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सोमवार, 30 दिसंबर 2013

नव वर्ष के लिए एक ग़ज़ल...व एक गीत ..... डा श्याम गुप्त ...

                          नववर्ष पर नव-आशा, नव-विचार युत ....मानव संस्कृति व संस्कार के मूल .....प्रेम व  संसृति की नाभि -रूप हेतु प्रस्तुत है एक गीत व एक ग़ज़ल......

एक ग़ज़ल------उन के अश्कों को...



              ग़ज़ल.....
उन के अश्कों को पलकों से चुरा लाये हैं |
उनके गम को हम खुशियों से सजा आये हैं

आप मानें या न मानें यह तहरीर मेरी ,
उनके अशआर ही ग़ज़लों में उठा लाये हैं|

उस दिए ने ही जला डाला आशियाँ मेरा ,
जिसको बेदर्द हवाओं से बचा लाये हैं |

याद करने से भी दीदार न होता उनका,
इश्क में यूंही तड़पने की सजा पाए हैं|

प्यार में दर्द का अहसास कहाँ होता है,
प्यार में ज़ज्ब दिलों को ही जख्म भाये हैं|

प्रीति है भीनी सी बरसात, क्या आलम कहिये,
रूह क्या अक्स भी आशिक का भीग जाए है|

श्याम करते हैं सभी शक मेरे ज़ज्वातों पे,
हम से ही दर्द के नगमे जहां में आये हैं||

                                     --- चित्र गूगल साभार....   

... और एक गीत ....ये दुनिया हमारी सुहानी न होती.....





ये दुनिया हमारी सुहानी न होती,  
कहानी ये अपनी कहानी न होती ।
ज़मीं चाँद -तारे सुहाने न होते
जो प्रिय तुम न होते, अगर तुम न होते।

न ये प्यार होता, ये इकरार होता
न साजन की गलियाँ, न सुखसार होता।
ये रस्में न क़समें, कहानी न होतीं
ज़माने की सारी रवानी न होती ।

हमारी सफलता की सारी कहानी
तेरे प्रेम की नीति की सब निशानी ।
ये सुंदर कथाएं फ़साने न होते
सजनि! तुम न होते,जो सखि!तुम न होते ।

तुम्हारी प्रशस्ति जो जग ने बखानी
कि तुम प्यार-ममता की मूरत-निशानी ।
ये अहसान तेरा सारे जहाँ पर
 तेरे त्याग-दृड़ता  की सारी कहानी ।

ज़रा सोचलो कैसे परवान चढ़ते
हमीं जब न होते, जो यदि हम न होते।
हमीं हैं तो तुम हो सारा जहाँ है
जो तुम हो तो हम है, सारा जहाँ है।

अगर हम न लिखते, अगर हम न कहते
भला गीत कैसे तुम्हारे ये बनते।
किसे रोकते तुम, किसे टोकते तुम
ये इसरार इनकार, तुम कैसे करते ।

कहानी हमारी-तुम्हारी न होती
न ये गीत होते, न संगीत होता।
सुमुखि! तुम अगर जो हमारे न होते
 सजनि! जो अगर हम तुम्हारे न होते॥



                                                              ----- चित्र ..डा श्याम गुप्त  





बुधवार, 18 जनवरी 2012

बदल गए... डा श्याम गुप्त की ग़ज़ल...

ऋतुएँ  बदल गयीं , मौसम  बदल गए ।
कुछ तुम बदल गए, कुछ हम बदल गए।

नयनों में नक्श आज हैं क्यों ये नए नए ।         
क्यों हम बदल गए क्यों तुम बदल गए ।

 हम बढ़ चले थे आपकी राहों में जाने जाँ,
चाहों में हम थे आप क्यों राहें बदल गए ।

तुम को न बदलना था, हम को न बदलना था ,
जब  तुम  बदल गए,  हम  भी  बदल गए ।

यूं बहके जमाने के कदम, उन्नति की राह में ,
रिश्ते   बदल  गए,   नाते  बदल  गए ।

इस दौरे भागम-भाग की क्या दास्ताँ कहें ,
ईमां  बदल  गए ,  इन्सां  बदल  गए ।

बदले हैं अब  तो चाँद तारे ज़मीं आफताब,
क्या श्याम' अब कहें जो हम-तुम बदल गए ।।