू होगा. इसका मतलब है कि संशोधन से पहले या बाद में जन्मी बेटियां, बेटों के समान, संयुक्त परिवार की संपत्ति में सहदायिक अधिकार प्राप्त करेंगी. 

इस फैसले का हिंदू परिवारों में लैंगिक समानता और संपत्ति के अधिकारों पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा है. 

✒️ विनीता शर्मा केस का पूर्वव्यापी प्रभाव:-

🌑 2005 का संशोधन पूर्वव्यापी रूप से लागू होगा. 

🌑 बेटियों को सहदायिक अधिकार:

🌑 संशोधन के बाद, बेटियां बेटों के समान सहदायिक होंगी. 

🌑 समान अधिकार:

बेटियों को बेटों के समान संपत्ति पर अधिकार प्राप्त होंगे. 

इस फैसले ने हिंदू कानून में लैंगिक समानता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है. 2020 में विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा केस में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कह दिया है कि बेटियों को पैतृक संपत्ति में जन्म से ही बराबर का हक मिलेगा, भले ही पिता की मृत्यु 2005 से पहले हुई हो या बाद में। इस फैसले ने बेटियों के अधिकार को और मजबूत किया.यह मामला भारत के कानूनी इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ है, क्योंकि इसने हिंदू कानून में लैंगिक समानता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है. 

( बेटियों को अपना अधिकार प्राप्त करने के लिए कानूनी रूप से क्या कदम उठाने होंगे, ये जानने के लिए जुड़े रहिये कानूनी ज्ञान ब्लॉग से और यदि और कोई भी कोई समस्या या जिज्ञासा हो तो ब्लॉग के कमेंट सेक्शन में जाकर टिप्पणी करें ) 

धन्यवाद 🙏🙏

द्वारा 

शालिनी कौशिक 

एडवोकेट 

कैराना (शामली )

सोमवार, 9 जून 2025

सशक्त नारी -बिगड़ता समाज



आख़िरकार वही हुआ जो बिल्कुल भी नहीं होना चाहिए था. आज तक पुरुष पर दरिंदगी के आरोप लगते रहे किन्तु आज की भारतीय नारी ने पिछले कुछ समय से यह साबित करके दिखा ही दिया है कि वह पुरुषो से किसी भी मामले मे पीछे नहीं है. अपने सकारात्मक स्वरुप से नारी देवी का स्वरुप तो सृष्टि के आरम्भ से ही दिखाती आ रही थी किन्तु वह राक्षसी भी हो सकती है, चुड़ैल भी हो सकती है यह आधुनिकता की ओर बढ़ते नये भारत में ही नजर आया है.

      लड़कियों के लिए तो आधुनिक सामाजिक संस्कृति के आरम्भ से ही विवाह मौत का द्वार बनता रहा है दहेज़ के दानव के कारण, किन्तु लड़कों को नहीं पता था कि एक दिन शादी करना उनके लिए भी मृत्यु के घाट उतरने के समान ही हो जायेगा. अभी तो भारतीय संस्कृति मुस्कान द्वारा किये गए सौरभ के टुकड़ों पर ही आंसू बहाकर शांत नहीं हुई थी कि भारतीय संस्कृति को धक्का पहुँचाने वाली सोनम और निकल आई.

        भारतीय संस्कृति में पत्नी हमेशा पति की प्रेरणा, जीवन रक्षक रही है. पति की मंगलकामना के लिए पत्नियों ने हर कष्ट को सहा है, हर संकट का सामना किया है. सोनम और राजा रघुवंशी की शादीशुदा जिंदगी की शुरुआत जिस माह में हुई वह एक ऐसा पवित्र माह है जिसकी अमावस्या को सुहागन नारियां सावित्री द्वारा अपने पति सत्यवान के प्राण यमराज तक से ले आने की कथा कहते हुए वट सावित्री व्रत रखती हैँ और अपने पति के दीर्घायु होने की प्रार्थना करती हैं, ऐसे पवित्र ज्येष्ठ मास में सोनम ने सावित्री के आदर्श को तोड़ा है, वह पति जो पत्नी की बात और उसका मन रखते हुए बिना किसी पूर्व योजना के हनीमून पर जाता है, माँ उमा रघुवंशी की सीख को एक ओर रख पत्नी सोनम की भावना की कदर करते हुए उसके कहने पर सोने की चेन पहनकर जाता है. उसे इस तरह से धोखे में रखकर, सुपारी देकर उसकी हत्या को अंजाम देकर भारतीय नारी की सृष्टि के आरम्भ से चली आ रही 

"यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता." 

      के सत्य को मिथक साबित किया है. यही नहीं सोनम ने गलत साबित कर दिया है उस सोच को, जिसे केरल हाई कोर्ट की खंडपीठ ने एक निर्णय में पत्नी के देवी स्वरुप को ऊपर रखते हुए सम्मान देते हुए कहा कि 

"पति को बचाते हुए पत्नी द्वारा केस वापस लेना असामान्य नहीं."

केरल हाई कोर्ट के जस्टिस देवन रामचंद्रन और जस्टिस एम. बी. स्नेहलता की खंडपीठ ने पत्नी की महानता पर टिप्पणी करते हुए कहा कि, "एक स्त्री अपने वैवाहिक जीवन और परिवार की रक्षा के लिए क्षमा करती है और सहन करती है। यह क्षमा कोई निष्क्रिय क्रिया नहीं, बल्कि एक सक्रिय और परिवर्तनकारी कार्य है, जो भावनात्मक घावों को भरने और आंतरिक शांति प्राप्त करने का माध्यम बनता है। यह महिला की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी आंतरिक शक्ति का प्रमाण है, जिससे वह कटुता और प्रतिशोध की श्रृंखला को तोड़ती है।"

     बहुत गहरे हैँ वे घाव जो आज की ये बेटियां- सूर्पनखा का रूप धारण कर अपने परिवार को, पति को, बेटे बेटियों को पहुंचा रही हैँ. ये आधुनिक शिक्षा द्वारा भरे जा रहे वे कुसंस्कार ही कहे जा सकते हैँ जो भारतीय नारी को सीता की जगह सूर्पनखा बना रहे हैँ. एक तरफ सीता ने अपने पति का साथ देने के लिए राजसी ठाठ बाट तक त्यागकर वनों की कंटीली धरती पर नंगे पैर चलना स्वीकार किया और एक सूर्पनखा थी जिसने अपनी कलुषित वासना के लिए अपने भाई रावण, कुम्भकर्ण और भाई के एक लाख पूत, सवा लाख नातियों को युद्ध की भेंट चढ़वा कर सोने की लंका नगरी को श्मशान मे तब्दील करा दिया. ऐसे मे आज की शिक्षा व्यवस्था पर यह कलंक आएगा ही आएगा कि वह हमारी बेटियों को क्या पढ़ा रही है जो भारतीय नारी के दैवीय संस्कार छीन कर उन्हें राक्षसी स्वरूप में ढाल रही है. आज यह भारतीय शिक्षा की कमियां ही हैँ जो मुस्कान और सोनम के रूप में कातिल पत्नियां उभरकर सामने आ रही हैँ और हिंदी फ़िल्म के इस गाने की पंक्ति को सत्य साबित कर रही हैँ -

"शादी से पहले करती हैँ अक्सर प्रेम कँवारियाँ,

चक्कर खा गए हम तो रे भईया देख शहर की नारियाँ.

