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गुरुवार, 25 सितंबर 2014

या देवी सर्व-भूतेषु --नारी ..... को श्रृद्धा -नमन क्यों नहीं ?...डा श्याम गुप्त



या देवी सर्व-भूतेषु -- नारी को श्रृद्धा -नमन क्यों नहीं ?

             नवरात्र .... देवी रूपा नारी के विभिन्न भाव रूपों की पूजा का उत्सव हैं.....
तीन देवियाँ ---ग्रीस ( रोमन)

त्रि देवी ...मिस्र
पार्वती

महा भगवती --जिनका वर्णन करने में स्वयं त्रिदेव भी सक्षम नहीं


  
               सृजन की ईशत-सत्ता, परमतत्व, परब्रह्म  की कार्यकारी शक्ति जहां असीम ब्रह्म में प्रकृति, माया या आदि शक्ति है ...वहीं ससीम विश्व में वह शक्ति व नारी रूपा है | अतः परमतत्व को समझने के लिए उससे बढ़कर श्रेष्ठतर  तत्व और क्या हो सकता है| जहां देवी, दुर्गा, काली, गौरी, लक्ष्मी, राधा, सीता, योगिनी, त्रिपुर सुन्दरी आदि ... शक्ति के विभिन्न नाम-रूपों की पूजा  की जाती रही है; वहीं नारी के सखा, माँ, भगिनी, प्रेयसि, पत्नी आदि विभिन्न  सामाजिक, पारिवारिक रूप संसार जीवन-जगत में महत्वपूर्ण हैं | अतः नारी सदैव ही समाज की केन्द्रीय भूमिका में रहती आयी है| शक्ति-रूपा नारी  सदैव  ही  मानव के श्रृद्धा  अन्तःस्फूर्ति का केंद्र है  एवं सदा होना चाहिए |


                   धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष रूपी जीवन तत्व  संसार तत्व को समझने  उसकी प्राप्ति सिद्धि के लिए मनुष्य  रिद्धि-सिद्धि, योग, व्यापार, कला , राजनीति, धर्म आदि का अवलंबन लेते हैं | परन्तु जीवन तत्व स्वयं जिसका प्रलेख है एवं परमात्म-सत्ता स्वयं को व्यक्त करने हेतु जिसका आलंबन लेती है उस अखंड मातृसत्ता से अन्यथा आलंबन इस संसार चक्र के हेतु और क्या हो सकता है ?  तो उसी  "या देवी सर्व भूतेषु 
"... मातृरूपा ..नारी, स्त्री को सदैव श्रृद्धा-नमन  की दृष्टि द्वारा हम क्यों नहीं देख सकते ... क्यों उस पर अत्याचार ..अनाचार के लिए तत्पर हो जाते हैं |

शुक्रवार, 25 जनवरी 2013

वह आदि-शक्ति...डा श्याम गुप्त ...


भारत माता



ब्रह्मा-सावित्री, विष्णु-लक्ष्मी, शिव-शक्ति
वह नव विकसित कलिका बनकर,
सौरभ कण वन -वन विखराती।
दे मौन निमन्त्रण, भ्रमरों को,
वह इठलाती, वह मदमाती

वह शमा बनी झिलमिल झुलमिल ,
झकृत  करती तन -मन को ।
ज्योतिर्मय, दिव्य, विलासमयी ,
कम्पित करती निज़ तन को ॥

अथवा तितली बन पन्खों को,
त्रिदेवी
झिलमिल झपकाती चपला सी
इठलाती, सबके मन को थी,
बारी बारी से बहलाती ॥

या बन बहार निर्ज़न वन को,
हरियाली से नहलाती है।
चन्दा की उज़ियाली बनकर,
सबके मन को हरषाती है ॥

वह घटा बनी जब सावन की,
रिमझिम रिमझिम बरसात हुई।
मन के कौने को भिगो गई,
दिल में उठकर ज़ज़्वात हुई ॥

वह क्रान्ति बनी गरमाती है,
वह भ्रान्ति बनी भरमाती है।
सूरज की किरणें बनकर वह,
पृथ्वी पर रस बरसाती है॥

कवि की कविता बन अन्तस में
कल्पना रूप में लहराई
बन गई कूक जब कोयल की,
जीवन की बगिया महकाई

वह प्यार बनी तो दुनिया को,
कैसे जीयें, यह सिखलाया ।
नारी बनकर कोमलता का,
सौरभ-घट उसने छलकाया ॥

वह भक्ति बनी, मनवता को,
देवीय भाव है सिखलाया ।
वह शक्ति बनी जब मां बनकर,
मानव तब प्रथ्वी पर आया ॥

वह ऊर्ज़ा बनी मशीनों की,
विग्यान, ग्यान- धन कहलाई।
वह आत्म-शक्ति मानव मन में,
संकल्प शक्ति बन कर छाई ॥

वह लक्ष्मी है, वह सरस्वती,
वह मां काली, वह पार्वती
वह महा शक्ति है अणु-कण की,
वह स्वयं-शक्ति है कण-कण की ॥

है गीत वही, संगीत वही,
योगी का अनहद नाद वही ।
बन कर वीणा की तान वही,
मन वीणा को हरषाती है॥

वह आदि-शक्ति, वह प्रकृति-नटी,
नित नये रूप रख आती है ।


उस परम-तत्व की इच्छा बन,
यह सारा साज़ सज़ाती है ॥