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शुक्रवार, 16 जनवरी 2015

* घूंघट की दीवारों में !*


* घूंघट की दीवारों  में !*
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क्यों कैद किया औरत को ?
घूंघट की दीवारों  में ,
घुटती है ; सिसकती है ,
घूंघट की दीवारों  में !
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कुछ कर के दिखाने की ;
उसकी भी तमन्ना थी ,
दम  तोड़ रही हर चाहत ;
घूंघट की दीवारों  में !
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मुरझाया सा दिल लेकर ;
दिन-रात भटकती है ,
हाय कितना अँधेरा है !
घूंघट की दीवारों  में !
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घूंघट जो उठाया तो ;
बदनाम न हो जाये ,
डर-डर के रोज़ मरती है ;
 घूंघट की दीवारों  में !
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क्या फूंकना औरत को ;
मरघट पे है ले जाकर ,
जल-जल के खाक होती है ;
घूंघट की दीवारों  में !

शिखा कौशिक 'नूतन'