रामा ओ रामा!

द्वारा 

शालिनी कौशिक 

एडवोकेट 

कैराना (शामली )

सोमवार, 19 मई 2025

महिलाओं की सखी -वन स्टॉप सेंटर


(वन स्टॉप सेंटर-कानूनी ज्ञान)

वन स्टॉप सेंटर (OSC) हिंसा से प्रभावित महिलाओं को एक ही जगह पर विभिन्न सहायता सेवाएं प्रदान करने के लिए स्थापित एक एकीकृत केंद्र है। यह केंद्र महिलाओं को तत्काल और गैर-आपातकालीन दोनों प्रकार की सहायता प्रदान करता है, जिसमें चिकित्सा, कानूनी, मनोवैज्ञानिक परामर्श और आश्रय शामिल हैं. 

➡️ OSC के उद्देश्य:-
1️⃣ हिंसा से प्रभावित महिलाओं और बालिकाओं को तत्काल और गैर-आपातकालीन सहायता प्रदान करना।
2️⃣ पीड़ित महिलाओं को एक ही छत के नीचे चिकित्सा, कानूनी, मनोवैज्ञानिक और परामर्श सहायता प्रदान करना। 
3️⃣ हिंसा से प्रभावित महिलाओं को सशक्त और आत्मनिर्भर बनाना।
4️⃣ हिंसा से पीड़ित महिलाओं के लिए न्याय और सुरक्षा सुनिश्चित करना।

➡️ OSC में प्रदान की जाने वाली सेवाएं:-
1️⃣ आश्रम (अस्थायी आश्रय): 
पीड़ित महिलाओं को तत्काल सुरक्षित आश्रय प्रदान किया जाता है।
2️⃣ पुलिस डेस्क: 
पीड़ित महिलाएं पुलिस को अपनी शिकायत दर्ज करा सकती हैं।
3️⃣ कानूनी सहायता: 
पीड़ित महिलाओं को कानूनी परामर्श और सहायता प्रदान की जाती है।
4️⃣ चिकित्सा सहायता: 
पीड़ित महिलाओं को चिकित्सा परामर्श और उपचार प्रदान किया जाता है।
5️⃣ मनोवैज्ञानिक परामर्श: 
पीड़ित महिलाओं को मनोवैज्ञानिक परामर्श और समर्थन प्रदान किया जाता है।
6️⃣ सामाजिक परामर्श:
पीड़ित महिलाओं को सामाजिक परामर्श और सहायता प्रदान की जाती है।
7️⃣ सहायता समूहों का संचालन: 
पीड़ित महिलाओं को अपने अनुभवों को साझा करने और एक-दूसरे का समर्थन करने के लिए सहायता समूह प्रदान किए जाते हैं।
8️⃣ प्रशिक्षण और विकास कार्यक्रम:
पीड़ित महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए प्रशिक्षण और विकास कार्यक्रम प्रदान किए जाते हैं।

OSC भारत सरकार द्वारा हिंसा से प्रभावित महिलाओं की सहायता के लिए शुरू की गई एक योजना है. इस योजना का उद्देश्य महिलाओं को सशक्त बनाना, उन्हें न्याय दिलाना और उनके जीवन को सुरक्षित बनाना है

 इस प्रकार किसी भी प्रकार की हिंसा से पीड़ित महिलाएं 181 हेल्पलाइन नंबर पर कॉल कर वन स्टॉप सेंटर की मदद ले सकती हैँ.

प्रस्तुति 
शालिनी कौशिक 
एडवोकेट 
 कैराना (शामली )

शुक्रवार, 2 मई 2025

ल़डकियों में बढ़ती मर्दानगी

  


     नारी सशक्तिकरण के लिए प्राचीन भारत से ही एड़ी से लेकर चोटी तक का जोर लगाया गया. नारी शक्ति के अधिकारों को लेकर बहुत लड़ाइयाँ लड़ी गई, कितनी ही महिलाओं ने सशक्तिकरण के क्षेत्र में मिसालें भी गढ़ी, दुश्मनों के दांत युद्धों तक में खट्टे कर दिए, देश के विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्री पद से लेकर देश में प्रधान मंत्री पद तक नारी शक्ति ने अपना लोहा मनवाया किन्तु जो हाल आज की महिला शक्ति ने कर दिखाया है वह वास्तव में हैरत अंगेज है. आज की महिला शक्ति ने विशेषकर पत्नी स्वरुप ने अपने पतियों का खासकर विवाहित धर्म में प्रवेश करने जा रहे लड़कों की दिमागी स्थिति का संतुलन गड़बड़ा दिया है. लड़के शादी करने से डर रहे हैं, कितने ही लड़की के नाम से दूर भाग रहे हैं. क्या क्या खतरनाक चल रहा है आजकल, इस की एक झलक 

➡️ पहले देखिए कुछ आजकल के समाचार - 

1-आज तक - 20 मार्च 2025 - मुस्कान और साहिल ने चाकू से किया हमला, उस दिन रात को जैसे ही सौरभ अपने कमरे में सोने गया, मुस्कान ने साहिल को बुला लिया. इसके बाद पहले मुस्कान ने सौरभ के सीने पर तेजधार खंजर से वार किया और फिर साहिल चाकू लेकर सौरभ पर टूट पड़ा. सौरभ पूरी ताकत से लड़ने की कोशिश कर रहा था, लेकिन वो हार गया. मुस्कान उसकी मौत का तमाशा देखती रही. कुछ ही मिनटों में सौरभ की सांसें थम चुकी थी.कत्ल के बाद अब लाश ठिकाने लगाने की बारी थी. तो उसकी प्लानिंग भी पहले से हो चुकी थी. इसके बाद साहिल और मुस्कान ने मिलकर एक प्लास्टिक का बड़ा ड्रम खरीदा. फिर उन दोनों ने बाथरूम में सौरभ की लाश के टुकड़े किए और उस बड़े ड्रम में भर दिए. फिर उस ड्रम को सीमेंट का घोल डालकर भर दिया. यानी वो ड्रम सौरभ की ठोस कब्र बन चुका था.

2-दैनिक भास्कर - 19 फरवरी 2025 - मुजफ्फरनगर में शादी के दिन ब्यूटी पार्लर में सजने गई डॉक्टर दुल्हन अपनी महिला मित्र के साथ फरार हो गई। जब रात 9 बजे तक नहीं लौटी तो परिजनों ने कहा- कि ब्यूटी पार्लर में हार्टअटैक आने से दुल्हन की मौत हो गई।किसी ने दुल्हन की मौत की सूचना पुलिस को दे दी। पुलिस ने परिजनों से पूछताछ की तो घर वाले बार-बार बयान बदल रहे थे। पुलिस ने शव का पोस्टमॉर्टम करवाने के लिए कहा तो परिवार मना करने लगा। शव दिखाने के लिए तैयार नहीं था। तब पुलिस ने ब्यूटी पार्लर का CCTV चेक किया।CCTV में डॉक्टर दुल्हन अपनी महिला मित्र के साथ जाती नजर आई। पुलिस दोनों को मध्यप्रदेश से पकड़कर ले आई है। नई मंडी कोतवाली में दुल्हन और उसकी महिला मित्र से पूछताछ की जा रही है।

3-हिन्दुस्तान - 2 अप्रैल 2025 - 30 साल के लोकेश मांझी रेलवे विभाग में लोको पायलट के पद पर तैनात हैं। उनकी शादी हर्षिता रैकवार नामक लड़की से साल 2023 में हुई थी। उन्होंने एसपी ऑफिस पहुंचकर गुहार लगाई है कि मेरी पत्नी मुझे मारती है। मुझे बचाओ साहब। पीड़ित ने इस पूरी घटना का एक वीडियो भी बनाया है, जिसे पुलिस को सौंपा है। यह वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है।

4-आज तक - 16 अप्रैल 2025 - यह कोई बॉलीवुड की रोमांटिक-कॉमेडी फिल्म नहीं, बल्कि हकीकत है. मेरठ जिले के दौराला थाना क्षेत्र में ऐसा हुआ है. सोमवार की शाम बारात आने वाली थी. युवती की शादी रोहटा क्षेत्र के एक युवक से तय हुई थी. दुल्हन शादी से कुछ घंटे पहले मेकअप कराने के लिए दौराला के एक ब्यूटी पार्लर गई थी. जैसे ही मेकअप पूरा हुआ, दुल्हन वहीं बाहर खड़ी बाइक पर बैठे अपने प्रेमी के साथ भाग निकली.

5-दैनिक भास्कर - 16 अप्रैल 2025 - संगीता ने अपने पति को कैसे मारा, ये जानिए…बॉयफ्रेंड पति को बाइक पर लेकर गया, मार डाला संगीता के अपराध की कहानी 25 फरवरी, 2025 को शुरू होती है। जानी इलाके के गांव कुसेड़ी के जंगल में एक युवक की लाश मिली। उसके पास से जो पेपर मिले, उससे सामने आया कि वह अजय उर्फ बिट्‌टू (28) है। वह देहरादून में जॉब करता था। मेरठ में अपने ताऊ के पोते की शादी में शामिल होने आया था।पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में सिर और चेहरे को भारी चीज से कुचलने की बात सामने आई। सिर की हड्‌डी टूट गई थी। जांच शुरू हुई। परिवार के सदस्यों की मोबाइल कॉल डिटेल में पत्नी संगीता पर शक गहराया। उसने एक खास नंबर पर लगातार और लंबी बातचीत की थी। इस नंबर की लोकेशन गाजियाबाद में मिली। यह नंबर अवनीश था, जो उसका रिश्तेदार था। अवनीश को पकड़े जाने के बाद संगीता के साथ उसका अफेयर भी सामने आया।

7-दैनिक जागरण - 17 अप्रैल 2025 - मेरठ के बहसूमा में अमित की हत्या उसकी पत्नी रविता और उसके प्रेमी ने मिलकर की थी। रविता का गांव के ही युवक से प्रेम प्रसंग चल रहा था जिस कारण अमित से उसका विवाद होता था। हत्या के बाद उन्होंने एक हजार रुपये में सांप खरीदकर अमित की कमर के नीचे रख दिया ताकि सर्पदंश से मौत लगे। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गला दबाने से मौत की पुष्टि हुई।

8-अमर उजाला -(अलीगढ़) - 18 अप्रैल 2025 - यूपी में सास और होने वाले दामाद की लव स्टोरी अलीगढ़ और आस-पास के इलाकों में सुर्खियां बनी है। गुरुवार को थाने में रोते हुए मासूम बेटा बोला कि मां घर चल... इस पर होने वाले दामाद संग गई सपना ने मुंह फेर लिया। सात साल के बेटे के आंसू भी सपना के दिल को नहीं पिघला सके।

         महर्षि तुलसीदास जी ने कहा है -

" महावृष्टि चलि फूट कियारी। जिमि स्वतंत्र होई विगरहि नारी।"

अर्थात जैसे भारी बारिश से खेतों की क्यारियाँ फूट जाती हैं, उसी तरह से स्वतंत्र होने पर स्त्रियाँ बिगड़ जाती हैं. सही साबित कर रही है आज की नारी महर्षि तुलसीदास जी की उक्त पँक्तियाँ, नहीं सम्भाल पा रही है आज की नारी स्वयं को मिली हुई यह स्वतंत्रता. आधुनिकता का ज्वर इस कदर हावी है कि आज फ़िल्मों और मॉडलिंग में लगी हुई महिलाओं को तो छोड़ दीजिए, गृहणी कही जाने वाली नारी के शरीर से भी वस्त्र धीरे धीरे कम होते जा रहे हैं, कहाँ महिलाओं के शरीर पर पहने वस्त्रों के ऊपर दुपट्टा, दुशाला एक शान हुआ करता था, एक पहचान हुआ करता था उसके सभ्य, सुसंस्कृत परिवार की बेटी या बहू होने की, किन्तु आज केवल उसके पुरातन होने की, बहनजी होने की उपाधि मात्र रह गए हैं जिसे कोई भी आधुनिक महिला सुनना नहीं चाहती. 

➡️ प्राचीन धार्मिक संस्कार को छोड रही आज की नारी - 

   आज देश में सत्तारूढ़ सरकार, जहां देश में सनातन धर्म, संस्कृति के उत्थान के लिए प्रयासरत है वहीं आज की नारी एक अलग ही लीक पर जा रही है. प्रेम विवाह या लिव इन रिलेशनशिप तो बिल्कुल ही अलग राह हो गई हैं जीने की पर इससे भी ज्यादा बढ़ गया है आज ब्यूटी पार्लर में जाकर दुल्हन के मेकअप का प्रचलन, धार्मिक संस्कार और नारी का गहना शर्म दोनों ताक पर रख दिए गए हैं. हमारे प्राचीन संस्कारों में ये शामिल था कि कँगना बंधने के बाद दूल्हा या दुल्हन वैवाहिक गतिविधि के लिए ही घर से बाहर निकलते थे जिनमे दूल्हे का तो फिर भी ये था कि वह घुड़चढी के लिए घर से निकलता था किंतु दुल्हन कँगना बंधने के बाद केवल शादी के धार्मिक संस्कार पूरे होने पर घर से विदा होने के लिए ही घर से निकलती थी अन्यथा नहीं, किन्तु आज कल एक नया प्रचलन शुरू हो गया है दुल्हन के ब्यूटी पार्लर में तैयार होने का और इसके लिए दुल्हन अपनी एक सहेली या बहन भाई के साथ ब्यूटी पार्लर पर आती है और दुल्हन के रूप में तैयार होकर कार या ई रिक्शा से वापस लौटती है, कई बार तभी ब्यूटी पार्लर के बराबर की दुकान से दुल्हन के रूप में तैयार होकर सामान खरीदने लगती है और कभी कभी दुल्हन के रूप में ही ब्यूटी पार्लर से फुर्र हो जाती है. दुल्हन के रूप में तैयार होने की शर्म का तो अब कहीं नामों निशान ही नहीं रह गया है. इस सब का असर विवाहों के टूटने से लेकर उसके आपराधिक अंत के रूप में नजर आ रहा है किन्तु आधुनिकता में डूब रहा समाज या फिर आज की आधुनिक नारी की कोई सोच इस ओर ध्यान देती नहीं दिखाई देती है. 

➡️ सह शिक्षा डाल रही है गलत असर - 

       आज स्कूल - कॉलिजों में सह शिक्षा का प्रचलन बढ़ गया है और इसका एक सीधा सीधा असर यह दिखाई दे रहा है कि लड़कियों में लड़का बनने की होड़ सी चल पड़ी है. पहले के समय में एक नियम कायदा था कि सडकों पर ज्यादा चुहलबाज़ी नहीं करनी है, कुछ खाना पीना नहीं है. लड़कियां पहले घर से स्कूल जाती थी और स्कूल से सीधे घर आती थी. घर आकर यदि कोई काम होता था तो घर के ही किसी सदस्य के साथ जाकर ले आती थी, किन्तु समय बदला, ये सब पुरातन बातों में शामिल हो गए, इन्हें मानने वाले बैकवर्ड हो गए. अब स्थिति यह हो चुकी है कि लड़कियां पूरी तरह से आजाद हो चुकी हैं. कोई लड़का अगर लड़की के हाथ मार देता है तो उसे पहले बहुत गलत कहा जाता था और अब तो कानून के घेरे में ही ले लिया जाता है किन्तु लड़कियां आते जाते अपने स्कूल के संगी साथियों को पीछे से हाथ मार रही हैं उनका रास्ता रोककर अनाप शनाप बाते सडकों पर कर रही है और हद यह हो गई है कि अब सभ्य समाज के लड़कों को ही लड़की का यह व्यवहारः बर्दाश्त से बाहर हो रहा है. स्कूल की बस से उतरते ही आइसक्रीम खरीदना, उसे सरेराह खाते जाना, शोर मचाते, हुड़दंग करते, खिल्ली उड़ाते जाना आज की लड़कियों का फैशन बन गया है. आज की लड़कियां स्कूटी चला रही हैं, कार चला रही हैं पूरी तरह से लड़कों को कॉपी कर रही हैं. लड़के जिस तरह से स्कूटी चलाते हैं लड़कियां वही स्टाइल कॉपी कर रही है. लड़कियां नौकरी कर रही हैं और सिगरेट, शराब पी रही हैं, रातों में लड़कों के साथ अर्धनग्न अवस्था में घूम रही हैं. लड़कियां रह कहां गई हैं अब तो चारो ओर मर्द ही मर्द, लड़के ही लड़के नजर आते हैं. 

    आधुनिकता का जो रूप आज की लड़कियों ने धारण किया है, उसी का परिणाम चारो ओर लड़कों पर कहर बनकर बरस रहा है. अब लगभग हर दस - पंद्रह लड़कियों में से जिसकी भी शादी तय हो रही है उसका कोई न कोई बॉय फ्रेंड जरूर है क्योंकि कॉलिज लाइफ में अगर लड़कों के लिए गर्ल फ्रेंड का होना शान की बात है तो लड़की का बॉय फ्रेंड होना उसकी पर्सनैलिटी में चार चांद लगाने के लिए जरूरी है. स्थितियां इस कदर बिगड़ती जा रही हैं कि माँ ही बेटी के होने वाले पति को लेकर भाग रही है. लव मैरिज करने वाली अपने प्रेमी पति से ही अलग नया प्रेमी ढूंढ रही हैं और प्रेमी पति के टुकड़े काटकर ड्रम मे भर रही हैं. 4-4  बच्चे वाली अपने बच्चों के साथ या बच्चों को छोड़कर घर से भाग रही हैं, लड़कियां लड़कों से भी छोटे शॉर्ट्स पहनकर सडकों पर हुड़दंग मचा रही हैं और कुंवारी लड़कियाँ ही नहीं शादीशुदा लडक़ियां, दो दो बच्चों की माँ भी शॉर्ट्स टी शर्ट पहने खुलेआम सडकों पर घूम रही हैं और ऐसा नहीं है कि ये अनपढ़, गँवार लड़कियां कर रही है बल्कि ऐसी शर्मनाक घटनाओं को अंजाम वे लड़कियां दे रही हैं जो कहने के लिए वेल क्वालिफाइड हैं, कहने के लिए अच्छे संस्कारी घरों की सन्तान हैं, कहने के लिए बड़ी बड़ी सभाओं में मंच से बढ़ चढ़कर संस्कारों की बातें करती हैं किन्तु व्यक्तिगत जीवन में इनके बिल्कुल विपरीत आचरण दिखाई दे रहे हैं. समाज और वह भी भारतीय हिन्दू समाज आज रोजाना घटित इन नृशंस घटनाओं को देखते हुए यही कहा जा सकता है कि पतन की ओर ही जा रहा है. आज की लड़कियां सशक्तिकरण की जो मिसाल कायम कर रही हैं वह उनका यही एटीट्यूड दिखाती है - 

" वहम निकाल देना ये अपने दिमाग से, 

हम डरने वाले नहीं हैं किसी के बाप से...!!" 


द्वारा 

शालिनी कौशिक 

एडवोकेट 

कैराना (शामली) 




गुरुवार, 1 मई 2025

शादी के समय मिले सोने पर किसका हक

 



 केरल हाइकोर्ट ने हाल ही में शादी में दुल्हन को मिलने वाले सोने को लेकर एक बड़ा फैसला सुनाया है। केरल हाइकोर्ट ने कहा है कि शादी के समय दुल्हन को मिले सोने के आभूषण और नकद महिला की विशेष संपत्ति हैं। उच्च न्यायालय के मुताबिक इन संपत्तियों को 'स्त्रीधन' माना जाएगा।

प्रस्तुति 
शालिनी कौशिक 
एडवोकेट 
कैराना (शामली) 

हिन्दू संस्कार-हिमानी नरवाल

  


     पहलगाम अटैक में धर्म पूछकर गोली से मारे गए करनाल निवासी नेवी के लेफ्टिनेंट विनय नरवाल की पत्नी हिमांशी द्वारा सभी देश वासियों से शांति की अपील की गई है। गुरुवार को लेफ्टिनेंट विनय नरवाल की जयंती थी उस पर विनय के परिवार द्वारा ब्लड डोनेशन कैम्प लगाया गया जिसमें मीडिया द्वारा बात करने पर विनय नरवाल की पत्नी हिमांशी नरवाल ने कहा कि हमें मुस्लिमों और कश्मीरियों को टारगेट नहीं करना चाहिए। हम शांति चाहते हैं, किन्तु 6 दिन पूर्व ही हुई शादी का ऐसा दर्दनाक अंत उनके गुस्से को दबा नहीं सका, उन्होंने यह भी कहा कि इस हमले में शामिल लोगों को सख्त सजा मिले। हिमांशी नरवाल ने कहा, 'इस हमले में जो लोग शामिल हैं, इन्हें सख्त सजा दी जाए। लेकिन हमें मुस्लिमों और कश्मीरियों को टारगेट नहीं करना है।' 

ये होती है एक हिन्दू की सोच - इस छोटी सी बच्ची ने एक मुस्लिम के हाथों बिना किसी रंजिश के, बिना किसी तकरार के अपने 6 दिन पहले पति हुए विनय नरवाल का खून बहते देखा और उसके बाद भी ये इतनी बड़ी बात दिल से कह गई, ये श्री राम की भक्ति की शक्ति ही है जो हर हिन्दू को यह ताकत प्रदान करती है कि वह अपने कड़े से कड़े दुश्मन को भी माफ कर सके. भगवान इस बेटी को यह गहरा दुख सहन करने की शक्ति प्रदान करें और कभी भी किसी भी बेटी के साथ ये अन्याय न करें - जय श्री राम जय हनुमान 🌹🌹🚩 

द्वारा - 

शालिनी कौशिक 

एडवोकेट

कैराना (शामली) 

सोमवार, 14 अप्रैल 2025

महिला हित में अनिवार्य हुआ विवाह पंजीकरण

  


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 विवाह पंजीकरण अब सभी के लिए अनिवार्य 

      हमारा देश परम्परा वादी है, यहां हर धार्मिक अनुष्ठान पारंपरिक रीति-रिवाजों से ही होते आए हैं, और इन्हीं परंपराओं और धार्मिक रीति रिवाज से बंधा हुआ है भारत में विवाह अनुष्ठान, जो परिवार और समाज के लोगों के मध्य अनुष्ठापित किया जाता है जिस कारण यहां शादी का पंजीकरण कराना जरूरी नहीं समझा जाता. आम धारणा यह है कि विदेश में जाने वाले जोड़ों और सिर्फ स्पेशल मैरिज एक्ट यानी विशेष विवाह अधिनियम के तहत की गई शादियों का ही पंजीकरण अनिवार्य होता है।

  इसीलिए अब यह जानना सभी के लिए जरूरी है कि शादी का पंजीकरण करवाना हर विवाहित जोड़े के लिए अब आवश्यक है। हमारे देश में शादी को हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 या विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के अंतर्गत पंजीकृत किया जाता है और मैरिज सर्टिफिकेट इस बात का वैध कानूनी सबूत होता है कि दंपति विवाहित हैं। हिंदू विवाह अधिनियम के अंतर्गत वर के लिए न्यूनतम आयु सीमा 21 वर्ष और वधु के लिए 18 वर्ष है। वहीं, विशेष विवाह अधिनियम के तहत दोनों लिए न्यूनतम आयु सीमा 21 वर्ष है। विवाह रजिस्ट्रेशन या विवाह पंजीकरण भारत में जरूरी सम्भव हुआ है माननीय उच्चतम न्यायालय के आदेश से. माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा फ़रवरी 2006 में फ़ैसला दिया गया था कि भारत में सभी धर्मों के विवाहों का रजिस्ट्रेशन ज़रूरी है. यह फ़ैसला लेने का मुख्य उद्देश्य महिलाओं के अधिकारों की रक्षा थी. इस फ़ैसले के तहत, सभी राज्य सरकारों को तीन हफ़्तों के अंदर इस संबंध में नियम बनाने का निर्देश दिया गया था. जिसमें निम्न जानकारी सभी राज्य सरकारों को उपलब्ध करानी थी-

🌑 विवाह रजिस्ट्रेशन कराने के लिए नियम बनाने से पहले आम जनता से मांगी गई आपत्तियां।

🌑 विवाह रजिस्ट्रेशन के लिए नियम बनाने के बाद, राज्य सरकारों को जारी की गई उचित अधिसूचना। 

🌑 विवाह रजिस्ट्रेशन के लिए कानूनी रूप से नियुक्त अधिकारी। 

🌑 विवाह रजिस्ट्रेशन में वर वधू की आयु और वैवाहिक स्थिति का बताया जाना। 

🌑 विवाह रजिस्ट्रेशन न कराने पर या ग़लत घोषणा पत्र दाखिल करने पर विधिक परिणाम या कानूनी कार्रवाई के बारे में भी प्रावधान करना।

          यह सभी प्रावधान करने का मुख्य कारण एक निर्णय था, जिसे माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा महिला हितार्थ लिया गया था. सिविल वाद में स्थानांतरित याचिका श्रीमती सीमा बनाम अश्विन कुमार (291) मामले में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा पूरे भारत में विवाह पंजीकरण अनिवार्य किया गया.  

प्रस्तुत मामला हरियाणा जनपद न्यायालय की ओर से विवाह पंजीकरण के मुद्दे पर याचिका थी जो राज्यों का मुद्दा थी । अलग अलग राज्यों में विवाह के संबंध में अलग-अलग नियम थे और इस मामले में सम्बन्धित राज्यों के विवाह अधिनियमों का उपयोग किया गया जैसे कि कर्नाटक विवाह (पंजीकरण और विविध प्रावधान) अधिनियम, 1976; असम मुस्लिम विवाह और तलाक पंजीकरण अधिनियम, 1935;  बॉम्बे विवाह पंजीकरण अधिनियम, 1953; हिमाचल प्रदेश विवाह पंजीकरण अधिनियम, 1996; आंध्र प्रदेश अनिवार्य विवाह पंजीकरण अधिनियम, 2002: उड़ीसा मुस्लिम विवाह और तलाक पंजीकरण अधिनियम, 1949। इन सभी को विचारार्थ ग्रहण करने के बाद सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 14 फरवरी 2006 को निर्णय लिया गया और सभी राज्यों को विवाहों को अनिवार्य रूप से पंजीकृत करने और 3 महीने में पंजीकरण की प्रक्रिया के साथ वापस आने के निर्देश दिए गए।

➡️ निर्णय के प्रमुख घटक-

🌒 14 फ़रवरी 2006 को निर्णय देते हुए सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय में निम्नलिखित मुद्दे प्रमुख रहे - 

🌒 सर्वप्रथम सर्वोच्च न्यायालय ने स्वयं का निर्णय लेने का अधिकार उल्लिखित किया। 

🌒 सर्वोच्च न्यायालय ने विवाह में दुर्व्यवहार और बाल विवाह को कम करने के लिए विवाह के पंजीकरण आवश्यक स्थान दिया। 

🌒 सर्वोच्च न्यायालय द्वारा राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निम्नलिखित कार्य करने का निर्देश जारी किया गया - 

 🌑"(i) पंजीकरण की प्रक्रिया आज से तीन महीने के भीतर संबंधित राज्यों द्वारा अधिसूचित की जानी चाहिए। यह मौजूदा नियमों में संशोधन करके, यदि कोई हो, या नए नियम बनाकर किया जा सकता है। हालांकि, उक्त नियमों को लागू करने से पहले आम जनता से आपत्तियां आमंत्रित की जाएंगी। इस संबंध में, राज्यों द्वारा उचित प्रचार किया जाएगा और आपत्तियां आमंत्रित करने वाले विज्ञापन की तारीख से एक महीने तक मामले को आपत्तियों के लिए खुला रखा जाएगा। उक्त अवधि की समाप्ति पर, राज्य नियमों को लागू करने के लिए उचित अधिसूचना जारी करेंगे।

🌑 (ii) राज्यों के उक्त नियमों के तहत नियुक्त अधिकारी विवाहों को पंजीकृत करने के लिए विधिवत अधिकृत होंगे। आयु, वैवाहिक स्थिति (अविवाहित, तलाकशुदा) स्पष्ट रूप से बताई जाएगी। विवाहों का पंजीकरण न कराने या गलत घोषणा दाखिल करने के परिणाम भी उक्त नियमों में दिए जाएंगे।

🌑 यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि उक्त नियमों का उद्देश्य इस न्यायालय के निर्देशों का पालन करना होगा।

🌑 (iii) जब भी केन्द्रीय सरकार कोई व्यापक कानून बनाएगी, उसे जांच के लिए इस न्यायालय के समक्ष रखा जाएगा।

🌑 (iv) विभिन्न राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों के विद्वान वकील यह सुनिश्चित करेंगे कि यहां दिए गए निर्देशों का तत्काल पालन किया जाए।

➡️ उत्तर प्रदेश में विवाह पंजीकरण-

🌑 उत्तर प्रदेश में विवाह पंजीकरण साल 2017 महिला कल्याण विभाग द्वारा दिए गए निर्देशों के पालन में अगस्त 2017 में लागू किया गया . इस नियम के तहत, उत्तर प्रदेश में होने वाली सभी शादियों का पंजीकरण कराना ज़रूरी कर दिया गया है।  

➡️ क्यों ज़रूरी माना विवाह पंजीकरण? 

🌒 बाल विवाह रोकने के लिए। 

🌒 विधवाओं को उत्तराधिकार का दावा करने में सक्षम बनाने के लिए। 

🌒 महिलाओं को पति से भरण-पोषण और बच्चों की अभिरक्षा के अपने अधिकारों का प्रयोग करने में सहायता करना। 

🌒 द्विविवाह या बहुविवाह की जांच करने के लिए

🌒 पतियों को अपनी पत्नियों को छोड़ने से रोकने के लिए। 

➡️ पंजीकरण प्रक्रिया-

🌒 उत्तर प्रदेश में विवाह का पंजीकरण हिन्दू विवाह अधिनियम (1955) या विशेष विवाह अधिनियम (1954) के तहत होता है. 

🌒 आप अधिकारिक वेबसाइट igrsup.gov.in पर जाकर ऑनलाइन पंजाकरण कर सकते हैं. 

🌒 पंजीकरण के बाद, विवाह पंजीकरण प्रमाणपत्र जारी किया जाएगा. 

🌒 यूपी विवाह प्रमाणपत्र प्राप्त करने के लिए, वर और वधू दोनों के आधार नंबर की आवश्यकता होती है.

🌒 पंजीकरण ऑनलाइन या ऑफ़लाइन किया जा सकता है. 

🌒 ऑनलाइन पंजीकरण के लिए, igrsup.gov.in वेबसाइट पर जाएं. 

🌒 ऑफ़लाइन पंजीकरण के लिए, संबंधित विवाह पंजीकरण कार्यालय में जाना होता है. 

🌒 जो युगल शादी कर रहे हैं या पहले से शादीशुदा हैं, वे कोर्ट मैरिज करके अपनी शादी का पंजीकरण करा सकते हैं:

🌑 चरण-1 सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट के कार्यालय में जाएं, जिसके अंतर्गत विवाह हुआ है या जहां दंपति रहते हैं।

🌑 चरण-2 आवेदन पत्र भरें और इस पर पति-पत्नी दोनों हस्ताक्षर करें। आवेदन के दिन ही जमा किए गए सभी दस्तावेजों का सत्यापन किया जाता है। सत्यापन पूरा होने के बाद अप्वॉइंटमेंट के लिए एक दिन तय किया जाता है।

🌑 चरण-3 यदि विवाह, विशेष विवाह अधिनियम के तहत हो रहा है, तो इसमें लगभग 60 दिन लग सकते हैं और हिंदूू विवाह अधिनियम के मामले में, आवेदन के बाद अप्वॉइंटमेंट की तारीख मिलने में लगभग 15 दिन लगेंगे।

🌑 चरण-4 दंपति में से किसी भी पक्ष का कोई भी व्यक्ति, जो विवाह के समय उपस्थित था, विवाह का गवाह हो सकता है। अप्वॉइंटमेंट के दिन, दोनों पक्षों और उनकी शादी में शामिल हुए गवाहों को उपस्थित रहना होगा। विवाह के पंजीकरण के लिए ऑनलाइन विकल्प भी उपलब्ध है। आप अपने राज्य की पंजीकरण वेबसाइट पर ऑनलाइन आवेदन कर  सकते हैं।

➡️ पंजीकरण हेतु ज़रूरी दस्तावेज़-

* आवेदन फॉर्म 

• शादी का कार्ड 

• आयु प्रमाण 

• निवास का प्रमाण 

• पासपोर्ट साइज फोटो 

• 10 रुपये के स्टाम्प पेपर पर निर्धारित प्रारूप में पति और पत्नी दोनों की ओर से अलग-अलग शपथ पत्र। जिसमें सभी जरूरी विवरण हों और जो नोटरी द्वारा सत्यापित हो. 

• यदि पति-पत्नी में से कोई एक तलाकशुदा है तो तलाक का आदेश। 

• यदि पिछले पति या पत्नी की मृत्यु हो गई हो तो मृत्यु प्रमाण पत्र। 

• विवाह के बाद नाम बदलने पर सरकारी राजपत्र की प्रति। 

• यदि पति या पत्नी में से कोई एक विदेशी नागरिक है, तो वैवाहिक स्थिति प्रमाण पत्र। 

• गवाह के लिए भी अपना पैन कार्ड और निवास प्रमाण पत्र जमा करना जरूरी और गवाह दो होने जरूरी। 

➡️ पंजीकरण का मह्त्व-

🌒 विवाह पंजीकरण कराए जाने पर एक प्रमाण पत्र प्राप्त होता है जिसे मैरिज सर्टिफिकेट कहा जाता है.  मैरिज सर्टिफिकेट एक आधिकारिक दस्तावेज होता है जो रजिस्टार के द्वारा जारी किया जाता है, जिसमें तारीख और स्थान के साथ विवाह प्रक्रिया को प्रमाणित किया जाता है ।

🌒 विवाह पंजीकरण प्रमाणपत्र, दंपति के विवाहित होने का कानूनी सबूत होता है.

🌒 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के अधिकारों को सुरक्षित रखने के लिए सभी धर्मों के लोगों के लिए शादी के पंजीकरण को अनिवार्य बना दिया था.

🌒 अगर आप पति के वीजा पर विदेश यात्रा करना चाहती हैंं।

🌒 संयुक्त स्वामित्व की संपत्ति खरीदते समय और संयुक्त रूप से होम लोन के लिए आवेदन करते समय।

🌒 भारत और अन्य देशें के भी दूतावास, पारंपरिक शादियों को मान्यता नहीं देते हैं। विदेशों में शादी को साबित करने के लिए मैरिज सर्टिफिकेट अनिवार्य है।

🌒 संपत्ति के उत्तराधिकार के मामले में कानूनी कार्यवाही आसान होती है।

🌒 यदि जमाकर्ता या बीमाकर्ता की मृत्यु हो जाती है, जिसने किसी व्यक्ति को नामित नहीं किया था तो पति/पत्नी पारिवारिक पेंशन या बैंक जमा या जीवन बीमा लाभ का दावा करने में सक्षम होते हैं।

🌒 अगर आपको शादी के बाद अपना नाम बदलना हो या पासपोर्ट के लिए आवेदन करना हो या बैंक खाता खोलना हो।

🌒 यह दस्तावेज पति या पत्नी को अपने जीवनसाथी द्वारा त्यागे जाने से बचाता है।

🌒 संपत्ति के हस्तांतरण या कानूनी अलगाव के मामले में बच्चों की कस्टडी के लिए।

🌒 इसे वैवाहिक विवादों में मजबूत और वैध सबूत के रूप में भी माना जाता है।

       अगर आप उत्तर प्रदेश के निवासी या नागरिक हैं तो विवाह पंजीकरण से संबंधित अन्य जानकारी के लिए जुड़े रहिए मेरे ब्लॉग "कानूनी ज्ञान" से और कोई जिज्ञासा हो तो झटपट कमेन्ट सेक्शन में जाकर पूछ डालिए अपना सवाल, जवाब अवश्य दिया जाएगा. धन्यवाद 🙏🙏

प्रस्तुति 

शालिनी कौशिक 

एडवोकेट 

कैराना (शामली) 





सोमवार, 24 मार्च 2025

महिलाओ का लैंगिक उत्पीड़न है ये

 


     भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 75 लैंगिक उत्पीड़न को दण्डनीय अपराध घोषित करती है. इसमे कहा गया है कि 

➡️धारा 75. लैंगिक उत्पीड़न.- 

(1) ऐसा कोई निम्नलिखित कार्य, अर्थात् :-

(i) शारीरिक संस्पर्श और अग्रक्रियाएं करने, जिनमें अवांछनीय और लैंगिक संबंध बनाने संबंधी स्पष्ट प्रस्ताव अन्तर्वलित हों; या

(ii) लैंगिक स्वीकृति के लिए कोई मांग या अनुरोध करने; या

(iii) किसी महिला की इच्छा के विरुद्ध अश्लील साहित्य दिखाने; या

(iv) लैंगिक आभासी टिप्पणियां करने,

वाला पुरुष लैंगिक उत्पीड़न के अपराध का दोषी होगा।

(2) ऐसा कोई पुरुष, जो उपधारा (1) के खण्ड (i) या खण्ड (ii) या खण्ड (iii) में विनिर्दिष्ट अपराध करेगा, वह कठिन कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।

(3) ऐसा कोई पुरुष, जो उपधारा (1) के खण्ड (iv) में विनिर्दिष्ट अपराध करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।

            दो दिन पूर्व ही बॉम्बे हाई कोर्ट अपने निर्णय में कहा कि किसी महिला सहकर्मी के बालों के बारे में टिप्पणी करना और उस पर गीत गाना कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न नहीं माना जा सकता और यह कहते हुए एचडीएफसी बैंक के अधिकारी को राहत दे दी. 

           इससे एक दिन पूर्व ही इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा दुष्कर्म के प्रयास के आरोपी को राहत देते हुए विवादित निर्णय दिया गया जिसने पूरे देश में महिला आयोग और महिला मंत्रियों तक को महिलाओं की सुरक्षा हेतु आवाज़ उठाने के लिए विवश कर दिया. पीड़िता का ब्रेस्ट पकड़ना और नाड़ा तोड़ना दुष्कर्म या दुष्कर्म का गम्भीर प्रयास माना जाएगा या नहीं, इस पर तो बहस सारे देश में छिड़ी हुई ही थी, साथ ही, अब बहस "लैंगिक उत्पीड़न क्या है?" पर भी छिड़ने जा रही है.

➡️ लैंगिक उत्पीड़न क्या है - 

     लैंगिक उत्पीड़न, यौन प्रकृति का कोई भी अवांछित व्यवहार है जिससे किसी व्यक्ति को अपमानित, भयभीत या असुरक्षित महसूस हो. यह लैंगिक असमानता का एक रूप है. यह भेदभाव और हिंसा का भी एक रूप है. 

➡️लैंगिक उत्पीड़न के कुछ उदाहरण: 

*किसी को गलत तरीके से घूरना या तिरछी नज़र से देखना

*किसी की शारीरिक विशेषताओं या तौर-तरीकों के बारे में लिंग-संबंधी टिप्पणी करना

*किसी को धमकाने के लिए यौन या लिंग-संबंधी टिप्पणी या आचरण का इस्तेमाल करना

*यौन अफ़वाहें फैलाना

*यौन प्रस्ताव देना

*यौन चुटकुले सुनाना

*अश्लील साहित्य दिखाना

*किसी को कामुक या लिंग-विशिष्ट तरीके से कपड़े पहनाना

*किसी को डराने-धमकाने वाला माहौल बनाना

➡️लैंगिक उत्पीड़न का दुष्प्रभाव-

लैंगिक उत्पीड़न किसी भी लिंग, यौन अभिविन्यास, जाति, जातीयता, सामाजिक-आर्थिक स्थिति, या धर्म के लोगों को प्रभावित कर सकता है. 

        अब जब हम भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 75(1) की उपधारा (iv) का अवलोकन करते हैं तो पाते हैं कि उसमे (iv) लैंगिक आभासी टिप्पणियां करने वाले पुरुष को लैंगिक उत्पीड़न के अपराध का दोषी माना गया है और जब हम लैंगिक उत्पीड़न के कुछ उदाहरण देखते हैं तो उसमें किसी की शारीरिक विशेषताओं या तौर-तरीकों के बारे में लिंग-संबंधी टिप्पणी करने को लैंगिक उत्पीड़न कहा गया है. 

    अब एक नजर प्रस्तुत मामले में निर्णय की ओर ले जाते हैं जिसमें जस्टिस संदीप मानें ने कहा कि यदि याचिकाकर्ता के खिलाफ आरोप सही भी माने जाएं, तो भी उनसे यौन उत्पीड़न पर कोई ठोस निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। पुणे स्थित एचडीएफसी बैंक के एसोसिएट क्षेत्रीय प्रबंधक विनोद कछावे को बैंक की आंतरिक शिकायत समिति ने कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न रोकथाम कानून के तहत कदाचार का दोषी ठहराया था। वहीं, याची के वकील ने कहा, कछावे ने महिला से सिर्फ यही कहा था कि वह बाल संवारने के लिए जेसीबी का इस्तेमाल कर रही होगी।

     ऐसे में एक महिला के बालों को उसकी शारीरिक विशेषता के रूप में स्वीकार करते हुए जब लैंगिक उत्पीड़न के उदाहरण इस टिप्पणी को लैंगिक उत्पीड़न की भाषा में शामिल कर रही है तो बॉम्बे हाई कोर्ट का यह निर्णय भी उसी तरह से विवादास्पद कहा जाना चहिये जिस तरह से इलाहाबाद हाई कोर्ट का दुष्कर्म के प्रयास को नकारने का निर्णय विवादों की एक कड़ी बनकर रह गया है. 

     पुरुषों द्वारा महिलाओं पर लैंगिक टिप्पणी करना उनकी रोज की आदत में शुमार है और फिर जब महिला उनकी सहकर्मी हो तो यह एक तरह से वे अपने हक में शामिल कर लेते हैं. अभी हाल ही में दिल्ली विधान सभा के चुनाव में एक राजनेता रमेश बिधूड़ी कहते हैं, 'लालू ने वादा किया था कि बिहार की सड़कों को हेमा मालिनी के गालों जैसा बना दूंगा, लेकिन वे ऐसा नहीं कर पाए। मैं आपको विश्वास दिलाता हूं, जैसे ओखला और संगम विहार की सड़कें बना दी हैं, वैसे ही कालकाजी में सारी की सारी सड़कें प्रियंका गांधी के गाल जैसी बना दूंगा।' 

       इस तरह अगर न्यायालयों द्वारा महिला के सम्मान पर हुए लैंगिक टिप्पणी के मुद्दे को यूँ ही हल्की बात समझकर हवा में उड़ाया जाता रहा तो महिलाओं के लिए सार्वजनिक जीवन में उतरकर कार्य करना बहुत ही कठिन हो जाएगा. अपने सम्मान को ठेस पहुंचाने वाले के खिलाफ उतरना एक महिला के लिए, वो भी जब वह भारतीय हो, बहुत मुश्किल होता है. रूपम देओल बजाज होना और के पी एस गिल जैसे बड़े अधिकारी को सजा दिलवाना आसान नहीं होता, इसके लिए न्याय व्यवस्था का महिला के साथ मजबूत सहयोग जरूरी है. 

द्वारा 

शालिनी कौशिक 

एडवोकेट 

कैराना (शामली)